साहित्य तरंग
‘कटरा बी आर्जू’ उपन्यास में सामान्य जनता पर किए गए अत्याचारों, परिवार नियोजन और नगरों के विस्थापन के नाम पर किए गए अमानवीय व्यवहार, विरोधी स्वरों को दबा देने की निर्मम क्रिया तथा पुलिस और जेल विभाग के अधिकारियों की परपीड़न -प्रकृति का जो चित्रण किया गया है वह बेजोड़ है। यह उपन्यास आपातकाल की घटनाओं पर आधारित है। यह कहना अधिक अच्छा होगा कि उन पर लिखा गया है। इसके लिए इलाहाबाद के एक मोहल्ले ‘ कटरा मीर बुलाकी’ जिसे ‘कटरा बी आर्जू’के नाम की कल्पना की गई है। राही मासूम रजा ने उस मोहल्ले के सामान्य लोगों के सुख-दुख की जिंदगी का चित्रण करते हुए उनके आपातकाल के दबाव से गुजरने की यथार्थ रूपरेखा खींची है। इसमें उपन्यासकार ने राजनीतिक छल कपट का उद्घाटन भी किया है। इस उपन्यास का नाम सरकारी मानकता पर खरा नहीं उतरता है। यह मात्र लेखक की कल्पना से चित्रत शीर्षक है। कवि अब्दुल हसन नायाब शहनाज के साथ अपनी सगाई के दिन यानी अपनी एक आर्जू के पूरा -सा होने के दिन ‘कटरा मीर बुलाकी’ के नाम के नीचे चाकू से यह नाम लिख देता है।उन्हीं की आर्जू का नहीं है, ‘ यो भी वे बहुत दिन से देखते चले आ रहे हैं कि उनके मोहल्ले वालों के पास और तो कुछ नहीं पर आर्जू है, ।’1 (कटरा भी आर्जू , राही मासूम रजा. राजकमल प्रकाशन , नई दिल्ली, पृष्ठ- 11)
प्रस्तुत
उपन्यास
में
यदि
लेख
‘भारतीय
मुसलमान
और
राष्ट्रवाद’नामक
लेख
पर
विचार
नहीं
किया
जाएगा
तो
यह
समझना
कठिन
हो
जाएगा
कि
इस
उपन्यास
में
किस
ज्वलंत
अमानवीय
समस्याओं
का
उद्घाटन
करने
का
प्रयास
किया
गया
है। यह
समस्या
सदियों
से
भारत
देश
में
चली
आ रही
है। कई
लोगों
ने
इस
समस्या
का
निवारण
करने
का
भरसक
प्रयास
भी
किया
है
परंतु
फिर
भी
आज
भी
यह
समस्या
भारत
के
लगभग
प्रत्येक
शहर
में
समय
दर
समय
अपना
सिर
उठाती
रहती
है। अतः
इस
संदर्भ
में
इस
लेख
के
बारे
में
कहना
समीचीन
होगा। असगर
वजाहत
के
लेख
से
उल्लिखित
निम्न
पंक्तियां
इस
प्रकार
है-
“कुरान
के
कानून
चाहे
अटल
हो
पर
यदि
समय
के
साथ
उनको
नई
परिभाषा
देने
का
अधिकार
न दिया
गया
होता
तो
इस्लाम
ने
‘ इजतिहाद’ और
‘ इज्मा’
का
हक
भी
ना
दिया
होता। इस्लाम
ने
इसका
दरवाजा
इसीलिए
खुला
रखा
कि
धर्म
की
बुनियादी
बातों
को
छोड़कर
बाकी
सारी
समस्याओं
के
सिलसिले
में
अपने
अपने
ऐतिहासिक
और
सामाजिक
वातावरण
को
ध्यान
में
रखते
हुए
नए
फैसले
किए
जा
सकें
