हिंदी साहित्य के विविध रूप
गिरमिटिया
- प्रसाद राव जामि
प्रस्तावना:
गिरमिटिया
एक प्रकार का मजदूर था। जो अंग्रेजो के द्वारा कम रोटी दे कर के उन्हें बाहर मजबूरी के नाम पर दूसरे देशों में भेजा जाता था ।उसे गिरमिटिया कहते हैं।
जब अंग्रेज 17 वी शताब्दी में भारत की मजदूरों को अंग्रेजों ने रोटी रोटी के लिए मोहताज कर दिया था। तब उनको विदेशों में ले जाकर वहां उनसे काम करवाया करते थे। उनको वहां पर ले जाकर मजदूरों का काम करवाया जाता था ।उनको वहां गिरमिटिया कहा जाता था। गिरमिटिया एक अंग्रेजी के एग्रीमेंट शब्द था। गिरमिट शब्द अंग्रेजी के एग्रीमेंट शब्द का अपभ्रंश बताया जाता है। जिस कागज पर अंगूठे का निशान लगाकर लगवा कर हर साल हजारों मजदूर दक्षिण अफ्रीका या अन्य देशों को भेजे जाते थे ।उसे मजदूर और मालिक गिरमिट कहते थे। इस दस्तावेज के आधार पर मजदूर गिरमिटिया कहलाते थे।
इतिहास:
गिरमिटिया
प्रथा: अंग्रेजों द्वारा सन १८३४ से आरंभ हुई और सन १९१७ में इसे निषिद्ध घोषित किया गया। जो मजदूरों की भर्ती के लिए 19वीं शताब्दी के तीसरे दशक के आरंभ की गई ।गिरमिट प्रथा की अंतर्गत भारतीय मजदूरों से किसी बगीचे पर एक निर्धारित अवधि तक प्रायर 5 से 7 साल काम करने के लिए एक अनुबंध कराया जाता था। जिसे आम बोलचाल की भाषा में गिरमिट प्रथा भी कहते हैं।
गिरमिटिया
को भारत की देश से फिजी, ब्रिटिश, गुयाना ,डच गुयाना, त्रिनिडाड, टोबेगा, नेटाल (दक्षिण अफ्रीका)आदि देशों में भेजे जाते थे। यह सब सरकारी नियमों के अंतर्गत थे ।इस तरह का कारोबार करने वालों को सरकारी संरक्षण प्राप्त था।
गिरमिटिया की दुर्दशा:
गुलामी पैसा चुकाने पर भी गुलामी से मुक्त नहीं हो सकता था। लेकिन गिरमिटिया के साथ केवल इतनी बाध्यता थी कि वे 5 साल बाद छूट सकते थे ।गिरमिटिया छूट तो सकते थे। लेकिन उनके पास वापस भारत लौटने को पैसा नहीं होते थे। उन उनके पास उसके अलावा और कोई चारा नहीं होता था या तो अपने ही मालिक के पास काम करें या किसी अन्य मालिक के गिरमिटी
हो जाए ।वह भी बेचे जाते थे। काम ना करने काम चोरी करने पर प्रताड़ित किए जा सकते थे। आमतौर पर गिरमिटिया चाहे औरत हो या मर्द हो उसे विवाह करने की छूट नहीं थी। यदि कुछ गिरमिटिया विवाह करते भी थे। तो भी उन पर गुलामी वाले नियम लागू होते थे ।जैसे औरत किसी को बेची जा सकती थी और बच्चे किसी और को बेचे जा सकते थे। गिरमिटिया यानी पुरुष के साथ 40 फ़ीसदी औरतें जाती थी। युवा औरतों को मालिक लोग रखेल बनाकर रखते थे और उनका भरपूर यौन शोषण करते थे ।आकर्षण खत्म होने पर या औरतें मजदूरों को सौंप दी जाती थी ।गिरमिटिया की संताने मालिकों की संपत्ति होती थी। मालिक चाहे तो बच्चों से बड़ा होने पर अपने यहां काम कराएं यह दूसरों को बेच दे। गिरमिटिया को केवल जीवित रहने लायक भोजन वस्त्र आद्री दिए जाते थे। इन्हें शिक्षा मनोरंजन आदि मूलभूत जरूरतों से वंचित रखा जाता था। यह 12 से 18 घंटे तक प्रतिदिन कमरतोड़ मेहनत करते थे। अमन भी परिस्थितियों में काम करते-करते सैकड़ों मजदूर हर साल अकाल मौत मरते थे। मालिकों के जुल्म की कहीं सुनवाई नहीं थी।
