साहित्य तरंग
शुक्लां बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजं।प्रसन्न वदनं ध्यायेत सर्व विघ्नोप शांतये। नारायण समारंभां व्यास शंकर मध्यमां।अस्मदाचार्य पर्यंतं वंदे गुरु परंपराम्। कूजंतं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम।आरूह्य कविताशाखां वंदे वाल्मीकि कोकिलम।वाल्मीकेर्मुनिसिंहस्य कवितावनचारिणः।श्रुण्वन रामकथानादं को न याति परां गतिम्।यःपिबन सत्यं रामचरितामृतसागरम। अतृप्तस्तं मुनिं वंदे प्रचेतसमकल्मषम। मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेंद्रियबुद्धिमतांवरिष्ठं। वातात्मजंवानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शिरसा नमामी।नमोस्तु रामाया सलक्ष्मणाय देव्यै च तस्मै जनकात्मजायै नमोस्तु रुद्रेंद्रयमानिलेभ्यो नमोस्तु चंद्रार्कमरूद्गणेभ्यः।
रामं रामानुजन सीतांभरतं भरतानुजम्।
सुग्रीवं वायुसूनं च प्रणमामि पुनः पुनः।
आदि कवि वाल्मीकि महर्षि द्वारा रचा गया कालजयी महाकाव्य श्रीमद्रामयणं में श्रीरामजी की कथामृत है।वह साधारण काल्पनिक समय गुजार देने वाला आम कथा नहीं अजर अमर, भूत भविष्य और वर्तमान के लिए जीवन मूल्य प्रदान करने वाला अत्युत्तम सर्वोपरि ग्रंथ है।कहाजाता है कि इसकी रचना वैवश्वत मन्वन्तर के चौबीसवें महायुग में हुआ और यह राम त्रेतायुग का सातवां अवतार है। वे मर्यादा पुरुषोत्तम लोकरक्षक लोकमंगल कारक हैं। रामायण में जीवन सत्य जीवन मूल्य सत्य व्रत आज्ञा पालन भ्रातृप्रेम पातिव्रत्य धर्म पत्नीधर्म शिष्यधर्म राजधर्म शतृधर्म आदि निहित है। भक्ति युक्त काव्य भागवतम है, भक्ति और मुक्ति काव्य महाभारत है, लेकिन भक्ति मुक्ति और युक्ति काव्य श्री रामायण ग्रंथ है।इसके द्वारा शास्त्र संस्कार प्रकट होता है,यह शास्त्र सम्मत वेद सम्मत और वेद पर आधारित है। इसके समकक्ष का कोई काव्य ग्रंथ नहीं है।
पुराणों में कहा गया कि राम नाम ही एक मंत्र और रामायण शब्द भी एक मंत्र है इसीलिए हर घर में पूजनीय पठनीय और आचरणीय महिमान्वित ग्रंथ है।इसके द्वारा भगवान राम की प्राप्ति होती है।रामोपासना से त्यागय्य, रामदास, तुलसीदास आदि भक्तगण कृतार्थ हुए। अतीत से वर्तमान तक राम नाम तारक मंत्र ही रहा इसे पाकर धन्य हुए और होते रहते हैं।जब तक सूर्य चंद्र ग्रह नक्षत्र कल्प रहेंगे तब तक रामायण रहेगा और भक्तों की रक्षा करेगा। वाल्मीकि रामायण आदि काव्य है। वाल्मीकि के तदनंतर व्यास अगस्त भरद्वाज कालिदास भवभूति आदि से कृत रामायण, वाल्मीकि रामायण के भाष्य ग्रंथ हैं। इनके द्वारा वाल्मीकि रामायण को सुचारू रूप से वाल्मीकि हृदय को समझ सकते हैं। इनके अलावा रंगनाथ रामायण मोल्ल रामायण तुलसीदास जी का रामचरितमानस कंब रामायण आदि प्रमुख ग्रंथ हैं, विदेशियों के भी जैसा कि टिबेटन इंडोनेशियाई मलेशियन नेपाली पर्सियन के भी अपने अपने रामायण हैं।
वाल्मीकि रामायण साहित्यिक दृष्टि से उत्कृष्ट धार्मिक दृष्टि से श्रेष्ठ उपासना की दृष्टि से अत्युन्नत भक्ति प्रधान काव्य है। धर्म और उपासना से राम सर्वव्यापक परब्रह्म परमात्मा है। शाब्दिक अर्थ से राम सुंदर और आनंद है। सौंदर्य ही आनंद, आनंद ही परंब्रह्म है उसी तरह आनंद ही राम है आनंद देने वाला भी राम है।
“श्रीराम शरणं समस्त जगतां ,रामं विना कागति
