Saturday, April 9

एक सच्ची घटना - सागर देहलवी (कथा सरोवर)

कथा सरोवर


एक सच्ची घटना

सागर देहलवी

    बात उस समय की है जब मैं शिक्षा के क्षेत्र में संघर्ष कर रहा था, परीक्षा का समय था मैं भी अपने एक घनिष्ट मित्र के साथ परीक्षा में पास होने हेतु अच्छे अंक प्राप्त करने खातिर उत्तर प्रदेश के सुप्रसिद्ध जिला फर्रुखाबाद के बहुत ही प्रसिद्ध धार्मिक स्थल  बाबा नीम करोरी धाम को दर्शन हेतु ट्रेन से जा रहा था। जैसा कि मान्यता है कि ईश्वर से दरख्वाश लगाने से सभी काम पूर्ण होते हैं, तो ये वाला भी पूर्ण (सफल) होगा। हां तो, बाबा के धाम पहुंचा उनके दर्शन किए और थोड़ा घूम कर वहां का भौगौलिक एवम प्राकृतिक पर्यवेक्ष भी देखा। तत्पश्चात ही हम रेलवे स्टेशन पर वापसी हेतु पहुंचे, रेल अपने समय से कुछ समय देरी से पहुंच रही थी, कुछ समय बाद पता चला कि गाड़ी और देरी से पहुंचेगी मतलब देरी पे देरी और देरी, अब इंतजार ही करना था क्योंकि टिकट खरीद चुके थे खैर इंतजार करते करते भीषण गर्मी में तीन घंटे जैसे तैसे गुजारे तत्पश्चात रेलवे स्पीकर से सूचना मिली कि ट्रेन दो घंटे और देरी से चल रही है, यह सुनकर तो मानो जमीन आसमान के बीच में मैं हूं ही नहीं, पारा चढ़ गया मेरा और मैं उन्ही बाबा को कोसने लगा जिनके दर्शन करने मैं आया था, जिनसे मैं कुछ मांगने आया था, मेरा शांत दिमाग अब अशांत होकर बाबा जी से कहने लगा कि बाबा जी क्या यही है आपकी शक्ति क्या ऐसा ही आशीर्वाद देते हैं आप अपने भक्तों को। मैं तो पहली बार आया था आपके दर्शन करने, फिर भी आपने अच्छे से घर नहीं पहुंचाया, और न जाने क्या क्या कहा मैने बाबा जी से लिखने में भी संकोच कर रहा हूं मैं। खैर देरी से ही सही ट्रेन आई, चूंकि ट्रेन देरी से पहुंची तो जाहिर है कि सीमा से ज्यादा भरी भी होगी , अब इतनी भरी ट्रेन में जिसको जहां जगह मिली वो बैठ गए। कुछ लड़के ट्रेन के इंजन पर चढ़ गए, इधर मेरा दोस्त बोला चलो क्यों न हम भी इंजन पर चढ़ जाएं । फिर हमने कुछ नहीं सोचा हम इंजन पर चढ़ गए। दो स्टेशन निकलने के बाद ट्रेन कुछ खाली हो गई, किंतु हम इंजन पर थे तो हमें पता नहीं चला। अब और आगे बढ़े इंजन की आवाज़ इतनी की कुछ सुनाई ही न दे इधर बहुत थकान होने के कारण आंखे भी लगने लगीं। साथ में मैं बाबा जी से कहता रहा कि बाबा जी आज आपने पुरा दिन बर्बाद कर दिया। अब बाबा जी को इतना गुस्सा आ आएगा मुझे नहीं ज्ञात था अन्यथा इससे बड़ी परेशानी मिल जाती मैं कुछ नहीं बोलता। अब बाबा जी ने हमें सज़ा क्या दी वो सुनिए, 

