भारतीय साहित्य विविध स्वर
समय सुबह का
धुंध बहुत थी
सामने का बिल्कुल
दिखाई नहीं दे रहा था...
लगता था मानो
बादल जमीन पर हो
ठंड के दिन...
ओस बहुत था...
पेड़ों के पते
ओस के कारण
मोहक दिख रहे थे...
ठंड इतनी थी...
बात करना कठीण हो रहा था...
कोशिश करने पर दांत बज रहे हो...
नजारा बेमिसाल था...
साथ तुम थी...
गरमागरम चाय...
सुबह मानो पुरे शबाब पर था...
धुंध बहुत थी।
अच्युत उमर्जी
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