जिससे
जमाना
उसे
पीछे
छोड़कर
आगे
निकल
जाए। कुरान
का
यह
कहना
है
कि
उसका
पैगाम
तमामआने
वाले
लोगों
के
लिए
है।”
2 -( संपादक, सागर शैलेंद्र कथाक्रम 2003, भारतीय मुसलमान और राष्ट्रवाद, पृष्ठ संख्या -53)
इस
प्रकार
कहा
जा
सकता
है
कि
इस
उपन्यास
में
भी
इसी
सच्चाई
को
उभारने
का
प्रयास
किया
गया
है।
आर्जूएं दो
प्रकार
की
होती
हैं-
एक
वह
होती
है
जो
बड़े
लोगों
की
होती
है,
और
जो
पूरी
होती
है
और
लगातार
बढ़ती
चली
जाती
है। दूसरी
वह
होती
है
जो
सामान्य
होती, किंतु
पूरी
नहीं
होती,
यह
सामान्य
आदमियों
की
होती
है,
थकी
रहती
है,
टूटती
रहती
हैं,
बिखरती
रहती
है
और
उनके
जीवन
के
साथ
समाप्त
भी
हो
जाती
है। इस
मोहल्ले
की
आशाएं
भी
ऐसे
ही
सामान्य
लोगों
की
है
जो
कभी
समाप्त
नहीं
होने
पाती। इसी
टूटती
हुई
आशाओं
की
झड़ी
को
उपन्यासकार
ने
प्रस्तुत
करने
का
प्रयास
किया
है।
इस
उपन्यास
में
कई
पात्र
है
किंतु
केंद्रीय
पात्र
पहलवान
भोलू,
बिल्लो,
देश,
शमसू मियां,
आशाराम,
शहनाज
और
महनाज।पहलवान
भोलू
की
चाय
की
दुकान
है। बिल्लू
पहलवान
की
बिना
मां
बाप
की
भांजी
है
जो
उन्हीं
के
यहां
पलती
है। देश
उनके
दिवंगत
मित्र
का
लड़का
है। यह
भी
उन्हीं
के
यहां
रहता
है। बिल्लू
ने
एक
लॉन्ड्री
की
दुकान
खोल
रखी
है। देश
बाबू
गौरी
शंकर
लाल
पांडे
एम
पी
के
नेशनल
गैरेज
में
नौकर
है। बिल्लू
और
देश
की
शादी
तय
हो
चुकी
होती
है। मकान
के
लिए
दोनों
पैसे
बचाते
हैं। मियां
शमसू
भी
वही
काम
करते
हैं। शमशु
मियां
का
इकलौता
बेटा
पाकिस्तान
चला
गया
है। वे
अपनी
बीवी
सकीना
और
दो
बेटियों
शहनाज
और
विधवा
मेहनाज़
के
साथ
गरीबी
में
अपनी
जिंदगी
की
गाड़ी
खींच
रहे
हैं। शहनाज
की
शादी
मास्टर
बदल
हसन
नायाब
से
तय
है
किंतु
यह
शादी
इसीलिए
नहीं
हो
पाती
की
मास्टर
वलीमा
देना
चाहते
हैं,
उनके
पास
इसके
लिए
पैसे
नहीं
है। मेहनाज
की
दोबारा
शादी
तय
होती
हैं। शमसु
मियां
के
खाल
आजाद
बहन
के
बेटे
मास्टर
एक
लाख
लेकर
उनके
गबन हो
जाने
के
कारण
यह
शादी
नहीं
हो
पाती
और
शादी
होती
है
शमसु मियां
से,जो उम्र
में
थोड़े
ही
छोटे
है
,जो
खाते
पीते
दुकानदार
हैं,
जो
हर
तरह
से
असुंदर
है।
इस
जिंदगी
के
कई
पहलू
है। एक
है
इसका
सामाजिक
और
मानवीय
पहलू। सामाजिक
संदर्भों
की
दृष्टि
से
यह
मोहल्ला
बहुत
ही
संश्लिष्ट
और
संबद्ध
है। यह
बात संवेदना
के
भीतर
एक
मार्मिकता देती
रहती
है।यहां
हिंदू
मुसलमान
में
कोई
भेदभाव
नहीं
है। एक
