कथा सरोवर
- वी एन वी पद्मावती
एक सूंदर परिवार था। उनकी एक छोटी बेटी थी। उसका नाम सरोज था। माँ नहीं चाहती थी कि उसकी पढाई में कोई बाधा हो। इसलिए उसकी पढाई तथा दोस्तों के चयन में उसकी सहायता करती।
सरोज को जानवरों तथा पक्षियों से बड़ा लगाव था। इसलिए उसने माँ से पूछा उसे कोई नन्हा सा कुत्ता खरीद लाये पर माँ नहीं मान रही थी। क्योंकि घर में उसके उम्र के कोई भाई बहिन न थे। उसे बोरियत लगता था।
एक दिन जब वह पाठशाला जा रही थी तो पाठशाला प्रांगण से पहले उसके कन्धों पर एक मिट्ठू (तोता) बैठ कर बोल रहा था। उसे उसकी बोली अच्छी लगी। मिट्ठू चाहता था कि वह सदा सरोज के साथ रहे | यही बात उसने सरोज से कही। पर सरोज डर रही थी कि उसकी माँ नहीं मानेंगी। ऐसे ही दो-तीन दिन हर रोज मिट्ठू आती अपनी इच्छा व्यक्त करती। न जाने उसका सरोज से किस जन्म का सम्बन्ध था। एक दिन सरोज ने उससे कहा-तुम मेरे साथ चलो मै माँ को मनाने की कोशिश करूँगी| अगर माँ की सहमति मिले तो तुम मेरे साथ रहोगी वरन् ऐसे ही रोज मिलकर चले जाना। मिट्ठू को देखते ही माँ भड़क उठी। परन्तु सरोज ने माँ को समझाया कि उसके हम उम्र के न रहने के कारण उसे अकेलापन महसूस हो रहा है और मिट्ठू किसीको कोई बाधा न पहुँचाएगी| वह उसकी पूरी देखभाल करेंगी। तब माँ ने कहा कि पढाई होने के बाद ही उसपर ध्यान देना होगा और उसे मिट्ठू को रखने की सहमति मिल गयी।
रोज मिट्ठू सरोज को छोड़ने आता और फिर लाने जाता। एक दिन सरोज को छोड़ आते मिट्ठू ने देखा कि कोई बच्चों को चुराकर ले जानेवाली गैंग ताक में कड़ी थी कि श्याम को घंटी बजेगी तो कुछ बच्चों को ले जाया जाए। मिट्ठू ने तुरंत उड़कर खिड़की से सरोज की कक्षा में प्रवेश किया और अपनी तोतली बातों से अध्यापिका को सचेत किया कि अनहोनी होनेवाली है और बच्चों को किडनैप (अगुआ) करने की योजना बनाई जा रही है। तब अध्यापिका गुस्से में आकर बोली यह किसकी पालतू पक्षी है और ये क्या बकवास कर रही है ?
तब सरोज ने कहा यह मेरी पालतू पक्षी है और वह झूठ नहीं बोलती। अध्यपिकाजी आप निश्चिन्त रहिये मिट्ठू किसीको कुछ नहीं करेगा। आपसे निवेदन है कि आप पहले प्रिंसिपल साहब को समाचार दीजिये और पता करवाईये कि यह बात क्या सच है या गलत। अगर सच है तो आप उसपर पुलिस की सहायता ले सकते हैं ना। तुरंत अध्यापिका ने प्रिंसिपल को समाचार दिया। जानने पर पता चला कि सच है कि वहाँ एक गैंग डेरा डाले बैठी है बच्चों को ले जाने। पुलिस को समाचार देने पर वे आये और जब पाठशाला की घंटी बजाई तो थोड़ी ही दूर में जब वे बच्चों को किडनैप कर रहे थे तो उन्हें रंगे हाथों पकड़ा और कहा कि कई दिनों से वे जिस गैंग कि तलाश में थे वे वही है। हमारी सहायता करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद। प्रिंसिपल साहब ने कहा - आप मेरी नहीं, बल्कि सरोज तथा उसकी पक्षी की सराहना कीजिये। इसके हकदार वे ही हैं।
सरोज तथा उस पक्षी की सबने सराहना की और सरोज को २६ जनवरी के दिन 'साहसी सरोज ‘ का पुरस्कार दिया गया तथा उसकी साड़ी पढाई की जिम्मेदारी सरकार ने ले ली।
सीख : कहा जाता है कि "होनहार बिरवान के होत चिकने पात।" जिसके पैर बचपन में चिकने होते हैं वे बड़े होशियार होते हैं। साहस नाम का आभूषण मनुष्य के लिए आवश्यक है|
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