हिंदी साहित्य के विविध रूप
२१वी सदी के हिंदी लेखिकाओं के उपन्यासों में नारी विमर्श
विमर्श न्याय का विषय है जो कि स्पष्टीकरण को दर्शित करता है भाव को
नहीं।
डा .उदय भान सिंह के अनुसार –“साहित्यिक समीक्षा वह रचना है ,जो
आलोचित साहित्यिक कृति के अर्थ या बिम्ब को को भलीभांति ग्रहण करने में
पाठक,श्रोता या दर्शक की सहायता करें ।”२
अर्थात ,किसी वस्तु या कृति के सम्यक व्याख्या करना ही विमर्श कहलाता है जिसके अनेक पर्यायवाची
शब्द है –समीक्षा ,आलोचना ,विचार ,विवेचन ,परीक्षा ,मीमांसा और तर्क जो सूक्ष्मता
लिए हुए विधमान है।
“मानक हिंदी कोश में
तो विमर्श का अर्थ –विचारण ,आलोचना ,व्याकुलता ,क्षोभ और उद्वेग है।”३
जबकि “अंग्रेजी हिंदी शब्दकोश में विमर्श का अर्थ भाषण ,प्रवचन,
प्रबंध दिया हुआ है ।”४
ऑक्सफोर्ड अंग्रेजी कोश में भी डिस्कोर्स Discourse शब्द का अर्थ- भाषण या बातचीत ही
है ।
अभय कुमार दुबे –“इसका निपट अर्थ है दो वक्ताओं के बीच संवाद या
बहस या सार्वजनिक चर्चा।”५
विमर्श जागरूकता का परिचायक है जो समाज में व्यक्ति और जाति में चेतना
लाकर दिशा की ओर उन्मुख करता है ।
आज के समय में विमर्श क्षेत्र व्यापक हो चुका है –जिसमें नारी विमर्श
,वृद्ध विमर्श ,आदिवासी विमर्श ,दलित विमर्श ,किन्नर विमर्श ,बाल विमर्श आदि कितने
ही विमर्श उभरकर सामने आए है ।
अगर माना जाए तो हाशिए कृत समुदायों को सामने लाना ही विमर्श का मूल उद्देश्य दिखाई पड़ता है। नारी तो सदियों से ही हाशिए पर रही जो आज केंद्र में आ गई है ।
नारी के तो अनेकों पर्यायवाची शब्द है –स्त्री ,पत्नी ,औरत ,मादा और
अंग्रेजी मेंWoman,Female,Damsel शब्द मिलते है ।
“स्त्री (सं \स्तरी )।(१)नारी ,औरत ।(२)पत्नी \जोरू |(३)मादा ।(४)एक
वृत जिसके प्रति चरण में दो गुरु होते है ।उसका दूसरा नाम ‘कामा‘है ।
उ.गंगा ध्यावौ कामा पावो |स्त्री .दे .’इस्तिरी “६
Oxford Dictionary of Thesaurusमें ‘dame’का अर्थ इसप्रकार है
–
‘Dame(noun)1.(title
of) Woman who has been knighted, 2.
Comic female pantomime character played by man, 3.Us slang woman.”
‘ Woman ‘ का अर्थ –“1 .Adult
human female, 2.The female sex, 3 .Colloquial
wife,girl friend.”
स्त्री को दया ,माया ,ममता ,श्रधा ,इडा आदि के रूप में विभाजित करेगें
तो विमर्श अधूरा ही रहेगा यानि स्त्री के व्यक्तित्व की पूर्णता में समग्र मानवी
रूप को देखना ही सार्थक होगा ।
नारी विमर्श की परिभाषा
नारी विमर्श को पश्चात् विद्वान् ईस्तेल फ्रडमेन ने इसप्रकार परिभाषित किया है – “ Feminism is a belief that although women men are inherently of equal worth, most ties privilege men as a group. As a result ,social movements are necessary to achive political equality between women and men with the understandnd that gender alway intersects with other social hierarchies .”
