साहित्य तरंग
संस्कृत प्राकृत एवं अपभ्रंश के मूर्धन्य प्रणेता "आचार्य हेमचंद्र"
- कमलेकर नागेश्वर राव 'कमल'जी
प्रस्तावना:-
हिन्दी काव्य के आरंभिक काल में काव्य की विविध प्रवृत्तियों का उदय हुआ, इस दृष्टि से ‘आदिकाल’ कहना समाचीन है। यह नाम आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा दिया गया है। इस काल के राजनीतिक वातावरण तथा काव्य में वीर भावना की प्रधानता के आधार पर इस काल को वीरगाथा काल कह दिया गया है।
आदिकालीन परिस्थितियाँ :-
ऐतिहासिक दृष्टि से आदिकाल में राजनैतिक अराजकता और अव्यवस्था व्याप्त थी।उस समय समाज में सिद्ध, नाथ, जैन, शैव, शाक्त, वैष्णव और स्मार्त आदि अनेक धार्मिक सम्प्रदाय प्रचलित थे। राजनीति पर इस्लाम का आधिपत्य हो चला था। इन परिस्थितियों में भी देश में साहित्य सृजन हुआ था । दर्शन, ज्योतिष, कर्मकाण्ड आदि विषयों पर नवीन ग्रंथ लिखे गए। श्री हर्ष, राजाभोज, जयदेव, कुन्तक, क्षमेंद्र महिमभट्ट जैसे विद्वानों ने ग्रंथों की रचनाएँ की थीं किंतु हिन्दी साहित्य ने इनसे विशेष प्रभाव ग्रहण नहीं किया। साहित्य में धार्मिकता और वीरता की भावना प्रधान रही।
आदिकाल की उपलब्ध सामग्री में सबसे अधिक ग्रंथों की संख्या जैन ग्रन्थों की है।अपभ्रंश साहित्य को जैन साहित्य कहा जाता है, क्योंकि अपभ्रंश साहित्य के रचयिता जैन थे। जैन कवियों की रचनाओं में धर्म और साहित्य का मणिकांचन योग दिखाई देता है।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कहा कि “इस काल में वीरगाथात्मक ग्रंथों की प्रचुरता है,अतः जैन साहित्य को धार्मिकता मानकर साहित्य कक्ष से बहिष्कृत करना पड़ेगा।”
जैन साहित्य :-
जैन साहित्य अत्यंत विशाल है, यह अधिकतर अपभ्रंश, प्राकृत और संस्कृत भाषा में लिखा गया है।जैन रचनाकारों ने पुराण काव्य, चरित काव्य, कथा काव्य तथा रास काव्य इत्यादि ग्रंथों की रचना की। प्रमुख जैन कवि स्वयंभू, पुष्प दन्त, हेम चन्द्र और सोमप्रभु सूरी हैं।
इनमें से कलिकाल सर्वज्ञ महान गुरु, समाज-सुधारक, धर्माचार्य, गणितज्ञ एवं भारतीय चिंतन, साहित्य और साधना के क्षेत्र में महान, साहित्य, दर्शन, योग, व्याकरण, काव्यशास्त्र, वाङ्मय के सभी अंङ्गो पर नवीन साहित्य की सृष्टि तथा नये पंथ को आलोकित करनेवाले, संस्कृत एवं प्राकृत पर समान अधिकार रखनेवाले अद्भुत प्रतिभाशाली मनीषी " आचार्य हेमचंद्र"थे।
जन्म तथा परिचय:-
आचार्य हेमचंद्रका जन्म गुजरात में अहमदाबाद से १०० किलोमीटर दूर दक्षिण-पश्चिम स्थित धंधुका नगर में विक्रम संवत् ११४५(1145) के कार्तिकी पूर्णिमा की रात्रि में हुआ था। मातापिता शिवपार्वती उपासक मोढ वंशीय वैश्य थे। पिता का नाम चाचिंग अथवा चाच और माता का नाम पाहिणी देवी था। बालक का नाम चांगदेव रखा। माता पाहिणी और मामा नेमिनाथ दोनों ही जैन थे।
चांगदेव के नव वर्ष की आयु में जैन संघ की अनुमति से उदयन मंत्री के सहयोग से दीक्षा संस्कार विक्रम सवंत् ११५४(1154) में माघ शुक्ल चतुर्दशी शनिवार को हुआ। और उनका नाम सोमचंद्र रखा गया।
अभयदेवसूरि के शिष्य प्रकांड गुरुश्री देवचंद्रसूरि हेमचंद्र के दीक्षागुरु, शिक्षागुरु या विद्यागुरु थे।आचार्य देवचन्द्रसूरी जी ने अपने ज्ञान में देखा और उदगार व्यक्त किये, "सोम जहाँ बैठेगा वहाँ हेम ही होगा" उस के बाद सोमचन्द्र, हेमचन्द्र नाम से जाने लगे।
रचनाएँ :-
संस्कृत साहित्य और विक्रमादित्य के इतिहास में जो स्थान कालिदास का और श्री हर्ष के दरबार में जो स्थान बाणभट्ट का है प्राया वही स्थान 12 वीं शताब्दी में चोली के वंशज बहुत सुप्रसिद्ध गुर्जर नरेंद्र शिरोमणि सिद्धराज जय सिंह के इतिहास में श्री हेमचंद्राचार्य का है।आचार्य हेमचंद्र अनेक विद्याओं तथा शास्त्रों में निष्णात थे।
