(Bharat Ki Azadi Ka Amruth Mahotsav)
अहो राष्ट्र !!
मैं अपने वन का चंदन हूं
निज मातृभूमि का वंदन हूं
दूजे की बात मैं करूं क्यों
मैं स्वयं शीर्ष अभिनंदन हूं
हारूं क्यों यूं ही निज पथ पर
मिट जाऊं एक शपथ लेकर
भीरुता की बात करूं मैं क्यूं
मैं मधुर रुदन का क्रंदन हूं
टकरा जाऊं निर्भय होकर
रणभूमि में लथपथ होकर
जीवन के झंझावातों में
मैं सहज श्याम रघुनंदन हूं
अपना वंदन तुम करो स्वयं
अपने उत्सर्ग की बात अहम्
जलती-तपती इस मरुधरा पर
नृत्य मेघाकुल अतिरंजन हूं
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मेरी जन्मभूमि मां, मेरी पालिका
गूंजित रहेगी सदा मेरी स्वर- तंत्रिका
लूं श्वास अंतिम भी, तो गोद में तेरी
है हृदय की विकल- विह्वल इच्छा घनेरी
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94725 09056
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