    हमारे गंतव्य स्टेशन से लगभग 4 कि.मी. पहले ट्रेन के नीचे से पटाखे की आवाज़ आई और गाड़ी रुक गई, कुछ लड़कों ने आवाज़ लगाई कि टिकट चेकिंग होगी वो भी मजिस्ट्रेट चैकिंग, सभी इधर उधर भागने लगे। मैं रुआब में खड़ा था थोड़ी देर में एक वर्दी धारी मेरे पास आया और मेरा हाथ पकड़ लिया, मैने उनसे कहा कि आप क्या कर रहे हैं मेरे पास टिकट है, मेरे लाख बताने पर भी उन्होंने अनसुनी की और मुझे मेरे मित्र के साथ अपनी बस में बैठाल लिया, बस में अलग बटालियन थी, मैने उनसे भी कहा हुजूरेआला हमारे पास तो टिकट है, फिर क्यों ऐसा व्यवहार, उन्होंने बड़े अदब से कहा, 

आपने टिकट किसकी ली, 

    मैं= ट्रेन की

    वो= आप बैठे कहां थे

    मैं= इंजन पर

    वो= यही तो भारतीय रेल के नियमों के विरुद्ध है। 

    मैं= हुजूरेआला हम इस नियम से अज्ञान थे, कृपया हमें छोड़ने की कृपा करें। 

    वो= आपका अज्ञान हम ज्ञान में ही बदलने चल रहे हैं। अब आप चुपचाप बैठे रहिए अन्यथा हमें चुप कराना आता है। बस फिर क्या हमारे पड़ोस में एक वकील साहब नाम= किशोरीलाल वर्मा एडवोकेट रहते हैं जो आज भी वहीं रहते हैं, को फोन पर सारी बात बताई उन्होंने कहा बेटा घबराना नहीं वो जहां ले जाएंगे हम वहीं पहुंच रहे हैं। शाम 5 बजे हमारे वकील साहब समोसे मीठी चटनी के साथ लेकर आए और कंधे पर हाथ रख कर हौसला दिया कि मैं आ गया हूं, बच्चो आप भूखे होंगे आप समोसे खाइए हम अंदर मिलकर आते हैं , अब मैं समोसे खाने लगा मेरे दोस्त ने समोसे छीन लिए और कहा यार वकील साहब सिर्फ तुझे छुड़ाएगे या मुझे भी और यदि तुझे तो क्या तू मुझे छोड़ कर चला जाएगा। उसकी बात सुन मुझे हसीं आई और उससे कहा तुम समोसे खाओ, वो बहुत घबराता जा रहा था जब उसकी आखों में आंसू आ गए तो मैं कुछ कहता इतने में वकील साहब आ गए और बोले आपने समोसे नहीं खाए अभी तक,  तो मैंने उनसे कहा कि ये रो रहा है उन्होंने कहा क्यों अब क्या हुआ उसने कहा वकील साहब मुझे कौन छुड़ाएगा, इतना सुन वकील साहब भी हस पड़े और कहा जल्दी बाइक पर बैठो दोनों अब हम घर चलें। इतना सुन उसने समोसे और चटनी अन्य पकड़े गए लड़कों को दे दिए। और हम वकील साहब की बाइक पर सवार हो कर अपने घर आ गए। 


अब इस कहानी से मिली सीख.........

मेरे द्वारा निकले बाबा जी हेतु कटु शब्दों का श्राप मिला मुझे। क्योंकि मैं जिस प्रकार सच्ची श्रद्धा लेकर बाबा नीम करोरी धाम गया था उसी श्रद्धा से वापस नहीं आया और अति कटु शब्दों का प्रयोग कर दिया। किंतु हां मैने भी जिंदगी का बहुत बड़ा तजुर्बा हासिल कर कसम खाई कि जिस पर भी श्रद्धा रखूंगा उस पर अटूट विश्वास भी रखूंगा। और आज तक है बाबा जी ने मुझे किसी भी परेशानी में नही डाला। हमेशा परेशानियों में हौसला देकर उससे निकाला ही है, और आगे भी जीवन भर यही आस रहेगी बाबा जी से। 

सागर देहलवी

दिल्ली


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