कथा सरोवर
- स्वप्ना बागेलीकर
कलम का नाम : स्वप्ना वाघेश्वरी
अक्षय बहुत नादान लड़का है। जो भी कुछ भी कहे विश्वास करता है। जिसके कारण आनेवली परेशानियों के बारे में नहीं सोचता है। उसके पिता बहुत बड़े व्यापारी और बड़े अमीर व्यक्ति है । इसलिए दोस्त अक्षय से सहायता लेते थे । एक दोस्त ने अक्षय से कहा कि मेरे पास पाठयपुस्तक खरीदने के लिए पैसे नहीं है ।पुस्तक ना रहने के कारण अध्यापक से डांट खानी पड़ रही है। बस ऐसा कहने से अक्षय उस के लिए पाठयपुस्तक् खरीदने के लिए पैसे देता है। एक और मित्र कुछ पैसों की ज़रूरत है ऐसा कहने पर बिना कुछ सोचे उसे भी मदद कर देता है।ऐसे बहुत सारे दोस्तों को कुछ न कुछ मदद करते ही रहता है बिना सोचे। इसी तरह अक्षय का एक दोस्त राजन आता है और कहता है कि "मेरी माँ की तबियत ठीक नहीं है ।ऑपरेशन करना पड़ रहा है । शायद कुछ पैसों की कमी पड़ेगी ।मेरी सहायता करो । मुझे पचास हजार रुपये की मदद करो ।" ऐसा कहते हुए रोने लगता है ।अक्षय का दिल पिगलता है और कहता है कि तीन चार हजार रुपये मांगते तो मैं भी दे देता लेकिन पचास हज़ार रुपये बड़ी रखम है इसे तो पिताजी से ही मांगना पड़ेगा ।चलो से पूछेंगे ।दोनो जाते है और अक्षय सारी बात पिताजी को बताता है और राजन की सहायता करता है। राजन अक्षय के पिताजी को धन्यवाद कहते हुए जल्दी जल्दी अस्पताल जाता है और माँ का ऑपरेशन करवाता है ।कुछ दिन बीत गये ।एकदिन राजन अपने दोस्त अक्षय के पास आता है और बीस हजार रुपये देते हुए कहता है कि "उस दिन तुम्हारी मदद करने से ही आज मेरी माँ मुझे वापस मिल गयी।बहुत धन्यवाद ।मैं तुम्हारे पिताजी से मिलकर धन्यवाद कहना चाहता हूँ।"
तब अक्षय कहता है कि दोस्त को कभी धन्यवाद कहने की ज़रूरत नहीं है माँ तो किसी की भी माँ है । पिताजी जी से मिलना चाहते हो तो चलो मिलते है।दोनो अक्षय के पिताजी से मिलते है ।राजन अक्षय के पिताजी को धन्यवाद कहते हुए बीस हजार रुपये देते होते कहता है कि बाकी के रुपये कुछ दिनों बाद जमा करके दे दूंगा ।तब अक्षय के पिता कहते है कि "तुम अभी छात्र ही हो तो अभी रुपये देने को ज़रूरत नहीं है ,यह बीस हजार रुपये तुम अपने पास ही रखो और माँ के लिए दवाई ,फल के लिए उपयोग करना उनकी तबियत का ध्यान रखना"। ऐसा कहते हुए वह अपने काम पर चले जाते है ।
नीति:
किसी भी ज़रुरतमंद की सहायता करना बहुत अच्छी बात है।

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