Friday, May 13

समाज का दर्पण है प्रेमचंद की कहानी -- अवुसुला श्रीनिवासा चारी ‘ शिक्षा रत्न ’(साहित्य तरंग)

साहित्य तरंग

समाज का दर्पण है प्रेमचंद की कहानी

                                                                                                   -- अवुसुला श्रीनिवासा चारीशिक्षा रत्न

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 प्रेमचंद का जीवन परिचय :


    मुंशी प्रेमचंद जी का जन्म 31 जुलाई ,1880 में वाराणसी जिले से 4 मील दूर लमही ग्राम में हुआ था। इनका बचपन का नाम धनपथ राय था। वे अपनी कहानियां उर्दू में नवाबराय के नाम से लिखते थे। गरीब परिवार में जन्म लेने तथा अल्पायु में ही पिता की मृत्यु हो जाने के कारण उनका बचपन अत्यधिक कष्ट में रहा।

         प्रेमचंद के पिता अजायब लाल और माता आनंदी देवी थी। प्रेमचंद का कुल दरिद्र कायस्थों का था। जिसके पास करीब 6 बीघे जमीन थी और परिवार बड़ा था। प्रेमचंद के पितामह मुंशी गुरु सहाय लाल पटवारी थे। उनके पिता मुंशी अजायब लाल डाक मुंशी थे और उनका वेतन लगभग ₹25 मासिक था। उनकी मां आनंदी देवी सुंदर , सुशील महिला थी। 6 महीने की बीमारी के बाद प्रेमचंद की मां की मृत्यु हो गई तब वे आठवीं कक्षा में पढ़ रहे थे।

        दो वर्ष के बाद उनके पिता ने फिर दूसरा विवाह कर लिया और उनके जीवन में विमाता का अवतरण हुआ। जब प्रेमचंद 15 वर्ष के थे उनका विवाह हो गया। उनकी पत्नी बहुत ही कुरूप और उम्र में भी उनसे बड़ी थी। यह विवाह उनके सौतेले नाना ने तय किया था। वह झगड़ालू पत्नी गरीबी का कारण बताकर मायके चली गई और वापस नहीं आई।

        उनका दूसरा विवाह 1905 में बाल विधवा शिवरानी देवी से हुआ। शिवरानी देवी के पिता फतेहपुर के पास के इलाके में एक जमींदार थे और शिवरानी जी के पुनः विवाह के लिए उत्सुक थे। दूसरे विवाह के बाद उनके जीवन में परिस्थितियां कुछ बदली और उनकी आर्थिक तंगी कम हुई। इनके लेखन में अधिक सजगता आई। प्रेमचंद की पदोन्नति हुई तथा यह स्कूलों के डिप्टी इंस्पेक्टर बना दिए गए।

       इसी खुशहाली के जमाने में प्रेमचंद की पांच कहानियों का संग्रह सोजे वतन प्रकाश में आया। शिवरानी देवी जी की पुस्तकप्रेमचंद घर मेंप्रेमचंद के घरेलू जीवन का राजीव और अंतरंग चित्र प्रस्तुत करती है प्रेमचंद अपने पिता की तरह पेचिश के शिकार थे और निरंतर पेट की व्याधियों से पीड़ित रहते थे।

 

 साहित्यिक परिचय :

       मुंशी प्रेमचंद जी ने लगभग एक दर्जन उपन्यासों एवं 300 कहानियों की रचना की। उन्होंने माधुरी एवं मर्यादा नामक पत्रिका का संपादन किया तथा हंस एवं जागरण नामक पत्र भी निकाला। उनकी रचनाएं आदर्शोंन्मुख़ यथार्थवादी है। जिनमें सामान्य जीवन की वास्तविकता का सम्यक चित्रण किया गया है। समाज सुधार एवं राष्ट्रीयता उनकी रचनाओं के प्रमुख विषय रहे हैं।

 रचनाएँ :

        प्रेमचंद जी के प्रसिद्ध उपन्यास - सेवासदन , निर्मला , रंगभूमि , कर्मभूमि , गबन , गोदान आदि हैं। उनकी कहानियों का विशाल संग्रह 8 भागों में मानसरोवर के नाम से प्रकाशित है , जिसमें लगभग 300 कहानियां संकलित हैं।

       कर्बला , संग्राम और प्रेम की वेदी उनके नाटक हैं। साहित्यिक निबंध  कुछ विचारनाम से प्रकाशित हैं। उनकी कहानियों का अनुवाद संसार की अनेक भाषाओं में हुआ है।

