हिंदी साहित्य वैश्विक परिदृश्य
पारिवारिक क्षेत्र में आदर्श मानव मूल्यों के उन्नयन में
वर्तमान हिन्दी उपन्यासों की भूमिका
निबंधकार : मिर्जा मासुमे फातिमा
मानव सहानुभूति, सकारात्मक संवेदनशीलता, व्यवस्थित सामाजिक चेतन, वैयक्तिक आदर्श, मानव संबंध, आकर्षक एवं प्रभावी संचार और पारस्परिक सहयोग ये सब उपयोगी मानवमूल्य
माने जा सकते हैं| सामाजिक क्षेत्र में कुछ विशेष व्यक्ति होते हैं जिनमें दु:खी लोगों
के प्रति सहानुभूति की भावना प्रचुर मात्रा में प्राप्त होती है| ऐसे लोगा अपने लिए हानि
पहूँचानेवाले लोगोँ को भी उपकार ही करने की प्रवृत्ति रखते हैं| जिससे बुरा सोचने वाले लोग भी इनके व्यक्तित्व से
प्रभावित होकर अपने को सुधारने की चेष्टा करते हैं और अपने चरित्र को आदर्शवान बना
लेते हैं|संवेदनाशील मानव कोई भी कार्यबडी सरलता से कर पाता है| वह सभी के मन को आसानी से आकर्षित करता है, परंतु
कुछ लोग इस संवेदनशीलता का गलत फायदा भी उठाते हैँ|
सकारात्मक रूप से
संवेदनशील होने के लिए किसी का भी मनुष्य मात्र होना पर्याप्त है|परन्तु
मनुष्य होकर यदि कोई अनुशासन हीन होता है तो उसका व्यक्तित्व अथवा जीवन किसी के
लिये अनुकरणीय नहीं हो सकता|अनुशासन का मानव जीवन में अत्यंत
महत्व होता है|विशेष रूप से यह प्रक्रिया पारिवारिक क्षेत्र
में प्रारंभ होती है और आगे चलकर वह सामाजिक क्षेत्र में अपने सकारात्मक प्रभाव
दर्शासकती है| इस अवसर पर शब्बीर अहमद ‘मंजर’ कुद्दूसी कृत ‘जुलेखा’ उपन्यास का एक प्रसंग उल्लेखनीय है| उपन्यास की नायिका जुलेखा आदर्श महिला थी| उसके
व्यक्तित्व और चरित्र से प्रभावित होकर उसके पति अशरफ ने गाँव में चिकित्सालय एवं विद्यालय
प्रारंभ करता है| परंतु जुलेखा की ननद नईमा फैशन के पीछे
पडकर जुलेखा को कोई महत्व नहीँ देती किंतु गाँववालों द्वाराजुलेखा को दिये जाने
वाले सम्मान से प्रभावित होकर वह अपने-आप को सुधारने लगती है| इस अवसर पर वह अपनी माँ जरीना से कहती है “अम्मी! सच्ची बात यह है कि इस
बदलाव से मैँ खुद को बहुत हल्का-फुल्का महसूस कर रही हूँ|
मुझे लगता है कि मैं अब तक बनावटी जिंदगी जी रही थी और बानावटी जीवन गुजारने वालों
के साथ रहती थी| उस मोहल्ले के लोग गरीब और जाहिल जरूर हैं
पर उनकी जिंदगी हकीकी है| न उनकी बातचीत, न बोलचाल, न हंसना-रोना, न
मिलन-जुलना और न दोस्ती करना – उनका कुछ भी बनावटी नहीँ बल्कि हकीकी है| मेरे सिर पर फैशन का भूत हमेशा सवार रहता था, अब
मेरा दिल सकून है और रूहानी खुशी मिलती है|”1नईमा
के इस कथन से सहृदय पाठकों को यह स्पष्ट हो जाताहै कि जिस परिवार के सदस्य
आधुनिकता के नाम पर बोझिल पहनावा धारण करके जीवन व्यतीत करना चाहते हैं उन्हें
जुलेखा जैसेउसी परिवार के अन्य सदस्य सुधार कर मूल्यवान जीवन व्यतीत करने के लिये
प्रेरित कर सकते हैं|
यदि किसी परिवार में दो
भाई होते हैं तो उनमें से बडे भाई को अपने छोटे भाई का सही मार्ग दर्शन करते हुए
