Tuesday, March 8

गुरु कृपा - प्रमोद कुमार "सत्यधृत"(कथा सरोवर)

 


 कथा सरोवर


गुरु कृपा
            प्रमोद कुमार"सत्यधृत"


    आज भी मैं उस घटना को याद करके रोमांचित हो उठता हूं, जब मेरे गुरु जी ने मेरा नाम पुकारकर कहा,खड़े हो जाओ ।

    मैं सिहर उठा ।न जाने क्या बात है ? पूरी कक्षा मेरी तरफ ऐसे देख रही थी,मानों मैं दुनिया का आठवां अजूबा हूं।शायद यह मेरे गुरु का मेरे ऊपर अपार स्नेह और विश्वास का परिणाम था।

    मैं सहमता हुआ सा,जा  पहुंचा गुरु के पास और मेरे हाथों पर लगातार डंडे बरसा दिये,वो भी पूरे बारह,लगाने थे तेरह, कि अचानक  कार्यालय से एक व्यकि आया,उसने गुरु जी से कुछ बातें की और वापिस चला गया लेकिन शायद इसी बीच गुरु जी भूल गये और क्रोधातिरेक होकर पुनः सजा देकर कहा भाग जा यहां से।

    शायद इसका प्रमुख कारण,मेरे गणित विषय के मासिक मूल्यांकन में अंकों का कम आना था।मैं समझ चुका था कि बीस में से सात अंक आये हैं अतः तेरह डंडे तो लगने ही थे,लेकिन पुनः डंडे लगने का औचित्य समझ नहीं आया।

    दोनों हाथों से रह-रहकर खूंन टपक रहा था और,फूलकर कर कुप्पा हो गये थे ।भला क्या मजाल की हम अपने गुरु के गुरुत्व  को धूमिल होने दें ।

    लेकिन फिर भी किसी ने बता दिया,उसपर परिवारवालों ने खूब धमकाया की पढ़ता नहीं है,पिटाई तो होगी ही,भला गुरु जी को तेरी तनख्वाह लेनी है।

    सारी रात बस यही सोचता रहा कि कल उस देवत्व रूप के असीम तेज का सामना कैसे होगा?

    अगले दिन नज़रें झुकाये, अपनी मेज पर बैठा हुआ निःशब्दता के घने अंधकार में ,पता भी नहीं चला कि कब गुरु जी ने कक्षा में पदार्पण कर दिया। अभिवादन स्वर नें मेरी तंद्रा को तोड़ा और पाया कि जीवन में पहली बार शिष्टाचार का दामन भी छूट गया है।आज अवश्य ही कुछ होगा ? कि अचानक कक्षा में मेरे नाम का स्वर गूंजा। शरीर में सिहरन सी दौड़ गई कि जिसका डर था ,वो हो गया।

    किंकर्तव्यविमूढ़ सा जा पहुंचा, अपने दोष का निवारण करने।

    लेकिन देखकर हृदय आतर्नाद कर उठा कि मेरे गुरु जी की आंखें नम और बोझिल हैं।

    सहसा बड़े प्यार से अपना स्नेहिल हाथ मेरे कंधे पर रखा और कहा कि तूने मुझे बताया क्यों नहीं कि मेरे डंडे लग चुके हैं,मैं सजा पा चुका हूं।

    बोलते समय गुरु जी  के शब्दों को शायद पहली बार मैनें लड़खड़ाते हुये देखा था। 

    मेरा गला भर आया था।आंखों से आँसुओं की अविरल धारा बह निकली थी।मैं गुरु जी के चरणों में पड़ा सिसक रहा था और कह उठा ,क्या भूल हो गयी मुझसे जो आपने मुझे पराया समझ लिया।गुरुदेव ये आत्मा भी आपकी, शरीर भी आपका है।

    गुरु जी ने झट से मुझे गले से लगा लिया और कहा,'अरे नादान भूल तुझसे नहीं मुझसे हो गयी है।इतनी सहनशीलता, संवेदना और अनुशासन केवल एक अध्यापक में हो सकती है।

    अरे तू तो अध्यापक बनेगा।नाम ,शौहरत तेरे पीछे भागेंगी,बस यही मेरा आशिर्वाद है।

और अगले दिन गुरु जी का तबादला कहीं ओर हो गया था लेकिन उनकी कही बातें आज भी मेरे कानों में गूँजती हैं और मन विभोर होकर कह उठता है----

        गुरु तुम बिन, ना सच्चा साथी।

        दिन -रात जले, दीपक की भांति।।


प्रमोद कुमार"सत्यधृत"
पिनगवां(नूहं)
हरियाणा
99926 93261
email - pramodgautam608@gmail.com

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कथा सरोवर
Editor
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