साहित्य संगम
हिन्दी साहित्य के इतिहास को कुछ शब्दों या पन्नों में सीमित करना बहुत मुश्किल है I क्योंकि- अतीत में जो भी घटित हुआ उसे इतिहास कहा जाता है I और हमारा अतीत इतना विशाल है उसे पूरा कह पाने का प्रयास मात्र इतिहासकार कर पाते हैं I हिन्दी साहित्य के इतिहास को मुख्यता चार कालों में विभाजित किया जाता है I पहला है आदिकाल I इसे वीरगाथाकाल भी कहा जाता है I इसका समय लग भग सन 1050 से 1375 तक का माना जाता है I इस काल को आदिकाल नाम डाॅ हाज़री प्रसाद द्विवेदी ने दिया I इस काल को वीरगाथाकाल इसलिए कहा गया कि- पृथ्वीराजरासो जैसे वीर और शृंगार रस प्रधान काव्य इस समय में अधिक लिखे गये I मुख्यतौर पर रचनाएं काव्य में होती थी I राजाओं के साथ कवि युद्ध में जाकर उनकी वीरता का वर्णन करते थे I राजा के पास अधिक रहकर रचना करने के कारण इसे चारण काल भी कहा गया l वीरगाथाकाल में युद्ध अधिक होते थे I युद्ध देख देख कर और युद्घ के बुरे परिणाम सहन कर प्रजा उदास और निरस हो चुकी थी I उन्हें सांत्वना देने कवियों ने भगवान की भक्ति का सहारा लिया I यह आविष्कार ही भक्तिकाल कहलाया, इस काल का समय सन 1375 से 1700 तक का था I इस काल में ही साहित्य ने अपने उत्कृष्ट स्थान को प्राप्त कर लिया I इसलिए भक्तिकाल को हिन्दी साहित्य का स्वर्णयुग भी कहा जाता है I भक्तिकाल में सगुण और निर्गुण दोनों प्रकार की भक्तियो को स्थान दिया गया l मानव अपने कल्याण के लिए शक्तिशाली अस्तित्व में सहारा ढूँढने लगा I किसी ने राम की भक्ति की, तो किसी ने कृष्ण की भक्ति में खुद को डुबोया I किसीने ग्यान को ही सब कुछ माना, तो किसीने प्रेम में डूबकर आनंद पाया I इस तरह समय बिताने के बाद जनता विलास की ओर आकर्षित हुई I
इस आकर्षण का परिणाम स्वरूप रीतिकाल का जन्म हुआ I रीतिकाल का समय सन 1700 से लेकर 1900 तक का माना जाता है I इस काल में ब्रज अवधि के साथ साथ फारसी भाषा का भी प्रयोग होने लगा I भक्ति का स्थान श्रृंगार को दिया जाने गया I विलासमय जीवन की चाह में कवि राजाओं के साथ रहकर उनके मनोरंजन के लिए काव्य रचना करने लगे I भावनाओं के स्थान पर काला को प्राथमिकता दी जाने लगी I साहित्य रचना से बंधे बंधनों से कुछ साहित्यकार मुक्त होना चाहते थे I इसलिए इस काल में रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध, रीतिमुक्त, तीनों ही प्रकार के कवि हमें देखने को मिलते हैं I सन 1900 से लेकर आज तक के काल को आधुनिक काल कहा जाता है I आधुनिककाल को गद्यकाल भी कहा जाता है I इस काल में पद्य की अपेक्षा गद्य को महत्व दिया गया जाने लगा I इस समय की देश की राजनीतिक, सामाजिक परिस्थितियों भिन्न थी I किसी समय सोने की चिड़िया कहलाने वाला भारत, विदेशियों के आक्रमण, आधिपत्य और लूट से त्रासत था I अपने उज्जवल अस्तित्व को दोबारा पाना चाहता था I इसीलिए उस समय के कवि और लेखक प्रजा में अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने की प्रेरणा देना चाहते थे I प्रजा के पास साहित्य के साथ व्यतित करने का समय कम था I वह कम समय में अधिक फल पाना चाहते थे I लेखक किसी भी तरह से प्रजा में चेतना लाना चाहते थे I ग़ुलामी की जंजीर तोड़कर स्वतंत्र होने की शिक्षा प्रजा को देने के लिये और उस समय में फ़ैली कुरीतियो को भी अपनी कलम की सहायता से मिटाना चाहते थे I जैसे सतीप्रथा, दाहेज प्रथा, नारी के प्रति हीन भावना मिटाना, स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देना, जात पात के भेद भाव को मिटाना, सामाजिक एकता लाने का प्रयास करना आदि I
