Saturday, May 21

एनुगु लक्ष्मण कवि और अब्दुल रहीम खानखाना एक तुलनात्मक अध्यन - समीउल्लाह खान (साहित्य तरंग)

साहित्य तरंग


एनुगु लक्ष्मण कवि और अब्दुल रहीम खानखाना एक तुलनात्मक अध्यन

- समीउल्लाह खान 

                                                                                                   

    अब्दुल रहीम खानखाना और एनुगु लक्ष्मण कवि-ये दोनों नीति कवियों के नाम से प्रसिद्ध हुए। दोनों की भाषाएं अलग -अलग है।

    रहीम हिंदी के प्रमुख नीति कवि हैं तो एनुगु लक्ष्मण कवि तेलुगु के। दोनों उच्च कोटि के कवि हैं। रहीम १६वीं शताब्दी के कवि हैं तो एनुगु लक्ष्मण कवि १८वीं शताब्दी के रहे। एनुगु लक्ष्मण कवि १७९७  में पूर्वी गोदावरी जिले के पेद्दाडा गांव में पैदा हुए।उनके माता- पिता पेरमांबा और तिम्मा कवि थे।उनके परदादा जलपाला मात्य  थे। उन्हें पेद्दापुरम के संस्थानाधीशों से हाथी का पुरस्कार मिलने से इनके घराने का नाम पैडिपाटि से एनुगु पड़ गया था। जलपाला मात्य के परपोता लक्ष्मण मंत्री। उनके पोता एनुगु लक्ष्मण कवि।ये कवियों के वंशज थे।ये कवि सार्वभौम कूचिमंचि तिम्मा कवि के समकालिक थे।

    एनुगु लक्ष्मण कवि ने भत्रु हरी के संस्कृत की सुभाषित त्रिशति का तेलुगु में सुभाषित रत्नावली के नाम से अनुवाद किया। सुभाषित रत्नावली के नीति, श्रृंगार और वैराग्य के नाम से तीन भाग हैं। भर्तृहरि के सुभाषित त्रिशति को तेलुगु में तीन कवियों ने अनुवाद किया.... एनुगु लक्ष्मण कवि, पुष्पगिरी तिम्मना और एलकूचि बाल सरस्वति।इन तीनों अनुवादकों में से सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुआ है एनुगु लक्ष्मण कवि का सुभाषित रत्नावली।

       अब रहा कवि रहीम का परिचय:रहीम का पूरा नाम अब्दुल रहीम खानखाना ये १६वी शताब्दी के प्रमुख हिन्दी कवि थे।

    ये अकबर के दरबार के नवरत्नों में से एक थे।ये अकबर के अभिभावक बैरम खां के सुपुत्र थै। रहीम का जन्म 17 दिसम्बर,1556मे दिल्ली में हुआ।इनके पिता बैरम खां थे। रहीम की पत्नी महबानु बेगम।जन्म से मुसलमान होते हुए भी रहीम ने हिन्दू जीवन की बड़ी गहराई से मार्मिक चित्रण किया था जो उनकी विशाल हृदयता का परिचय देती है। हिंदू देवी-दवताओं, पर्वों, धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं का जहां भी उनकी रचनाओं में उल्लेख किया गया है पूरी जानकारी और ईमानदारी के साथ किया गया है।ये जीवन भर भारतीय का यथार्थ मानते रहे। रहीम ने काव्य में रामायण, महाभारत,पुराण तथा गीता जैसे ग्रंथों के कथानकों को मिसाल के लिए चुना हैऔर लौकिक जीवन के व्यवहार पक्ष को उसके द्वारा समझाने का प्रयास किया है,जो भारतीय संस्कृति की झलकियां पेश करती है।

    गुजरात,कुंभलनेर और उदयपुर आदि युद्धों में विजय प्राप्त करने पर सम्राट अकबर ने अपने समय की सर्वोच्च उपाधि "मीर अर्ज़" से रहीम को विभूषित किया। आगे चलकर १५७४ में   अकबर ने रहीम को "खान खाना" उपाधी से सम्मानित किया। १६२६ई.में ७१ वर्ष की आयु में रहीम का देहांत हुआ। रहीम के रचनाओं में दोहावली या सतसई ,बरवै नायिका भेद, श्रृंगार सोरठ,मदनाष्टक,राग पंचाध्यायी,नगर शोभा, फुटकर बरवै छंद तथा पद, फुटकर कवितव,सवैये, संस्कृत काव्य आदि।वे अपने रचनाओं में पूर्वी अवधी, ब्रजभाषा तथा खड़ी बोली का प्रयोग किया करते थे।

