Tuesday, March 22

नरेश मेहता के खंड काव्य प्रार्थना पुरुष - डा एम राज्यलक्ष्मी (साहित्य संगम)

साहित्य संगम


नरेश मेहता के खंड काव्य प्रार्थना पुरुष
            डा एम राज्यलक्ष्मी



    हिंदी साहित्य में नरेश मेहता की शैली उत्तम श्रेणी में स्थित है। यह नवीन भारतीय साहित्य के उच्चतम कवि कथाकार एवं विचारक हैं ।उनके जन्म के समय जो परिस्थितियां थी वह बहुत कठिन थी।इन परिस्थितियों में भी उनका व्यक्तित्व उन्नत रूप से उभर कर आया है। नरेश मेहता मितभाषी, मालवा की मिट्टी की तरह ही स्नेह के जल से पिघलने वाले और सूखे पन से तड़पने वाले अत्यंत सज्जन, विवादों से परे ,शांत ,गंभीर साधारण भीड़ से दूर रहने वाले ,एक सांस्कृतिक संदर्भ में जीने वाले स्थितप्रज्ञ ,अविचल और स्वाभिमानी व्यक्ति हैं ।उनकी रचना शैली से नरेश जी के व्यक्तित्व को देखा जा सकता है।

    प्रार्थना पुरुष खंडकाव्य गांधी जी की जीवन गाथा पर लिखी गई यह कृति इतिवृत्तात्मक लघु कृति है। गांधीजी अपना लक्ष्य साधना अपना आयुध के द्वारा प्राप्त करने का प्रयत्न किए। सामाजिक विषमताओं को भी सत्याग्रह और अहिंसा के द्वारा दूर करने का प्रयत्न किए। आज भी समाज में गांधी जी के द्वारा सूचित सत्य और अहिंसा विश्व कल्याण के लिए सर्वोपरि है।
    मेरी मान्यता है कि महापुरुष व्यक्ति नहीं हुआ करते, वे तो संस्कृति होते हैं। ऐसे पुरुष देश पर काल चलाते हैं। देश, सीमा को ही वाहन कर सकता है, असीम को नहीं, इसीलिए इतिहास दृष्टि से इन्हें खंडित रूप में ही देखा जा सकता है। कल तक गांधी हमारे साथ इतिहास में चल रहे थे, और आज हमारी स्मृति हैं। कुछ काल बाद यह स्मृति ही श्रुति बन जाएगी, आ रहा था वह श्रुति को मृतक बनने क्या देर लगेगी। यह मिथक काव्य ही समग्रता है। गांधी मिथक निश्चित ही बनेंगेऔर तब उनका दैनंदिन कार्य व्यापार, नगण्य को विराट बना देने की प्रतिभा, घटना, इतिहास और प्रतीक के छोटे-छोटे क्षितिजों को लांग कर मात्र लीला बन जाएंगे। काल की आबादता और अगाधता में अहोरात्र संपन्न होने वाला केवल _ उत्सव।। जिस प्रकार राम,कृष्ण,बुद्ध और ईशा प्रत्येक क्षण संवत्सर बनकर मनुष्य मात्र में घटित होते हैं। उसी प्रकार गांधी भी घटित होंगे ।
    नरेश मेहता जी इस काव्य में गांधीजी के जन्म के समय सामाजिक परिस्थितियों का वर्णन करते हुए कहते हैं
थी मध्य युग की जड़ता
अब भी जीवन में फैली
ये जाती पांती के झगड़े
और छुआछूत थी फैली।
वे जमींदार और राजा
छोटे मोटे रजवाड़े
उस पर अंग्रेजी शासन
सब थे मानव के आड़े।
    इन परिस्थितियों के बीच गुजरात में अक्टूबर सन १८६९ में जन्म हुआ। ऐसा लगता था कि इनके  जन्म के साथ ही धरती पर वैष्णवता उतारी हो। उस समय किसने भी नहीं सोचता जिस शिशु के पैरों के चिह्न रेत पर पड़ेंगे वहीं युग का इतिहास बनेगा
प्रतिदिन जो शिशु पैरों से
बालू पर चिह्न पड़ेंगे,
तब किसे पता था ये ही
युग का इतिहास बनेंगे।