मानवीय
संवेदना
है
जो
सभी
को
आपस
में
प्रेम
भाव
से
बांधे रहने
में
सफल
है। शमसु
मियां
सबके
आदरणीय
हैं
और
पहलवान
भी
सबका
विश्वास
और
आदर
अर्जित
किए
हुए
हैं। मेहनाज
को
बिल्लू
और
देश
घर
की
लड़की
जैसा
प्यार
करते है। देश
और
बिल्लू
एक
दूसरे
से
झूठ
बोलकर
मेहनाज
के
दहेज
का
इंतजाम
करते
हैं। यूनियन
के
प्रश्न
पर
मनमुटाव
होने
पर
शमशु
मियां
और
देश
एक
दूसरे
के
लिए
तड़पते
हैं,
एक
दूसरे
के
हित
की
ही
बात
सोचते
है
। अंत
में
मिलने
पर
शमसु मियां
देश
से
लिपटकर
बच्चे
की
तरह
रोने
लगते
हैं। होली
के
दिन
एक
हिंदू
द्वारा
मुसलमानों
के
विरुद्ध
एक
टिप्पणी
जड़
देने
पर
पहलवान
उसे
थप्पड़
मारते
हैं। और
उसे
कहते
हैं
“खबरदार
यदि
इस
मोहल्ले
में
हिंदू
मुसलमान
का
सवाल
उठाया
तो।”
-3 ( कटरा भी आरजू, राही मासूम रजा. राजकमल प्रकाशन , नई दिल्ली, पृष्ठ- 35 )
इन्हीं
मानवीय
संबंधों
के
साथ-साथ
परिवार
और
मैत्री
का
संबंध
भी
यहां
पर
महत्वपूर्ण
भूमिका
निभाते
हैं।मियां
शमसु अपने
सारे
अभावों
के
बावजूद
अपनी
बच्चियों
को
अपना
गहरा
प्यार
देते
हैं,
मेहनाज
के
संपन्न
होने
पर
उसकी
लाख
कोशिशों
के
बावजूद
उसका
कोई
सामान
नहीं
लेते। पहलवान
अपनी
दिवंगत
बहन
की
बेटी
बिल्लू
और
मित्र
के
बेटे
देश
को
न केवल
प्यार
से
पालते
हैं
वरन्
उनके
लिए
अपनी
शादी
भी
नहीं
करते। बिल्लू
और
देश
के
संबंधों
में
स्वस्थ
मान्यता
दिखाई
पड़ती
है। शहनाज
और
मास्टर
पद
उल
हसन
के
संबंधों
में
भी
वही
मानवीय
तीव्रता
लक्षित
होती
है। इस
प्रकार
राही
ने
एक
छोटे
से
गरीब
उपेक्षित
मोहल्ले
को
उसकी
छवि
में
पकड़ा
है।
इस
जिंदगी
का
दूसरा
पहलू
है-राजनीतिक
मानवीयता
जो
अनजाने
मानवीय
मूल्यों
पर
ही
टिकी
हुई
है। इसका
मानवीय
पहलू
बहुत
ही
आक्रांत
कर
देने
वाला
है। यह
मानव
की
मनुष्यता
को
तोड़कर
कुरूप
बनाता
है। यह
कुरूपता
कभी
व्यक्ति
के
स्तर
पर
तो
कभी
सामूहिक
समाज
के
स्तर पर
दिखाई
देती
है। सामाजिक
और
राजनीतिक
दबाव
बहुत
ही
व्यापक
है
परंतु
धीरे-धीरे
इमरजेंसी
के
नाम
पर
आर्थिक
दबाव
भी
उपन्यास
के
क्रमिक
विकास
में
दृष्टिगोचर
होता
है। अर्थात
यह
विकास
यात्रा
सामान्य
मनुष्य
से
होकर
सामूहिक
मानवता
की
ओर
अग्रसर
होती
है। इमरजेंसी
के
पहले
और
इमरजेंसी
के
दौरान
राजनीति
के
प्रभावित
क्षेत्रों
में
आने
वाले
तत्व
को
उसके
चारित्रिक
उद्घाटन
के
द्वारा
प्रस्तुत
करने
का
सफल
प्रयास
किया
गया
है। यह
उद्घाटन
केवल
और
केवल