उसे आदर्श मानव मूल्योँ का अनुसरण करने के लिए प्रेरित एवं प्रोत्साहित करते रहना
चाहिए| परंतु यदि बडा भाई ही आदर्श जीवन मूल्योँ को ठेस पहूँचते हुए गलत रास्ते
पर चलता है तो उसे सही मार्ग पर लाने के लिए यदि छोटा भाई प्रयत्न करता है और सफल
नहीँ हो पाता तो उसे दंड देने के लिए उसके शत्रु की सहयता करने के लिए छोटा भाई तैयार
हो तो इसमेँ कोई गलत बात नहीँ| रामायण का खालनायक रावण सीता
अपहरण करके आदर्श मानव मूल्यों को ठेस पहूँचता है, उसका छोटा
भाई विभीषण उसे सही मार्ग पर लाने हेतु अत्यंत प्रयास करता है किंतु लंका से
निर्वासित होकर राम के शरण में जाता है और अपने बडे भाई के विरुद्ध संघर्ष करने
हेतु उद्यत होता है तो उसे आदर्श पारिवारिक मूल्य कहने में कोई संकोच नहीं हो सकता| इसी तथ्य को उजागर करने वाला सुधीर निगम कृत ‘धर्मात्मा विभीषण’उपन्यास का एक छोटा सा प्रसंग द्रष्टव्य
है|विभीषण अपने भाई रावण को उसके द्वारा की गयी गलती को
एहसास कराने के उद्देश्य से उससे कहते हैं “राक्षस संस्कृति मेँ स्त्रियोँ के
अपहरण की प्रथा आपने अपने लिए ही डाली है| नाना के कुल में
अपहरण का कोई इतिहास नहीं है| खुलकर आपका विरोध इसलिए नहीँ
किया जाता कि आप राजा हैं, संरक्षक हैँ, किसी के अग्रज हैं, किसी के पिता हैं|... आपने ऋषि, देव, गंधर, यक्ष-कन्याओँ का, विवाहित स्त्रियोँ काअपहरण क्या
इस कारण किया है कि आप राजा होने के नाते अबाध भोग के अधिकारी हैँ| इन अबलाओँ की ‘हाय’ पुंजीभूत
होकर अब सीता के रूप में अशोक वाटिका में बैठी हैँ|”2 विवेच्य
उपन्यास के विभीषणके इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि किसीपरिवार का बडा भाई
आदर्शमूल्यों को ठुकरा कर अनैतिक कार्य करने के लिये उद्यत हों तो उसे कठोर शब्दों
से समझाने में उसके छोटे भाई को संकोच करने की कोई आवश्यकता नहीं|
मनुष्य चाहें कितनी ही
ऊँचाइयों पर पहूँच जाए, परन्तु उसे जन्म देकर तथा पाल-पोस कर शिक्षा-दीक्षा दिलाते हुए बडा करने
वाले माता पिता के प्रति सदैव सम्मान की भावना रहनी चाहिए|
लेकिन वर्तमान युग की युवा पीढी में ऐसी मानसिकता का अभाव दिखाई दे रहा है| इस अभाव को दूर करने के लिये सृजनशील कथाकार ऐसे पात्रों का सृजन कर सकते
है, जो सफलता की बुलंदियाँ छूकर भी अपने अभिभावकोँ को और
उनकी आदतों को सम्मान देते हुए उनका आदार करें| आधुनिक युग
के लोकप्रिय उपन्यासकार सुरेन्द्र वर्मा कृत ‘मुझेचाँदचाहिए’ उपन्यास की नायिका वर्षा वाशिष्ट का चरित्र इस सन्दर्भ में विशेष
उल्लेखनीय है|“‘मुझे चाँद चहिए’ नायिका वर्षा वाशिष्ट शिक्षा और ज्ञान प्राप्ति के साथ अपने व्यक्तित्व
में आधुनिकता और समसामयिकता के अनेकानेक संस्कारों को आत्मसात कर लिया था| फिर भी जब हमें पता चलता है कि वह अपने दद्दा के प्रति उनके विरोध के
बावजूद आदर, श्रद्धा और गौरव के भाव प्रकट करती रहती है तो
