Thursday, March 3

होली (लघुकथा) - अरुणा कुमारी राजपूत 'राज' (कथा सरोवर)

कथा सरोवर


होली
(लघुकथा)

अरुणा कुमारी राजपूत 'राज'


    होली का नाम सुनते ही वह बेचैनी और उदासी से भर जाता था|  उसे आज भी वो दिन याद है जब माँ - पापा, होली बेटे - बहू के साथ मनायेंगे और कुछ दिन वहीं रहेंगे यह सोचकर उसके पास आए थे| पर उसने यह कहते हुए कि वह और उसकी पत्नी बहुत व्यस्त रहते हैं, होली के अगले दिन ही उन्हें रवाना कर दिया था और उसी दिन घर वापस लौटते समय रास्ते में कार दुर्घटना में उनकी मौत खो गयी| बहुत रोया था अपनी उस हरकत पर वो और आज तक पछता रहा है अपनी उस गलती पर| बीते समय की यादों में खोया वह ऑफिस से निकलकर घर जाने के लिए सड़क के दूसरी तरफ पार्किंग में खड़ी अपनी कार लेने जा रहा था| 

    वह अपने विचारों में इतना खोया हुआ था कि उसे सामने से आता ट्रक भी नहीं दिखाई दिया| वो तो भला हो उस बूढ़े का जिसने उसे उचित समय पर खींच लिया|

    क्या हो गया है तुम्हें बबुआ, अभी क्या अनहोनी हो जाती? वो बूढ़ा कह रहा था| उसने नजरें उठाकर देखा और पाया कि ये तो वही बूढ़ा है जो अपनी पत्नी के साथ ऑफिस के नीचे चाय का खोखा चलाता है| तभी बुढ़िया चाय ले आयी और बोली लो चाय पी लो, आज कुछ परेशान लग रहे हो|

    उसने चुपचाप दोनों की तरफ देखा और चाय ले ली| चाय पीते-पीते उसने हिम्मत करके पूछा, "आप इस उम्र में इतना काम क्यों करते हैं?" 

    जिस पर बूढ़े ने कहा कि उनके चार बेटे हैं पर किसी के भी पैसा और समय दोनों ही नहीं है उनके लिए, तो अपना गुजारा चलाने के लिए ये खोखा चलाना पड़ता है| यह सुनते ही उसे उन दोनों में अपने माँ-पापा नजर आने लगे| उसे लगा यही समय है अपनी गलती सुधारने का और उसने उन बुजुर्ग दम्पति से कहा, "क्या आप दोनों मेरे साथ मेरे घर में रहेंगे मेरे अभिभावक बनकर?" कुछ देर की चुप्पी के बाद बुजुर्ग दम्पति ने हाँ में सिर हिला दिया|  उनकी हाँ मिलते ही उसने खुद से कहा, "अब हम होली तो क्या, हर त्योहार साथ मनायेंगे| उसकी बेचैनी और उदासी अब खत्म हो चुकी थी|



अरुणा कुमारी राजपूत 'राज'

सहायक अध्यापिका

आदर्श अंग्रेज़ी माध्यम संविलयन विद्यालय राजपुर

विकास खण्ड - सिम्भावली

जनपद - हापुड़

उ०प्र०

9457179156

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कथा सरोवर
Editor
Prasadarao Jami

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