रामेणा प्रतिहन्यते कलिमलम,रामाया कार्यं नमः”
“रामा द्रस्यति कालभीम भुजगो रामस्य सर्वं वशे
रामे भक्ति रखंडिता भवतुमे रामा त्वमेश्रय:”
कालसर्प भी रामाधीन में रहता है। इसीलिए भक्त त्यागय्य ने कहा कि “कालातीत विख्याता रामा..तुम ही हमारा आश्रय है।“ व्यास महर्षि ने कहा कि वाल्मीकि महर्षि ने सौ करोड़ श्लोकों की रचना की उनमें भूमी पर स्थित प्रतिभा संपन्न प्रज्ञावान पुरुष के लिए चौबीस हजार श्लोक दियागया,बाकी श्लोक दूसरे लोकों के विशेष प्रज्ञावान को दिया गया। वाल्मीकि रामायण में २४००० श्लोक ५०० सर्ग ७ कांड हैं।
उमासंहियता में रामायण पारायण की विशेषताएं हैं।कांड,सर्ग, श्लोक हर एक के लिए अलग अलग फल है, विविध फल प्राप्ति के लिए अलग अलग पारायण नियम हैं। संपूर्ण रामायण पारायण करने केलिए बालकाण्ड से शुरू कर उत्तर काण्ड तक पारायण कर फिर सीता कल्याण श्रीराम पट्टाभिषेकम तक पारायण कर समाप्त करना है। बालकाण्ड जयकांड है, यह धर्म अर्थ काम और मोक्ष प्रदान करने वाला है।
व्यास भगवान ने कहा कि” विष्णु समान देव, वेद समान शास्त्र सूर्य समान ज्योति क्षमा समान सारं कीर्ति समान धन ज्ञान समान लाभ रामायण समान ग्रंथ नहीं है।“रामायण के हर अक्षर राम स्वरूप होने के कारण पारायण के पहले पूजा करना है ।“चरितं रघुनाथस्य शतकोटि प्रविस्तरं,एकैक मक्षरं पुंसां महापातक नाशनम”
प्रचेतस महर्षि के दसवां पुत्र तपस्या से सिद्धि प्राप्त कर वाल्मीकि नाम से प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने अपने तप: सिद्धि से बीता हुआ षट कांड तक की कथा को और भविष्य की कथा उत्तर काण्ड को दर्शाते हुए संपूर्ण रामायण की पूर्ति की।वेदों के द्रष्टा होने के कारण वे वेदर्षि हैं। रामायण के पहले तीन कांड बालकांड, अयोध्याकांड, अरण्यकांड तक के कांड कर्म कांड हैं, बाकी किष्किन्धाकाण्ड सुंदरकांड युद्धकांड और उत्तर कांड ज्ञान कांड हैं। रामायण के श्रवण मात्र से सर्व पापों का विनाश सर्व दोषों का निवारण सर्व दुःखों का दूर होता है। रामायण पारायण, सर्व यज्ञफल सर्व पुण्यफल गोदान फल देकर पवित्र बनाता है। वाल्मीकि महर्षि रामायण रचना केलिए दर्भासन में अनुष्ठान कर बैठता है। उनके सामने युग्म क्रौंच पक्षियों में से नर पक्षी का शिकार होने से मादा पक्षी दुःखी होकर आर्तनाद करती है।इस दृश्य से विचलित वाल्मीकि अप्रयत्न से निषाद को श्राप देता है कि”मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमशाश्वती समा:,यत्क्रौंच मिथुनादेकमवधी:काम मोहितं । बाह्यार्थ है कि जो भी हिंसा करता है उसके प्रतिष्ठा का भंग होता है और चिरकाल अशांति से भटकता रहता है। मगर आंतरिक रूप से रामायण का मंगल निर्देशन है। मां का अर्थ लक्ष्मी माता निषाद का अर्थ श्रीनिवास , प्रतिष्ठा त्वमाग शाश्वती: का अर्थ बहुकाल तक शाश्वत रूप से यश, कीर्ति से रहो क्रौंच मिथुनानेकां का अर्थ है कि असुर लक्षण दंपति में रावणासुर का वध करने से तुम सकुशल होगा। उनके मुंह से जो भी श्लोक का सृजन होता है वह रामायण काव्य के अनुरूप बनरहा है।