अत्यंत आश्चर्य हो जाता है| ऐश्वर्य और कला के क्षेत्र में
सर्वोच्च शिखर पर पहूँचने के पश्चात भी जब उसे (वर्षा वाशिष्ट को) सूचना मिलती है
कि उसके दद्दा उसके यहाँ थोडे दिनों के लिए रहने आ रहे हैँ तो वह अपने घर के सभी
सदस्यों को निर्देश देती है जिन्हें पढकर कोई भी पाठक चकित रह जाता है|”3 वह झल्ली से कहती है “झल्ली, यहाँ से पांडेय जी को
फोन करो| कहना, थोडे-से गंगाजल का
प्रबंध कर दें| फिर दद्दा के सामने अपनी रसोई शुद्ध कर लो| थोडे- से बर्तन दद्दा के लिए अलग निकाल लो| उनका
खाना दोनों जुन तुम और हेमलता बनाना| सुबह शाम मुझे समय
मिलेगा तो मैं हाथ बटाऊँगी| ... हाँ फ्रिज से अंडे और डीप
फ्रीजर से मटन-चिकेन निकालकर चौकीदारोँ को दे दो| हम लोग भी
अब प्याज-लहसुन नहीँ खायेंगे|4प्रस्तुत प्रसंग से
सहृदय पाठकों को यह तथ्य स्पष्त हो जाता है किकिसी परिवार में बुजुर्ग लोगों को
सम्मान की भावना से देखनाएक आदर्श पारिवारिक मूल्य है और किसी भी समाज के प्रत्येक
सदस्यको ऐसे पारिवारिक मुल्यों का अनुसरण करना उस समाज के लिये कल्याण्कारी हो सकता
है|
समरेंद्र नारयण
आर्य
कृत ‘अपने लोग’ उपन्यास में शेखर और सुचित्रा दोनों का दांपत्य
जीवन बडी सुखमय रूप से व्यतीत होता रहता है|वे लोग अपने भावी जीवन को सुखमय ढंग
से व्यतीत करने के उद्देश्य से अपने लिए एक मकाना बनाना चाहते हैँ| इसके लिए पहले वे एक छोटी सी जगह खरीदने का विचार करते हैँ और उन्हें
पचास हजार की जरूरत पडती है| सुचित्रा वह पैसे अपने पिता से
माँगना चाहती है तो शेखर उसे मना कर देता है| परंतु
“सुचित्रा के बार-बार आग्रह से शेखर पत्नी के निर्णय से सहमत हो जाता है तथा
सुचित्रा माँ से कह कर पचास हजार रुपए की पेशकश कर देती है|
उसके परिवार वाले स्वीकार कर लेते है कि अग्रीमेंट होने के बाद पैसे मिल जाएंगे| शोखरबहुत खुश हो जाता है| अब उसके पास पंद्रह हजार
की और जरूरत है जिसके लिए वह अपने घर वालोँ से पेशकशकर लेता है जो वादा के मुतबिक
देते तो है लेकिन जमीन रजिस्ट्री होने से पहले ही वापस ले लेते हैँ| जब शेखरने पाँच हजार रुपए का इंतजाम करके जमीन का अग्रीमेंट करा लेता है
तो तीन महीने बाद सुचित्रा के घर वाले भी पैसे देने से मना कर देते हैँ| इससे शेखर तथा सुमित्रा दोनों को बहुत ही गहरा आघात पहुँचता है|”5प्रस्तुत प्रसंग से हमें यह स्पष्ट हो जाता है कि वर्तमान
पारिवरिक क्षेत्र में सभी लोग पैसे के मामले में स्वार्थी बनते जा रहे हैँ| उनकी यह मानसिकता परिवार में उनके संबंधियों को कितना कष्ट देती है यह
प्रस्तुत उपन्यास में बडे ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है| पारिवारिक मूल्योँ के विघटन से संबंधित यह प्रसंग सहृदय पठकों को बहुत ही
प्रभावित करता है|
प्रचीन मूल्योँ का आचरण आज
भी अनेक परिवारों में देखने को मिलता है|पत्नी पति के समक्ष पूर्ण रूपेना
अपनी बात नहीँ कह पाती|क्योँकि वह अपने अदर्शोँ और मूल्योँ