       प्रेमचंद जी ने हिंदी कथा साहित्य में युगांतर उपस्थित किया। उनका साहित्य समाज सुधार और राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत हैं। वह अपने समय की सामाजिक तथा राजनीतिक परिस्थितियों का पूरा प्रतिनिधित्व करता है। देश में किसानों की दशा सामाजिक बंधनों में तड़पती नारियों की वेदना और वर्ण व्यवस्था की कठोरता के भीतर संत्रस्त हरिजनों की पीड़ा का मार्मिक चित्रण मिलता है।

     मुंशी प्रेमचंद की सहानुभूति भारत के दलित जनता , शोषित किसानों , मजदूरों और अपेक्षित नारियों के प्रति रही है। सामाजिकता के साथ ही उनके साहित्य में ऐसे तत्व विद्यमान हैं ,जो उसे शाश्वत और स्थाई बनाते हैं। मुंशी प्रेमचंद जी अपने युग के उन सिद्ध कलाकारों में से एक थे जिन्होंने हिंदी को नवीन यु्ग की आशा आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का सफल माध्यम बनाया।

 भाषा :

 मुंशी प्रेमचंद जी उर्दू से हिंदी में आए थे। अतः उनकी भाषा में उर्दू की लोकोक्तियां तथा मुहावरों के प्रयोग की प्रचुरता मिलती है।

      इनकी भाषा सरल , सहज , व्यवहारिक , प्रवाह पूर्ण , मुहावरेदार एवं प्रभावशाली है तथा उसमें अद्भुत व्यंजना शक्ति भी विद्यमान है। मुंशी प्रेमचं की भाषा पात्रों के अनुसार परिवर्तित हो जाती है।

     इनकी भाषा में सादगी एवं अलंकारिकता का समन्वय विद्यमान है। बड़े भाई साहब , नमक का दरोगा , पूस की रात आदि इनकी प्रसिद्ध कहानियां है।    

 शैली :

     इनकी शैली आकर्षक है इसमें मार्मिकता है। उनकी रचनाओं में चार प्रकार की शैलियां उपलब्ध होती हैं। वे इस प्रकार हैं - वर्णनात्मक , व्यंग्यात्मक , भावात्मक तथा विवेचनात्मक। चित्रात्मकथा मुंशी प्रेमचंद की रचनाओं की विशेषता है।

 

उनकी कुछ कहानियां इस प्रकार हैं --

                                                         

नमक का दरोगा

     कहानी आजादी के पहले की है। नमक का नया विभाग बना। विभाग में अच्छी कमाई बहुत ज्यादा थी। इसलिए सभी व्यक्ति इस विभाग में काम करने को उत्सुक थे।

      मुंशी वंशीधर ने फारसी प़ढी और रोजगार की खोज में थे। उनके घर की आर्थिक दशा खराब थी। वंशीधर के पिताजी ने उसे समझाया था कि ऐसी नौकरी करना जिसमें ऊपरी कमाई अच्छी हो और आदमी तथा अवसर देखकर घूस जरूर लेना।

    वंशीधर को भाग्य से नमक विभाग के दरोगा पद की नौकरी मिलती है। पिताजी बहुत खुश थे। वंशीधर अच्छे आचरण और कार्य कुशलता से सभी अधिकारियों का दिल जीता।

     जाड़े के समय एक रात उस इलाके के सबसे प्रतिष्ठित जमींदारपंडित अलोपीदीनकी गाड़ियां यमुना नदी का पुल पार कर रही थीं, जिसमें नमक था।वंशीधर उन गाड़ियों को रोका। अलोपीदीन बंशीधर को रिश्वत लेकर गाड़ियां छोड़ने को कहा। वंशीधर अपने कर्तव्यों पर अडिग रहा। पंडित को गिरफ्तार करवाया और अदालत में पेश करवाया। सारे वकील और गवाह पंडित जी के पक्ष में थे वंशीधर के पास केवल सत्य का बल था।

      अलोपीदीन तो सबूत के अभाव में रिहा कर दिया गया। वंशीधर के उद्दंडता और विचार हीनता के बर्ताव पर अदालत ने दुख जताया , जिसके कारण एक अच्छे व्यक्ति को कष्ट झेलना पड़ा। वंशीधर को व्यंग्य बाणों को सहना पड़ा। एक सप्ताह के अंदर कर्तव्यनिष्ठा का दंड मिला और नौकरी से हटा दिया गया।