गिरमिटिया
प्रथा के विरुद्ध महात्मा गांधी का सहयोग इस अमानवीय प्रथा के विरुद्ध महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका से अभियान प्रारंभ किया। भारत में गोपाल कृष्ण गोखले ने इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में मार्च 1912 में गिरमिटिया प्रथा समाप्त करने का प्रस्ताव रखा। काउंसिल के 22 सदस्यों ने तय किया कि जब तक यह मानवीय प्रथा खत्म नहीं की जाती तब तक वे हर साल यह प्रस्ताव पेश करते रहेंगे दिसंबर 1916 में कांग्रेस अधिवेशन में महात्मा गांधी जी ने भारत सुरक्षा और गिरमिटिया प्रथा अधिनियम प्रस्ताव रखा इसके 1 माह बाद फरवरी 1917 में अहमदाबाद में गिरमिटिया तथा विरोधी एक विशाल सभा आयोजित की गई इस सभा में सीएफ एंड्रयूज और हेनरी ने भी प्रथा के विरोध में भाषण दिया इसके अलावा गिरमिटिया मजदूर की प्रथा को समाप्त करने में मदन मोहन मालवीय सरोजिनी नायडू जिन्ना जैसे भारतीय नेताओं का भी बहुत बड़ा योगदान था। इसके बाद गिरमिटी विरोधी अभियान और जोरदार पकड़ता गया मार्च 1917 में गिरमिट विरोधियों ने अंग्रेज सरकार को एक अल्टीमेटम दिया कि मई तक यह प्रथा समाप्त की जाए। लोगों को बढ़ते आक्रोश को देखते हुए सरकार की गंभीरता से सोचना पड़ा 12 मार्च को ही सरकार ने अपने गजट में यह निषेधाज्ञा प्रकाशित कर दी कि भारत से बाहर के देशों को गिरमिट प्रथा की तहत मजदूर ना भेजे जाएंगे।
गिरमिटिया की अवधारणा:
सन 1800 में इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति की शुरुआत हुई ऐसे में ब्रिटेन ने एशिया अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में उपनिवेश की शुरुआत की इसके लिए उन्हें काम करने के लिए मजदूरों की जरूरत थी। जब भारत में अंग्रेजों का शासन था ।अंग्रेजों को पता था कि भारतीय लोग मेहनती होते हैं और कम पैसों में ही अपना गुजारा कर लेते हैं ।उन्होंने इसी का फायदा उठाकर भारतीयों को एग्रीमेंट पर काम कराने के लिए दूसरे देशों को भेजा गया यह अग्रिम एंटी बाद में गिरमिट बन गया और फिर गिरमिटिया कहलाया जो लोग दूसरों देशों में काम करने के लिए भेजे गए वह लोग वहीं पर बस गए और वहीं रहने लगे अवधेश उनका हो गया और अब वापस ना आते आने का अवकाश भी ना था इसलिए वहीं अपने देश को स्वीकार कर रहने लगे।