    वे अपने हरिजन मित्रों के साथ ही दिन रात खेला करते थे। एकदिन  अपने मां के द्वारा दी गई मिठाई अपने मित्र को दे देता है, उस पर मां बहुत बिगड़ती है। उस मिठाई को लेने के लिए भी उसका मित्र संकोच कर रहा था, क्योंकि वह हरिजन था। वह बालक सोचता है मानव मानव के बीच में यह दूरी क्यों? जबकि ईश्वर का निवास तो पवित्र मन पर ही होता है।
    गांधीजी को बाल्यकाल से ही माता-पिता के प्रति भक्ति भावना घर कर गई थी। यह भावना उन्हें श्रवण कुमार की कथा को पढ़कर और सत्यवादी हरिश्चंद्र की कथा को पढ़कर उनके मन में करुणा का भाव जागृत हो उठा। बाल्यकाल में ही उनका विवाह हो गया था। उनका शरीर दुर्बल था। उन्हें मित्र ने सलाह दी कि मांस सेवन से शरीर हृष्ट पुष्ट होता है।
संस्कार प्रबल वैष्णव थे
पर परामर्श का लालच
सच कितना नैसर्गिक है
यह महा पतन का लालच।
    गांधीजी इस प्रकार इतना गिर गए कि वह मांस सेवन के साथ साथ बीड़ी पीना साथ ही पैसों की छोरी भी करने लगे थे। परंतु यह सारी घटना अपने पिता के अवगत करा दिए। तब जाकर कहीं उन्हें संतोष हुआ। अब पिता ही उनके सबसे प्रिय और आदर्श थे। बीमार पिता की सेवा करना ही उनके जीवन का व्रत था। यही उनके जीवन का प्रभात था
    गांधीजी शिक्षा ग्रहण करने के लिए जब विलायत जा रहे थे तब उनकी मां ने मांस और मदिरा ना खाने का मन से वचन ले लिया था। वह वहां की वेशभूषा को तो अपना लिए थे परंतु वहां की संस्कृति को नहीं अपना सके। क्योंकि वह समझ चुके थे कि वह अंग्रेज नहीं एक भारतीय हैं।
    वे बैरिस्टर बनके ऐसे ही भारत लौटे वैसे ही मां की मृत्यु का समाचार सुनकर दुखी हो जाते हैं। वे देश की  प्रशासनिक स्थितियों से न्याय नहीं कर पा रहे थे। उसी दक्षिण अफ्रीका से कानूनी काम के लिए बुलावा आया और वे चल पड़े।
    पहले दिन ही डरबन के न्यायालय में गांधी को अपमानित होना पड़ा। क्योंकि उनके पगड़ी पर उठाया गया आपत्ति पर वे क्रोधित हुए। इस घटना को गांधी ने पत्रों में लिखा कर छपवा दिए। यही नहीं बल्कि उनको कुली कहकर भी अपमानित किया। अफ्रीका में उन्हें पग पग पर अपमानित होना पड़ा। वहां रात में घर से निकलना भी वर्जित था। वे अपने अधिकारों के लिए निरंतर लड़ते रहे। इनकी अधिकारों की वाणी लंदन तक पहुंच चुकी। उनके संघर्ष की कहानी सुनकर भारत जाग गया। गांधी जी ने अपने जीवन में सारे सुख सुविधाओं को त्याग कर अनुशासित जीवन को अपना लिए। वह सभी कार्य अपने ही हाथों से करते थे।
    गांधीजी का मन भारत का राजनीतिक परिस्थितियों एवं नेताओं के गतिविधियों को देखकर दुख से भर गया। जब मैं मुंबई में वकालत कर रहे थे तभी वे  नेटाल चले गए। वहां पर भी रंग नीति की वही नीति थी। कुछ दिन जोहेनसबर्ग में रहने का निश्चय कर लेते हैं।
    पोलक से भेंट और रस्किन की पुस्तक गांधी जीवन दर्शन की आधार थी। गांधीजी ने वकालत का पेशा छोड़कर आजीवन सेवा का व्रत ले लिया। गांधीजी स्वनिर्मित अनुशासन पर चलने लगे। नंगे पांव चलना, एक श्रमिक की वेशभूषा और एक बार ही भोजन करते थे।
