Monday, April 4

हिंदी साहित्य के आदिकाल में सभ्यता तथा संस्कृति - वी एन वी पद्मावती (साहित्य संगम)

साहित्य संगम


 हिंदी साहित्य केआदिकाल में सभ्यता तथा संस्कृति

            वी एन वी पद्मावती


    भारतीय  सभ्यता सभी देश  तथा संस्कृतियो में उच्चकोटि की तथा उत्कृष्ट है। भारतीय संस्कृति  वैदिक काल से सभी युगों से अपनी छोड़ छापते हुए प्रतिष्ठित तथा सराहनीय बनी हुई है।

    संस्कृति से एक जीवंत और दीर्घ परंपरा का बोध है।  इसका असली कारण हम इसलिए विश्व के सभी देशों से यह भिन्न तथा गौरवपूर्ण रखती है।

    भारतीय साहित्य तथा संस्कृति के बारे में सुनते ही सबके मस्तक सम्मान से झुकते हैं। भारतीय संस्कृति  वैदिक काल से सभी युगों से अपनी छाप छोड़ते हुए प्रतिष्ठित तथा सराहनीय बनी हुई है। अतीत से प्राप्त संस्कारों का आचरण करते हुए नए विचारों का समावेश करते हुए परंपरा को कोई आघात पहुंचे ऐसी ऐतिहासिक परिवेश में अपने आपको समाविष्ट करती हुयी आगे बढ़ती जातीरहती है। भारतीय संस्कृति का संस्कृतिक, ऐतिहासिक परिवेश विकासात्मक टिकाऊपन की सारी विशेषताएँ कालप्रवाह के साथ बहती जाती आयी है।   भारतीय सभ्यता संस्कृति केवल बदलती हुई ऋतुएँ, पर्यावरण को दृष्टि में रखती हुई मानसिक परिवेश पर भी अधिक ध्यान देती हुई अपने निजी आस्तित्व  को भूलते हुए अपनी सीमाओं को लांघते हुए आगे बढ़ती जा रही है।  इसी कारण वह युगों, सदियों से नई, तथा शुद्ध दिख पड़ती है। 

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह बारम्बार।

तरवर जो पत्ता झड़ै , बहुरि लागै डार।।

    साहित्य समयानुसार सत्य तथा तथ्यों का समन्वय करते हुए सच्चाईयों का दर्पण बनकर सामने आता है।  इसलिए अरब पुर्तगाली, फ़्रांसिसी, डच  अंग्रेज आदि के आक्रमण से भी भारतीय संस्कृति का बाल भी  बांका हुआ बल्कि यहाँ की  बनावटों , वेश-भूषा, खान-पान आदि  ने भारतीय संस्कृति में चार चाँद लगा दिए।

 सिगरी रेन मोहि संग जगा।

भोर भया तब बिछुरन लागा।।

वाके बिछुरत फटथ हिया।

सखी साजन! ना सखी दिया।

    हर्षवर्धन काल में आये हुए हुएनत्सांग, फाहियान जैसे यात्री तथा प्रतिनिधियों ने भारतीय सभ्यता संस्कृति तथा शासन के बारे में उनके पुस्तकों में बहुत उत्तम लिखा था। इतना ही नहीं सिकंदर के दूत मेगस्थनीज़ ने अपनी किताब इंडिका में भारतीय साहित्य, चक्रवर्तियों का शासन, उनकी वीरता, भारतीय भवन निर्माण कौशलता के बारे में लिखते हुए उसमे निक्षिप्त सूत्रों का वर्णन किया। 

    भारतीय परिवेश की सभ्यता संस्कृति पूरब, पश्चिम , उत्तर , दक्षिण में अलग होकर भी उसमे मर्यादा की सीमा, सदियों से आये हुए आचार विचार, उस समय से चली रही परंपरागत पद्दतियों से परिपूर्ण तथा अपने आप में स्वच्छ तथा शुद्ध है। 


एक ताल मोती से भरा

सबके सर पर औंधा धरा।

चारों ओर वह थाली फिरे

मोती उससे एक गिरे।।

 

