Wednesday, July 6

कविता, हे कविता ! - ए . सांबशिव राव (काव्य धारा)

काव्य धारा


कविता, हे कविता !


कविता,हे कविता !

      न गगन कुसुम,

      न जगत् मिथ्या,

      न प्रलय विलय,

      न अस्मिता की तलाश,

      न ईर्ष्या की जलन,

      सुस्मिता का विलास –जिजीविषा|

 

कविता, हे कविता!

आकाश का अनंत,

पृथ्वी का सहन,

पानी की तरलता,

मलय का मारुत,

सूर्य का तेज,

सुमन का सुगंध– सुधामृत|

 

कविता, हे कविता!

न विस्मय – न असमय,

न विपरीत – न अपरिचित,

न विरोध – न अवरोध,

न विभेद – न अभेद,

न विपर्याय – न अकर्मण्य,

प्रगतिशील प्रभास – विजय सुहास (विहार)|

 

कविता, हे कविता !

मेरे ह्रदय की धड़कन,

मन की चाह,

मस्तिष्क की आकांक्षा,

धैर्य की लक्ष्मी, विजय की कामना,

आजीवन का व्यवसाय,

विशब्द,अस्तब्ध - जीव की यात्रा|


ए . सांबशिव राव

हिंदी के सहाय आचार्य,

हिंदी विभाग,

एस. आर. & बी. जी. एन. आर आर्ट्स & साइंस कॉलेज (स्वायत्तशासी),

खम्मम, तेलंगाणा स्टेट – 507 002

asrhindi@gmail.com

99089 22678

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