ग्रंथों की सर्वांग पूर्णता विज्ञान कथा और सरलता की दृष्टि से इनका स्थान अद्वितीय है। निखिल शास्त्र निपुणता तथा बहुज्ञता के कारण उन्होंने 'कलिकाल सर्वज्ञ' की उपाधि प्राप्त की। उनकी योग्यता, उनकी क्षमता, उनका जीवन, उनका कार्य, उनका आचार-व्यवहार-चरित्र सभी गुण शत-प्रतिशत आचार्य के समान थे।
सिद्धराज के आग्रहानुसार हेमचंद्र ने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ शब्दानुशासन "सिद्ध हेम" व्याकरण नाम से लिखा ।यह ग्रंथ 1 वर्ष में पूर्ण हुआ। इसके बाद में 'काव्यानुशासन' लिखा।
कुमारपाल का शासनकाल विक्रम संवत 1226 था और वही हेमचंद्र का जीवन काल था।वह कुमारपाल के 6 माह पूर्व ही स्वर्गवासी हो चुके थे, अतः हेमचंद्र का रचनाकाल निश्चित रूप से विक्रम संवत 1162 से 1228 तक माना जा सकता है।
राजा कुमार पाल के आग्रह से आचार्य हेमचंद्र ने 'योग शास्त्र', ' वीतराग स्तुति', 'कुमारपाल चरित'( प्राकृत द्वयाश्रय काव्य )एवं त्रिषष्ठिशलाका पुरुष चरित' की रचना की।उनकी अंतिम रचना प्रमाणमीमांसा थी, यह उनकी स्व लिखित प्रस्तावना से सिद्ध होता है।
हेमचंद्र द्वारा रचित पंक्तियों की संख्या 311 करोड़ बताई जाती हैं। यदि हम इसे अतिशयोक्ति मान लें, तो उनकी 100से अधिक रचनाएं होंगी। रचनाओं को देखने से स्पष्ट होता है कि हेमचंद्र अपने समय के अद्वितीय विद्वान थे। साहित्य के संपूर्ण इतिहास में किसी दूसरे ग्रंथकार की इतनी अधिक और विविध विषयों की रचनाएं उपलब्ध नहीं है। रचनाओं की संख्या के संबंध में 'प्रभावक् चरित' का हेमसूरी प्रबंध दुष्टव्य है जिसमें 12 ग्रंथों के नाम गिनाए हैं।
'काव्यमाला' सीरीज के अंतर्गत काव्य शासन की प्रस्तावना में 'औफ्रेचेस कैटलॉग दिया हुआ है। उस सूची के अनुसार 'अनेकार्थ कोश',अनेकार्थ शेष, अभिधान चिंतामणि,अलंकार चूड़ामणि, उणादि सूत्रवृति,काव्यानुशासनम, छंदोनुशासनम्,देशीनाम माला, द्वयाश्रय काव्य,सवृत्ति, धातु पाठ सवृत्ति,धातु पारायण सवृत्ति, धातु माला, नाममाला शेष ,निघंटु शेष,बाल भाषा व्याकरण सूत्र वृत्ति,योग शास्त्र, विभ्रम सूत्र, लिंगानुशासन सवृत्ति, शेष संग्रह, शेष संग्रह सारोद्धार की प्रसिद्ध कृतियाँ मानी गई हैं।
उपसंहार :-
हेमचंद्र सच्चे अर्थ में आचार्य थे। आचार्य आचार ग्रहण करवाता है, अर्थों की वृद्धि कराता है,बुद्धि बढ़ाता है। आचार्य के सभी गुण हेमचंद्र में विद्यमान थे।हेमचंद्र गुजरात की विद्याचार्य हैं।भारतवर्ष के संस्कृत साहित्य के इतिहास में इन्हें महा पंडितों की प्रथम पंडित में स्थान प्राप्त है। गुजरात में उनका स्थान राजा प्रजा के आचार सुधारक रूप से महान आचार्य का है। हेमचंद्र का व्यक्तित्व बहुमुखी था। एक साथ महान संत, शास्त्रीय विद्वान, वैयाकरण, दार्शनिक काव्यकार, योग्य लेखक और लोग चरित के अमर सुधारक थे। इनके व्यक्तित्व में स्वर्णिम प्रकाश कि वह आभा थी जिसके प्रभाव से सिद्धराज जयसिंह और कुमार पाल जैसे सम्राट आकृष्ट हुए थे।ये विश्व बंधुत्व के पोषक और अपने युग के प्रकाश स्तंभ ही नहीं, अपितु युग-युग के प्रकाश स्तंभ हैं। इस युगपुरुष को साहित्य और समाज सर्वदा नतमस्तक हो नमस्कार करता रहेगा।
संदर्भ ग्रंथ सूची:-
१.आचार्य हेमचंद्र --डॉ.वि.भा.मुसलगाँवकर
मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी।
२. काव्यानुशासन -हेमचंद्र
-- महावीर जैन विद्यालय,बंबई
कमलेकर नागेश्वर राव 'कमल'
एस.ए(हिंदी)
अच्चंपेट, नागर कर्नूल जिला। तेलंगाना।
9848493223
dilwaali7@gmail.com
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