अर्थात् पुरुष एवं स्त्री समान महत्व रखते है ।अधिकांश समाज में
पुरुषों को वरीयता दी जाती है जिसके कारण स्त्री –पुरुष समानता के लिए सामाजिक
आन्दोलन जरूरी है क्योंकि लिंगाधारित अंतर अन्य सामाजिक परम्पराओं में प्रवेश करता
है।
यानि यह चिन्तन अन्याय के विरुद्ध प्रदर्शित है। एकतरफ यह चिन्तन धारा
है। जिसे वैचारिकी या सैध्दांतिकी लेखन भी कहते है। जो बहुत पहले से चली आ रही है
रचनाकार अपनी लेखन कार्यकौशल से इस बातों को स्पष्ट करता है ।जो नारी को धरातल पर
अलग –अलग छवि से दृष्टिगत करता है ।
पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष द्वारा बनाये नियमों के वर्चस्व ,नारी
की निरीहता , जकड़न ,रुढियों में बंधी छटपटाहट दिखाई पड़ती है। अर्थात नारी स्वभाव
को समझना ही नारी विमर्श का मुख्य लक्ष्य है। यह नाहि कोई परंपरा है ना ही पश्चिम
के संस्कार। आज के बदलते युग में दृष्टी को बदलना ही नारी विमर्श का मुख्य आधार
है। नारी मुक्ति संतुलनात्मक लचीलापन
आधुनिक सोच ही मुक्त होना है जो नारी विमर्श का ध्येय है।
नारी विमर्श का उद्भव
नारी का संबंध समाज के हरेक प्राणी से है जो प्रत्येक संबंधों को जोड़े
रखता है। यहीं प्यार और संबंध ही नारी विमर्श को ही सही दिशा प्रदान करती है। जिसमें
एक रूप शोषण का भी है जो किसी भी रूप में हो सकता है ।इस शोषण की पीड़ा ,अस्मिता का
संघर्ष नारी विमर्श का एक मुद्दा बन सकता है नारी का विद्रोही रूप संघर्षशील नारी
विमर्श को प्रकट करता है।
नारी विमर्श को बहस के रूप में ना दृस्तिग्त करके एक जागृति रूप में प्रकट
करना ही सही मन्तव्य हो सकता है। जो की इक्कसवीं सदी का स्वप्निल सच है। नारी से
जुड़ी प्रत्येक मार्ग प्रशस्त हो ,समस्या ,कुंठा , ईच्छा सभी को स्पष्ट रूप से
प्रकट करना सके ही नारी विमर्श होगा।
महादेवी वर्मा के मान्यतानुसार –“पुरुष के समान स्त्री भी कुटुंब
,समाज ,नगर तथा राष्ट्र की विशिष्ट सदस्य है तथा उसकी प्रत्येक क्रिया का प्रतिफल
सबके विकास में बाधा भी डाल सकता है और उनके मार्ग को प्रशस्त भी कर सकता है ।”७
नारी में कोमलता और सहानभूति के साथ साहस तथा बौधिक क्षमता का एक ऐसा
सामंजस्य होना आवश्यक है महादेवी वर्मा के कथनानुसार –“स्त्री के व्यक्तित्व में
कोमलता और सहानुभूति के साथ साहस तथा विवेक का एक सामंजस्य होना आवश्यक है जिससे
हृदय के सहज स्नेह की अजस्त्र वर्षा करते हुए भी वह किसी अन्याय को प्रश्रय न देकर
उसके प्रतिकार में तत्पर रह सकें । ऐसा एक सामाजिक प्राणी न मिलेगा जिसका जीवन
माता ,पत्नी ,आदि स्त्री के किसी न किसी रूप से प्रभावित न हुआ हो । इस दशा में
उसके व्यक्तित्व को कितने गुरु उत्तरदायित्व की छाया में विकास पाना चाहिए ।”८
महादेवी वर्मा नारी की सुकोमलता को बनाए रखने के पक्ष में है। समाज के