शाप देने के बाद अपने क्रोध को वश में न रख सकने के कारण दुखी होता है। तभी ब्रह्मा जी का आगमन होता है और आशिर्वाद देते हुए कहता है कि “मेरे संकल्प से सरस्वती इस तरह अपने बुद्धि पर प्रचोदित हो रही है,उस अप्रयत्न श्लोक में राम कथा का निर्देशन है। रामायण लेखन का समयासन्न हुआ।भूत वर्तमान और भविष्य का दर्शन इस तरह होता है कि‘पुरायतत्रनिव्रृत्तं पानौ अमलकं यथा’।रहस्य और निगूढ़ बातों का दर्शन होता, सभी पात्रों का हृदय और चाल चलन भी मालूम होता है। तुम से एक असत्य कथन भी नहीं किया जाता।यह काव्य जीवंत और कालजई कृति होता है।”ब्रम्ह हंसवाहन में चले जाने के बाद महर्षि वाल्मीकि ध्यान में राम की संपूर्ण कथा दर्शन कर ग्रंथन करता है।“काव्य रामायणं कृत्सन सीतायाश्चरितं महत, पौलस्त्यवथ मित्येव चकार चरितव्रत:”बाह्य रूप से। यह राम और सीता माता की कथा, रावण वध है,।आंतरिक रूप से यह परंब्रह्म की और मनोविज्ञान की गाथा है। करपात्रीजी के हजार पृष्ठों कका'रामायण मीमांसा' में रामायण की महिमा है।उसी तरह वारणासी सुब्रमण्यम शास्त्री जी का ‘महाभारत तत्व कथनं' में भी रामायण का महत्व व्यक्त किया गया।
सूर्य भगवान का पुत्र वैवश्वत मनु के द्वारा अयोध्या का निर्माण हुआ।भारत और विश्व का प्रथम राजधानी नगर अयोध्या है।यह राम जन्म भूमि के रूप में कितना प्रसिद्ध है उतना प्रसिद्ध प्रशस्ति प्राचीन प्रथम राजधानी के रूप में भी है। अयोध्या मथुरा माया काशी पुरी द्वारका और अवंतिका नामक सप्तपुरी मोक्ष स्थान हैं। वेदों में भी अयोध्या का वर्णन है। “अष्टाचक्रा नवद्वारा देवतानां पूर अयोध्या”। अयोध्या यानि अपना हृदय स्थान है,उसी प्रकार ब्रह्मांड का भी हृदय स्थान अयोध्या पुरी है। यह भद्र सुरक्षित कुशलक्षेम स्थान है जिसके राजा दशरथ इंद्र के समान राजकाज शासन किया । दशरथ सत्कर्मों के आचरण करते हुए इंद्रिय निग्रह से राजधर्म किया, धन और संपत्ति की वृद्धि केलिए योजनाएं बनाकर सुचारू शासन करते थे। वर्तमान समय में इस तरह की शासन व्यवस्था की आवश्यकता है। देश को प्रगति मार्ग में ले जाते हुए धर्म युक्त शासन करने की विधि जानना है।
केवल आर्थिकाभिवृद्धि अभिवृद्धि नहीं कहलाता है।नैतिक और मानसिक रूप से जिस देश की उन्नति होगी वहीं उन्नति उन्नति कहलाता है। धार्मिक नींव पर भौतिक वृद्धि करना है। दशरथ के राज्य में क्रूर विद्याहीन नास्तिक कोई भी नहीं है। सभी स्त्री पुरुष अपने धर्माचरण से निर्मल व्यक्तित्व से महर्षि प्रतीत होते हैं। सभी खुशहाल संपन्न शान वैभव से जीवन व्यतीत करते हुए मिष्ठान्न से अतिथि अभ्यागतों का आदर सत्कार करते थे और अतिथि देवो भव: जैसे आर्योक्तियों का पालन करते थे,दान देते थे।सभी आनंद ख़ुशी से अपने अपने व्यवसायों में लगे रहते थे और सर्वरूपों से सुख समृद्ध हैं। वे सभी सुसज्जित औरअलंकृत हैं। सत्य के आश्रय में निस्वार्थ निष्पक्ष भाव से बिना ईर्ष्या से रहते हैं। सभी विद्यावान विद्वान हैं और धर्म पालन करने से दीर्घायु, परिवार से समृद्ध हैं। अयोध्या पुण्य पावन पवित्र होने के कारण परमात्मा विष्णु का जन्म राम के स्वरूप में हुआ। जीवात्मा का प्रकाश स्थान हृदय है । इसका प्रमाण वेद वाक्य है कि “तस्यामां हिरण्यम कोश:स्वर्गे लोके ज्योतिशांवृत।“मंत्री सामंत कोशागार सेनाध्यक्ष और ऋतिक आदि से राज्य का शुभ शासन हो रहा है। रामायण,उत्तम नागरिक और नगरीय जीवन का प्रमाण ग्रंथ है। आत्म नियंत्रण सत्यकाम कुशल श्रीमान दृढ़व्रती नीतिज्ञ नीतिकुशल शास्त्र ज्ञान संपन्न जितेंद्रिय आज्ञाकारी मितभाषी सकल सद्गुण संपन्न दशरथ पुत्रकाम से महर्षि वशिष्ठ की बात पर पुत्रकामेष्ठि करवाया।
