Friday, May 13

अनुवाद के क्षेत्र - डॉ. वि. सरोजिनी (साहित्य तरंग)

साहित्य तरंग

अनुवाद के क्षेत्र

-          डॉ. वि. सरोजिनी

आज की दुनिया में अनुवाद का क्षेत्र बहुत व्यापक हो गया है। शायद ही कोई क्षेत्र बचा हो जिसमें अनुवाद की उपादेयता को सिद्ध न किया जा सके। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि आधुनिक युग के जितने भी क्षेत्र हैं सबके सब अनुवाद के भी क्षेत्र हैं, चाहे न्यायालय हो या कार्यालय, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी हो या शिक्षा, संचार हो या पत्रकारिता, साहित्य का हो या सांस्कृतिक सम्बन्ध। इन सभी क्षेत्रों में अनुवाद की महत्ता एवं उपादेयता को सहज ही देखा-परखा जा सकता है। चर्चा की शुरुआत न्यायालय क्षेत्र से करते हैं।

संस्कृति : अनुवाद को सांस्कृतिक सेतुकहा गया है। मानव-मानव को एक दूसरे के निकट लाने में, मानव जीवन को अधिक सुखी और सम्पन्न बनाने में अनुवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। भाषाओं की अनेकतामनुष्य को एक दूसरे से अलग ही नहीं करती, उसे कमजोर, ज्ञान की दृष्टि से निर्धन और संवेदन शून्य भी बनाती है। विश्वबंधुत्व की स्थापनाएवं राष्ट्रीय एकताको बरकरार रखने की दृष्टि से अनुवाद एक तरह से सांस्कृतिक सेतु की तरह महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है।

साहित्य : साहित्य के क्षेत्र में अनुवाद वरदान साबित हो चुका है। प्राचीन और आधुनिक साहित्य का परिचय दूरदराज के पाठक अनुवाद के माध्यम से पाते हैं। भारतीय साहित्यकी परिकल्पना अनुवाद के माध्यम से ही संभव हुई है। विश्व-साहित्य का परिचय भी हम अनुवाद के माध्यम से ही पाते हैं। साहित्य के क्षेत्र में अनुवाद के कार्य ने साहित्यों के तुलनात्मक अध्ययन को सुगम बना दिया है। विश्व की समृद्ध भाषाओं के साहित्यों का अनुवाद आज हमारे लिए कितना ज़रूरी है कहने या समझाने की आवश्यकता नहीं।

सरकारी कार्यालय : आज़ादी से पूर्व हमारे सरकारी कार्यालयों की भाषा अंग्रेजी थी। हिन्दी को राजभाषा के रूप में मान्यता मिलने के साथ ही सरकारी कार्यालयों के अंग्रेजी दस्तावेजों का हिन्दी अनुवाद ज़रूरी हो गया। इसी के मद्देनज़र सरकारी कार्यालयों में राजभाषा प्रकोष्ठ की स्थापना कर अंगे्रजी दस्तावेज़ों का अनुवाद तेजी से हो रहा है।

न्यायालय : अदालतों की भाषा प्राय: अंग्रेजी में होती है। इनमें मुकद्दमों के लिए आवश्यक कागजात अक्सर प्रादेशिक भाषा में होते हैं, किन्तु पैरवी अंग्रेजी में ही होती है। इस वातावरण में अंग्रेजी और प्रादेशिक भाषा का बारी-बारी से परस्पर अनुवाद किया जाता है।

शिक्षा : भारत जैसे बहुभाषा-भाषी देश के शिक्षा-क्षेत्र में अनुवाद की भूमिका को कौन नकार सकता है। कहना अतिशयोक्ति न होगी कि शिक्षा का क्षेत्र अनुवाद के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। देश की प्रगति के लिए परिचयात्मक साहित्य, ज्ञानात्मक साहित्य एवं वैज्ञानिक साहित्य का अनुवाद बहुत ज़रूरी है। आधुनिक युग में विज्ञान, समाज-विज्ञान, अर्थशास्त्र, भौतिकी, गणित आदि विषय की पाठ्य-सामग्री अधिकतर अंग्रेजी में लिखी जाती है। हिन्दी प्रदेशों के विद्यार्थियों की सुविधा के लिए इन सब ज्ञानात्मक अंग्रेजी पुस्तकों का हिन्दी अनुवाद तो हो ही रहा है, अन्य प्रादेशिक भाषाओं में भी इस ज्ञान-सम्पदा को रूपान्तरित किया जा रहा है।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी : देश-विदेश में हो रहे विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के गहन अनुसंधान के क्षेत्र में तो सारा लेखन-कार्य उन्हीं की अपनी भाषा में किया जा रहा है। इस अनुसंधान को विश्व पटल पर रखने के लिए अनुवाद ही एक मात्र साधन है। इसके माध्यम से नई खोजों को आसानी से सबों तक पहुँचाया जा सकता है। इस दृष्टि से शोध एवं अनुसंधान के क्षेत्र में अनुवाद बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