आदिकाल की सभ्यता और संस्कृति की लहर

    भारतीय विश्व की संस्कृति सर्वाधिक प्राचीन संस्कृति है।  आदिकाल भारतीय चिंतन धारा का एक महत्वपूर्ण काल है।  जैन, वैष्णव, शैव, कापालिक, शाक्त, सिद्ध एवं नाथ आदि कई सम्प्रदायों की बहुत सी प्रवृत्तियाँ इस युग में समस्त साहित्य में देखी जा सकती हैं। 

    राजनैतिक उथल-पुथल, विदेशी आक्रमण तथा दो-दो संस्कृतियों के मिलन का परिवेश आदिकाल की विशेषता है। युग की चेतना और साहित्य सन्देश में राष्ट्रीयता तथा देश भक्ति की  दृष्टि अपनी सुरक्षा तथा जीविका तक ही सीमित होती चली गयी। 


वीरता धन हरी, धन हर धन तुव कला

खान पित बसन खनहि बाघ छला।

    शौर्य , आत्मबल और देश के हित में  प्राणोत्सर्ग करने के व्यक्तिगत उदहारण इस युग में मिलते हैं साथ ही संगठन  शक्ति के अभाव से इनकी प्रभावी परिणाम दिखाई नहीं पड़ते।  रूढ़ियों और परम्पराओं की जड़ें हिलने लगी।  आदिकाल की काल सीमा में शासन करनेवाले तुर्क अफगानी शासक थे।  भारतीयों से तुर्क-अफगानी युद्धों का वर्णन मिलता है।  राजनैतिक अवस्था की दृष्टि से कलह और विघटन के कारण एक विदेशी सभ्यता तथा संस्कृति के संपर्क में रहा था। कवि दरबारी आश्रय ले रहे थे।  इस युग में नीति, भक्ति या  धर्म और लोक कोभी साहित्य में अपनाया गया।  परन्तु प्रधानता युद्ध वर्णनों और शौर्य गानों की थी।  भारत ने अपनी राजनीतिक पराजय के बावजूद सांस्कृतिक पहचान खोने दी। धर्म भारतीय संस्कृति का एक अपरिहार्य अंग है। इसलिए इस युग में परिवर्तन धर्म के क्षेत्र में भी हुआ। ईसा की आठवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक भारतीय संस्कृति के मूल भूत सिद्धांत लग भाग अपरिवर्तित रहे। पर बाह्यकार में बदलाव आया। परिणामतः आम आदमी धर्म के वास्तविक रूप को पहचानने में असमर्थ रहा। मोहम्मद गजनी, गोरी तथा उनके बाद क़ुतबुद्दीन ऐबक आदि के आक्रमण तथा शासनों के कारण इस्लाम धर्म का प्रचार-प्रसार बढ़ा। वेद-शास्त्रों के विभिन्न विधि-विधान और कर्म कांडों को लेकर चलने वाले हिन्दू धर्म तथा बौध्द धर्म में संघर्ष होने लगे। बौद्ध धर्म की इन शाखाओं में (हीनयान तथा महायान शाखाओं में) तंत्र, मन्त्र, हयोग आदि के साथ पांच मकारों (मांस, मत्स्य, मैथुन, मद्य, तथा मुद्रा) को भी विशेष स्थान प्राप्त हुआ। जैन, वैष्णव, शैव, शाक्त, आदि सम्प्रदायों की प्रतिद्वंद्विता राष्ट्रीय शक्ति का ह्रास कर रही थी।  यह दुर्भाग्यवश धर्म मनुष्य की सामजिक और  मुक्ति के संगठन  राजनैतिक धन बनने के स्थान पर विच्छेद भाव उत्पन्न करने के साधन बने। सभी मत/धर्म प्रचार में डूबे हुए थे। विषम धार्मिक परिस्थितियों ने साहित्य को भी प्रभावित किया। यहाँ की कलाएँ पर्याप्त विकसित एवं उन्नत मानी जाती थी। डॉक्टर नागेंद्र ने कहा है की आदि काल दो संस्कृतियों के संक्रमण एवं ह्रास-विकास की गाथा है। इस्लाम मूर्तिपूजा का विरोधी था। गजनी, गोरी ने केवल आक्रमण ही नहीं किया बल्कि कई मंदिरों के मूर्तियों की तोड़-फोड़ की, जिससे मूर्ती कला का ह्रास होता गया। हर्षवर्धन के विशाल साम्राज्य ने हिन्दू धर्म और संस्कृति का राष्ट्र व्यापी एकता का आधार दिया था। भारतियों का जन जीवन धर्म भावना से ओतप्रोत, पवित्र एवं सुसंस्कृत था। इनकी झलक तत्कालीन स्थापत्य, मूर्ति एवं संगीत कला में भी दिखलाई पड़ती है। सभी संस्कृतियाँ कही--कही किसी--किसी तरह एक दूसरे से प्रभावित हैं। जाती-पाँति, ऊंच-नीच, गोत्र तथा वर्ण आदि के भी विचार प्रबल थे। ब्राह्मणों की श्रेस्टता धीरे-धीरे कम हो रही थी। सामाजिक रीति रिवाज और विधि विधानों का कट्टर प्रचलन सामाजिक  को छिन्न-भिन्न कर रहा था। संगठित सामजिक व्यवस्था की आशा शेष थी। संस्कृत, प्राकृत, पाली भाषाओँ के होने पर भी अवहट्ट भाषा प्रचलन में  थी। 