तपते झुलसते जीवन को शीतलता स्त्री की कोमलता ही प्रदान करती है –“संसार में
निरंतर संघर्षमय जीवन वैसे ही कुछ कम नीरस तथा कटु नहीं है ,फिर यदि उससे सारी
सुकुमार भावनाओं के माधुर्य को बहिष्कार कर दिया जाए तो असीम साहसी ही उसे वहन
करने में समर्थ हो सकेगा ,इतर जनों के जीवन को तो उस रुझता का भार चूर – चूर किए
बिना न रहेगा। स्त्री की कोमलतामयी सदाशयता और सहानुभूति समाज के संतृप्त जीवन के
लिए शीतल अनुलेप का कार्य करती है ,इसमें संदेह नही ।”९
अब नारी ने अपनी शक्ति को पहचाना और पारम्परिक अवधारणा से बाहरी जीवन
में सफलता पाने की ओर जागरूक हुई ।
“आज की परिस्थिति कुछ और ही है | स्त्रीन घर का अलंकार मात्र बनकर
जीवित रहना चाहती है न देवता की मूर्ति बनकर प्राण प्रतिष्ठा चाहती है कारण वह जान
गई है कि एक का अर्थ अन्य की शोभा बढ़ाना तथा उपयोग न रहने पर फ़ेंक दिया जाना तथा
दूसरे का अभिप्राय दूर से उस पुजापे को देखते रहना । जिसे न देकर उसी के नाम पर
लोग बाँट लेंगे। आज उसने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरुष को चुनौती देकर अपनी
शक्ति की परीक्षा देने का प्रण किया है और उसी में उतीर्ण होने को जीवन की चरम
सफलता समझती है ।”१०
आदिकाल से नारियों की दशा दयनीय रही परन्तु समय के बदलाव से नारी की
सोच में परिवर्तन आया ।अब दुःख को भाग्य का लेखा न मानकर पुरुषों के खूँटे से बंधी
निरीह गाय न मानकर सभी धारणाओं का खंडन करने की ओर अग्रसर हुई |वे स्वयं को इंसान
समझना शुरू कर दिया ।शताब्दियों के शोषण के पश्चात् अब नारी मुक्ति के प्रयास
तीव्रगति से फैल रही है ।
नारी को विमर्श के रूप में अपनाना ही विमर्श का सही गन्तव्य होगा
|स्त्रीत्व होना कमजोरी नही बल्कि एक शक्ति है ,क्षमता है ,महादेवी का द्रष्टव्य
है –“युगों से पुरुष स्त्री को उसकी शक्ति के लिए नही सहनशक्ति के लिए ही दंड देता
आ रहा है ।”११ नारी एक सामाजिक इकाई है
जबकि उसे व्यक्तिगत संपत्ति समझा जाता है पितृसत्ता ने जहाँ चाहा इस्तेमाल किया है
स्त्री को मनुष्य के रूप में अपनाना ,अस्मिता प्रदान करना ही नारी विमर्श का जन्म
है।
नारी विमर्श का अर्थ मोर्चा या आन्दोलन नही है जबकि उन घटनाओं से है
जो स्त्री को उसके अधिकारों के प्रति सचेत करता है |नारी विमर्श का दृष्टिकोण एक
स्वस्थ एवं तटस्थ होकर पूर्ण रूपेण मानवोचित भाव को प्रकट करता है |इसका सरोकार
जीवन तथा साहित्य में नारी के प्रति प्रगतिशील भाव से है । मुक्ति सामाजिक
दायित्वों ,कर्तव्यों ,अधिकारों ,संस्कारों से नही बल्कि उन मानसिकताओं से है जो
स्त्री को हमेशा पुरुष के अधीन तथा शोषण के दायरे में रखा है ।
नारी का आत्मसंघर्ष हरेक युग में रहा है। परंपरागत धारणाओं ने नारी के
लिए एक निश्चित मानदंड बनाया है उसे हर परिस्थितियों में जीना है किन्तु बन्धनों