से बाँदी रहती है|इस तथ्य का विवरण हमें अलका सरावगीकृत
उपन्यास ‘एक ब्रेक के बाद’में
देखने को मिलता है| लेखिका कहती है “वह जानता है कि उसकी
पत्नी उससे कभी भी वह सवाल नहीं पूँछेगी जो हर घडी पूछ्ना चाहती –‘और कितना दु:ख दोगे मुझे?’ या फिर ‘और कितना भटकोगे और मुझे भटकाओगे इस तरह? पत्नी ने
तभी लंबी साँस छोडी और बहुत हल्के से मुस्कुराई, नियति का
स्वीकार| सचमुच, मेरा भारत महान है
क्योंकि यहाँ ऐसी पत्नियाँ मिलती हैँ| भट्ट ने गंभीरता से
सोच|”6ये भारतीय नारी की अपने पति और परिवार के
प्रति सच्चा समर्पन है जो सारी दु:खोँ को अपने अंतरिक मुस्कान से समाधान कर देती
है|
वर्तमान युग में जीवन के
भाग दौड का प्रभाव पारिवारिक रिश्तोँमें अधिक देखने को मिलता है| माता-पिता
अपने बच्चों के प्रति बडे उम्मीद रखते हैँ इसका परिमाण यह हो रहा है कि बच्चे अपने
माता-पिता के सपनों को साकार करने के मार्ग में स्वयं तनावग्रस्त हो जाते हैँ| इसी तथ्य को उजागर करते हुए अलका सरावगी अपने उपन्यास ‘एक ब्रेक के बाद’कहती है “उसे मालूम था कि
पिताजी को वह अपनी बात कभी नहीँ समझा सकता – खासकर इसलिए भी कि पिताजी ने बचपन से
उसे हमेशा हर चीज में फर्स्ट आने के लिए हाँका था और उन्हेँ समझ में नहीं आता था
उनका गोल्ड-मेडलिस्ट बेटा स्कूल कॉलेज में फिसड्डी रहनेवाले लडकोँ से जिंदगी की
दौड में कैसे पीछे रह गया|”7ऐसी पारिवारिक स्थिति
के कारण भविष्य की पीढी वाले बच्चे या तो तनावग्रस्त होते जा रहे हैँ अथवा रास्ता
भटककर अपने परिवार के अन्य सदस्योँ को परेशान कर रहे हैँ|
अत: किसी भी परिवार के माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चोँ को अनावश्यक रूप से
परेशान न करें|
विवाह विच्छेद
आदर्शपारिवारिक मूल्योँ के ह्रास का एक महत्वपूर्ण पहलू माना जा सकता है|नई सदी में
अनेक परिवारों में यह प्रवृत्ति देखने को मिलतीहै|मन्नू
भंडारी कृत ‘आपका बंटी’उपन्यास के लेखन के समय वालेसमाज में यह प्रवृत्ति कुछ कम थी, परन्तु आजकल यह प्रवृत्ति दिन प्रति दिन बढतीही जा रही है और इसका प्रभाव
निस्सन्देह भविष्य की पीढी पर पडेगा| अलका सरावगी अपने उपन्यास ‘कोई बात नहीं’में कहती है“रिचर्ड जैकस्न की किसी बात का रोजी पर कोई असर नहीँ
हुआ था| रिचर्ड जैसे मामूली हैसियत वाले थोडे साँवले से
युरोशियन से विवाह करना उस बिगडे दिलवाली सुंदरी की एक सनक थी, जबकी उसे कोई अच्छा अंग्रेज पति भी मिल सकता था| अब
दो साल के ‘जेजे’ को रिचर्ड के हवालेकर
किड स्ट्रीट के मकान के अलावा अपनी सारी संपत्ति बेच पैसे बटोरकर वह इंग्लैण्ड चली
गई और एक अंग्रेज से विवाह कर ली| पर
रिचर्ड के लिए यह सदमा बर्दाशत करना संभव नहीं हुआ|”8रोजी जैसी प्रवृत्ति वाली महिलाएँ किसी भी समाज के लिए विशेष रूप से
भारतीय समाज के लिए कलंक मानी जा सकती हैं| ये महिलाएँ
पारिवारिक मूल्यों को ठेस पहूँचाती हुई अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए अपने कोक से