 

हिंदी साहित्य के भक्तिकाल में सभ्यता तथा संस्कृति

    भक्तिकाल को स्वर्णकाल या स्वर्णयुग कहा जाता है।  इस काल में लोक जागरण हुआ और लोग भक्ति की महत्ता को जानकार जीवन को परमोत्कृष्ट पथ पर ले जाने के विधि विधान में लगे थे कारण वे विदेशियों के पालन में दबे जा रहे थे और उनके पास भक्ति के अलावा कोई और चारा नहीं था।  संत तुकाराम, चैतन्य महाप्रभु, रामानंद, रामानुजाचार्य  , आलवार, नयनार आदि की भक्ति विधाओं से लोग प्रेरित होकर अपने जीवन को शिष्टाचार की और मार्गदर्शन करावा रहे थे।   रामानुजाचार्य जैसे उत्तम व्यक्तित्व का उनपर प्रभाव पड़ा।  उन्होंने ऊॅच-नीच भेद को तोड़ दिया। 


जाति-पाँति पूछे नहीं कोई। 

हरी को भजे सो हरी को होई।।


    महाप्रभु वल्लभाचार्य ने पुष्टि-मार्ग की स्थापना की और विष्णु के कृष्णावतार की उपासना करने का प्रचार किया। उनके द्वारा जिस लीला-गान का उपदेश हुआ उसने देशभर को प्रभावित किया। अष्टछाप के सुप्रसिध्द कवियों ने उनके उपदेशों को मधुर कविता में प्रतिबिंबित किया।

    इसके उपरांत माध्व तथा निंबार्क संप्रदायों का भी जन-समाज पर प्रभाव पड़ा है। साधना-क्षेत्र में दो अन्य संप्रदाय भी उस समय विद्यमान थे। नाथों के योग-मार्ग से प्रभावित संत संप्रदाय चला जिसमें प्रमुख व्यक्तित्व संत कबीरदास का है। मुसलमान कवियों का सूफीवाद हिंदुओं के विशिष्टाद्वैतवाद से बहुत भिन्न नहीं है। कुछ भावुक मुसलमान कवियों द्वारा सूफीवाद से रंगी हुई उत्तम रचनाऍ लिखी गईं।


संक्षेप में भक्ति-युग की चार प्रमुख काव्य-धाराएं  मिलती हैं :