अश्वमेध यज्ञ और पुत्र कामेष्टि के बाद यज्ञ भूमि यज्ञवेदी में प्रत्यक्ष देवता गण, रावण के दुष्ट कार्यों से हैरान होकर अपने आप में चर्चा करते हैं।देव गंधर्व यक्ष किन्नर सभी रावण के आज्ञाकारी बनगये। रावण के कारण प्रकृति क्षोभित हो रही है। अष्ट दिक्पाल सूर्य चंद्र आदि रक्षा करने के लिए विनती करते हैं।रावण का वध ब्रह्म वर के अनुसार केवल नर वानर के हाथों से ही है।इस सिलसिले में यज्ञकुंड में से यज्ञ के अधिष्ठाता विराट पुरुष अंतर्यामी यज्ञस्वरूप परम पुरुष का अकस्मात प्रत्यक्ष होता है।वेदोक्ति है कि यज्ञों वै विष्णु: के अनुसार देवताओं के देवता चतुर्भुज शंख चक्र गदाधारी पीतांबर जगतपति नारायण विष्णु का अविर्भाव होता है।ब्रह्म जगन्नाथ से कहता है कि “स्वामी, दुष्ट रावण देवताओं को अनेक प्रकार के कष्ट देते आरहा है वर गर्व से।उसके कार्यों का अंत नहीं है। किसी देव गंधर्व यक्ष किन्नर किंपुरुष के द्वारा उसका वध नहीं किया जाता। केवल साधारण मनुष्य भी रावण का वध नहीं कर सकता। इसीलिए आप अपनी रक्षा करने शत्रु का वध करने मानव पर मन लगाकर मानव रूप में अवतार लेने का संकल्प लेना है।”
यह सुनकर भगवान विष्णु अभय देते हैं कि “आपके दुखों को दूर करने शत्रु को पराजित करने अवतार लेता हूं। इसीलिए दशरथ को मेरे पिता के रूप में चयनित किया गया।” हिरण्य कश्यप और रावण के वर के अनुसार विष्णु का अवतार हुआ। हम उनके कारण अवतरित नरसिंह और श्रीराम को पाकर धन्य हुए हैं।यज्ञ में पूर्णाहुति देते समय श्याम वर्ण,लाल वसन महापुरुष रजत ढक्कन के सोने की कटोरी में खीर लाता है और गंभीर स्वर से कहता है कि मैं ब्रह्म कहने पर खीर देने आया हूं इससे सत्संतान होता है,इसे अपनी पत्नियों को बांटिए।”उस महापुरुष की बात सुनकर दैव प्रेरणा से कौशल्या को आधा भाग सुमित्रा को पाव भाग कैकेई को पाव का आधा हिस्सा और बाकी हिस्सा फिर से सुमित्रा को बांटा गया। भगवान विष्णु अपने आपको विभाग कर पूर्ण स्वरूप में राम,लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न अंश स्वरूप में अवतरित हुए। परमात्मा विष्णु होने पर भी बाह्य रूप में आदर्श मानव, मर्यादा पुरुषोत्तम है।रसोवै सा: उक्ति के अनुरूप राम ही रामायण का रस है।रस यानि आनंद है यही रामायण का ध्वनि है।लोकरक्षण और हमारे लिए देव कार्य केलिए देवता अपने अंशों से भूमि पर अवतरित हुए थे। सर्व शक्ति संपन्न नारायण केलिए किसी का भी सहायता की आवश्यकता न होने पर भी लोक संरक्षणार्थ अवतरित हुए।लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्न भी आदर्श मानव, सत्य निष्ठ है।वानरों के रूप में देवताओं का आविर्भाव देवताओं के शासक ब्रह्मा के नेतृत्व में हुआ। ब्रह्मा का अंश जांबवान है, इसका जन्म पहले ही हुआ। राम के आगमन के पूर्व कुछ लोगों का और राम जन्म के बाद कुछ लोगों का जन्म हुआ।
युगों के पूर्व ब्रह्मा जी जह्माई लेने से जांबवान का जन्म हुआ वह ऋक्ष जाति के है। हनुमान सुग्रीव आदि आम बंदर न होकर वानर जाति के हैं।उनको भी अपना शासन व्यवस्था विद्या संस्कार संप्रदाय आदि हैं। इंद्रांश वालि,सूर्यांश सुग्रीव, बृहस्पति अंश तारुडु विश्वकर्मा अंश नल,अग्निअंश नील वरुणांश सुषेण प्रज्जन्य अंश शरभ है। अष्ट मूर्ति का एक रूप वायू है उनका अंश हनुमानजी है। “नमस्ते वायो त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासी मरुतस्य आत्मज: श्रीराम हनुमान वज्रसंहनोपेतर वैनतेय समाजवे सर्व वानर मुख्येशु बुद्धिमान बलवान”
