भारतीय साहित्य विविध स्वर
ऐ दुनिया तुमने लड़की को क्या जाना,
आदमी से उसे कम माना।।
राह बदली मंजि़लें बदलीं,
तकनीकें बदली,
पर तेरी सोच ना बदली,
चाहे जितना पढ़ लिख ले,
चाहे जितना बड़ निकले,
इतना दुत्कार कर
इनकार कर,
फिर भी तेरी रूह ना मचली
ऐ दुनिया तेरी सोच ना बदली
हमेशा तुमने लड़की को पराया धन माना,
ऐ दुनिया तुमने लड़की को क्या जाना,
आदमी से उसे कम माना।।
चाहे वह मुश्किलें लाँघ ले,
चाहे वह परबते छलाँग ले,
फिर भी तेरी वाह! ना निकली
ऐ दुनिया तेरी सोच ना बदली
हमेशा उसे कटी पतंग माना
ऐ दुनिया तूने लड़की को क्या जाना,
आदमी से उसे कम माना।।
चाह तो उसकी भी होती है
कदम से कदम मिलाने की
राह तो उसकी भी तकती है
आसमान को छूने की
ज्ञान की देवी,त्याग की मूर्ति ममता का प्रतिबिंब है,
फिर भी तूने उसे दिया ताना
ऐ दुनिया तूने लड़की को क्या जाना,
आदमी से उसे कम माना।।
इसी बेटी के लिए होगा तुझे एक दिन रोना,
पड़ेगा तुझे पछताना,
तब आएगी याद उसी बेटी की,
जिसे तू कहता था यह मत करना वो मत करना
अंत में तुझे होगा पुरुषों की नगरी संभालना,
ऐ दुनिया तूने लड़की को क्या जाना,
आदमी से उसे कम माना।।
हे़च. स्वरूपा
टी.जी.टी,हिंदी
इब्राहिमपटनम।
83098 21762
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