    नीति कवि भर्तृहरि  की सुभाषित त्रिशति से जो श्लोकों को  एनुगु लक्ष्मण कवि ने तेलुगु में अनुवाद किया है  उनमें से कुछ हम निम्न प्रस्तुत करते हैं जैसे.... भर्तृहरि नीति शतक का बेहतरीन सुवचन  जो संस्कृत से तेलुगु में अनुवाद किया गया है...

 1.केयूराणी न भूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्वला

 न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं 

न लंकृता मूर्दजा 

वाण्येका समलंकरोति पुरुषों या 

संस्कृता धार्यते

क्षीयंतेखिल भूषणानि सततं

 वाग्भूषणं भूषणं।

     जैसे चमकनेवाले मोतीहार,चंद्रहार,सूर्य हार से पुरुष शोभित न होंगे।पन्नीर जल, सुगंध द्रव्य, सुवासित लेपन पुरुष को शोभा नहीं देते। फूल और केशालंकरण भी षुरष को शोभा नहीं देते।

यहां असरदार बात ये है कि पुरुष के लिए वचन ही  उत्तम भूषण है।

      और एक श्लोक के अनुवाद में बहुत खूब कहा गया है ....

     विद्या निगूढ़ गुप्तमगु वित्तमु,

    रूपमु पूरूषालिकिन, विद्या यशस्सु भोगकरि, विद्या गुरुंडु, विदेश बंधुडन, विद्या विशिष्ट दैवतमु,विद्यकुसाटि धनंबु लेदिलन, विद्या नृपाल पूजितं, विद्या नेरुगनिवाडु मर्त्युडे।

    विद्या ही पुरुष के लिए  छिपा हुआ खजाना,विद्या ही से कीर्ति,सभी भोग और सुख की प्राप्ति होती है, शिक्षाविद् विराजमान रहेगा, नृपाल पूजितं,

विद्या विदेशी बंधु, जिसके विद्या नहीं है वह शव के बराबर है।

       इस प्रकार लक्ष्मण कवि ने नीतिपरक बातें बताई हैं जैसे रहीम ने। रहीम के भी कुछ दोहे देखिए...

   1.जो बडेन को लघु कहे, नहीं रहीम घटी जाहिं,

गिरधर को मुरलीधर कहें,कछु दुःख मानत नाही।

     भाव... रहीम कहते हैं कि बड़े को छोटा कहने से बड़े का बड़प्पन नहीं घटता। जैसे गिरधर को मुरलीधर कहने से उनके महिमा की कोई कमी नहीं होती।

   2.समय पाय फल होत है,समय पाय झरी जात।

  सदा रहे नहीं एक सी,का रहीम पछितात।

     रहीम कहते हैं कि उपयुक्त समय आने पर ही वृक्ष पर फल लगते हैं, झड़ने का समय आने पर ही वह झड़ जाता है।

   इस प्रकार हमें रहीम और एनुगु लक्ष्मण कवि के रचनाओं में  कई

नीति परक विषय देखने को मिलते हैं...न भूतो न भविष्यति।

समीउल्लाह खान 
हिन्दी पी.जी.टी

गुरुकुल पाठशाला/कलाशाला नेलकोंडपल्ली, 

खम्मं जिला।

70132 43207

-------------------------------------------------------------------------------------

If you like this Writing and want to read more... Then Follow Us
or call
9849250784
for Printed Book
साहित्य तरंग
Editor
Prasadarao Jami

-----------------------------------------------------------------------------------------------------


scan to see on youtube



scan to join on WhatsApp




BOOK PUBLISHED BY :

GEETA PRAKASHAN

INDIA

Cell 98492 50784

geetaprakashan7@gmail.com

---------------------------------------------------------------------------------

do you want to publish your writing through our BLOGPAGE ?

Please call us 62818 22363

No comments:

Post a Comment

Understand The Arjun’s Dream - K Rakesh (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "Shabdarambh")

  (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "Shabdarambh") Understand The Arjun’s Dream   💐........................................