भारतीय साहित्य विविध स्वर
पानी पानी तेरे कितने रूप,
जिसमें मिल जाए वैसा तेरा रूप,
बादल से बरसे तो वर्षा कहते,
आसमान की ओर उड़ जाए तो भाप कहते...
पानी पानी तेरे कितने रूप,
जिसमें मिल जाए वैसा तेरा रूप,
गिरकर जम जाए तो बर्फ कहते,
जमकर अगर गिरे तो ओले कहते...
पानी पानी तेरे कितने रूप,
जिसमें मिल जाए वैसा तेरा रूप,
फूल की पंखुड़ी पर हो तो ओस कहते,
फूल से मलमल के निकले तो इत्र कहते...
पानी पानी तेरे कितने रूप,
जिसमें मिल जाए वैसा तेरा रूप,
बड़े गड़े में जमा हो जाए तो झील कहते,
धरती पर सर सर बहने लगे तो नदी कहते...
पानी पानी तेरे कितने रूप,
जिसमें मिल जाए वैसा तेरा रूप,
पानी अपनी सीमा में हो तो जीवन देता,
पानी अपनी सीमा तोड़े तो प्रलय बन जाता...
पानी पानी तेरे कितने रूप,
जिसमें मिल जाए वैसा तेरा रूप,
सुख में दुख में आंख से -
निकले तो आंसू कहते,
मेहनत कर कर के शरीर से -
बह तो पसीना कहते...
पानी पानी तेरे कितने रूप,
जिसमें मिल जाए वैसा तेरा रूप,
मंदिर में अंजलि में पाए तो तीरथ कहते,
दूध ,दही ,शक्कर ,शहद में मिल -
जाए तो पंचामृत कहते...
पानी पानी तेरे कितने रूप,
जिसमें मिल जाए वैसा तेरा रूप...

बहुत बढ़िया, सचमुच जल अमृत तुल्य है। और आपका काव्य भी। कविराज अनंत शुभकामनाएं।
ReplyDelete