Monday, April 4

उपन्यास सम्राट प्रेमचंद और उनकी शैली - स्वप्ना वाघेश्वरी (साहित्य संगम)

साहित्य संगम


उपन्यास सम्राट प्रेमचंद और उनकी शैली

            स्वप्ना वाघेश्वरी


प्रत्येक रचनाकार यह प्रयास करता है कि वह अपनी रचना में कुछ नवीनता लाए इस दृष्टि से हिंदी उपन्यास के विकास में कुछ ही उपन्यास मिलते है, जो अपने शिल्पगत वैशिष्ट के कारण चर्चित रहे है। प्रेमचंद से पूर्व देवकीनन्दन खत्री के उपन्यासों के शिल्पगत वैशिष्ट से ध्यान आकर्षित किया। कथा के भीतर कथाओं की निरंतरता ने उनके उपन्यासों को लोकप्रिय दिलाई यद्यपि अन्य उपन्यासों में कोई नयापन नहीं मिलता था।    

प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों में कथाकार को अलग करने में आंशिक सफलता पाई है।प्रेमचंद के बाद उपन्यासों में कथाकार स्वयं कथा नहीं कहता बल्कि मुख्य पात्र से कथा कहलवाता है। मुख्य पात्र द्वारा चिंतन-मनन-स्मृति द्वारा कथा को विस्तार देने की कला का प्रदर्शन करते है।    


गोदान की नायिका धनिया      

गोदान की नायिका धनिया है।वह होरी की पत्नी और गोबर की माँ है। एक सामान्य भारतीय किसान की पत्नी की तरह धनिया भी अपने पति की अर्धांगिनी है।होरी के शब्दों में -“सेवा और त्याग की देवी,ज़बान की तेज पर मोम जैसा हृदय, पैसे-पैसे के पीछे प्राण देने वाली पर मर्यादा रक्षा के लिए सर्वस्व होम कर देने को तैयार।” देखा जाए तो धनिया गोदान की सबसे जीवंत पात्र है। उसमें न तो होरी की व्यवहार कुशलता है, न वह लल्लो-चंपो करना जानती है। अपने व्यवहार और आचरण में वह इतनी खरी है कि वह अन्याय का विरोध करना जानती है।इसके लिए वह होरी को भी खरी-कोटि सुनाती है निर्भीक और निडर धनिया पंचों के सामने भी सच कहने से नहीं चूकती। उसकी समझ बिलकुल साफ़ है।

होरी से वह कहती है -ये पंच नहीं राक्षस है जो डांड के बहाने हमारी ज़मीन लेना चाहते है। समझाती जाती हूँ पर तुम्हारी आँखें नहीं खुलतीं।”इसी प्रकार वह “ बैरी को छोड़ने में पाप मानती है।फिर चाहे वह भाई ही क्यों ना हो -बैरी को मारने में पाप नहीं छोड़ने में पाप है।”होरी जब दरोग़ा को रुपए देना चाहता है तो धनिया विरोध करती है -“ घर के परानी रात-दिन मरें और दाने -दाने को तरसें,लत्ता भी पहनने को मयस्सर नहीं और अंजुल भर रुपए लेकर चला है इज्जत बचाने। ऐसी बड़ी है तेरी इज्जत।” उस दरोग़ा को भी वह खरी-खरी सुनाती है।     

गाँव वाले उसका पानी बंद करना चाहते है तो धनिया सबको कहती है कि “अगर किसी ने उसे पानी भरने से मना किया तो वह अपना और उसका खून एक कर देगी।”धनिया हर अवसर पर जात- बिरादरी,समाज,क़ानून की      

परवाह किए बिना अन्याय का विरोध करती है। अपने इस निर्भीक और निडर स्वभाव से वह अनेक बार होरी को भी बचाती है। देखा जाए तो धनिया होरी की पूरक है उसमें भी मानवोचित कमियाँ हैं। किंतु इतनी नहीं जितनी होरी में। प्रतिशोध की भावना उसमें भी है, किंतु दूसरों की पीड़ा को देखकर दब भी जाती है। एक नारी की भाँति वह मत्रु-स्नेह से पूर्ण है पति से जितना उसे प्यार है उतनी ही वह उसके सीधेपन और दब्बू स्वभाव पर झल्लाती भी है।     

वस्तुतः धनिया की चरित्रिक विशेषताएँ होरी के चरित्र की कमियों को पूरा करती है। वह गोदान की प्रखर जीवंत और प्रभावशाली पात्र है। इस तरह प्रेमचंद का लक्ष्य समकालीन जीवन, उसकी समस्याओं को प्रस्तुत करना था। इसकी पूर्ति के लिए विविध चरित्रों की सृष्टि करके की है।गोदान में अनेक वर्ग के पात्र है। जो अपने ढंग से जीते।     

प्रेमचंद यद्यपि अपने उपन्यासों को चरित्र प्रधान नहीं मानते थे।किंतु चरित्रों के निर्माण में उनकी संवेदनशीलता और मनोवैज्ञानिक दृष्टि अद्भुत है।      

    वस्तुतः प्रेमचंद हिंदी के पहले उपन्यासकार हैं जिसने पाठकों को विश्वसनीय और आत्मीय लगने वाले पात्रों की दुनिया बनाई।       



स्वप्ना बागेलीकर 

कलम का नाम: स्वप्ना वाघेश्वरी, 

हिंदी अध्यापिका, ZPHS मंडेलगुडेम,

रघुनाथपल्ली, जिला: जनगाँव ।

9866755214   

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