रामाश्रयी शाखा

कृष्णाश्रयी शाखा

निर्गुण भक्ति

ज्ञानाश्रयी शाखा

प्रेमाश्रयी शाखा।।

    अष्टछाप, रसखान, रहीमदास,तुलसीदास, रैदास, मीराबाई,आदि प्रमुख कवि भक्तिकाल का प्रतिनिधित्व करते हैं। धर्म और शिक्षा का सम्बन्ध साध्य और साधन जैसा है। धर्म के बारे में हमने अनेक बार चर्चा की ही है वह एक विश्वनियम है जिससे व्यक्ति से लेकर सृष्टि तक सबकी धारणा होती है इन नियमों के अनुसार जब समष्टिजीवन का व्यवहार चलता है, तब धर्म संस्कृति का रूप धारण करता है इस व्यवहार और संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढी तक पहुँचाने की जो व्यवस्था है वह शिक्षा है तात्पर्य यही है कि धर्म, धर्म का व्यवहार और धर्म का हस्तान्तरण एक दूसरे के साथ अविनाभाव सम्बन्ध से जुड़े हैं। धर्माचार्य धर्म को जानता है, उसे व्यवहार खानपान, वेशभूषा, बोलचाल, उपभोग आदि में संयम, सादगी और त्याग होना ही चाहिये। उदाहरण के लिये खाने के पदार्थ खाना, शृंगार और अलंकारों का अतिरेक करना, शृंगार की बातें करना आदि में अधिक रुचि लेना, किसी को प्रेरणा देने वाला आचरण नहीं होता। धार्मिक मानस संयम, सदाचार, त्याग, अनुशासन आदि से ही प्रेरित होता है जो दम्भ समझता है, उससे प्रभावित नहीं होता। जिसे समाज का मार्गदर्शन करना है उसे शारीरिक स्तर के वैभव विलास से परहेज करना ही होता है। दिखावे के लिये संयम और एकान्त में असंयम से चरित्र दुर्बल होता है और लोग छले नहीं जाते - इसलिये ऐसा करने से सब कुछ नष्ट होता है। देशकाल परिस्थिति के अनुसार उसमें परिष्कार करता है, समष्टिनियमों का सृष्टिनियमों के साथ समायोजन करता है धर्माचार्य धर्म कहता है धर्माचार्य जो कहता है, उसे लोगोंं तक पहुँचाने का कार्य शिक्षा का है

    यदि धार्मिक समाज धर्मनिष्ठ है और वह अर्थनिष्ठ बन गया है तो उसे पुनः धर्मनिष्ठ बनाने में धर्माचार्य की भूमिका महत्त्वपूर्ण है उसके बिना धर्म की प्रतिष्ठा नहीं होगी और भारत भारत नहीं होगा इसलिए भक्ति के मार्ग को अपनाकर उन्होंने उसका प्रचार प्रसार किया जिससे जाति जागृत होकर सत्य पथ पर चलने का मार्ग प्रशस्त बना चुकी। कुछ ऐसे संगठन भी है जिनका मुख्य कार्य शिक्षा नहीं है, संस्कृति और धर्म है। परन्तु अपने कार्य के एक अंग के रूप में वे शिक्षा पर भी काम करते हैं मूल्यनिष्ठा संस्कारयुक्त शिक्षा यह उनका विषय है,भारतीय शिक्षा नहीं


कस्तुरी   कुण्डली   बसै,   मृग ढूंढें बन माँहि।

एसै   घटि-घटि राम   हैं, दुनियाँ   देखै   नाँहि।।

 

बकरी पाती खात है , ताकि काठी खाल।

जो नर बकरी खात है, तिनको कौन हवाल।।


    भक्तिकाल में समन्वय की भावना अधिक थी।  साहित्य में सधार्मिक, सामाजिक, दार्शनिक आदि क्षेत्रों में समन्वय की भावना मिलती है।  तुलसीदास में तो समन्वय  की विराट चेष्टा मिलती है। भक्ति, ज्ञान दर्शन  के साथ भाषा शैली एवं सगुण और निर्गुण में भी तुलसीदास में समन्वय की चेष्टा मिलती है।  भक्तिकाल में आडम्बरता का विरोध हुआ है।  कबीर के शब्दों में ,