स्वयं लगाए गांधीजी ने 
अपने पर अनुशासन 
नंगे पांव श्रमिक की भूषा
 एक बार का भोजन।
    21 वर्ष अफ्रीका में रहने के पश्चात प्रथम विश्व युद्ध के बाद स्वदेश लौटने पर उनका भव्य स्वागत किया गया। सत्याग्रह आश्रम की शुरुआत से तकलीफ से सूत काटने का उद्योग, आश्रम जीवन व्यतीत करने लगे। एक हरिजन को भी आश्रम रहने की अनुमति दे दी। उनसे असहमति प्रकट करने पर भी वे विचलित नहीं हुए क्योंकि शासक और शोषक दोनों अंग्रेज थे। इसीलिए उन से विनती करना भी व्यर्थ था। वे सरदार पटेल को साथ लेकर घर घर पहुंचे। अंग्रेज ने रौलट एक्ट का प्रसार किया तो शशक के सामने देश जाग उठा।
    असहयोग आंदोलन दांडी कूच बारह मार्च के बाद घोषणा हुई कि यह नमक कानून टूटेगा। ब्रिटिश राज्य टूटेगा ।पूरी दुनिया दंडी यात्रा खेल देख रही थी। बापू ने वयक्तिक सत्याग्रह को ही अपना हथियार बनाया और गांधी के आह्वान पर तीस हजार भारतीय जेल गए सन बयालीस  का आंदोलन स्वाधीन बनने का आश्वासन लेकर आया। अगस्त मुंबई के अधिवेशन में भारत छोड़ो आंदोलन गूंज उठा। उस समय का यह नारा था कि करो या मरो। भारत छोड़ो, यह हिंदुस्तान हमारा है यह गांधी की ही वाणी है।
और अधिक अब नहीं चलेगा
यह गोरों का शासन 
भारत छोड़ो के नारों से 
गूंज उठा अधिवेशन।
करो या मरो देशवासियों
 यह समय का नारा 
अंग्रेजों भारत छोड़ो
 हिंदुस्तान हमारा।
    गांधीजी अपनी मान्यताओं पर इस तरह से अड़े रहे कि उन पर कभी कोई समझौता नहीं किया।
    
    इस प्रकार नरेश मेहता ने पौराणिक कथाओं पर आधारित काव्य के अतिरिक्त युग की संभावनाओं को साकार करने वाले एक दिव्य पुरुष की कथा को उजागर किया है।

डा एम राज्यलक्ष्मी

हिंदी अध्यापिका

9885-642-642

-------------------------------------------------------------------------------------

If you like this Writing and want to read more... Then Follow Us
or call
9849250784
for Printed Book
साहित्य संगम
Editor
Prasadarao Jami

-----------------------------------------------------------------------------------------------------


scan to see on youtube



scan to join on WhatsApp




BOOK PUBLISHED BY :

GEETA PRAKASHAN

INDIA

Cell 98492 50784

geetaprakashan7@gmail.com

---------------------------------------------------------------------------------

do you want to publish your writing through our BLOGPAGE ?

Please call us 62818 22363

No comments:

Post a Comment

हमर छत्तीसगढ़ - मुकेश कुमार भारद्वाज (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "उथल पुथल - अक्षरों की")

(Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "उथल पुथल - अक्षरों की")      हमर छत्तीसगढ़  💐..................................💐 छत्त...