मानवीय
मूल्यों
को
लेता
हुआ
दिखाई
देता
है। राजनीति
के
आगे
मानवीय मूल्य
टकटकी
बांधे
देखते
नजर
आते
हैं।
आशाराम,
कटरा
मीर
बुलाकी
के
नीचे
मास्टर
अब्दुल
हसन
चाकू
से
कटरा
भी
आर्जू
नाम
लिख
देते
हैं
तो
उन्हें
यह
पसंद
नहीं
आता
और
संपादक
की
सलाह
पर
इस
पर
वे
धारावाहिक
लिखना
शुरू
कर
देते
हैं। बस
एक
तूफान
खड़ा
हो
जाता
है। केवल
एक
नाम
मात्र
से
सारी
की
सारी
मानवता
धरी
की
धरी
रह
जाती
है। इस
प्रकार
इस
उपन्यास
में
मानवता
को
एक
कमजोर
कड़ी
के
अंतर्गत
प्रस्तुत
करने
का
प्रयास
किया
गया
है। मानवता
एक
ऐसा
कांच
का
टुकड़ा
है
जो
थोड़ी
सी
भी
ठोकर
लगने
से
टूट
जाता
है। इसीलिए
हम
सभी
को
अर्थात
मानव
जाति
को
यह
समझना
होगा
कि
यह
मानवता
कितनी
अधिक
अमूल्य
है।
यह
नाम
सरकार
का
तख्ता
पलटने
की
किसी
साजिश
का
एक
कोड
है
ऐसा
पुलिस
के
द्वारा
माना
जाने
लगा
है। आशाराम
इस
साजिश
का
मुखिया
करार
दिया
जाता
है। पुलिस
की
ओर
से
के
बी
ए की
फाइल
खुल
जाती
है। फाइल
धीरे
धीरे
नीचे
से
ऊपर
की
ओर
और
इलाहाबाद
से
दिल्ली
की
ओर
से सरकती
है
और
सी
बी
आई
की
जांच
शुरू
हो
जाती
है। दूसरे
प्रसंग
में
गौरी
शंकर
पांडेय
एम
पी
के
नेशनल
गैरेज
में
शमसु
मियां
और
देश
नौकर
है। आशाराम
महा
हड़ताल
करता
है। हड़ताल
फेल
हो
जाती
है। इस
प्रसंग
में
एक
किताबी
नेता
के
साथ
ही
मजदूरों
की
आशा
आकांक्षा,
उनकी
सीधी
समझ,
उनकी
मजबूरी
और
हड़ताल
की
असफलता
का
परस्पर
संबंध
जोड़कर
सांकेतिक
रूप
से
एक
संक्षिप्त
संश्लिष्ट
चित्र
उभारा
गया
है। मोटर
मैकेनिक
से
यूनियन
टूट
जाती
है
और
जब
दूसरी
बार
यूनियन
के
निर्माण
की
कोशिश
होती
है
तो
शमसु
और
देश
को
प्रलोभन
से
तोड़ने
की
कोशिश
की
जाती
है। नेशनल
गैरेज
कॉन्फ्रेंस
एम
पी
बाबू
गौरी
शंकर
पांडेय
का
है। वे
नेता
भी
है। पूंजीपति
भी
। सरकार
का
चित्र
इसी
प्रकार
का
है। वह
पूंजीवादी
स्वभाव
का
होकर
भी
मजदूरों
के
हित
का
ढोंग
रचता हैं,
इसीलिए
उनमें
व्याप्त
एकता
को
तोड़तता है
और
उसकी
हार-जीत
को
उनके
संदर्भ
में
न देखकर
अपनी
राजनीतिक
हार-जीत
के
संदर्भ
में
देखतता है।
वह
नहीं
चाहतता कि
इनका
नेतृत्व
कोई
और
करें।
“ ऊपर
से
हुक्म
आया
कि
किसी
न किसी
तरह
मजदूर
आंदोलन
को
कम्युनिस्टों
के
हाथ
से
निकाल
लेना
चाहिए। सी
पी
आई
तो
फिर
भी
चल
जाएगी
पर
सी
पी
एम
को
हर
मोर्चे
पर
राजनीतिक
हार
का
सामना
करना
चाहिए।”-4 (वही ,पृ -57 )
मनुष्य
की
नासमझ
प्रवृत्ति
के
कारण
मानवता
का