जप माला छापा तिलक,

सरे एक एको काम।।

जाति पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान।

मोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्यान।।


सभी काव्य, रचनाएं आध्यात्मिक  कोटि की हैं। इस काल में कृष्णमार्गी तथा ज्ञानमार्गी कवियों ने मुक्तक काव्य रचना की है।   भाषा की विविधता इस काल की विशेष प्रधानता रही है।  इस काल में कवियों ने दोहा, चौपाई, गेय, पद , सोरठा, आदि छंदों का प्रयोग किया।  शांत रस इस काल का प्रधान रस है।  इस प्रकार भक्तिकालीन साहित्य में आदर्शवाद की प्रधानता है।  मानव में वासुदेवा कुटुम्बकम की भावना भरी गयी है। 

  

हिंदी साहित्य के रीतिकाल में सभ्यता संस्कृति

हिंदी साहित्य के रीतिकाल में सभ्यता संस्कृति

    हिंदी में 'रीति' या 'काव्यरीति' शब्द का प्रयोग काव्यशास्त्र के लिए हुआ था। इसलिए काव्यशास्त्रबद्ध सामान्य सृजनप्रवृत्ति और रस, अलंकार आदि के निरूपक बहुसंख्यक लक्षणग्रंथों को ध्यान में रखते हुए इस समय के काव्य को 'रीतिकाव्य' कहा गया। इस काव्य की शृंगारी प्रवृत्तियों की पुरानी परंपरा के स्पष्ट संकेत संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, फारसी और हिंदी के आदिकाव्य तथा कृष्णकाव्य की शृंगारी प्रवृत्तियों में मिलते हैं।रीतिकाव्य रचना का आरंभ एक संस्कृतज्ञ ने किया। ये थे आचार्य केशवदास, जिनकी सर्वप्रसिद्ध रचनाएँ कविप्रिया, रसिकप्रिया और रामचंद्रिका हैं। कविप्रिया में अलंकार और रसिकप्रिया में रस का सोदाहरण निरूपण है। लक्षण दोहों में और उदाहरण कवित्तसवैए में हैं। लक्षण-लक्ष्य-ग्रंथों की यही परंपरा रीतिकाव्य में विकसित हुई। रामचंद्रिका केशव का प्रबंधकाव्य है जिसमें भक्ति की तन्मयता के स्थान पर एक सजग कलाकार की प्रखर कलाचेतना प्रस्फुटित हुई। केशव के कई दशक बाद चिंतामणि से लेकर अठारहवीं सदी तक हिंदी में रीतिकाव्य का अजस्र स्रोत प्रवाहित हुआ जिसमें नर-नारी-जीवन के रमणीय पक्षों और तत्संबंधी सरस संवेदनाओं की अत्यंत कलात्मक अभिव्यक्ति व्यापक रूप में हुई।इस समय अनेक कवि हुएकेशव, चिंतामणि, देव, बिहारी, मतिराम, भूषण, घनानंद, पद्माकर आदि। इनमें से केशव, बिहारी और भूषण को इस युग का प्रतिनिधि कवि माना जा सकता है। बिहारी ने दोहों की संभावनाओं को पूर्ण रूप से विकसित कर दिया। आपको रीति-काल का प्रतिनिधि कवि माना जा सकता है। इस समय वीरकाव्य भी लिखा गया। मुगल शासक औरंगजेब की कट्टर सांप्रदायिकता और आक्रामक राजनीति की टकराहट से इस काल में जो विक्षोभ की स्थितियाँ आई उन्होंने कुछ कवियों को वीरकाव्य के सृजन की भी प्रेरणा दी। ऐसे कवियों में भूषण प्रमुख हैं जिन्होंने रीतिशैली को अपनाते हुए भी वीरों के पराक्रम का ओजस्वी वर्णन किया। इस समय नीति, वैराग्य और भक्ति से संबंधित काव्य भी लिखा गया।


