कथा सरोवर
- रफीखा बेगम 'शायरिन'
"क्या रे राजेश! बाहर घूमना हो गया क्या? अब आकर घर में अपना चेहरा दिखा। तेरी मां तेरा इंतजार कर रही है" फोन में पिता जी की डांट सुनकर राजेश को बहुत गुस्सा आ गया।
कुछ ही मिनटों में राजेश घर पहुंचा। देखा तो पिताजी कुछ हिसाब किताब लेकर टेबल के आगे कुर्सी पर बैठे हैं।
राजेश को देखते ही माँ कहने लगी "कहाँ गया था रे अब तक? तेरे पिताजी ने कहा था ना दोस्तों के साथ बेकार मत घुमा कर।आ! खाना खा ले।" माँ खाना परोसने लगी।
खाना खाकर चुपचाप राजेश अपने कमरे में गया। अपने बिस्तर पर लेटा राजेश गुस्से से सोचने लगा-" पिताजी तो हर वक्त मुझे ही डांटते रहते हैं। घूमने भी नहीं देते।" सोचते- सोचते ही उसे नींद आ गई।
अगले दिन सुबह नींद से जागते ही सामने पिताजी खड़े उसे ही देख रहे थे। तुरंत राजेश बिस्तर पर से उठ बैठा। पिताजी कहने लगे-"अब तो तेरी डिग्री की पढ़ाई हो गई। अब कोई नौकरी ढूंढ ले। दोस्तों से बेकार घूमना अच्छा नहीं है।"
सुबह-सुबह ही पिताजी की डांट सुनकर राजेश को बेहद गुस्सा आ गया। उसने मुंह हाथ धो लिया और कपड़े बदलकर गुस्से से बाहर चला गया।
शाम के 6:00 बज चुके थे राजेश घर नहीं लौटा उसकी मां दहलीज पर उसका इंतजार कर रही थी और राजेश के पिता से कहने लगी-" सुबह ही खरी-खोटी सुना दिया बेटे को। ना खाया, ना पिया। बस चला गया। ना जाने कहाँ भटक रहा होगा।"
राजेश के पिता चुप रहकर सब सुन रहे थे। इतने में राजेश पसीने से तर होकर घर पहुंचा। आते ही, उसने अपने पिताजी के पास जाकर उनके हाथ में ₹500 का नोट रख दिया। वह कहने लगा -"मैं ने लोहे की दुकान में वेल्डिंग का काम किया। यह आज की मेरी कमाई है।"
राजेश की बातें सुनकर पिताजी ने उसे गले लगा लिया उसे समझाते हुए कहने लगे-" तेरा दिल दुखाना मेरा उद्देश्य नहीं था। बेटा! हमें अपने उम्र के अनुसार अपना दायित्व निभाना चाहिए। तू ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली। अब इस उम्र में नौकरी करना तेरा दायित्व है। ये पैसे तू ही रख ले।"
पिताजी की बातों से राजेश प्रभावित हो गया। उसे अपने दायित्व का एहसास हुआ। अब उसे अच्छी तरह समझ में आ गया कि वे क्या कहना चाहते हैं। उसने पिताजी से माफी मांगी।
अगले दिन से ही राजेश नौकरी की तलाश करने लगा। कुछ महीनों के बाद फौज में भर्ती हो गया।
शिक्षा:-
सच है ना हमें अपनी उम्र के अनुसार अपना दायित्व निभाना चाहिए। इसी में सबकी भलाई है।
रफीखा बेगम 'शायरिन'
70937 16276

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