कथा सरोवर
भोला और भवन दो गहरे दोस्त थे। दोनों के घर पास पास ही थे ।उनका बचपन साथ ही गुजरा था।दोनों साथ में स्कूल जाते , साथ में खेलते , साथ में मस्ती करते थे ।लेकिन दोनों का व्यवहार एक दूसरे के विपरीत था। जहां भोला सीधा-साधा और शर्मीले स्वभाव का था ।वहीं भवन चंचल और मस्तीखोर स्वभाव का था। फिर भी उनकी दोस्ती बहुत पक्की थी ।उनका व्यवहार कभी उनकी दोस्ती के आड़े नही आया ,नाही उनकी दोस्ती पर कोई प्रभाव पड़ा ।उम्र के साथ भोला और भवन बढ़ने लगे ।भोला सीधा-साधा, मिलनसार, भगवान का भक्त ,हमेशा दूसरों की सहायता करने वाला, मददगार व्यक्ति था।जबकि भवन इसके विपरीत अड़ियल, विलासी, मदिरापान और वेश्यावृत्ति में रत रहने वाला व्यक्ति था। हमेशा भोला, भवन को समझाता रहता था। पर उस पर इसका कोई प्रभाव नहीं होता ।भोले की बात को भवन मजाक में उड़ा दिया करता था। भोला उसे उसके हाल पर छोड़ देता है ।एक दिन की बात है भोला मंदिर से पूजन करके निकला, उसके पैर में कांच का एक बड़ा टुकड़ा लग गया और पैर से खून बहने लगा ।भोला डॉक्टर के पास गया डॉक्टर ने पैर में चार टांके लगाए और दवाइयां खाने को दी ।दूसरी तरफ रोजाना की तरह भवन मदिरालय से निकला तो उसे रास्ते में हीरो का हार पड़ा हुआ मिला ।जब शाम को दोनों दोस्त मिले और अपनी दिन भर की आपबीती एक दूसरे को सुनाई ।जब भोला नेअपने पैर में कांच लगने की बात बताई तो भवन बोला क्या मिला भक्ति करके पैर में चार टांके लगे और डॉक्टर का खर्चा अलग । देख मुझे आज हीरो का हार मिला ।यह सुनकर भोला को थोड़ा दुख हुआ और सोचा मुझे इतनी भक्ति और दूसरों की मदद करने के बाद भी भगवान ने दर्द क्यों दिया। दोनों दोस्त मिलकर एक संत के पास गए और इसका मर्म पूछने लगे। संत ने ध्यान से दोनों की बात सुनी और फिर ध्यान में बैठ गए ।थोड़ी देर बाद संत का मोन टूटा ।वह उन दोनों की तरफ मुखातिब होकर बोले ,बेटा आज भोला की मृत्यु के योग थे ,पर अच्छे कर्मों के कारण सिर्फ पैर में चोट लगी और मृत्यु योग टल गया जबकि भवन तुम्हारे आज राजयोग थे लेकिन बुरे कर्मों के कारण सिर्फ हीरो का हार मिला और राजयोग टल गया ।यह सब अपने अपने कर्मों का फल है ।
नैतिक शिक्षा---
हमेशा हमें सत्कर्म करना दीन दुखियों की सेवा करना और दूसरों का कर सहयोग करना चाहिए।
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