Friday, May 13

मैथिलीशरण गुप्त जी के साहित्य में नारी भावना - रफीखा बेगम 'शायरिन' (साहित्य तरंग)

साहित्य तरंग

मैथिलीशरण गुप्त जी के साहित्य में नारी भावना

रफीखा बेगम 'शायरिन'

                                                                                                   

जीवन परिचय :     

    मैथिलीशरण गुप्त जी का जन्म 3 अगस्त 1886 को उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के चिरगांव नामक गांव में हुआ। उनके माता-पिता काशीबाई और रामचरण गुप्त थे। बचपन से ही वे साहित्य के प्रति रुचि रखते थे। उन्होंने हिंदी, संस्कृत, बंगला, मराठी और अंग्रेजी साहित्य का अध्ययन किया। आजीवन साहित्य साधना में लीन रहे। उनकी महान साहित्य सेवाओं को देखकर, भारत सरकार ने उन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि प्रदान की। 12 दिसंबर 1964 को उनका देहांत हो गया। 

    श्री मैथिलीशरण गुप्त जी खड़ी बोली के प्रथम महत्त्वपूर्ण कवि हैं। गुप्त जी का झुकाव गीतिकाव्य की ओर था और उनकी रचनाओं में राष्ट्रप्रेम मिलता है।  इनके काव्य में भारतीय संस्कृति का प्रेरणाप्रद चित्रण हुआ है।    

    इन्होंने अपनी कविताओं द्वारा राष्ट्र में जागृति तो उत्पन्न की ही, साथ ही सक्रिय रूप से असहयोग आन्दोलनों में भी भाग लेते रहे, जिसके फलस्वरूप इन्हें जेल भी जाना पड़ा।


गुप्त जी के साहित्य में नारी की भावना:-

    गुप्त जी की रचनाओं में राष्ट्रीयता समाज सुधार युगबोध के साथ-साथ भारतीय संस्कृति एवं नारी का भी चित्रण हुआ है। गुप्त जी ने अपने महाकाव्य साकेत में विरहिनी उर्मिला ममतामई मां कैकेई का तथा यशोधरा खंडकाव्य में यशोधरा तथा विष्णु प्रिय में नायिका का चित्रण अद्भुत ढंग से किया। नारी के प्रति सहानुभूति प्रकट करते हुए वे कहते हैं -

    "अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी,

    आंचल में दूध है और आंखों में पानी।" 

नारी को पुरुष से श्रेष्ठ मानते हुए भी कहते हैं-

    "एक नहीं दो-दो मात्राएं नर से भारी नारी।" 

    गुप्तजी नारी पर लगाए गए बंधनों का विरोध करते हैं पुरुष नारी पर विश्वास नहीं करता यह विडंबना ही है कि पुरुष के तो दोष क्षम्य हैं पर नारी का एक भी दोष क्षम्य नहीं होता। वह अत्याचार व शोषण का शिकार होती है। इस संदर्भ में वे कहते हैं-

    "अधिकारों के दुरुपयोग

    कौन कहां अधिकारी 

    कुछ भी स्वत्व नहीं रखती क्या अर्धांगिनी तुम्हारी?"

    जन्म दात्री होकर भी नारी को अपशब्द सुनना पड़ता है। उस पर  क्रूरता दिखाना उसका अत्याचार करना उचित नहीं है। इस संदर्भ में कहते हैं-

    "उपजा किंतु विश्वासी नर हाय! तुझी से नारी 

    जाया होकर जननी भी है, तू ही पाप पिटारी।" 

    गुप्तजी ने नारी के विविध रूपों का भी चित्रण किया। बेटी से बहू, मां, गृहिणी, प्रिया, कहीं पति के वियोग को सहने वाली तो, कहीं विधवा। कहीं वीरांगना के रूप में हैं तो, कहीं समाज सेविका के रूप में भी है। 

    साकेत में उर्मिला ने पति लक्ष्मण के मार्ग में बाधा नहीं बनती वह अपने प्रिय पति को वन जाने देती।

    गुप्त कृति यशोधरा में भी नायिका को अपने प्रिय से यही शिकायत होती है कि वह बता कर जाते।

    "सखि वे मुझसे कहकर जाते,

    सिद्धि हेतु स्वामी गए यह गौरव की बात 

    पर चोरी चोरी गए यही बड़ी व्याघात।" 

    चित्रकूट में सीता अपनी कुटिया को ही राजमहल मानती है। पति के साथ अपने आप को सौभाग्यवती समझती है। गुप्त जी ने सीता को आदर्श नारी के रूप में चित्रित किया है।

    उर्मिला को अपने रूप का दर्प है वह कामदेव को फटकार लगाती है।

    यशोधरा में भी गौतम बुद्ध जब वन से लौटते हैं तो वे उनसे मिलने नहीं जाती। बुद्ध स्वयं उनसे मिलने जाते हैं।

    गुप्त जी कहते हैं कि 

    "मानी नहीं मानता जो लो रही तुम्हारी बान, 

    दामिनी आए स्वयं द्वार पर यह भव्यत्र भवान।" 

    गुप्त गुप्त जी ने नारी को गौरवपूर्ण स्थान दिया है। उन्होंने अपने काव्य में उसके गौरवपूर्ण रूपों को अकेरा है।

    गुप्त जी की नारी भावना उदात्त भाव की है वह नारी को आदर्श रूप में स्थापित करते हैं।

   गुप्त जी के प्रायः सभी काव्य पात्र ऐतिहासिक अथवा पौराणिक हैं परंतु उनमें आधुनिक युग की संवेदना और मानवता है। ये सभी अलौकिक ना होकर लौकिक जगत की साधारण नारियां हैं।

रफीखा बेगम 'शायरिन'

अध्यापिका

जिला परिषद सेकंडरी पाठशाला रामपूर

मं. काजीपेट, जि. हनुमकोंडा

फोन नं. 7093716276

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