अनुबंधित का ठेका मजदूर जिन्हें गिरमिट भी कहा जाता है। आधिकारिक रूप से समाप्त हुए एक सदी से अधिक समय हो गया है ।इस प्रथा का अपना एक ठोस और कष्ट करें इतिहास है ।जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद में निहित है और जो भारतीयों को स्वैच्छिक भर्ती की आड़ में गिरमिटिया श्रमिकों के रूप में दूरस्थ स्थानों पर लेकर गया इस श्रम अनुबंध को गिरमिट के रूप में पहचान दी गई और कालांतर में उनके वंशजों को लोकप्रिय रूप में गिरमिटिया कहा गया ऐसे वंशज जो उन जगहों पर ही बस गए वह वहां के महत्वपूर्ण अंग बन गए।
त्रिनिदाद
और टोबैगो ,सूर्य नामा, जमाई का फिजी, मारीशस, मलेशिया ,दक्षिण अफ्रीका और कुछ हद तक युगांडा ,केन्या ,तंजानिया और कुछ अन्य देशों के महत्वपूर्ण हिस्से बन गए अनुबंध प्रणाली के तहत जो करीब 100 वर्षों तक चली। 19वीं शताब्दी की शुरुआत में भारतीयों के ब्रिटिश उपनिवेश में बागन श्रमिक के रूप में काम करने के लिए पहले कहीं जहाज द्वारा भेजा जाता था। अनुमान है कि लगभग 1.2 मिलन भारतीयों को 19 कॉलोनी ओ में स्थानांतरित कर दिया गया था। हालांकि सही आंकड़े नहीं होने के कारण संख्या अलग हो सकती है। कई रंगरूटों का इस्तेमाल निर्माण उद्योगों में भी किया जाता था ।खासकर अफ्रीका की पूर्वी तट पर बागानों और अन्य स्थानों में काम करने की परिस्थितियों बेहद खराब थी और वहां व्यापक तौर पर बीमारी फैली थी और उच्च मृत्यु दर थी भारतीयों के साथ स्थानीय लोगों द्वारा भी भेदभाव किया जाता था और उनकी संस्कृति एवं पारिवारिक परंपराओं के कारण उन्हें नीचा दिखाया जाता था ।जो लोग यात्रा से बच गए और अनुबंध की 5 या 10 साल की अवधि में वह या तो भारत लौट आए या अपना खुद का व्यवसाय स्थापित करने या कृषि योग्य भूमि लेकर वहीं बस गए इन मजदूरों ने जीता मानवीय परिस्थितियों में काम किया उसके कारण अनुबंध प्रणाली को काफी आलोचना हुई महात्मा गांधी जी जिन्होंने दक्षिण अफ्रीका में मजदूरों की दुर्दशा देखी थी। इसके मुखर आलोचक थे 1917 में ब्रिटिश सरकार द्वारा इस प्रणाली को आधिकारिक रूप में से समाप्त कर दिया गया था।
हालांकि तब तक इन कालोनियों में बसने वाले पूर्व भारतीय मजदूरों की संख्या अच्छी खासी हो गई थी ।प्रवासियों के इस वर्ग का स्थानीय अर्थव्यवस्था राजनीति और उपनिवेश की सामाजिक सांस्कृतिक संरचना पर व्यापक प्रभाव पड़ा इन प्रवासियों के वंशज प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति न्यायाधीशों सिविल सेवकों प्रमुख व्यापारिक नेताओं के पद तक आगे बढ़े और आज अपने दत्तक देशों में उनका बड़ा सम्मान है। वह भारत के साथ संबंध बनाए रखे हुए हैं और भारत के वंशज के रूप में गर्व से जाने जाते हैं ।कई वंशज अपनी जड़ों की तलाश करना चाहते हैं। उन बंधुओं से प्राप्त मामूली जानकारी के साथ वे इसे खोजना चाहते हैं। कई भारती अपने रीति-रिवाजों परंपराओं और भोजन की आदतों का पालन करना जारी रखे हुए हैं ।कुछ देश भारतीयों के आगमन का जश्न मनाते हैं। उनकी सफलता और समाज में योगदान का जश्न मनाते हैं। उनकी पूर्वजों द्वारा की गई मेहनत और कठिनाइयों की याद करते हैं ।इसके लिए वे सार्वजनिक अवकाश की घोषणा करते हैं। यस स्मारकों के माध्यम से उन्हें याद करते हैं। पीजी ,ग्रेनाडा , जमाईका, मारीशस ,सेंट लूसिया, सेंट विंसेंट और ग्रैनेडाइंस, सूर्य नामा ,त्रिनिदाद और टोबैगो यह सब हमारे हैं।
