कथा सरोवर
- प्रसाद राव जामि
पुराने जमाने की बात है। एक गोविंदपुर गांव था। उस गांव में माधवाचार्य नामक एक भक्त रहा करता था। भगवान की स्मरण के बिना दूजा उसका स्मरण नहीं था। उनका लक्ष्य ही ईश्वर प्राप्ति था। हर दिन पूजा-पाठ, ध्यान ,आध्यात्मिक चिंतन ,गीत ,गान, भजन में ही सारा दिन-रात बिता देता था। वे अलौकिक विषयों की ओर ध्यान नहीं देता था। अपनी राह में चलते रहता था। जब भी उनको समय मिलता तो समाज को ज्ञान उपदेश देते थे। उनके उपदेश से समाज में कई परिवर्तन लाए थे। समाज में उनका बड़ा आदर और सत्कार रहता था।
उनकी इस अपार ईश्वर भक्ति को देखकर गांव में कुछ यौवन इनके शिष्य बनना चाहे और इनके पास आकर अनुरोध करने लगे। गुरु ने उनको स्वीकार कर लिया और सारे शिष्य गुरु की सेवा में रहने लगे।वह अपने शिष्यों को मार्गदर्शक करने लगे और ज्ञान बोध करने लगे। शिष्य भी अपने गुरु के जैसे महान बन गए थे।ऐसे-ऐसे ही समय बीत गया।
एक दिन आया वही भक्त वृद्ध हो गया। अब उनको पता चल गया कि यह उनका अंतिम दिन समीप आ गया है। वे अपने शिष्यों को बुलाकर कहा कि मुझे काशी ले चलो। मेरा अंतिम समय आ गया है। जो मेरा अंतिम समय ईश्वर की उपासना में रहना चाहता हूं।
शिष्य गुरु की आज्ञा का पालन करने के लिए स्वीकार कर लिए और गुरुदेव से कहने लगे कि आप की अंतिम अवस्था और आपका अभीस्ट के अनुसार ही होगा। आप हमें अनुमति दे दें। गुरु ने उनको अनुमति दे दी।
गुरु अपने शिष्यों की बातें सुनकर बहुत खुश हुए और अपने शिष्यों को काशी उन्हें ले जाने की अनुमति दे दी। शिष्यों ने
पालकी में अपने गुरु को बिठाकर स्वयं
शिष्य पालकी ढोते हुए काशी निकल पड़े। कुछ ही दिनों के बाद गुरु शिष्य काशी पहुंच गए।
शिष्यों ने अपने गुरु को काशी विश्वेश्वर स्वामी एवं अन्नपूर्णा माता की दर्शन करवाएं। गुरु उस दर्शन से बहुत खुश और संतुष्ट हो गए। अपने सारे शिष्यों को हृदय पूर्वक आशीर्वाद देते हुए खुशी-खुशी अपनी अंतिम सांस छोड़ चल बसे।गुरु का जन्म धन्य हो गया।
गुरु इस दुनिया में ना रहे पर शिष्यों का उतना ही आदर था जितना गुरु का था।
भविष्य में उन शिष्यों का मान-सम्मान इतनी हुई की शिष्य जहां भी जाते थे। उनका बड़ा आदर ,सत्कार, गौरव प्राप्त होता था ।क्योंकि उनकी गुरु भक्ति की स्मरण अनमोल और अद्भुत थी। सारी शिष्यों का मान और नाम सारे विश्व में गूंज रहा था।
नीति:
मनुष्य का जीवन मरण तो यह साधारण है। पर वह जीवन में कैसे जीता है? यही सफल जीवन का एक दार्शनिक उदाहरण है।ईश्वर की उपासना से और गुरु की भक्ति से अपना जीवन सफल बन जाता है।
इसीलिए संस्कृत में "ज्ञान मनुजष्यम तृतीय नेत्रम"
प्रसाद राव जामि
साहित्यकार
6301 260 589
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