     पराजित और खेद से व्यतीत अपने घर पहुंचा, तो पिताजी ने कड़वी बातें सुनाए। उनकी माता को भी दुख हुआ। पत्नी ने कई दिनों तक सीधे मुंह तक बात नहीं की। एक सप्ताह बीत गया। संध्या का समय था। वंशीधर के पिता राम नाम की माला जप रहे थे तभी वहां एक सजा हुआ एक रथ आकर रुका। पिता उसमें अलोपीदीन को देखकर झुककर उन्हें दंडवत किया और चापलूसी भरी बातें करने लगे साथ ही अपने बेटे को कोसा।

       पंडित जी ने बताया कि उन्होंने कई रईसों और अधिकारियों को देखा तथा सबको अपने धन बल पर का गुलाम बनाया ऐसा पहली बार हुआ , जब कोई व्यक्ति ने अपनी कर्तव्यनिष्ठा द्वारा उन्हें हराया हो। ऐसा कहते हुए पंडित जी एक स्टांप लगा हुआ पत्र निकाला और उनकी प्रार्थना को स्वीकार करने के लिए कहा। उन्होंने वंशीधर को अपनी सारी संपत्ति का स्थाई मैनेजर नियुक्त किया था। पंडित जी ने वंशीधर को खुशी से गले लगा लिया।

इस कहानी में --

         प्रेमचंद जी की इस कहानी में सरलता , सहजता और मार्मिकता दिखाई देती है। साथ-साथ प्रेमचंद की समाज सुधार  की भावना को हम देख सकते हैं। भ्रष्टाचार के प्रति अरुचि और धर्म के प्रति रुचि को देख सकते हैं।

      कष्टों और अपमानों से झेलना पड़ता है लेकिन इसमें यह भी दिखाया गया है कि ऐसे लोगों को अंत में मीठा फल मिलता है। वंशीधर की कर्तव्यनिष्ठा और धर्म निष्ठा से हमें सीखने को मिलता है कि आदमी को कष्ट समय में भी अपने कर्तव्यनिष्ठता और धर्मनिष्ठता को नहीं छोड़ना चाहिए।

     इसमें कानून और न्याय से बड़ा धर्म को बताया गया है। धर्म के मार्ग पर चलने वालों की उन्नति कैसे होती है ? इसे हम इस कहानी में देख सकते हैं।

                                                             

पूस की रात

 

 कहानी का सारांश :

           पूस की रात कहानी ग्रामीण और किसान के जीवन की दुर्दशा को बताने वाली कहानी है। इस कहानी का नायक मामूली किसान है। उसके पास थोड़ी - सी जमीन होती है। जिस पर खेती करके वह अपना जीवन गुजारा करता है। लेकिन खेती से जो भी पैसे मिलते हैं वे ऋण चुकाने में ही चले जाते हैं। रोजी रोटी के लिए उसे मजदूरी भी करना पड़ता था। उसने मजदूरी करके बड़ी मुश्किल से ₹3 इकट्ठे किए हैं। लेकिन वह ₹3 भी महाजन ले जाता है। उसकी पत्नी मुन्नी इसका बहुत विरोध करती है किंतु वह भी अंत में लाचार हो जाती है।

     हल्कू हर रात अपनी फसल की देखभाल के लिए उसका पालतू कुत्ता जबरा के साथ जाता था। पौष के महीने की ठंड से बचने के लिए उसके पास केवल एक चादर था। ठंड से बचने के लिए वह लाख कोशिशें करता है जैसे - कुत्ते से बात करते हुए ठंड को महसूस करने की भावना को भूलने की कोशिश करना , पास के आम के बगीचे से पत्तियां इकट्ठा कर अलाव जलाना आदि। ठंड बहुत सता रही थी। वह चादर ओढ़े बैठा रहता है। खेत में नीलगायें घुस जाती हैं और पूरे खेत को चरने लगती हैं। जबरा उनकी आहट से सावधान होकर भोंकने लगता है। लेकिन अपनी थकान और ठंड के कारण वह नीलगायों को भगाने नहीं जाता है। इससे नीलगायें पूरी खेत को नष्ट कर देती हैं। हल्कू के मन में एक असंतृप्त , असहाय की भावना थी। वह सोच रहा था कि जब इस खेत से रोजी-रोटी भी नहीं मिलता है तो इसे बचाने से क्या फायदा एक बार नीलगायों को भगाने उठता भी है। दो तीन कदम चलता है , लेकिन ठंड के तेज झोंके के कारण वह फिर अलाव के पास बैठ जाता है। जाने की हिम्मत नहीं कर पाता।