हम प्रवासी भारतीय दिवस की आयोजन और कई अन्य कार्यक्रमों एवं योजनाओं के जरिए दुनिया भर में भारतीय प्रवासियों के साथ जुड़े हुए हैं। हमारे पास गिरमिटिया देशों के लिए भी विशेष कार्यक्रम है। जिसके तहत हम युवाओं के साथ भारत को जाने कार्यक्रम के माध्यम से और बुजुर्गों एवं मध्यम आयु वर्गों के साथ प्रवासी तीर्थ स्थान योजना के माध्यम से जुड़ते हैं। बच्चों के लिए हमारा छात्रवृत्ति कार्यक्रम जिसे प्रवासी बच्चों के लिए छात्रवृत्ति कार्यक्रम कहा जाता है। प्रवासी बच्चों को भारतीय विश्वविद्यालयों और संस्थानों में अध्ययन करने का अवसर प्रदान करता है ।प्रवासी भारतीय दिवस के तहत विभिन्न सम्मेलन और कुछ विशिष्ट सम्मेलन जैसे कि अभी का यह विशेष सम्मेलन है। हमें दुनिया भर के प्रवासी विद्वानों विचारों को और नीति निर्माताओं के साथ जुड़ने का सक्षम बनाते हैं ।मंत्रालय भी हमारे विष्णु को प्रोत्साहित करता है और प्रवासी भारतीयों के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने के लिए अनुदान देता है। मुझे विशेष रूप से खुशी है कि कोविड-19 तीनों के बावजूद हमारी मिशन आजादी का अमृत महोत्सव यानी भारत की आजादी के 75 वर्ष मनाने के लिए प्रवास भारतीयों के साथ-साथ सांस्कृतिक गतिविधियों में हुए और विशेष रूप से गिरमिटिया इतिहास के साथ-साथ उनकी उपलब्धियां पर केंद्रित कार्यक्रम भी आयोजित किया जा रहा है।
यह उम्मीद की जाती है कि गिरमिटिया सम्मेलन गिरमिटिया देशों में भारतीय प्रवासियों के साथ-साथ अधिक संपर्क स्थापित करेगा ।इसमें भारत और संबंधित गिरमिटिया देशों के बीच राजनीति अर्थव्यवस्था और लोगों की से लोगों के बीच संपर्कों के क्षेत्र में अधिक लाभकारी संबंध बनेगा। भारतीय प्रवासी गिरमिटिया देशों के बीच आबादी का एक बड़ा हिस्सा बनाते हैं और इसे विभिन्न क्षेत्रों में विशेष रूप से बेहतर और जीवित आर्थिक एवं व्यापारिक संबंधों वैज्ञानिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने और एक दूसरे के विकास में सहायता करने के लिए एक ठोस संबंध बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
आज का सम्मेलन बदलती पहचान बदलती भूमिकाओं और रुझान जिसे इंडिया फाउंडेशन के सहयोग से आयोजित किया गया है। बहुत शमिक है ।यह सम्मेलन गिरमिट प्रवासियों के इतिहास इसके विकास और समकालीन प्रसंग तथा इसके निवास के देश के महत्व का भी पता लगाएगा प्रवासी समुदाय भारतीय संस्कृति और परंपराओं के गौरव शील मशाल वाहक रहे और भारतीय संस्कृति को अपने संबंधित राष्ट्र को लोकाचार में आत्मसात करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
