कथा सरोवर
- फ़रज़ाना
संजना नामक लड़की सरकारी पाठशाला में ८ वी कक्षा में पढ़ती थी उसके माता-पिता बहुत ही गरीब थे। बिना मज़दूरी के घर चलना बहुत कठिन था। संजना सुबह उठकर मां के कामों हाथ बंटाकर समय पर पाठशाला पहुंचती थी।
समय बिताता गया संजना १० वी कक्षा में आती है पढ़ाई और घर के कामों से थक जाती थी। पाठशाला में पढ़ाई में सब छात्रों में से सब से पहले रहती थी । हर काम समय पर निबटाती थी पर हमेशा अपनी गरीबी के हालातों पर पाठशाला के एक पेड़ के नीचे बैठकर सोचती थी और जब भी वह उदास रहती थी, तब उसके मन से एक आवाज़ आती थी, "मैं हूं ना" इन शब्दों से संजना को एक नयी शक्ति मिलती थी।
वार्षिक परीक्षा का समय आता है सब छात्र पढ़ाई में व्यस्त रहते हैं। संजना अपने कामों से पढ़ाई को ज्यादा समय नहीं दे पाती थी।इस से संजना के मन में डर सा लगता था। फिर से मन से वही आवाज आती थी "मैं हूं ना" इन शब्दों से संजना को एक और बार नयी "प्रेरणा" मिली थी, समय गुज़रा और परीक्षा में सब से ज़्यादा अंक प्राप्त करके पाठशाला का नाम रोशन करती है।
आगे चलकर संजना एक बड़े अफ़सर बनकर अपने मां-बाप को खुशियां और सूखमय जीवन देती है और दुनिया को अपने जीवन की प्रेरणा बताती है । इस कहानी से पता चलता है कि "प्रेरणा" ही जिंदगी में एक महत्वपूर्ण स्थान निभाती है।
शिक्षा :
प्रेरणा ही सफलता कि चाबी है।
फ़रज़ाना
हिंदी अध्यापिका
जिला: नलगोंडा
तेलंगाना।
9440396378

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