काव्य धारा
- तस्लीम फातिमा
माँ पर कोई कविता लिखूँ, ऐसा साहस नहीं मुझमें I
ममता को शब्दों में सीमित कर दूँ, ऐसा सामर्थ्य नहीं मुझमें II
माँ की ममता का साया, साहस भरता है मुझमें I
जब भी मैं थक जाऊँ जीवन से, जीवन भरता है मुझमें II
माँ तो वो है जो खुद को खोकर, खुद को पाती है मुझ में I
आँसू सारे पीकर भी वो, खुशियाँ भरती है मुझमें Il
जननी कह देने भर से, माँ परिपूर्ण नहीं होती I
केवल जन्म देकर कोई, माता नहीं वो कहलाती ll
माँ तो वह है जो बच्चों को, हर पल जीवन सिखलाती I
अंधियारे में राह दिखाकर ,उजियारा जीवन में फहराती Il
दुःख में धैर्य धरे कैसे हम, मैं ने माँ से सीखा है I
हर मुश्किल पार करे कैसे हम, मैं ने माँ से सीखा है Il
बच्चों संग वह बच्ची बनकर, सब कुछ माँ ही सिखलाये I
इतना ज्ञान सिखलाकर भी, मेरी माँ भोली कहलाये Il
माँ रिश्तों का संगम बनकर, हर पात्र में जीना चाहती है I
खुद को खोकर भी बच्चों को, वो सब कुछ देना चाहती है Il
तुझ को परिभाषित कर पाऊं, तेरे कदमों तले स्वर्ग को पाऊं I
बिन आशीष कुछ भी कर पाऊं, ऐसा धैर्य नहीं मुझमें II
तुझ पर कोई कविता लिखूं, ऐसा साहस नहीं मुझमें I
शब्दों में सीमित करदूँ तुझको, ऐसा सामर्थ्य नहीं मुझमें II
तस्लीम फातिमा
हिन्दी पंडित,
ZPHS खिलाशाहपूर,
रघुनाथपल्ली,
जनगाँव,
पिन 506244
99663 42656


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