श्रीराम जन्म घटना से प्रकृति की मानव प्रकृति की और मन की शांति होती है।उमासंहिता में कहा गया कि राम जनन घटना पारायण से सुपुत्र की प्राप्ति फल मिलता है। पुत्रकामेष्टि के एक साल पश्चात बारहवां मास में चैत्र शुक्ल नवमी के दिन राम का जन्म हुआ। विष्णु, पिता के बीज के न होकर खीर के द्वारा मातृगर्भ में प्रवेश कर १२मास मां के गर्भ वास कर जन्म लेता है। “नक्षत्रेदिति दैवत्ये स्वोच्च संस्थेषु पंचसु ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाकपता विदुना सह प्रोद्यमाने जगन्नाथं सर्वलोक नमस्कृतमं कौशल्या जनयद्रायं दिव्य लक्षण संयुतं”।देवतावों की जननी अदिति देवता पुनर्वसु नक्षत्र का देवता हैं,सर्व देवताओं की मूल शक्ति अदिति है, तेजोमय नारायण का जन्म अदिति नक्षत्र पुनर्वसु में हुआ।इस समय पंचनक्षत्र सूर्य मंगल गुरु शुक्र शनि अपने अपने स्थानों पर उच्च स्थिति में हैं। राम का जन्म कुंडली साक्षात देवता का ही है, कुंडली से ज्ञात किया कि राम भगवदावतार है, धर्म संरक्षणार्थ भूमि पर अवतरित हुए। राम जन्म के बाद चैत्र शुक्ल दशमी पुष्य नक्षत्र मीन लग्न में भरत का,जुडुआ बच्चे लक्ष्मण शत्रुघ्न चैत्र शुक्ल दशमी अश्लेश नक्षत्र कर्काटक लग्न में जन्म लिया।
पुत्र जन्म महोत्सव अत्यंत शान शौकत से मनाया गया ग्यारहवें दिन के बाद नामकरणोत्सव महर्षि वशिष्ठ के द्वारा संपन्न हुआ। अध्यात्म रामायण में कहा गया कि वशिष्ठ जिस वंश में राम का उद्भव होने वाला है उस वंश के पुरोहित रहना चाहा। सर्व शास्त्र वेद ज्ञान संपन्न वशिष्ठ राजमहल से दूर कहीं जंगल में अपनी पत्नी से रहते हुए आवश्यकतानुसार रघुवंश के पुरोहित रहे हैं। महर्षि होने से नामकरण संदर्भ में उचित नामों को दर्शाते हुए नामकरण किया। राम कहते हैं कि“मेरे अवतार लक्षण मेरे दो अक्षरों के नाम में निहित है।”हमें तराने वाला तारक मंत्र है, इसीलिए त्यागय्या कहता है कि पेरिडि निन्नु पेंचिन वारेवरया सारसातर तारकनामम् ।रमइतीति: राम: ब्रह्मानंद। राम नाम सुखदाई आनंद दाई है। योगी मुनि साधना और उपासना से ब्रह्मानंद की प्राप्ति करते हैं। उपनिषदों में स्वर्गानंद इंद्रानंद गंधर्वानंद मनुष्यानंद आदि का वर्णन है। ब्रह्मानंद इन सभी आनंदों से सर्वोपरि है और यह महासागर है। परमात्मा और परंधाम ही राम है,राम नाम र आ म तीन अक्षरों से है।र अग्नि का बीजाक्षर है आ सूर्य का बीजाक्षर है म चन्द्र का बीजाक्षर है।“यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेखिलम् यच्चंद्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम।“गीता का यह श्लोक भी यही बात स्पष्ट कर रही है। यह संसार पूरा इन दीप्ति से ही चलता है।इन तीनों में एक ही परमात्मा विष्णु की तेज है। कहा जाता है कि श्रीयंत्र भी तीन भागों में अग्नि सूर्य और चंद्र की दीप्ति मय है। हमारे शरीर भी इन तीनों का समाहार है।वाक् अग्नि, नेत्र सूर्य ,मन चंद्र है।