गला
किस
प्रकार
घोंट जाता
है
इस
बात
का
परिचय
प्रस्तुत
उपन्यास
में
यथार्थ
रूप
से
दिखाया
गया
है। बाबू
गौरीशंकर
मजदूरों
के
दो
प्रिय
सर
शमसु
और
देश
को
दावत
पर
बुलाते
हैं
और
प्रलोभन
देते
हैं। शमसु अपनी
गरीबी
के
कारण
प्रलोभन
में
आ जाते
हैं
लेकिन
देश
विरोध
करता
है
और
इस
प्रकार
पूंजीवादी
राजनीति
को
परम
आत्मीय
जनों
के
संबंधों
में
दरार
डाल
देने
में
सफल
होते
दिखाया
गया
है। इसके
पश्चात
देश
को
डिसमिस
कर
दिया
जाता
है। इन
दो
प्रसंगों
के
साथ
छोटे-छोटे
कई
प्रसंग
जुड़े
हुए
हैं
जो
मानवीय
मूल्यों
को
या
यूं
कह
सकते
हैं
कि
मानवीय
कुरूप
चेहरे
को
सांकेतिक
रूप
से
उद्घाटित
करते
हैं। राजनीति
के
केंद्र
में
सरकार
ऐसी
है
लेकिन
वह
प्रतीक
मात्र
है। उसके
स्थान
पर
किसी
और
पार्टी
को
रख
कर
देखिए
वह
भी
ऐसी
ही
दिखाई
देगी। इसके
संकेत
जगह-जगह
उभारे
गए। यहां
तक
की
अपने
दल
की
छवि
बनाने
के
लिए
मजदूरों
के
हित
अहित
से
उतना
प्रयोजन
नहीं
लेते
जितना
आवश्यकता
होती
है।
जैसे-जैसे
कथा
का
विकास
होता
जाता
है
मानवीय
संवेदना
सामान्य
से
विशिष्ट
होती
हुई
दिखाई
देती
है।
प्रस्तुत
संदर्भ
में
समकालीन
उपन्यासकार
और
प्रशासनिक
अधिकारी
विभूति
नारायण
जी
के
सांप्रदायिक
मानवीय
संवेदना
के
संदर्भ
में
प्रकट
किए
गए
विचारों
को
प्रस्तुत
करना
आवश्यक
हो
जाता
है।
युगीन
संवेदनाओं को
उन्होंने
कुछ
इस
प्रकार
व्यक्त
किया
है-
“मैं
पिछले
20 25 वर्षों
से
सांप्रदायिकता
और
राज्य
के
रिश्ते
को
लेकर
लिखता
रहा
हूं
और
तब
से
लेकर
कई
बार
बड़ी
मजेदार
स्थितियां
उत्पन्न
हुई। मेरे
लेखन
में
राज्य
और
पुलिस
को
लेकर
जिस
तरह
की
टिप्पणियां
की
गई
है
उसे
लेकर
अक्सर
लोग
मुझे
रिटायर्ड
मान
लेते
हैं। मुस्लिममुस्लिम
अफसर
सैयद
शहाबुद्दीन
तो
सालों
पहले
से
मेरा
परिचय
अपनी
पत्रिका
में
रिटायर्ड
आई
पी
एस
अफसर
देते
रहे। मैंने
एक
कार्यक्रम
में
भोजन
अवकाश
के
दौरान
उनसे
यह
शिकायत
भी
की
तो
वे
हंसने
लगे। उनका
कहना
था
कि
वे
कल्पना
नहीं
कर
सकते
कि
नौकरी
में
रहते
हुए
कोई
पुलिस
अधिकारी
राज्य
के
साबर
दाई
चरित्र
पर
अपना
करारा
हमला
कर
सकता
है। इस
तरह
के
अनुभव
मुझे
कई
बार
हुए। मुझे
याद
है
कि
1991 या
बयान
वे
में
नागपुर
में
मुझे
भारतीय
राज्य
और
सांप्रदायिक
दंगों
पर
बोलना
था। मेरे
वक्तव्य
के
बाद
एक
बुजुर्ग
मुस्लिम
सज्जन
देर
तक
मेरा
हाथ
पकड़े
खड़े
रहे। अचानक
उन्होंने
मुझसे
पूछा
कि
मैं
रिटायर
कब
हुआ