क्योंकि- गद्य सरल रूप से साधारण जनता की समझ में आजाता था I इसीलिए साहित्यकार इसको बढावा देना चाहते थे I इस प्रबल इच्छा ने ही गद्य की कई विधाओं को जन्म दिया I खड़ी बोली प्रजा की भाषा होने के कारण इसका भरपूर प्रयोग आधुनिक काल में हुआ I भारतेंदु हरिश्चंद्र, डॉ हजारीप्रसाद द्विवेदी, ने पूरी तरह से आधुनिक काल का मार्गदर्शन किया I जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद,और रामचंद्र शुक्ल के समय में नाटक, कहानी, उपन्यास, निबंध, आलोचना जैसी विभिन्न शैलियों को बढ़ावा दिया I नाटक और कहानियो के माध्यम से रचनाकार अपनी बात कहने लगे I नाटकों के मंचन से प्रजा का मनोरंजन के साथ साथ कुछ कर गुज़रने की सीख भी उन्हें मिलती थी I उपन्यास का विकास जितना प्रेमचंद ने किया, शायद ही किसी ने किया हो, इसीलिए उन्हें उपन्यास सम्राट कहा जाता है I प्रेमचंद के प्रत्येक उपन्यास को पढ़ते समय ऐसे लगता है जैसे संपूर्ण घटना हमारे समक्ष घटित हो रही हो I पाठक को उस समय की सामाजिक राजनैतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों का भी पता चल जाता है I निर्मला उपन्यास में बे- मेल विवाह का वर्णन जो प्रेमचंद ने किया उसे पढ़कर हृदय भावुक हो उठता है I प्रेमचंद एक सफल कहानीकार भी हैं I कफ़न कहानी में उन्होंने पिता पुत्र के संभाषण द्वारा आलू भुनने और खाने के दृश्य में जो प्रश्न उठाये हैं उन्हें पढ़कर आँखों में आँसू आना स्वाभाविक है I गोदान के माध्यम से उन्होंने मजबूर किसान और भारत के रीति-रिवाजो का वर्णन किया है पढ़ने वाले उसे कभी नहीं भूल पाते I प्रेमचंद की हर एक रचना एक रत्न के समान है I
आधुनिक काल का आविष्कृत रूप कहानी संक्षिप्त में होती है I कम समय में उसे लिखा और पढ़ा जा सकता है I कहानी के माध्यम से ही अपनी बात सरल सहज और रोचक ढंग से कही जा सकती है I कहानी किसी भी प्रकार से लिखी जा सकती है I लघु, अति लघु, माध्यम, और लंबी कहानी लिखी जाती है I कहानी का विषय कुछ भी हो सकता है, पशु -पक्षियों का, किसी एतिहासिक घटना का, मित्रों की मित्रता का, भाई-बहन के स्नेह का, पति-पत्नी या नायक नायिका के प्रेम का, माँ- बच्चों का, व्यावहार संबंधी, स्वास्थ संबंधी या काल्पनिक कथा I कहानी जो भी हो पढ़ने वाले को तब आनंद नहीं मिलता जब तक कहानीकार उस कहानी के सभी पत्रों को स्वयं अनुभव नहीं करता I कहानी की भाषा भी सटीक होनी चाहिए I सटीक भाषा और शब्दों के अभाव में कहानी आत्मा हीन शारीर जैसे लगती है I प्रेमचंद युग के बाद प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, मनोवैज्ञानिक लेख, और आंचलिक उपन्यास जैसे नवीन रचनाएं भी रची जाने लगी I प्रगतिवाद का लक्ष्य समाज में फैली कुरीतियों का डटकर विरोध करना था I मनोवैज्ञानिक उपन्यास और कथायें लोगों में मानसिक क्लेश मिटाने का प्रयास करती थी I समस्याएं मानसिक भी होती हैं, इस ओर समाज का ध्यान आकर्षित भी करवाती थी I