भारत मे गिरमिटिया:
सर्वविदित
है कि दुनिया का कोई भी मुल्क संसाधनों के मामले में आत्मनिर्भर नहीं है। शायद यह एक बड़ी वजह है कि अलग-अलग देश अपनी जरूरतों के मुताबिक आपसी संबंध बनाते हैं। लेकिन भारत और मारीशस का रिश्ता थोड़ा अलग है। भारत में अंग्रेज राज के दौरान दोनों देशों के बीच संबंध स्थापित हुआ। यह बात अलग थी कि यह रिश्ता एक उपनिवेश का दूसरे उपनिवेश से था ।हमारी सच में अपनी जरूरतों को पूरी करने के लिए अंग्रेज बड़े पैमाने पर भारतीय मजदूरों को ले गए जिन्हें गिरमिटिया कहा जाता था। गिरमिटिया लोगों को मेहनत ने न केवल मारीशस की सूरत और औरत बदल दी भारत के साथ भावनात्मक संबंध की नींद भी पड़ी।
भारत और मारीशस के बीच रिश्ता केवल कूटनीतिक राजनीतिक और आर्थिक संबंधों के नियमों के दायरे में नहीं है। बल्कि वह एक ऐसा रिश्ता है ।जिसमें अपनापन है।
धर्म के आधार पर:
भारतीयों को जब गिरमिटिया बनाकर विदेशी में ले जाया गया तब वे अपने साथ गीता, रामायण ,महाभारत, हनुमान चालीसा, बाइबल आदि को अपने साथ ले गए। साथ ही वहां वे भारतवर्ष वंशीय अपने धर्म का स्वागत स्वागतम बंदी निष्ठा पूर्वक कि ऐसा देखा गया है कि मेरे गोरे मालिक अपने कॉलेज सरदारों के माध्यम से प्रवासी भारतीय मजदूरों में वर्ण जाति क्षेत्र और धर्म के आधार पर भेदभाव पैदा करने का पूरा प्रयास किया। करते ताकि मजदूरों में एकता कायम ना हो सके ।परंतु उनके लक्षणों के एवं पत्रिकाओं के बावजूद भी भारतीय मजदूर पूजा पाठ करते एवं जो थोड़ा बहुत पढ़े लिखे थे। वह रामायण या चालीसा का पाठ जोर-जोर से करते। जिससे कि वह भारतीय मजदूर अपने दिन भर की थकान को आसानी से मिटा सके साथ ही अपनी धार्मिक मान्यताओं को भी कायम रख सके।
संस्कृति के आधार पर:
वहां बैठक हुआ करती। जिसमें व्यक्ति अपने बातों को सबके बीच रख सके। इस दौरान में जो भी बातें होती हिंदी में तथा भोजपुरी में हुआ करती भारतवासियों का अपना एक अलग ही समाज था और आज भी है ।जिसके आधार पर वह एकता और बड़े सम्मान के साथ विभिन्न प्रमुख एवं त्योहारों का आयोजन करते आ रहे हैं। सन 1962 के पहले का समय था जब एकजुट होते थे तब लोक गीतों के माध्यम से अपनी पीड़ा की अभिव्यक्ति को मुखरित स्वर प्रदान करते थे। इसके लिए एक शाम को बैठक का पर सभी शामिल हुआ करते थे ।इस बैठक पर था कि चर्ची अभिमन्यु अनंत कृपा चौथा पुरानी ने देखा जा सकता है। बैठक में धर्म की चर्चाएं रामायण पाठ एवं हिंदी शिक्षण की जैसे महत्वपूर्ण कार्य भी होते रहे हैं ।अतः गांव में शिक्षा का माध्यम बैठक ही था जिसके माध्यम से अनपढ़ लोग भोजपुरी में बात करते जबकि पढ़े-लिखे लोग खड़ी बोली हिंदी में वार्तालाप करते हिंदी का गौरव के शासनकाल में मजदूर बालकों की शिक्षा बैठक में ही संभव हो गई थी 10 साल इसी प्रकार कहीं ना कहीं कहीं हिंदी का प्रचार उस गिरमिटिया समय की ही देन है।
