हिंदी साहित्य वैश्विक परिदृश्य
भाव्यमानश्र्वर्व्यमाणोडर्थो नाट्यम”
आचार्य अभिनय गुप्त ने लिखा है
कि नाटक वह दृश्यकाव्य है, जो प्रत्यक्ष, कल्पना एवं अध्यवसाय का विषय बन सत्य और
असत्य से समन्वित विलक्षण रूप धारण करके सर्वसाधारण को आनंदोपलब्धि कराता है |
“सिध्दांतकौमुदी”
के तिडंत प्रकरण में नाट्य की उत्पत्ति इस प्रकार दिया गया है
|
“नट नृतौ | इत्यमेवपूर्वमपि पठितम् तत्रांगविक्षेपः |
पूर्वपठितस्य नाट्यमर्थः | यत्कारिष नटव्यपदेशः |”
इससे पता चलता है कि “नट” धातु का अर्थ गात्रविक्षेपण एवं
अभिनय दोनों ही था |
हिंदी कथा-साहित्थ के
क्षेत्र में प्रवेश करने वाली मृदुला गर्ग आज की एक बहुचर्चित लेखिका है । एक
लेखिका के रूप में अपने को स्थापित करने के लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पडता है ।
मृदुला जी के लेखकीय व्यक्तित्व के निर्माण में उनके परिवार की भूमिका तथा
परिवेशगत संस्कार प्रमुख रहे हैं । पढ़ाई के अलावा अभिनय में विशेष रूचि होने के
कारण लेखिका ने स्कूली दिनों में अनेक नाटकों में अनेक नाटकों में अभिनय करके
पुरस्कार प्राप्त किए और मंच तथा अभिनय के माध्यम से ही , किताबों इतर भी उनका एक जीवन बना । अभिनय और वादविवाद
स्पर्धाओं द्वारा उनका एक सार्वजनिक जीवन निर्मित हुआ । इनकी प्रकाशित रचनाओं में
छः उपन्यास, आठ कहानी-संग्रह तथा तीन नाटक एवं दो काहानी-संग्रह हैं । मृदुला जी न
सिर्फ उपान्यासकार या कहानिकार हैं बल्कि वे उच्चकोटि की चिंतक भी हैं । साथ ही
जागरूक नाटककार भी हैं ।
मृदुलागर्ग पर कुछ विशिष्ट
घटनाओं ने, परिवार ने समाज ने प्रभाव डाला था । इन्होनें मुसिबत में फसें लोगों की
मदद – नाटक करके चंदा इकट्ठा करके की । बच्चों के लिए नाटक कार्यशालाएँ भी करती
रहीं । ये संपूर्ण समाजवाद की चाह रखती हैं । इनके तीन नाटक प्रकाशित हो चुके है ।
"एक और अजनबी” नाटक में इन्होने सामाजिक व पारिवारिक मूल्यों का स्वाभाविक रूप झलकता है
। सामाजिक संगठन में परिवार एक महत्वपूर्ण इकाई है । मानव -
समाज के साथ-साथ परिवारों का रूप भी परिवर्तित हुआ है । “परिवार
इस समूह का नाम है -जिसमें स्त्री-पुरूष का यौन सम्बन्ध
पर्याप्त निश्चित और इनका साथ इतनीदेर तक रहें जिससें संतान उत्पन्न हो जाए और
उसका पालन-पोषण भी किया जाये है ।” - मैकाइवर “सफल गृहणी बनकर अपना परिवार संभालना, पने
पति को सुख-संतोष प्रदान करना और अपनी सन्तान का भविष्य बनाना हर लडकी अपना
कर्तव्य समझती है और सद् गृहणी बनने का
प्रयत्न करती है । वास्तव में नारी का अस्तित्व परिवार में ही बनता है और नारी
जीवन की सफलता उसके परिवार की सफलता से ही मापी जाती है ।” इन्ही
विषयों को बताते हुए मृदुला जी ने अपनी नाटक
“एक और अजनबी” में प्रस्तुत की । इस
नाटक की मूल संवेदना-सदियों से चली आ रही दम तोड़ती हुई परंपराएँ,खोखले रीति-रिवाज
एवं परंपराजन्य संस्कार में घुटते हुए मनुष्य की तड़प की अभिव्यक्ति है साथ ही
