Friday, April 1

वात्सल्य - अवुसुला श्रीनिवासा चारी ‘शिक्षा रत्न‘ (कथा सरोवर)

 कथा सरोवर


वात्सल्य 

            अवुसुला श्रीनिवासा चारी ‘शिक्षा रत्न


    राजू किसी निजी कारखाने में चपरासी के रूप में काम करता था । ₹ 5000 वेतन मिलता था । वह बहुत पढ़ा - लिखा नहीं था । घर में पत्नी और 9 साल की एक बेटी थी । लड़की बड़ी होती जा रही थी । घर का खर्चा भी बढ़ता चला जा रहा था । दिन-ब-दिन घर चलाना मुश्किल महसूस हो रहा था । वह अपनी लड़की को निजी  पाठशाला से निकालकर सरकारी पाठशाला में दाखिल करवाया । वह सोचा इससे कुछ पैसे बच जाएंगे तो घर चलाना थोड़ा आसान होगा ।

    राजू की पत्नी गीता बहुत ही सुंदर और सुशील थी । वह भी ज्यादा पढ़ी-लिखी तो नहीं थी लेकिन चतुर थी । वह हर काम को सुचारु रूप से करती थी । घर के काम के साथ-साथ सास और ससुर की सेवा - शुश्रूषा में हमेशा रथ रहती थी । राजू के माता-पिता उनकी बहू की सेवा और उनके व्यवहार से बहुत खुश थे ।

    एक दिन अचानक गीता की तबीयत खराब हो गई जब राजू काम से लौट आया तो वह सो रही थी ।  उसे तेज बुखार थी । राजू उसे अस्पताल ले गया तो पता चला कि उनके दिमाग में खून जम जाने के कारण वह अधिक दिनों तक जिंदा नहीं रह पायेगी । यह बात सुनते ही राजू के पैरों के तले जमीन हिल गई । वह अपनी पत्नी से इस बात को छिपाना ही ठीक समझा क्योंकि सच बता कर वह अपनी पत्नी और माता-पिता की आंखों में आंसू देखना नहीं चाहता था ।

    गीता रोज दवाई लेती रही दिन - दिन उसका स्वास्थ्य बिगड़ता गया । शरीर उसका साथ नहीं दे रहा था । अपने सास - ससुर की सेवा से भी वह दूर होती गई । थकान महसूस करने लगी थी । एक दिन वह परलोक सिधर गई । इससे राजू का जीवन दुख के घने बादलों से छा गया । वह एक चलती - फिरती मूर्ति की तरह बन गया था । जिसमें प्राण तो हो लेकिन कोई भावना ना हो।

    कुछ दिन बीत गए । राजू के मित्र उसे समझाए कि आखिर कितने दिनों तक इस तरह रहोगे ? तुम्हारी बेटी और माता-पिता का देखभाल भी तो करना है। इस तरह रहोगे तो उन लोगों का क्या होगा ? राजू धीरे-धीरे अपने आप को संभालने लगा। अपनी लड़की के भविष्य की चिंता उसे सता रही थी। वह हर रोज काम पर जाता था। माता - पिता की सेवा भी करता था। लेकिन अपनी बेटी के लिए पहले की तरह समय नहीं दे पा रहा था ।