ये त्रिकरण है। सभी में स्थित चैतन्य वाक् शरीर मन द्वारा व्यक्त होता है। तेजोमय राम मंत्र से वाक् को बल मिलता है शरीर पवित्र होता है और मन की शुद्धि होती है।यह संसार अग्नि सोमात्मकम है ,जगत् कारण है।सप्त कोटि महामंत्रों का सार ही राम नाम है।सारतारोपनिषद में कहा गया कि सप्त कोटि के मंत्र भी राम मंत्र के सामान नहीं है। योगशास्त्र में कहा गया कि शरीर में अग्नि सूर्य चंद्र मंडल हैं। मूलाधार स्थान अग्नि मंडल अनाहत चक्र से सूर्य मंडल आज्ञा चक्र से चंद्र मंडल हैं। राम नाम के जप से कुंडली शक्ति जागृत बिना दुख दर्दों से होती है। राम ही सत् चित् आनंद, ज्ञान स्वरूप आनंद,शुद्ध शाश्वत आनंद है। ब्रह्म विष्णु शिवात्मक रूप और सर्व देवतात्मक रूप राम है। रामायण में सुंदरकांड शिव स्वरूप का दर्शन कराता है। हरि हर रूप राम का है। नारायण में रा और नमः शिवाय में म दोनों जीवाक्षर राम ही है। त्यागय्या कुछ करोड़ों के तारक मंत्र से सिद्धि प्राप्त किए।वे कहते हैं कि “शिव मंत्रंकु म जीवं, माधव मंत्रंकु र जीवम ई विवरमुलु तेलिसिन घनुलकु म्रोक्केद।”राम रहस्योपनिषद में कहा कि “राम एवं परमब्रह्म राम एवं परमतपः राम एवं परमतत्वम श्रीरामो ब्रह्म तारकं”श्रीराम आम मानव को मार्ग दिखाता है अपने आचरण से बातों से कार्यों से,इससे मानुष जाति का उद्धार होता है, राम नामजप से ज्ञान और रामायण पारायण से धर्म का अर्थ, धर्मांचरण ज्ञात करते हैं। त्यागय्या कहता है कि“रामायनु ब्रह्म को पेरु आ मानव जननादुल तीरु,तेलिसि राम चिंतनतो नाममु चेयरो मनसा।” राम नाम जप से पाप विमुक्त, चित्त शुद्ध होकर आत्म ज्ञान प्राप्त करते। नाम जप से ज्ञान, ज्ञान से मुक्ति मिलती है। राम ध्यान से सहज वैराग्य, राम की पूजा से ऐश्वर्य मिलता है। “ईश्वरस्यभाव ऐश्वर्य है”। ईश्वर से अपना अभिन्न भाव का उदय होता है। धर्म से नाम जपने से ज्ञान , ज्ञान से ध्यान करें तो वैराग्य, वैराग्य से पूजा करें तो ईश्वरस्यभाव मिलता है। निस्वार्थ भाव ही ऐश्वर्य है।अनेक लोग जैसा कि गुंटूर रंगन्नबाबू,राघव आंजनेयुलु, गुंटूर पिच्चयदास जी,कनकम्म जी, महाराष्ट्र के श्री लिंगोपंत जी आदि ने नाम को पकड़ कर अपने जीवन को सार्थक बनाया। त्यागय्या कहता है कि “वेदालु वर्णिंचिंन रूपं, ब्रह्म रुद्रादुलु ध्यानिंचिन रूपं,मोदसदनमगु पटु चरितमुतो मुनिराजवेषयो त्यागराजनुत एवरिकै अवतारं एत्तितिवो।” सर्व लोक के लिए प्रिय, आनंद प्रिय, आनंद स्वरूप,आनंद कारक है। त्यागय्या कहता है कि“जगदानंदकारका!जय जानकीप्राणनायका!”राम के बाहरी प्राण लक्ष्मण हमेशा राम के साथ रहकर भ्रातृप्रेम को दर्शाया और उसी तरह शतृघ्न भरत के साथ रहकर अपना कर्तव्य निभाया। इक्ष्वाकु वंश के राजा सनातन धर्माचरण करनेवाले और सत्यव्रत हैं। वनगमन में लक्ष्मण,राज शासन में शत्रुघ्न सेवा में तत्पर रहते हैं। राम लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्न सकल सद्गुण संपन्न सर्व शास्त्र पारंगत हैं। भगवान के दिव्य चरित्र, गाना मृत से आनंदित होने वाले महर्षि वाल्मीकि के यहां महर्षि नारद का आगमन होता है। अतिथि मर्यादा पूरा कर इस प्रकार प्रश्न किया कि “वर्तमान समय में भूमि पर स्थित सकल सद्गुण संपन्न, पूर्ण शोभित व्यक्ति, श्रेष्ठ विद्वान, शक्तिवान, बुद्धिमान, सत्यनिष्ठ,कृतज्ञ,सकल जीव कोटि के लिए सत्कार्य करने