लेखिका ने इन नाटकों के माध्यम से पाठकों तक यह भी संदेश पहुँचाया है कि एक तड़पता हुआ व्यक्ति मुक्ति
पाना चाहता है । वह सहज रूप से प्राकृतिक जीवन
जीना चाहता है और जीवन में रंगीन क्षणों को प्राप्त करना चाहता है । नये
रिश्ते बनाना चाहता है ।
“यह नाटक दो अंको में और सात दृश्यों में विभक्त हैं ।” इसे “आकाशवाणी पुरस्कार योजना के अंतर्गत सन् 1977
में पुरस्कार भी मिला ।”मुख्य पात्र इन्दर,शानी ,मणी व
जगमोहन हैं । शानी इन्दर खोसला से टूटकर प्यार करती है, मगर इन्दर पढ़ाई पूरी करने
के लिए विदेश जाना चाहता है और बाद में ही शादी के बारे में सोचना चाहता है । इधर
शानी समाज के बंधनों में बंधी रहती है और इन्दर आने तक परिवार वाले उसका विवाह
जगमोहन नामक व्यक्ति से कर देते हैं । संयोग से कुछ समय बाद इन्दर जगमोहन का बॉस बन
कर आता हैं । शानी का पति अपनी तरक्की चाहता हैं, इसलिए बॉस को घर पर बुला कर खाना
खिलाना चाहता है । मगर शानी डिलीवरी के
लिए मैके में रहती । जगमोहन उसे लिवाने आता है और जब शानी आती है तब इन्दर आता है
। शानी उसे व इन्दर शानी को देखकर आश्चर्य करते हैं । उसी समय जगमोहन किसी गाँव
जाने को कहकर घर से बाहर चला जाता है और घर पर इन्दर और शानी अकेले रह जाते हैं । सामाजिक
व पारिवारिक मूल्यों की भेंट चढ़ जाने के कारण अब शानी असहज एवं भावशून्य रोबोट की
व्यवहार करती है । लेखिका ने कुछ वस्तुएँ प्रतीकात्मक रूप में ली हैं जैसे-“रजाई”। “रजाई” को सुरक्षा व गरमाहट की अभिव्यक्ति दी है इसलिए नाटक के आखिरी में इन्दर
शानी को एक रजाई देते हुए कहता –“यह तुम ले लो, तुमने इसे दो
बार बनवाया । पहले इसमें सिर्फ हम दोआते थे, अब बहुत फैल गई,सारी दुनिया बीच में आ
गई । इनके बीच में मैं आर तुम खो जायेंगे ।” नाटक की भाषा
सीधी होते हुए भी बोठी नही हैं बल्कि तेज धार लिए हुए हैं जो पाठकों के दिलों को
चीर जाती है ।
नाटक की विशेषता के
अन्तर्गत हम यह लिख सकते हैं कि किस तरह एक व्यक्ति सामाजिक व पारिवारिक धर्म और
जिम्मेदारियाँ निभाते-निभाते स्वयं को एक अजनबी के रूप में ढाल लेता है । जैसा कि
शानी ने किया है । इस प्रकार मृदुला जी सामाजिक व्यवहार की बलिवेदी पर चढ़ाये गये कुछ लोगों की हृदयस्पर्शी काहनी “एक और अजनबी”
नाटक में दर्शाया है ।
“सब कलाएँ
जीवन का अनुकरण है । मानव शैशवावस्था से ही अनुकरण प्रिय होता है । सबका अनुकरण कर
अभिनय के द्वारा अपने को श्रेष्ट बताने की चेष्टा करता ।” अरस्तु
संदर्भ सहित ग्रंथ:
1.विष्णु प्रभाकर के नाटकों की चेतनाभूमि -नम्मि
अप्पल नायुडु ,पृष्ट सं-15
2.विष्णु प्रभाकर के नाटकों की चेतनाभूमि –नम्मि अप्पल नायुडु,पृष्ट सं-16
3.साठोत्तरी लेखिकाओं की कहानियों में परिवार-डॉ.भारती शेल्के,पृष्ट सं-16
4.मृदुला गर्ग के साहित्य में चित्रित समाज-किरणबाला
जाजू(मुंदडा),पृष्ट सं-36
5. विष्णु
प्रभाकर के नाटकों की चेतनाभूमि -नम्मि अप्पल नायुडु,पृष्ट सं-26
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