(Bharat Ki Azadi Ka Amruth Mahotsav)
बचपन में हमने सुनी कहानी थी
दादी, नानी और माँ ने कही कहानी थी
यह बात भी कुछ समय पुरानी थी
एक 'सोने की चिड़िया' थी
अपनेपन में लिपटी एक प्यार की पुड़िया थी
खुशहाल थी वो अपने तिनकों के घर में
और माटी से लिपटे हलधर के हल में
लेकिन बूरी नजर से वो बच नहीं पाया
अपने भोलेपन के कारण उसने
अपना 'सोने की चिड़िया' नाम गवाया
फिर धीरे-धीरे लूट गया उसका संसार
क्योंकि आ पहुँचे थे, लुटेरों के सरदार
पहले मुगलों ने था लूटा
फिर खाया अंग्रेजों का इंग्लिश जुत्ता
बहुत दिनों तक लड़-झगड़कर
लाठी, गोली और सूली पर चढ़कर
सन् 47 में आजादी पायी
लेकिन 'सोने की चिड़िया' अब
नींद से उठकर ले रही थी, अंगड़ाई
और देख रही थी अपने घर को
उजड़े हूए स्वर्ण के उस घर को
हालत बूरी तो क्या, बद से बदतर थी
लेकिन फिर भी मन में खुशी की एक लहर थी
वो पुनर्जन्म था, उस चिड़िया का
और आजाद था, अब उसका बचपन
धीरे-धीरे फिर उसने उड़ना सीखा
बचपन से बढ़ गया, जवानी को कदम
अब वो चिड़िया आकाश नापती
चाँद पे भी रख रही कदम
और दुनिया कहती
देखो, यह है भारत-भू चमन
एक 'सोने की चिड़िया' है
प्यारी-सुन्दर, सबसे बड़िया है...।
वरिष्ठ अध्यापक हिन्दी
ग्राम देई, जिला बूंदी,
राजस्थान
96368 87773
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