हूं
और
मेरे
यह
कहने
पर
कि
अभी
तो
मुझे
20 साल
से
भी
अधिक
नौकरी
करनी
है। उनके
चेहरे
पर
आश्चर्य
के
जॉब
हां
आए
थे
मुझे
आज
भी
याद
है।-5 (गुप्त, शंभू एवं जैन, सर्वेश, अनहद गरजे, पृष्ठ- 6 )
इस
प्रकार
सांप्रदायिक
दंगों
को
मानवीय
दृष्टि
से
देखने
का
प्रयास
राही
मासूम
रजा
ने
उसी
समय
कर
दिया
था।
प्रकार
यह
कथा
एक
तरह
से
इमरजेंसी
की
कथा
बन
जाती
है। जहां
पर
हमारी
ही
शासन
ने
हमारे
ही
लोगों
पर
अमानवीय
अत्याचार
किए
थे। आज
तक
इसका
कोई
ठोस अब
पाठ
कि
राह
उम्र
एक,कारण
या
कोई
सच्चा
प्रमाण
नहीं
मिल
पाया
है। राजनीति
की
प्रति
छाया
में
किस
प्रकार
कोई
स्वार्थी
देश
का
प्रधान
मानवीय
मूल्यों
पर
देश
का
सौदा
कर
बैठता
है
इसका
ज्वलंत
उदाहरण
प्रस्तुत
उपन्यास
में
देखा
गया
है। यह
एमरजैंसी
की
कथा
हम
सभी
को
पता
है
मालूम
है। उस
समय
की
यात्राओं
को
हम
अखबारों
और
पुस्तकों
में
तथ्यात्मक
रूप
से
पढ़ते
आए
हैं। इसीलिए
उनका उन
घटनाओं
में
अब
पाठक
को
रस
नहीं
किंतु
राही
ने
उन
घटनाओं
को
एक
मोहल्ले
के
जनसामान्य
के
बीच
उनकी
आशाओं
और
विश्वासों
के
बीच
उनके
मानवीय
संबंधों
और
मूल्यों
के
बीच
उपस्थित
कर
एक
मार्मिक
कथा
भूमि
है
और
उन
घटनाओं
के
प्रभाव
को
अधिक
मुहूर्त
किया
है। इस
मोहल्ले
के
अधिकतर
लोग
तत्कालीन
सरकार
के
भक्त
थे। अदालत
में
उनकी
हार
से
दुखी
हुए
थे। वे
समझते
थे
कि
तत्कालीन
सरकार
गरीब
परवर
है। उन्होंने
देश
और
गरीब
जनता
के
लिए
बड़े
काम
किए
हैं। महंगाई,
चोरी,
स्मगलिंग,
अराजकता
आदि
को
रोकने
के
लिए
इमरजेंसी
लगाई
है। देश
को
विश्व
बैंक
से
कर्जा
दिलाया
है। लेखक
यह
बताना
चाहते
हैं
कि
आम
जनता
किस
प्रकार
मुकदमे
में
हारी
हुई
इंदिरा
जी
द्वारा
फैलाए
गए
मोह
का
भ्रम
जाल
में
फंसी
हुई
है
वह
आखिर
कब
तक
आती
रहती। सभी
समझते
हैं
कि
उन्होंने
उनकी
आरजू
की
पोशाक
है
किंतु
सब
की
आरजू
है
टूटी
चली
जाती
हैं। देश
आखिर
दम
तक
तत्कालीन
प्रधानमंत्री
की
जय
जय
कार
करता
है
किंतु
इमरजेंसी
की
पुलिस
उसे
मार
मार
कर
अंग
ही
बना
देती
हैं। बिल्लो
एक
तरह
से
पति
होती
है
और
मकान
भी
खो
देती
है। जिस
मकान
को
उसने
इतनी
तादाद
से
बनवाया
था
उसे
सरकार
का
बुलडोजर
ध्वस्त
कर
देता
है।
बिल्लो
अपनी
बच्ची
के
साथ
उसमें
पीस
जाती
है
और
कहीं
इस
घटना
का
जिक्र
तक
नहीं
होता। मास्टर
पद
उल
हसन
की
सेना
से
शादी
होने
से
पूर्व
नसबंदी
हो
जाती
है,
पहलवान
सब
कुछ
खोकर
उजड़
जाते
हैं। यातना
और