फणीश्वरनाथ रेणु ने आंचलिक उपन्यास जैसी नयी शैली का परिचय साहित्य से करवाया I जिस में किसी प्रांत विशेष का परिवेश हमें देखने को मिल जाता था I छायावाद भी आधुनिककाल का प्रमुख अंग माना जाता है I प्रकृति की हर एक वस्तु में भागवान के अस्तित्व को देखना मुख्य रूप से छायावाद कहलाता है I सुमित्रा नंदन पंत, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, और महादेवी वर्मा छाया वाद के प्रमुख चार स्तंभ माने जाते हैं I महादेवी वर्मा की दो पंक्तियों की कविता मुझे याद आगई,
लेट हुई मैं लेटी थी, कोई मुझ पर लेटा था I
बुरा न मानो दुनिया वालों, वो तो मेरा बेटा था I
जैसी, सहज पक्तियों से पाठकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती थी वो I
प्रकृति के माध्यम से रहस्यमय ढंग से विद्रोही भावनाओं को उजागर किया जाता था इस काल में I छायावाद के अतिरिक्त आधुनिककाल में कई और विधाएँ देखने को मिलती हैं I जैसे निबंध, जिसमें किसी एक वस्तु या घटना विशेष का विस्तार से या संक्षिप्त में वर्णन किया जाता है I आलोचना भी गद्य की एक विधा है I जिसमें किसी और की भावनाओं को सराहना या टिप्पणी करना मुख्य होता है I जिस से पाठकों को विषय के दोनों पक्षों का बोध होता है I रिपोर्ताज जिस में लिखने वाला अपनी इच्छा से और समज से किसी विषय या परिस्थिति के संबंध में अपने विचार व्यक्त करता है I एक समय में कविता लिखने के लिए छंद अलंकार की समझ होना बहुत आवश्यक माना जाता था I कविता की पंक्तियों के अंत वाले शब्दों में तुकबंदी को भी महत्व दिया जाता था I किन्तु आधुनिककाल के आते आते यह भावना बदल गई, और कवि यह मानने लगे कि-मन का भाव प्रकट करने के लिए,किसी अलंकार, छंद या तुकबंदी की आवश्यकता नहीं यह विचार इतना प्रबल हो गया कि-कविता का स्वरुप ही बदल गया l और कविता को अकविता कहा जाने लगा I
जो भी हो आदिकाल से लेकर आधुनिककाल तक साहित्यकरो का एक ही मन्तव्य रहा है कि-पाठक को प्रेरित करना, दुःख में सहारा देना, समाज का मार्ग दर्शन करना,इतिहास को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना, संस्कृति की रक्षा करना, हिंसा के विरुद्ध आवाज़ उठाने की क्षमता प्रजा में जागरुक करना, कमज़ोर को सक्षम बनाना, अज्ञान में ज्ञान का उजाला फैलना,कुरीतियां दूर करने के लिए प्रेरित करना, आदि I
साहित्य लिखने के लिये सशक्त भाषा का प्रयोग होता है I सशक्त भाषा ही अपेक्षित भाव प्रकट कर पाती है I जब तक सही भाव साहित्यकार समाज तक नहीं पहुंचाता वह सफल, साहित्यकार नहीं होता I भावों के साथ साथ भाषा भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती है I जब तक भाषा जीवित होती है हमारी संस्कृति भी जिवित होती है I संस्कृति ही हमें संस्कार प्रदान करती है I संस्कार से ही मनुष्य श्रेष्ठ कहलाता है I इसलिए हमें अपने साहित्य की रक्षा अवश्य करनी चाहिए I क्यों कि- साहित्य ही जीवन है I
तस्लीम फातिमा
हिन्दी पंडित
ZPHS खिलाशाहपूर
रघुनाथपल्ली
जनगाँव
Pin 506244
फोन नंबर 9966342656
-------------------------------------------------------------------------------------
Please call us 62818 22363

Good article
ReplyDeletekeep posting more...