कथा सरोवर
विवेक अपनी कक्षा का होनहार विद्यार्थि था I उसे प्रत्येक विषय में अच्छे अंक प्राप्त होते थे I फिर भी वह कभी प्रसन्न नहीं होता था I हमेशा उदासी और घुटन से घिरा रहता I क्योंकि-उसकी अप्रसन्नता का कारण उसकी ही कक्षा का छात्र सुनील था I सुनील कक्षा में हमेशा प्राथम स्थान पर होता था I विवेक और सुनील के अंकों में 4 या 5 अंकों का ही फर्क़ होता था I हमेशा विवेक, सुनील से पीछे रह जाता था I इसीलिए विवेक, सुनील से इर्ष्या करने लगा था I विवेक लाख प्रयत्न करके भी सफलता नहीं प्राप्त कर पाया I अब विवेक, सुनील से मन ही मन जलने लगा था I स्वयं को अपमानित महसूस कर रहा था I रात दिन वह इन्हीं विचारों से घुटता रहता I
इस बार की परीक्षाओं में वह अधिक अंक प्राप्त कर सुनील पर विजय पाने का निश्चय करता है I अब उसने कुछ ऐसा कार्य कर डाला जिसकी कल्पना भी किसीने नहीं की थी I ऐसा काम नहीं करना चाहिए था I विवेक ने अध्यापक की आंक बचाकर मौका पाते ही, उन प्रश्नों के उत्तर पाठ्य पुस्तक में देखकर लिखे, जिनके जवाब वह नहीं जानता था I
परीक्षा का परिणाम आया विवेक को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था I सभी अध्यापक और सहपाठी उसकी प्रशंसा कर रहे थे I किन्तु वह अब भी खुश नहीं था I अपराध बोध से उसका मन व्यथित था I उसके अंदर से यह अवाज आरही थी, कि- तू चोर है तू ने चोरी की है, जो सम्मान तुझे मिल रहा है तू उसका अधिकारी नहीं है I वह बहुत बेचैन हो गया l
अंत में उसने इस ग्लानि से छुटकारा पाना चाहता है और कक्षाध्यापक को जाकर सच सच बता देता है कि -कौन कौन से उत्तर उसने पाठ्य पुस्तक से देखकर लिखे है I इस के लिए विवेक ने अध्यापक से माफ़ी भी मांगी I तब अध्यापक ने विवेक की प्रशंसा की I
सच्चाई बताते ही उसका मन शांत हो गया l उसे असीमित सुख की अनुभूति हुई I अब विवेक के मन की इर्ष्या समाप्त हो गई थी I वह मन लगाकर पढ़ता और जो अंक परीक्षा में मिलते उनसे ही आनंद का अनुभव करता I
नीति- "धोखे से प्राप्त किया गया वैभव सुख नहीं देता "
हिन्दी पंडित
ZPHS खिलाशापुर
रघुनाथपल्ली
जनगाँव 506244
99663 42656
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