बिहारी के दोहे

सतसइया के दोहरा ज्यों नावक के तीर।

देखन में छोटे लगैं घाव करैं गम्भीर।।

नहिं पाराग नहिं मधुर मधु नहिं विकास यहि काल।

अली कली में ही बिन्ध्यो आगे कौन हवाल।।

घर घर तुरकिनि हिन्दुनी देतिं असीस सराहि।

पतिनु राति चादर चुरी तैं राखो जयसाहि।।

मोर मुकुट कटि काछनी कर मुरली उर माल 1


केशवदास के दोहे

जेहि घर केसो नहिं भजन, जीवन प्रान अधार।

सो घर जम का गेह है, अंत भये ते छार॥

केसो दुबिधा डारि दे, निर्भय आतम सेव।

प्रान पुरुष घट-घट बसै, सब महँ सब्द अभेव॥


    प्राय: सभ्यता और संस्कृति को समानार्थी समझ लिया जाता है, जबकि ये दोनों अवधारणाएँ    अलग-अलग हैं। तथापि विभेद ठीक वैसा ही है, जैसे हम एक फूल को सभ्यता और उसकी सुगन्ध को संस्कृति कहें। सभ्यता से किसी संस्कृति की बाहरी चरम अवस्था का बोध होता है। संस्कृति विस्तार है तो सभ्यता कठोर स्थिरता। सभ्यता में भौतिक पक्ष प्रधान है, जबकि संस्कृति में वैचारिक पक्ष प्रबल होता है। यदि सभ्यता शरीर है तो संस्कृति उसकी आत्मा।सांस्कृतिक वस्तुएँ प्रतियोगिता रहित होती हैं, किन्तु सभ्यता का आधार प्रतियोगिता है। दो आविष्कारों में प्रतियोगिता होती है, किन्तु आध्यात्मिकता में कोई प्रतियोगिता नहीं होती।सभ्यता साधन है, जबकि संस्कृति साध्य है। साध्य का तात्पर्य अन्तिम लक्ष्य से है, जिसमें असीम सन्तुष्टि का अनुभव होता है और इस असीम सन्तुष्टि की प्राप्ति के लिए जो विधि अपनाई जाती है, उसे साधन कहते हैं।सभ्यता संस्कृति का अधिक जटिल तथा विकसित रूप है।सामाजिक दृष्टि से यह काल घोर अध:पतन का युग रहा यह सामंतवादी युग था , जो सामंतवाद के अपने सभी दोषों से युक्त था नीचे वालों को ये मात्र अपनी संपत्ति मानते थे, जिनका अस्तित्व केवल उनके लिए, उनकी सेवा के लिए ही था नारी को अपनी सम्पत्ति मानकर उसका भोग, इनके जीवन का मूल मंत्र हो गया था सुरा और सुंदरी राजा और प्रजा के उपास्य विषय हो गए थे नैतिक मूल्यों का पूर्णत: अभाव था चिकित्सा, शिक्षा और संपत्ति-रक्षा का कोई प्रबंध था धर्म-स्थान भ्रष्टाचार और पापाचार के केंद्र बन गए थे हिंदू अपने आराध्य राम-कृष्ण का अतिशय श्रृंगार ही नहीं करते थे, बल्कि उनकी लीलाओं में अपने विलासी-जीवन की संगति खोजने लगे थे रुढ़िवादिता के अत्यधिक बढ़ जाने से मुसलमान जीवन की वास्तविकता से दूर पड़ गए कर्म और आचार का स्थान अंधविश्वास ने ले लिया


साहित्य और कला

    साहित्य और कला की दृष्टि से यह युग काफी समृद्ध रहा ललित कलाओं में चित्रकला, स्थापत्य और संगीत-कला का पोषण राजमहलों में हुआ संगीत-शास्त्र पर कुछ प्रामाणिक ग्रंथ लिखे गए अलंकार-प्रिय विलासी राजा और बादशाहों की अभिरुचि से अत्यधिक प्रभावित होने के कारण तथा कल्पना-परक वैविध्य की न्यूनता के कारण कलाएँ कला की सीमाओं से दूर पड़ गई

 