विश्वास
की
विसंगति
के
बीच
इन
पात्रों
को
रखकर
जो
प्रभाव
भरा
गया
है
वह
बहुत
ही
करुणा
और
गहरा
है। हां
शहनाज
की
दुनिया
बदल
जाती
है। वह
एक
तरह
से
राजनीतिक
वेश्या
बन
जाती
है
और
अपने
प्रभाव
से
बड़े
बड़े
मंत्रियों
को
कम
पित्त
करती
हैं। आशाराम
पता
बताने
से
इनकार
करने
के
कारण
देशराज
को
मार
मार
कर
अंग
हीन
बना
दिया
जाता
है
शारीरिक
यातना
के
डर
से
मार्क्सवादी
से
कांग्रेसी
बन
जाता
है
और
नए
चुनावों
में
कांग्रेस
के
टिकट
पर
लड़ता
है। एमपी
गौरी
शंकर
पांडे
दूसरी
पार्टी
में
जा
मिलते
हैं। लेखक
ने
सांकेतिक
रूप
से
यह
उद्घाटित
कर
दिया
है
कि
तत्कालीन
सरकार
के
विकल्प
के
रूप
में
आने
वाली
नवीन
सरकार
कोई
उम्मीद
नहीं
दिलवा
सकती
है
क्योंकि
इसमें
भी
वही
लोग
हैं
जो
इस
सरकार
में
थे। इन
दोनों
दलों
के
मंत्री
एक
दूसरे
के
मित्र
हैं।
इसी
से
राजनीति
मैं
अमानवीयता
का
उद्घाटन
होता
है।
सामाजिक और मानवीय संबंधों की दृष्टि से संपन्न एक छोटा सा गरीब मोहल्ला जो गरीबी हटाओ का नारा बुलंद करने वाली इमरजेंसी के दबाव में कैसे टूट कर बिखर जाता है इसका प्रभावशाली अंकन किया गया। किंतु इमरजेंसी की सीमा इस उपन्यास की भी सीमा बन जाती है। यह विदित होता है कि उपन्यासकार को पात्रों और परिस्थितियों से उत्पन्न होने वाले आसनों से संतुष्ट नहीं है। वह सीधे इमरजेंसी के संदर्भों के बारे में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना चाहते हैं। कुछ लोगों को यह एक नई टेक्निक लग सकती है। कुछ लोग अनौपचारिक ताल आने का प्रयास कर इस पर मुक्त हो सकते हैं उपन्यास के घटनाक्रम में मानवीय विसंगतियों के उद्घाटन के लिए लेखक ने प्रायर नाटक की स्थितियों की सुंदर योजना बनाई है। यह योजना बहुत अधिक प्रभाव दायक है। बुलडोजर बिल्लो के घर में दाखिल होता है और प्रतिरोध करती हुई बिलों को उसके बच्चे सहित कुचल देता है और उस समय बुलडोजर में फिल्मी संगीत सुनाते हुए ट्रांजिस्टर में आकाशवाणी पर इमरजेंसी की प्रशंसा में कहे गए बिल्लू के वाक्य फूटने लग। इस नाटकीय विधान से एक त्रासदी भरा माहौल उत्पन्न हो जाता है और यहीं पर इस उपन्यास का अति संवेदना के साथ समापन भी होता है। कुल मिलाकर यह कहना सही होगा कि मासूम रजा ने प्रस्तुत उपन्यास के माध्यम से एक संवेदनात्मक कथानक का गठन करने में सफलता प्राप्त की है।
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