Tuesday, March 29

सीख - तस्लीम फातिमा (कथा सरोवर)

 कथा सरोवर


सीख
            तस्लीम फातिमा 


        मेरा नाम किशन है I  मेरी मौसी की कोई निस्संतान थी।इसलिए मेरी मौसी ने मुझे गोद लिया था I तब मेरी उम्र दो वर्ष की थी I किन्तु मुझे गोद लेने के बाद मौसी के घर मे अपनी संतान का जन्म हुआ I जिस मौसी ने अपनी बहन से  विनती करके मुझे प्राप्त किया था। उसी ने खुद  की  सन्तान के पाते ही मुझे बोझ समझना आरंभ कर दिया Iदो या  तीन वर्ष  में ही  मुझसे पीछा छुड़ाने का  संकल्प कर लिया और बिना  मेरी सगी माँ को बताये, मुझे मेरे नानी के पास छोड़ दिया I बचपन में माँ का परिवर्तन बार-बार क्यों हो रहा है I यह मेरा कोमल दिल समझ नहीं पाया I और वो सहम गया I  गुम  सुम रहना, खुल कर बात न करना, हर छोटे विषय से डर जाना मेरा स्वभाव बन गया l मेरे अस्तित्व में उदासी भर गई I ननिहाल में ही मेरी प्राथमिक शिक्षा  का प्रारंभ हुआ I  मैं स्कूल रिक्शा में जाता था I रिक्शा से मेरा तात्पर्य यह है कि-पीछे एक जाली से बना डिब्बा होता था I उसी में  हम  10 से  12 छात्र बैठते थे I आगे साईकिल जैसा निर्माण होता था I जिसे रिक्शा चालक स्वयं पैडल मार कर चलाता था I शायद  2 या 3 किलोमीटर का रास्ता था I रास्ते मे एक खाई भी पड़ती थी I खाई से रिक्शा गुज़रते समय बच्चे एक दूसरे पर गिरते थे I बाकी सब बच्चे इस स्थिति का पूरा पूरा आनंद लेते I पर मेरा इस समय कलेजा मुह को आजाता I मेरे इस स्वभाव का लाभ उठाकर कुछ छात्र मुझे उस समय और भी डराकर गिरा दिया करते थे I इस घटना की कल्पना कर मुझे रिक्शा में जाने से डर लगने लगा I मेरे छह मामा थे I उन्होंने मेरे डर का कारण पूछा तो मैने उन्हें सच्चाई बतादी I 

        दूसरे दिन मेरे दो मामा रिक्शा तक मुझे छोड़ने आये,और उन छात्रों को पीटा,जो मुझे गिरा दिया करते थे I इसके बाद भी यह सिलसिला थमा नहीं, मैं पहले की तरह ही  रिक्शा में स्कूल जाने से डरने  लगा I हर रोज़ दिल घबराता थाI सुबह से लेकर जब तक मार्ग की वह खाई गुज़र न जाती मैं डरता रह्ता I घर वापस आते समय पुनः वही अनुभव मुझे झेलना पड़ता I अब मैं इस अवस्था से छुटकारा पाना चाहता था I  हमारे घर के आंगन से  सटकर ही एक पार्क हुआ करता था I पार्क में झूले सरपट इत्यादि सब कुछ थे I हर रोज छात्र वहा खेलने आते थे I उन में वह छात्र भी होते थे जो मुझे रिक्शा और पाठशाला में सताया करते,मेरा उस छात्र से बदला लेना चाहता था, जो सब से अधिक मुझे सताता थाI मेरे मन में कुछ कर गुज़रने का जुनून सवार होगया था I रविवार का दिन था I मैंने सुबह से ही शाम होने का इंतज़ार किया I क्योंकि शाम को ही बच्चे पार्क में खेलने आते थे I 

        मैंने अपनी पूरी शक्ति लगाकर एक पत्थर उठाया और सीधे उस बच्चे के सर पर निशाना साधा I पत्थर मस्तक पर जा लगा और उस बच्चे की चीख निकल गई I खून बहना शुरू होगया I मैं यह सब देखकर डर गया I मेरी योजना के अनुसार मुझे खुश होना चाहिए था I मगर ऐसा नहीं हुआ I और मैं सीधे घर की ओर भाग आया I अब पहले से भी ज्यादा भयभीत था मैं I मैं ने खून से सना चेहरा देखा था I आज भी आंख बंद करता हूँ तो वह दृश्य मुझे स्पष्ट दिखाई देता है I 

        सन 1979 या 1980 की बात होगी शायद, हमारे घर के पास ही पुलिस स्टेशन भी था I पुलिस स्टेशन के सारे दृश्य हमारे आँगन से स्पष्ट दिखाई देते थे I अपराधियों को पुलिस द्वारा पीटा जाना उन्हें मुर्गा बनाना आदि मैं  छुप छुप कर देखा करती,उन दिनों ऐसा करना शायद बड़ी बात न थी I कुछ भी गलत करने से मेरा मन वैसे भी घबराता था I मैंने सुन राखा था जो जुर्म करते हैं उन्हें पुलिस पकड़ कर लजाती है I और बहुत मारती है I अब मुझे भी  पुलिस पकड़ कर ले जाएगी मैं यह सोंचने लगा I  मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई थी I कुछ मिनटों में ही जिसे मैंने पत्थर मारा था उसकी माँ  अपने घायल पुत्र को साथ लेकर आयी और मेरी नानी से मेरी शिकायत लगादी I अब मैं अपने दिल की आवाज़ साफ़ सुन पारही थी I नानी ने उन्हें समझा बुझाकर भेज तो दिया किन्तु चोट पहुंचाने का अपराध बोध मेरे मन में आज भी है I चोट खाकर जितनी पीड़ा उस बच्चे को हुई होगी उस से अधिक का  अनुभव मुझे हुआ I जीवन की हर घटना कोई न कोई सीख अवश्य देती है I शायद मुझे वह सीख मिल चुकी थी I चाहे जितना भी कष्ट क्यों न हो किसी दूसरे को दुःख या चोट पहुंचाने से शांति नहीं मिल सकती I यह मैंने उस दिन जाना I 


नीति:

हिंसा का जवाब हिंसा कभी नहीं हो सकता I  दुनिया में हर व्यक्ति से मिलजुल कर प्रेम पूर्वक रहो।खुश रहो। आनंदमय जीवन बिताओ।



तस्लीम फातिमा 

हिन्दी पंडित 

ZPHS खिलाशापुर

रघुनाथपल्ली 

जनगाँव  506244

99663 42656


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Editor
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