जनसंचार : जनसंचार के क्षेत्र में अनुवाद का प्रयोग अनिवार्य होता है। इनमें मुख्य हैं समाचार-पत्र, रेडियो, दूरदर्शन। ये अत्यन्त लोकप्रिय हैं और हर भाषा-प्रदेश में इनका प्रचार बढ़ रहा है। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन में भारत की सभी प्रमुख भाषाओं में समाचार प्रसारित होते हैं। इनमें प्रतिदिन 22 भाषाओं में खबरें प्रसारित होती हैं। इनकी तैयारी अनुवादकों द्वारा की जाती है।

अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध : अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध अनुवाद का सबसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है। विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों का संवाद मौखिक अनुवादक की सहायता से ही होता है। प्राय: सभी देशों में एक दूसरे देशों के राजदूत रहते हैं और उनके कार्यालय भी होते हैं। राजदूतों को कई भाषाएँ बोलने का अभ्यास कराया जाता है। फिर भी देशों के प्रमुख प्रतिनिधि अपने विचार अपनी ही भाषा में प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुवाद की व्यवस्था होती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि अन्तर्राष्ट्रीय मैत्री एवं शान्ति को बरकरार रखने की दृष्टि से अनुवाद की भूमिका बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।

अनुवाद से बहुत आशायें की जाती है। परंतु हम भूल जाते हैं कि यह कोई सर्वोषधि नहीं है। इसकी अपनी सीमायें हैं। सांस्कृतिक, साहित्य, सरकारी कार्यालय, न्यायालय, शिक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, जनसंचार और अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध आदि विभिन्न क्षेत्रों में अंतरण या समतुल्य भाव -विचार सूचना को प्रस्तुत करना संभव नहीं होता। अत: उस पर बहुत अधिक निर्भर करने में सतर्क रहना होगा। जैसे हमेशा अनुवाद निर्भर जाति क्रमश: पंगु होने लगती है, मौलिक रचना, सृजन और दृष्टि शक्ति दुर्बल होने लगती है। इन बातों पर परोक्ष रूप में प्रकाश डालना जरूरी है। ज्ञान-विज्ञान को अनुवाद कर भंडार भरना एक दृष्टि से ठीक है, परंतु उसी पर निर्भर करने से मौलिकता पर(ओरिजिन) पर प्रभाव पड़ने की संभावना से इनकार नहीं कर सकते। अनुवाद का क्षेत्र हमारी आशाओं और अपेक्षाओं से भी अधिक विस्तृत है। जीवन के विराट फलक को स्पष्ट करने और रंग भरने में अनुवाद की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। वैश्वीकरण को केवल बाजारीकरण नहीं, वास्तव में मानवीय एकीकरण के क्षेत्र में अनुवाद की भूमिका पर प्रकाश डाला गया है। ज्ञान-विज्ञान -कला संस्कृति के सभी क्षेत्रों में अनुवाद की जरूरत हो रही है। भारत का वैश्वीकरण का अपना दृष्टिकोण इसीके माध्यम से सफल होगा, इस पर भी विचार किया गया है।

सहायक ग्रन्थ :

1. प्रो. दिनेश चमोला शैलेश - अनुवाद और अनुप्रसंग

2. डॉ. भोलानाथ तिवारी - अनुवाद विज्ञान

3. कृष्ण कुमार गोस्वामी - अनुवाद विज्ञान की भूमिका 

4. डॉ. आलोक कुमार रस्तेगी - हिंदी में व्यवहारिक अनुवाद

5. प्रो. अशोक मर्डे - अनुवाद का स्वरूप

डॉ. वि. सरोजिनी

गेस्ट फेकल्टी,  हिंदी विभाग,

आंध्र विश्वविद्यालय, विशाखपट्टण

मोबाइल - 9542323226

  ई मेल : vedangisarojini@gmail.com


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