वाला, प्रज्ञा निधि, अत्यंत सोंदर्यवान, क्रोध या ईर्ष्या को अपने वश में रखने वाला, त्रैलोक्य शरण्य, पराक्रमी, लक्ष्मी संपन्न, जिनके क्रोध से देवता भी भयभीत होते हैं ऐसे कोई व्यक्ति हैं?” त्रिलोक संचारी और ज्ञानी महर्षि नारद उत्तर देते हैं कि इक्ष्वाकु वंश के दशरथ महाराज के पुत्र सकल दिव्य लक्षण शोभित, जितेंद्रिय,सकल ऐश्वर्य संपन्न, अपरिमित शक्ति शाली, आजानुबाहु, विशाल वक्ष, प्रसन्न मुख, विशाल नेत्र, अपरिमित मेधावी,अत्यद्भुत कंठस्वर से बोलने वाला है,वही राम है। महर्षि वाल्मीकि और देवर्षि नारद के वार्तालाप द व्यक्त होता कि राम एक दिव्य और भव्य पुरुष हैं। ऐसे महान पुरुष का शासन को आज भी राम राज्य के नाम से याद करते हैं। उन्होंने ११००० सालों का सुशासन किए थे।
राम लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्न अपने विद्या पूरा कर सकल अस्त्र शस्त्र कोविद हुंए।एक दिन अचानक राजर्षि-ब्रह्मर्षि विश्वामित्र का आगमन होता हैं तो दशरथ स्वागत सत्कार कर यहां आने का कारण ज्ञात करते हैं कि विश्वामित्र लोक कल्याण हेतु करने वाले यज्ञ की रक्षा श्रीराम चंद्र से करवाना चाहते हैं। इसीलिए राक्षसों से यज्ञ की रक्षा कराने राम को अपने साथ भेजने की बात कहते हैं। राम को पराक्रम सत्य संकल्प, सर्वव्यापक, सर्वोन्नतमहत्मा के रूप में जानकर भेजने के लिए कहता है।“अहं वेद्मि महात्मानां रामं सत्यपराक्रमं, वशिष्ठोपि महातेजा ये चेमे तपसि स्थिताः”राजा दशरथ राक्षसों से जूझने के लिए राम के बदले सेना के साथ स्वयं आने की बात कहते हैं। राक्षसों के विवरण लेते हैं कि लोक कंटक रावणासुर अपने अनुपस्थिति में सुबाहु,मारीचों से विध्वंसक कार्य कराते है।उनका वध कर यज्ञ की रक्षा करना है।इससे त्रस्त दशरथ महर्षि वशिष्ठ कहने से राम को विश्वामित्र के साथ भेजते हैं। धनुर्धारी राम और लक्ष्मण त्रिशीर्ष पन्नग जैसा दिख रहे हैं। १२मील सरयू के किनारा पैदल चलने के बाद विश्वामित्र राम से आचमन करवाकर बला, अतिबला नामक दो मंत्र देते हैं जिससे थकावट, बूढ़ापा के दुख दर्दों नहीं रहते हैं। मंत्र बल से १००० सूर्यों के समान प्रकाशित हुआ। मार्ग में ताटक का वध देखकर नभतल से देवता गण फूल बरसाते हैं। विश्वामित्र इंद्र के आज्ञानुसार दिव्य अस्त्रों का उपदेश करते हैं, मंत्र प्राप्ति के बाद अस्त्र साकार हो कर अपना कर्तव्य पूछने पर राम अपने स्मरण से प्रत्यक्ष होने की बात कहते है।बाद में विश्वामित्र के आश्रम सिद्धाश्रम (वामनमूर्ति का निवास स्थान, उन्होंने कई लाखों साल निवास किया)गए। विश्वामित्र यज्ञ कार्य में लीन हुआ। सातवां दिन मारीच और सुबाहु यज्ञ का विघ्न करने से सुबाहु का वध होता है और शत योजन दूर समुद्र में गिरता है मारीच। वहां के महर्षि मुनि गण वापस आकर राम की प्रशंसा करते हैं।बाद में ऋषियों के कहने पर जनक महारज मिथिला के राजा द्वारा संपन्न यज्ञ में भाग लेने मिथिला राज्य को जाते हैं। राम, शिव धनुष का भंग कर दशरथ की अनुमति से सीता माता की पाणिग्रहण करते है उसी तरह लक्ष्मण उर्मिला की,भरत मांडवी की शतृघन श्रुतकीर्ति की पाणिग्रहण करते हैं। कोमल, लावण्य, सद्गुण संपन्न सीता माता को पाकर अपरिमित तृप्ति से आनंदित हुआ।सच्चरित धीर मेधावी अपने पति होने से सीता माता अपूर्व आनन्द अनुभव कर रही है। रूप सौन्दर्य चाल चलन धर्म आचरण परस्पर प्रेम अनुराग से सीता राम , लक्ष्मी नारायण जैसा हैं।विवाह महोत्सव के बाद विश्वामित्र हिमालय को चले जाते हैं। दशरथ अपने पुत्र और पुत्रवधूओं के साथ अयोध्या को जाते समय रास्ते में जमदग्नि का पुत्र परशुराम का आगमन होता है और राम के द्वारा परशुराम के पुण्य हरण किया जाता है। परशुराम राम को नारायण के अवतार मानकर फिर से महेंद्र गिरी को चले जाते हैं।