हिंदी साहित्य के आधुनिक युग की सभ्यता और संस्कृति

हर युग की सभ्यता की परिभाषा भिन्न होतीहै। आज के युग के जिन्स और शोट्स पहऩे बच्चे सभ्य नही हैं यह कहना सरासर ज्यादती होगी पश्चमी प्रभाव जिसे हम हर वक्त सूली पर लटका देते है हमे कभी भी मानव मूल्यों को छोडने को नही कहता |  मानव-मूल्यों के वे भी हमारी  भाँति पक्छधर हैं। बात अगर संस्कृति की है तो बेशक हम अलग अलग  संस्कृतियों के पोषक हैं। आपके विचार सोचने को बाध्य करते हैं कि क्या हम अपनी सभी गलतियों को  पश्चमी प्रभाव कह कर दरकिनार कर सकतें हैं या कि हमे चाहिये कि हम अपने कुण्ठाऔ से निकल सही गलत का फैसला करना सीख लें सिनेमा और टीवी महिला नेता किसी का दोष नहीं ज्ञितना अपने नजरिए का है।  वे भावनाएँ भी,जो मानवीय तो होती हैं पर अर्थप्राप्ति के मार्ग मे बाधा बनकर खड़ी हो जाती हैं,उन्हें हम झटक कर अपने से दूर कर देते हैं।भावनाशून्यता को आज हमने व्यावहारिकता की संज्ञा देदी है। वर्गभेद को तेज हवा देती यह सभ्यता आज हमें तंगदिल भी बनाती जा रही है, साथ ही, उन आदर्श मानव-मूल्यों के हनन को विवश करती है जो हमारी वैचारिक सम्पदा तो थी ही,सदैव व्यवहारिकता की कसौटी पर खरी भी उतरती थी 1 मानव की कल्याणकारी योजनाओं,दुख-सुख के बीच पैठकर उसके कल्याण के निमित्त जीवन को होम कर देनेवाला आम आदमी या कि विविध सुविधाओं से सम्पन्न साथ ही तथाकथित उन्नत विद्याओं से सम्पन्न होकर अपने चारो ओर भौतिक और वैचारिक उपलब्धियों की लौह किलाबन्दी कर समाज से अपने को काटकर रखनेवाला तथाकथित विद्वत्समाज। अंत मे यह कहना समीचीन ही होगा कि अगर वेशभूषा ,खान पान और रहन-सहन से नागरी बन जाना ही सभ्यता की पहचान है तो हमारी संस्कृति को भूमिसात् होने में कदापि विलंब नहीं होगा। हम आशावान हों कि ऐसा कदापि नहीं होगा। हमारी संस्कृति इन घात प्रतिघातों के बाद भी सदैव अक्षुण्ण रही है और रहेगी।  एक ओर यह विकसित जीवन शैली हमें अन्तर्राष्ट्रीय मानव बनाने जा रही है,वहीं हम अपनी अमूल्य संस्कृति को खोते जाने का अनुभव भी करते ही हैं।ऐसा कहना कदापि अनुचित नहीं होगा कि वर्तमान सभ्यता हमारी संस्कृति पर हावी होती जा रही है। हमारे ग्रामों मे अभी भी इस सभ्यता ने पूरी तरह अपने पाँव नहीं पसारे हैं,परिणामस्वरूप मानव मूल्य अभी वहाँ संरक्षित दीखते हैं, पर नागरी सभ्यता की चका चौंध उनहें भी अपने लपेट में लेना ही चाहती है।


भारत माँ के नयन दो हिन्दू-मुस्लिम जान। 

नहीं एक के बिना हो दूजे की पहचान।।

राजनीति शतरंज है , विजय यहां वो पाए।

जब राजा फंसता दिखे पैदल दे पिटवाय।।


    इस कारण से कला का इतिहास, "आधुनिकता" को आधुनिक युग और आधुनिकतावाद शब्द से अलग कर के देखता है - वह इसे एक असतत "शब्द के रूप में देखता है जिसका प्रयोग उस सांस्कृतिक अवस्था के लिए किया जाता है जिसमें नवाचार की प्रकट होनेवाली परम आवश्यकता जीवन, कार्य और विचारों की एक प्राथमिक शर्त बन जाती है". और कला में आधुनिकता "आधुनिक होने की अवस्था से कहीं अधिक है, या पुराने और नए के बीच विरोध से अधिक है |

 


वी एन वी पद्मावती

सरकारी बालिकोन्नत पाठशाला

लालबजार, हैदराबाद-500015

99519 74900

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