      वह चादर ओढ़कर सो जाता है। सुबह उसकी पत्नी उसे जगाती है और कहती है कि सारी फसल नष्ट हो गई है। तब हल कहता है कि हो जाने दो कम से कम रात को ठंड में यहां सोना तो ना पड़ेगा।

इस कहानी में --

        प्रेमचंद जी ने इस कहानी के जरिए यह बताने की कोशिश किया है कि भारत में अधिकतर किसानों की दशा ऐसी ही दुखद है। अधिकतर किसान अपनी उन्नति के बारे में सोचना तो दूर अपने वर्तमान की स्थिति को बचाने के लिए ही कष्टों से झेल रहे होते हैं।

        मुन्नी के माध्यम से प्रेमचंद ने आर्थिक तंगी से अपने परिवार को बचाने की कोशिश करना और उसकी निस्सहायता को दर्शाया है। अपने पति की दुर्दशा को देखकर दुखित होने के सिवा कुछ भी नहीं कर सकती। वह अपने पति को खुश देखना चाहती थी। लेकिन विवश थी।

                                                        

दो बैलों की कथा

       यह कहानी दो बैलों के बारे में है जो अपने मालिक से बेहद प्यार करते थे और जिनमें आपस में भी गहरी मित्रता थी। दोनों बैल स्वाभिमानी , बहादुर और परोपकारी थे। उनका मालिक उन्हें बड़े स्नेह भाव से देखता था।

      झूरी काखी के पास हीरा और मोती नाम के दो स्वस्थ और सुंदर बैल थे। वह अपने बैलों से बहुत प्रेम करता था। हीरा और मोती के बीच भी घनिष्ठ संबंध था एक बार जूरी ने दोनों को अपने ससुराल के खेतों में काम करने के लिए भेज दिया। वहां उनसे खूब काम करवाया जाता था और खाने में रूखा - सूखा मिलता था। इसलिए दोनों रस्सी तोड़कर झुरी के पास भाग आए। उन्हें देख कर झूरी खुश हुआ लेकिन झूरी की पत्नी को पसंद नहीं आया मजदूर द्वारा उन्हें सूखा - भूसा खिलाया करती थी।

     झूरी का साला फिर उन्हें ले जाकर काम करवा लिया और सूखा - भूसा ही खाने को दिया। मोती बड़ा गुस्सैल ही था। हीरा धीरज से काम लेता था। उस घर में दोनों की हालत बहुत खराब थी। उस घर में एक छोटी सी लड़की रहती थी। उसकी मां मर चुकी थी। उसकी सौतेली मां उसे मारती रहती थी। इसलिए उन बैलों से एक प्रकार की आत्मीयता हो गई थी। चोरी-छिपे दो रोटियां डाल जाती थी। एक दिन वह उनकी रस्सियाँ खोल दी। दोनों बैल भाग खड़े हुए। एक नई जगह पहुंच गए। झूरी के घर का रास्ता भूल गया। फिर भी बहुत खुश थे।

             अपनी भूख मिटाने एक खेत में चरने लगे। इतने में उस खेत के मालिक आकर मोती को पकड़ लिया। इसे देखकर हीरा भी खुद फँसा। मालिक उसे कांजीहाउस में बंद कर दिया। एक दिन दीवार गिरा कर दोनों ने दूसरे जानवरों को भगा दिया। मोती भाग सकता था लेकिन हीरा को बंधा देखकर वह भी भाग ना सका।

      एक सप्ताह बाद कांजीहाउस के मालिक ने जानवरों को कसाई के हाथों बेच दिया। एक दढियल आदमी हीरा मोती , को ले जाने लगा। चलते - चलते उन्हें लगा कि वे परिचित राह पर गए हैं। दोनों उन्मत्त होकर उछलने लगे और दौड़ते हुए झूरी के द्वार पर आकर खड़े हो गए। झूरी ने देखा तो खुशी से फूल उठा। अचानक दढियल ने आकर बैलों की रस्सी पकड़ा। झूरी ने कहा वे उनके बैल हैं। पर दढ़ियल ने जोर - जबरदस्ती करने लगा। तभी मोती ने सींग चलाया और दढियल को दूर तक खदेड़ दिया। घर की मालकिन ने भी आकर दोनों को चूम लिया।

 इस कहानी में --

          प्रेमचंद ने बताया कि किसान और बैलों के बीच आपसी प्यार कैसा होता है ? किसान अपने खेत में काम करने वाले पशुओं को अपने परिवार के सदस्य ही मानते हैं। उन्हें अपने बेटों की तरह पालते हैं। इसमें भारतीय संस्कृति झलकती है।