लोकगीत के आधार पर:
सन 1947 में भारत के स्वाधीनता के बाद मारीशस का भारतीय समाज जागृत उन्मुक्त एवं चेतन हुआ साथी भाषा एवं संस्कृति के प्रति लोगों का उमंग एवं उत्साह का प्रखर रूप देखा गया ।लोकगीत के रूप में गाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के लोकगीत जैसे विरह गीत, बारहमासा गीत, ऋतु गीत, पर्व, त्योहार पर गाए जाने वाले गीत आदि वीरा गीत के बोल इस प्रकार के हैं।
"हमरा से दिलवा तोड़ के विदेशवा गइले ए राजा जी,
विदेशवा गइले राजा जी, निमोहिया भईल ये राजा जी।।"
रचना के आधार पर:
हिंदी भारत के राज्य की भाषा होने के साथ ही साथ-साथ देश की दुनिया की सबसे लोकप्रिय और चर्चित भाषा है जिसे बड़ी आज आबादी ने लॉन्ग लिखो पढ़ एवं बोल सकते हैं देवनागरी में लिखी जा रही है और सरल एवं मानक भाषा है यह कहने की कतई आवश्यकता नहीं है कि भाषा के प्रचार के पीछे लेखकों की सक्रियता एवं पाठकों की नेता के प्रति रुचि आदि की विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है।
गिरमिटिया का साहित्य:
गिरिराज किशोर:पहला गिरमिटिया रचना गिरिराज किशोर द्वारा रचित एक ही हिंदी उपन्यास है जो महात्मा गांधी पर आधारित है इसके नायक मोहनदास है अर्थात गांधीजी का आरंभिक रूप है इसकी भाषा हिंदी है।
रमेश चंद्र शाह:2014 का साहित्य अकादमी सम्मान सोमवार को रमेश चंद्र शाह को 78 साल की उम्र में जाकर मिला। 38 साल पहले जब तक उनका उपन्यास गोबर गणेश प्रकाशित हुआ था ।तब पहली बार उन्हें साहित्य अकादमी दिए जाने की चर्चा हुई थी।
2014 का साहित्य रमेश चंद्र शाह का नया उपन्यास विनायक उनके पिछले चर्चित उपन्यास गोबर गणेश के नायक की उत्तर कथा के रूप में आया है। गोबर गणेश संगीता एक व्यंग्य पूर्ण मनोरंजक और मार्मिक निबंध आवली है।
डॉक्टर शैलजा सक्सेना: ऋषि का हिंदी साहित्य इस रचना में हिंदी भाषा का प्रयोग और लेखन पूरे विश्व में बहुत लंबे समय से होता रहा है इस देश का अपना एक लेखन इतिहास है और हर देश में हिंदी की अपनी एक स्थिति है प्रवासी हिंदी जो आज हमारे सामने भी जी साहित्य की आई हुई है फिजी के हिंदी साहित्य पर विशेषांक का विचार है सामान्य जीवित हुआ है और सोचने पर बल पकड़ा गया है खोजने का समुंदर बने गया है और डूबने का अनेक मोती लेकर अब आपके सामने उपस्थित है विश्व के मानचित्र पर कुछ बिंदुओं के रूप में दिखने वाले इस देश की साहित्य का एक गहरा और विस्तृत इतिहास मिलता है और प्रथम सूर्योदय की तरह आशा भर भविष्य दिखाई देता है।
जोगिंदर सिंह कंवल:
फिजी के सर्वाधिक लब्ध प्रतिष्ठित लेखक माने जाते हैं फिजी के हिंदी साहित्य जगत में श्री योगेंद्र सिंह कमल एक युगांतर उपस्थित कर देने वाले रचनाकार के रूप में अवतरित हुए जोगिंदर सिंह कमल का जन्म व शिक्षण पंजाब में हुआ था पंजाबी और उर्दू भाषाओं का अधिकतर होती थी उन्होंने हिंदी में तीन काव्य संग्रह का चार उपन्यास एक कहानी संग्रह निबंध आलेख आलोचनाएं आदि विषयों पर विचार धारा प्रकट की। इनकी उपन्यास फिजी मां है।
निष्कर्ष:
कहा जा सकता है कि मारीशस, फिजी, सूरीनाम ,अभियान, त्रिनिदाद और टोबैगो आदि विभिन्न 89 देशों में भारतीय मूल के लोगों ने जो संघर्ष किया और बाद में मॉरिशस में या यूं कहा जाए कि विदेशों में अपने प्रतिभाओं को झंडे गाड़े। साथ ही जैसा भी
बन पड़ा, उन्हें हिंदी की मसाला को वहां जलाए रखा। चाहे भाषा के आधार पर हो या बोलचाल के आधार पर या धर्म एवं संस्कृति के आधार पर ही क्यों ना हो। यह सब ने अपनी हिंदी भाषा की अस्मिता को बनाए रखने में भारतवंसी मुख्य रूप से सफल हुए हैं। साथ ही साथ नई परंपराओं से गुणवान प्रवृत्तियों को प्रकाश में लाने का काम किया है। साथ ही अपने सफल प्रयास से भारतवंशियों ने इस देश को समृद्ध किया है। भारत भाषा की दृष्टि से इस बात पर ध्यान दिया गया कि भारतीय मूल के अधिकांश लोग अपनी मातृभाषा बोल पाने में अग्रसर हुए।
"उस आदमी से जाकर कहो कि
मेरी हिंदी भाषा
एक ऐसी खूबसूरत चीज है
जिसने मेरे संस्कृति को
अभी बचाए रखा है।"
हिंदी न्यू गिरमिटिया शब्द उसके मन को छलनी कर देता था ।उसका बस चलता तो था तो इसे शब्द को से निकालकर समुद्र के बीचो-बीच जाकर फेंका था। इसका कारण यह था कि कॉलेज के जंक्शन सबके सामने उसकी और उसके दोस्तों को मजाक उड़ाने के लिए उन्हें गिरमिटिया कहा करता था सभी अपमान का घूंट पीकर रह जाया करते।
आज जैक्सन जब अपने साथियों के साथ सामने से आता दिखाई दिया तो उसके दोस्त उसे समझाने लगे कि वह उसके मुंह ना लगे।
क्यों रे गिरमिटिया.... कैसे हो?
".........."
"आज तो तू कुछ बोल ही नहीं रहा? क्या गूंगा हो गया गिरमिटिया"?
"इन साले गिरमिटिया को जब फिजी से भगाया गया था सब ऑस्ट्रेलिया न्यूजीलैंड कनाडा चले गए जो निर्लज्ज थे, वह यहीं रह गए। यह लोग वही है।"
अब उसके धैर्य का बांध टूट गया।
"बाहर से आकर फिजी में अपना हक जताने वाले गिरमिट..... चुप हो जा।"
लेकिन आज उसका क्रोध सातवें आसमान पर था।
"हां हां हां...... मेरे पिताजी गिरमिटिया थे हमारा सारा खानदान गिरमिटिया है हम भले ही भारत मूल के हैं लेकिन हम किसी को अपना देश मानते हैं क्योंकि हम सभी सी मिट्टी में पले बढ़े हुए हैं।"
"हमारे देश में भार मन कर जी रहे हो और बातें बातें बड़ी-बड़ी करते हो...... सुन ले गिरमिटिया, हम मूल निवासी हैं, यह हमारा देश है, तुम्हारे जैसे गिरमिटिया का नहीं।"
प्रसाद राव जामि
साहित्यकार
6301 260 589
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