जन्म लेनेवाले बच्चों तक को त्याग देती है तो उनका पारिवारिक एवं सामाजिक क्षेत्र
पर कैसा दुष्प्रभाव पड सकता है इसे दिखाने मेँ कथाकार अलका सरावगी को बडी सफलता
मिली है|
निष्कर्षत: कहा जा सकता है
कि वर्तामन पारिवारिक क्षेत्र में कही आदर्श मानव मूल्योँ का अनुकरण करते हुए सुखी
पारिवरिक जीवन व्यतीत करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है तो वैसी प्रवृत्ति का प्रतिबिंब
‘जुलेख’,‘मुझे चाँद चाहिए’,‘धर्मत्मा विभीषण’ जैसे नई सदी के कुछ उपन्यासोँ से प्राप्त होता है|
ऐसे उपन्यासोँ का प्रचलन पारिवारिक क्षेत्र में होने वाले मूल्य ह्रास को
नियंत्रित करके इस क्षेत्र के विविध सदस्योँ को सुखमय जीवन व्यतीत करने की दिशा
में अग्रसरकरते हैँ|‘अपने लोग’,‘कोई
बात नहीँ’,‘एक ब्रेक के बाद’ जैसे
समसामयिक उपन्यासोँ में पारिवारिक मूल्योँके विघटन को दर्शाते हुए इनके कथाकारोँ
ने इनके पाठकोँ को ऐसे मूल्य ह्रास से बचने का संदेश देते हैँ| इन विविध उपन्यासोँ का पठन, पाठन एवं प्रचलन
समसामयिक पारिवारिक जीवन को सुधारने में सहयक होंगे इसमें कोई संदेह नहीँ| वैसे तो नई सदी मेँ अनेक ऐसे उपन्यास लिखे गये जिनमें पारिवारिक क्षेत्र
के आदर्श मानव मूल्योँ के उन्नयन के लिए संबंधित कथाकारों ने उपयुक्त प्रयास किया
है| प्रस्तुत लेख के सीमित कलेवर में ऐसे कुछ उपस्यासोँ के
अंतर्गत चित्रित पारिवारिक मूल्योँ का स्वरूप विवेचन करने का लघु प्रसार किया गया
है|
संदर्भ सूची :-
1. शब्बीर अहमद ‘मंजर’
कुद्दूसी : जुलेखा,माडर्न पब्लिशिंग हाउस,नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-20,
पृष्ठ संख़्या-120
2. सुधीर निगम : धर्मात्मा विभीषण (उपन्यास),ज्ञान ग़ंगा
प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम
संस्करण-2012, पृष्ठ संख़्या-83
3. डॉ एस कृष्ण बाबु : हिन्दी का उपन्यास सहित्य : मिथकीय
चेतना और सामाजिक सरोकार,अमन प्रकाशन,
राम बाग, कानपुर, प्रथम संस्करण-2021, पृष्ठ संख़्या-231
4. सुरेंद्र वर्मा : मुझे चाँद चाहिए (उपन्यास), भारतीय
ज्ञानपीठ प्रकाशन, लोडी रोड, नई दिल्ली, प्रथम ज्ञानपीठ संस्करण-2011, पृष्ठ संख़्या-447
5. डॉ एस कृष्ण बाबु : हिन्दी का उपन्यास सहित्य : मिथकीय
चेतना और सामाजिक सरोकार,अमन प्रकाशन,
राम बाग, कानपुर, प्रथम संस्करण-2021, पृष्ठ संख़्या-258
6. अलका सरावगी : एक ब्रेक के बाद (उपन्यास),राजकमल
प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-
2008,पृष्ठ संख़्या-76
7. अलका सरावगी : एक ब्रेक के बाद (उपन्यास), राजकमल
प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-
2008, पृष्ठ संख़्या-61
8. अलका सरावगी : कोई बात नहीं (उपन्यास), राजकमल
प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-
2004, पृष्ठ संख़्या-80
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