          पशुओं में भी वे गुण होते हैं जो सज्जनों में होते हैं। जैसे - अपने मालिक के प्रति प्रेम और विश्वास दिखाना उनके प्रति त्याग की भावना के साथ-साथ आपसी मित्रता और प्यार को भी देख सकते हैं। भागने का मौका मिलने पर भी अपने मित्र के लिए रुक जाना इसका प्रतीक है। अन्य प्राणियों से प्यार करना , अपने मालिक के प्रति विश्वास पात्र बनकर जीना , दूसरों की सहायता करना इस कहानी से हम सीख सकते हैं।

 

                                                                      

कफन

     झोपड़े के दरवाजे पर घीसू और माधव हाथ सेंकने के लिए जलाई हुई आग के सामने चुपचाप बैठे हुए थे। अंदर बेटे की जवान बीबी बुघिया जो मां बनने वाली थी , वह दर्द में कराह रही थी। रह - रह कर उसके मुंह से दिल दहला देने वाली आवाज निकल रही थी। कड़ाके की ठंड थी। रात का वक़्त था। पिता घीसू ने कहा तेरी बीबी दर्द के मारे चिल्ला रही है। एक बार देखकर तो आ। बेटे ने कहा - वैसे तो मरने ही वाली है मैं देख कर क्या करूंगा।

         बाप और बेटे दोनों ऐसे व्यक्ति थे जो बिल्कुल कामचोर हैं। काम पर जाते भी हैं तो ठीक से नहीं करते। इसलिए उन्हें कोई काम पर नहीं बुलाते। आधा घंटा काम करते हैं तो एक घंटा हुक्का पीते हुए आराम करते हैं। कुछ पैसे हाथ में होते हैं तो पूरे खर्च होने तक काम पर नहीं जाते। घर की चिंता बिल्कुल नहीं थी। घीसू की पत्नी कई दिन पहले मर चुकी थी। माधव की शादी एक साल पहले हुई थी। उसकी पत्नी अब मां बनने वाली है। वह डिलीवरी की दर्द से चिल्ला - चिल्लाकर सहायता की अपेक्षा कर रही थी। यहां दोनों बाप बेटे आलू जलाकर खा रहे थे।

       सारी रात वह चिल्लाती रही और बाप - बेटे आराम से सो गए। सुबह देखा तो वह मर चुकी थी। बाप - बेटे दोनों चिल्ला - चिल्लाकर रोने का नाटक कर रहे थे। अंतिम संस्कार के लिए लोग तरस खाकर पाँच रुपये जमा करके दिए। कफन खरीदने के लिए बाप और बेटे शहर पहुंचे। वहां शाम तक घूम - घूमकर एक शराब घर में पहुंचे। कफन खरीदने के लिए दिए गए पैसों से खूब शराब पिए और पेट भर खाये।

 इस कहानी में --

 मुंशी प्रेमचंद जी की यही तो खासियत थी कि वह बड़े हल्के - फुल्के अंदाज़ में ऐसी बातें रख देते थे जो आत्मा को झकझोर देती हैं हमें सोचने पर मजबूर कर देती हैं।

        इस कहानी में प्रेमचंद जी ने अमीर और गरीब के जीवन में जो अंतर होता है , उसे आंखों के सामने रखा है। इस कहानी के जरिए प्रेमचंद ने यह भी बताने की कोशिश किया है कि समाज में ऐसे भी गरीब हैं जिसके पास कफ़न खरीदने के लिए भी पैसे नहीं होते हैं। लोग मरने के बाद कफ़न खरीदने के लिए पैसे दान में देते हैं। लेकिन जीवित रहते समय कोई किसी की सहायता नहीं करते।

       शराब कितनी भयानक चीज़ है ? यह भी हम इस कहानी की सहायता से जान सकते हैं। श्रम की महत्ता को भी हम इस कहानी के जरिए जान सकते हैं।

         इस कहानी के द्वारा हम यह भी सीख सकते हैं कि परिवार के लोगों के प्रति हमारा क्या दायित्व होते हैं ? यह एक ऐसी कहानी है जिसे पढ़कर हर कोई भावुक हो जाता है और आँसू बहाये बिना रह नहीं सकता।

 

                                                                   

ईदगाह

       रमजान के पूरे तीस रोजों के बाद ईद आई है। कितना मनोहर , कितना सुहावना प्रभात है। वृक्षों पर अजीब हरियाली है। खेतों में कुछ अजीब रौनक है। आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है।

