Friday, May 20

माँ - तस्लीम फातिमा (काव्य धारा)

काव्य धारा




माँ

तस्लीम  फातिमा 



माँ पर कोई कविता लिखूँ,   ऐसा साहस नहीं मुझमें I 

ममता को शब्दों में सीमित कर दूँ, ऐसा सामर्थ्य नहीं मुझमें II 


माँ की ममता का साया, साहस भरता है मुझमें I 

जब भी मैं थक जाऊँ जीवन से, जीवन भरता है मुझमें  II


माँ तो वो है जो खुद को खोकर, खुद को पाती है मुझ में I 

आँसू सारे पीकर भी वो, खुशियाँ भरती है मुझमें Il


जननी कह देने भर से, माँ परिपूर्ण नहीं होती I 

केवल जन्म देकर कोई, माता नहीं वो कहलाती ll


माँ तो वह है जो बच्चों को, हर पल जीवन सिखलाती I 

अंधियारे में राह दिखाकर ,उजियारा जीवन में फहराती Il


दुःख में धैर्य धरे कैसे हम, मैं ने माँ से सीखा है I 

हर मुश्किल पार करे कैसे हम, मैं ने माँ से सीखा है Il


बच्चों संग वह बच्ची बनकर, सब कुछ माँ ही सिखलाये I 

इतना ज्ञान सिखलाकर भी, मेरी माँ भोली कहलाये Il


माँ रिश्तों का संगम बनकर, हर पात्र में जीना चाहती है I 

खुद को खोकर भी बच्चों को, वो सब कुछ देना चाहती है Il


तुझ को परिभाषित कर पाऊं, तेरे कदमों तले स्वर्ग को पाऊं I 

बिन आशीष कुछ भी कर पाऊं, ऐसा धैर्य नहीं मुझमें II 


तुझ पर कोई कविता लिखूं, ऐसा साहस नहीं मुझमें I 

शब्दों में सीमित करदूँ  तुझको, ऐसा सामर्थ्य नहीं मुझमें II 

तस्लीम फातिमा

हिन्दी पंडित,

ZPHS खिलाशाहपूर,

रघुनाथपल्ली,

जनगाँव, 

पिन 506244

99663 42656

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for Printed Book
काव्य धारा
Editor
Prasadarao Jami

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