में बंधकर ।जो कि पितृसत्तात्मक समाज द्वारा बनाया गया है।इस दोहरी मानदंड में तो
ना वो आजाद है और न ही बंधन में है ।
इससे यही दर्शित होता है कि स्त्री मुक्ति का प्रश्न उसके रूप को
अस्वीकार करने में ही उलझ कर रह जाता है –“स्त्री होना और मनुष्य परस्पर अपवर्जक
है ।”१२
नारी विमर्श का उद्देश्य उन कारकों को खोजना है जो नारी की स्थिति के
लिए उत्तरदायी है |यह नारी के प्रति होने वाले शोषण के विरुद्ध का संघर्ष है ।
“स्त्री विमर्श स्त्री के स्वयं की स्थिति के बारे में सोचने और निर्णय लेने का विमर्श है ।....यह स्वयं चेती स्त्री के पाए हुए स्वाधिकार है ,जहाँ उसे अपने खिलाफ होनेवाले हर गैर वाजिव सुलूक से खुद निपटना है |स्त्री की अस्मिता की लड़ाई आधी दुनिया को मनुष्य का दर्जा दिलाने की लड़ाई है।”१३
नारी विमर्श उसकी साहस और मनुष्य होने को दर्शित करता है ।आज उसने चुनौती को स्वीकार और अपने संकट से खुद लड़ने के लिए कमर कस ली है ।
महादेवी वर्मा ने द्रष्टव्य किया है –“हमें न किसी पर जय चाहिए न किसी
से पराजय ,न किसी की प्रभुता ,न किसी का प्रभुत्व ।केवल अपना वह स्थान वे स्वत्व
चाहिए जिनका पुरुषों के निकट कोई उपयोग नहीं है ,परन्तु जिनके बिना हम समाज का
उपयोगी अंग बन नहीं सकेंगी ।हमारी जागृत और साधन संपन्न बहिनें इस दिशा में विशेष
कार्य कर सकेंगी ,इसमें संदेह नही ।”१४ इस
प्रकार नारी मुक्ति आधुनिक युग की देन है ।
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची :
१ .रामचन्द्र वर्मा ,संक्षिप्त शब्द सागर पृष्ठ सं.९००
२. श्री हेमलता ,सुरेन्द्र वर्मा के नाटकों में स्त्री विमर्श पृष्ठ सं.२०
३ .मानक हिंदी कोश पृष्ठ सं.९०३
४ .अंग्रेजी हिंदी शब्द कोश पृष्ठ सं.१
५ .सं .अभय कुमार दुबे ,भारत का भूमंडलीकरण पृष्ठ सं.४४४
६.रामचन्द्र वर्मा ,संक्षिप्त हिंदी शब्द सागर पृष्ठ सं.१०१५
७ .महादेवी वर्मा ,हमारी श्रृखंला की कडियाँ -१ , श्रृखंला की कडियाँ पृष्ठ सं.१७
८. महादेवी वर्मा ,हमारी श्रृखंला की कडियाँ -१ , श्रृखंला की कडियाँ पृष्ठ सं.१८
९. महादेवी वर्मा ,हमारी श्रृखंला की कडियाँ -१ , श्रृखंला की कडियाँ पृष्ठ सं.१८
१०. महादेवी वर्मा ,हमारी श्रृखंला की कडियाँ -१ , श्रृखंला की कडियाँ पृष्ठ सं.१०५
११नीलम कुलश्रेष्ठ ही शोध का विषय क्यों बनी –परत दर परत स्त्री , पृष्ठ
सं.१ .
१२.ज्योत्स्ना मिलन ,पूर्वग्रह अंक १०४ , पृष्ठ सं.५८
१३ .रेखा कस्तवार ,स्त्री चिन्तन की चुनौतियां पृष्ठ सं.२५ -२६
१५ .महादेवी वर्मा , हमारी श्रृखंला की कडियाँ -१ , श्रृखंला की कडियाँ पृष्ठ सं.१५
बबीता कुमारी
शोधार्थी : हिंदी विभाग
कर्नाटक केंद्रीय विश्वविद्यालय, गुलबर्गा
Mob.9948019718
Mail :- Babitaz.saket@gmail.com
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