         गांव में कितनी हलचल है। ईदगाह जाने की तैयारियां हो रही हैं। बच्चे बहुत खुश हैं। पूरे  गांव में ईद का वातावरण है। बच्चे ईदगाह जाने के बाद मेले में घूमने और अच्छी-अच्छी चीजें खरीदने की योजनाएं बना रहे हैं। सभी बच्चों को मेले में खिलौने और मिठाइयां खरीदने के लिए पैसे दिए गए हैं। खुशी से उन पैसों को वह बार-बार गिन रहे थे।

         हामिद चार-पांच साल का दुबला - पतला लड़का था। उसके पिता हैजे के कारण चल बसे थे। उसकी मां भी किसी अनजान बीमारी के कारण परलोक सिधार गई। वह अपनी दादी के पास रहता था। छोटा बच्चा होने के नाते यह उसके समझ के बाहर की बात थी कि उनके माता-पिता कभी नहीं आएंगे

         वे बहुत गरीब थे। ईद का दिन है और घर में दाना तक नहीं है। उसकी दादी अमीना बड़ी मुश्किल से दो रोटियां खिला पाती थी। हामिद भी ईदगाह जाना चाहता था। हामिद को तीन कोस दूर पैदल और अकेले भेजने से अमीना डर रही थी। मेले में  कुछ खरीद कर  खाने के लिए तीन पैसे बड़ी मुश्किल से इकठ्ठा कर दे पाई थी।

        मेले में सभी लड़के अपने मनपसंद खिलौने और मिठाइयां खरीद रहे थे। हामिद दूर खड़ा चुपचाप देख रहा था। हामिद को लोहे की चीजों की दुकान में चिमटे को देखते ही घर में रोटियां तवे से उतारते समय दादी की उंगलियां जल जाने की बात याद आती है। इसलिए वह अपने लिए कुछ ना खरीद कर अपनी दादी के कष्ट को दूर करने के लिए तीन पैसों से चिमटा खरीदता है। वह यह भी  कल्पना करता है कि दादी और सारे गांव के लोग उसका शाबाशी करेंगे। सारे गांव में उसी के बारे में चर्चा करेंगे। लेकिन वह जब घर वापस आता है , तो उसके विपरीत ही देखने को मिलता है। हामिद अपनी दादी को समझाता है कि तुम्हारी उंगलियां तवे से रोटियाँ उतारते समय जल जाती थीं। यह मुझसे देखा ना जाता था अम्मा। इसलिए मैं इसे लिवा लाया। इस बात को सुनते ही अमीना का क्रोध तुरंत स्नेह में बदल गया। वह उस बच्चे के लिए अल्लाह से दुआएं मांगने लगी और उसकी आँखों से बड़ी - बड़ी आंसुओं की बूंदें गिर रही थीं।

  इस कहानी में --

        मुंशी प्रेमचंद की यह कहानी बाल मनोविज्ञान पर आधारित है। जिसमें एक बालक के इर्द-गिर्द पूरी घटना घूमती रहती है। कहानी अंत तक रोचक और कौतूहल उत्पन्न करता है।

        इस कहानी में प्रेमचंद की भाषा सजीव , मुहावरेदार तथा बोलचाल के निकट , तत्सम और उर्दू शब्दों का सुंदर प्रयोग , किया गया है भावपूर्ण , वर्णनात्मक तथा संवादात्मक शैली का सुंदर प्रयोग किया गया है। इस कहानी में बच्चों की मासूमियत को सफलतापूर्वक और सुन्दर ढंग से दिखाया गया है। हम यह भी जान सकते हैं कि बच्चों का प्यार कितना निर्मल होता है।

         हामिद के माध्यम से प्रेमचंद्र जी ने निस्वार्थ , त्याग , बड़े बुजुर्गों का ख्याल रखना , बड़ों का आदर करना , प्यार , त्याग , मित्रता की महत्ता और स्वाभिमान जैसे गुणों का परिचय दिया है।

        अमीना के माध्यम से बच्चों के प्रति त्याग , वात्सल्य जैसे गुणों का परिचय देते हुए यह भी बताया गया है कि गरीबी कितनी भयानक होती है।


 अवुसुला श्रीनिवासा चारी  ‘ शिक्षा रत्न

तुनिकी गाँव , कौड़ीपल्ली मण्डल , मेदक जिला ,

तेलंगाना राज्य  - 502316

83281 91672

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