    राजू को घर और दफ्तर का काम करना पड़ता था। इससे वह पूरी तरह थक जाता था। काम बढ़ जाने के कारण उसकी तबीयत भी बिगड़ती गयी। कभी-कभी वह इतना थक जाता था कि वह दफ्तर भी जा नहीं पाता था। घर चलाने के लिए वह अपने मित्रों से उधार भी लिया था। दफ्तर हर दिन  ना जा पाने के कारण आमदनी घटती गयी और कर्जा बढ़ता गया। एक दिन उसकी तबीयत अधिक खराब होने के कारण अस्पताल गया तो पता चला कि उसे ब्लड कैंसर है। वह मन में ठान लिया कि जब तक वह जिंदा हो तब तक अपने माता-पिता की सेवा में कोई कमी नहीं आने देगा और मरने से पहले अपनी बेटी की शादी एक अच्छे घराने में करेगा। इसके लिए वह दिन रात काम करने लगा। कहीं भी और कभी भी वह अपने माता - पिता और बेटी को उसकी बीमारी की बात मालूम होने ना दिया। दिन रात काम में लगा रहता था। दवाइयां भी वह अपने माता - पिता और बेटी के सामने ना खाकर घर के बाहर जाकर खा कर आता था।  जब भी कोई मित्र उधार लिये गये पैसे वापस मांगने आता तो उसे चुपचाप  लेकर बाहर जाता था। ताकि अपनी बेटी को उसकी आर्थिक तंगी का पता ना चले ।

    लेकिन वह मासूम - सी लड़की अपने पिता के इस व्यवहार को समझ ना पाई । वह सोचने लगी कि पिताजी पहले की तरह नहीं हैं ना वे उसके साथ खाते - पीते हैं और ना ही समय बिताते हैं पिताजी के इस व्यवहार को वह समझ ना पा रही थी। पिता के वात्सल्य की कमी महसूस करने लगी। पिताजी और उनके प्यार से दूर होती गयी।

    बेटी अब सयानी हो गयी थी। राजू जितना जल्द हो सके उसकी शादी करना चाहता था क्योंकि उसके पास भी शायद ज्यादा समय नहीं बचा था। राजू लड़की के लिए शादी के रिश्ते देखने लगा। कई रिश्ते देखने के बाद एक रिश्ता उसके मन को भाया। हर प्रकार से वह जांच पड़ताल करके रिश्ता तय किया ताकि उसकी लड़की शादी के बाद कभी मां-बाप की कमी महसूस ना करें।

    लड़की को लगा कि पिताजी इतनी जल्दी शादी करके अपना बोझ उतार लेना चाहते हैं। राजू ने रिश्ता पक्का कर लिया। शादी की तैयारियां होने लगीं। शादी के दिन दुल्हन को सजाने के लिए उसकी सहेलियां आती हैं ।  दुल्हन अपने मन की बात अपनी सहेलियों से कहने लगती है कि पिताजी पहले के जैसा नहीं हैं। सुबह जल्दी मेरी शादी करके अपना बोझ उतार लेना चाहते हैं। राजू का एक मित्र पैसे देकर राजू की सहायता करने और लड़की को आशीर्वाद देने आया था। दरवाजे पर खड़ा दुल्हन की सारी बातें सुन लेता है। इतने अच्छे स्वभाव वाले राजू के बारे में उन्हीं की लड़की भला - बुरा कहना राजू के मित्र से सहा नहीं गया।उसने दुल्हन को उनके पिताजी के बारे में सारी बातें बतायीं। सारी बातें सुनकर लड़की पानी - पानी हो गयी। वह फूट-फूटकर रोने लगी। उसे अपने आप पर ही क्रोध आने लगा था। तुरंत अपने पिताजी के पास जाती है और उनके चरणों में गिर कर रोने लगती है।

    राजू अपनी बेटी को उठाकर कहता है कि बेटी का स्थान तो पिता के हृदय में होता है। हर बाप के लिए उनकी बेटी राजकुमारी होती है। हर बाप अपनी बेटी को अपनी मां और देवी लक्ष्मी समान मानता है। मैं तुम्हें सदा खुश देखना चाहता हूं। इतना कहते हुए वह अपनी बेटी को गले से लगा लेता है। वह अपने दुख को रोकने की कोशिश करता है। उनकी आंखों से आंसू  गिरती जाती हैं।


नीति : 

कभी अपनों के प्यार पर शंका ना करना चाहिए।

 


अवुसुला श्रीनिवासा चारी ‘शिक्षा रत्न

तुनिकी गाँव , मेदक जिला , तेलंगाना।

दूरभाष : 8801600139, 8328191672

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Editor
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