दशरथ अपने परिवार के साथ अयोध्या पहुंच कर सुखमय जीवन बिता रहे हैं। कुछ दिनों के बाद अपने मामा युधाजित्तु के आह्वान पर भरत और शत्रुघ्न केकय राज्य को जाते हैं।यहां अयोध्या में राम,दशरथ और अपनी माताओं की सेवा में और राज्य काज में जुटगए। राम परोपकारी ,क्षमा गुण, सत्पुरुष सांगत्य, निरहंकार,सत्यव्रत,दयास्वभाव,जितक्रोध,दीनानुकंपी, शुचि युक्त है।वे आलसी नहीं, ईर्ष्यालु भी नहीं। ईर्ष्या को दूर करने से द्वेष भाव, क्रोध दूर होते हैं। राम की प्राप्ति के लिए सद्गुण संपन्न होना चाहिए। किसी का अपमान नहीं करता, अत्यधिक पराक्रमी है। पिता की तरह पुर जनों का क्षेम समाचार मालूम करते। स्मित पूर्वाभिभाषि, लोगों के दुख दर्दों को दूर करते और जनता के खुशियों में शामिल होकर अधिक आनंद करते थे। अयोध्या वासी बेहद खुशी से, राम को राजा बनाने केलिए देवताओं से प्रार्थना करते थे।इन सभी सद्गुण देखकर दशरथ अपने मंत्री, सामंत, पुरोहित और आम जनता से चर्चा कर श्रीराम अभिषेक का मुहूर्त महर्षि वशिष्ठ से निर्णय करवाते हैं।
मगर वही समय दैव प्रेरणा से कैकेई वर मांगती है।वे हैं भरत का अभिषेक और राम का वनगमन।भरत राम का इंतजार करते हुए , राम के पादरक्षों को सिंहासन पर विराजमान करके राज शासन करते हैं। दुष्टों का वध करने अवतरित रामचंद्र प्रभु १४ साल वन गमन करता है। वहां अनेक हजार राक्षसों का संहार करता है। सीतापहरण करने के कारण लंका पर आक्रमण कर दुष्ट रावण आदि राक्षसों का संहार हनुमान, जांबवान,सुग्रीव,अंगद,नल नील आदि वानर वीरों के साथ करता है। अनेक दुष्ट राक्षसों का वध होता है। लंका पुरी के राजा के रूप में विभीषण का अभिषेक किया जाता है। सीता माता अग्नि प्रवेश कर अपने पवित्रता को दर्शाती है। पुष्पक विमान से अयोध्या लौटने वाले सीता राम का भव्य स्वागत किया जाता है। साकेत पुरी के राजा के रूप में श्रीराम का अभिषेक कार्य अत्यंत दिव्य,भव्य शान शौकत से मनाया गया।
सुंदरे सुंदरो रामः सुंदरे सुंदरी कथा।सुंदरे सुंदरी सीता सुंदरे सुंदरं वनम।।
सुंदरे सुंदरं काव्यं सुंदरे सुंदरःकपिः। सुंदरे सुंदरं मंत्रं सुंदरे किं न सुंदरम।।
श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे ।सहस्रनाम तत्लुयं राम नाम वरानने।।
“कलियुग मानव का अनुसरणीय और आचरणीय महिमान्वित काव्यग्रंथ”
श्रीराम जय राम जय जय राम।
सन्दर्भ ग्रन्थ:
१. श्रीमदरामायण-वाल्मीकी
२.श्री मद्भभगवद गीता -वेदव्यास
३.महत्वपूर्ण शिक्षा-जयदयाल गोयन्दका
४.त्यागय्याराज कीर्तन-त्यागय्या
५.सामवेद षन्मुक शर्म के श्रीरामायण तत्व सौन्दर्य प्रवचन
Article by
पी सुधा रानी
Pillala Sudha Rani
PhD student
O u Hyderabad
Ph 6281379595
sudha0584@gmail.com
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ReplyDeleteJai Shree Ram