हिंदी साहित्य वैश्विक परिदृश्य
हिंदी जगत में नई कविताओं की सूजन भूमि पर उत्तम शैली अपनाए गए कविताओं में नरेश जी का स्थान उच्च है। यह आधुनिक भारतीय साहित्य के शीर्षस्थ कवि कथाकार एवं विचारक हैं। नरेश मेहता मितभाषी ,मालवा की मिट्टी की तरह ही स्नेह के जल से पिघलने वाले और सूखे पन से धड़कने वाले ,अत्यंत सज्जन ,विवादों से परे शांत गंभीर ,साधारण भीड़ से दूर रहने वाले एक सांस्कृतिक संदर्भ में जीने वाले स्थितप्रज्ञ, अविचल और स्वाभिमानी व्यक्ति है। उनके काव्य और लेखन में भी उनके सांस्कृतिक व्यक्तित्व की छाप दिखाई देती है।
नरेश मेहता ने अपने काव्य यात्रा में मिथकीय खंडकाव्य के लिए रामायण और महाभारत के कथा और उत्तम को आधार बनाता है। संशय की एक रात, महाप्रस्थान, प्रभात पर्व तथा शबरी प्रबंध काव्य रामायण और महाभारत पर आधारित है। कभी नहीं रामायण और महाभारत समय के अंशों को समकालीन समस्याओं से जोड़ते हुए काव्य की सृष्टि की है। नरेश जी की रचनाएं परंपरा को साथ लेकर समा कालीन से जुड़ती हैं और अनेक शाश्वत और सनातन मूल्य प्रस्तुत करती हैं। व्यष्टि और समिष्टि हित की कामना मानुष के जीवन को परिष्कृत और विकसित करने का प्रयास करती है। युद्ध और राज्य व्यवस्था मानव समाज में मानव जीवन के ऐसे ज्वलंत प्रश्न हैं जिन से मनुष्य कभी पीछा नहीं छुड़ा पाया है। संशय की एक रात और महाप्रस्थान इन्हीं दो समस्याओं से जूझते हैं।संशय की एक रात में कवि ने राम के माध्यम से मानव की समशयात्मक दशा को उजागर किया है। इसमें एक कवि ने राजा का मन स्थिति और लोकतंत्र को आधार बनाया है। राम के सशायीरूप में युद्ध की अनिवार्यता को निरूपित किया है। कवि ने राम के व्यक्तित्व को आधुनिक मानव के परिस्थिति के सांचे में डाला है। उनका राम आधुनिक मानव की तरह अनेक शंकाओं एवं समस्याओं से घिरा एक आधुनिक व्यक्ति जो स्वयं को जन विनाश का कारण नहीं बनना चाहता। जिस प्रकार आधुनिक मानव अनेक समस्याओं में डूबकर समाधान के लिए प्रयास करता रहता है। उसी प्रकार राम भी अपना जो द्वंद्वात्मक समस्या से चिंतित होता है। राम के माध्यम से आज की समस्याओं को उठाया गया है।
संशय की एक रात रामायण आधारित नाट्य शैली में लिखा गया एक अधुनातन खंडकाव्य है। कवि ने पौराणिक आख्यान के सहारे समा कालीन परिवेश में आधुनिक बोध को स्पष्ट किया है। नरेश मेहता राम को आधुनिक प्रज्ञा का प्रतिनिधित्व प्रदान करते हुए कहते हैं _ राम आधुनिक प्रज्ञा का प्रतिनिधित्व करते हैं। युद्ध आज की प्रमुख समस्या है। संभवत है सभी युग की। इस विभीषिका को सामाजिक एवं वयक्तिक धरातल पर सभी युगों में भोगा जाता रहा है और इसीलिए राम को भी ऐसी ही एकत्र देकर प्रश्न उठाए गए। जिस प्रकार कुछ प्रश्न सनातन होते हैं उसी प्रकार कुछ प्रज्ञा पुरुष सनातन प्रतीक होते हैं। राम ऐसे ही प्रज्ञा प्रतीक हैं।
इस खंड काव्य में कवि ने राम को एक नई दृष्टि से उभारा है। जिसमें राम भारतीय संस्कृति के मेरुदंड बन चुके हैं। कवि के समक्ष एक नई चिंता के रूप में अवतरित होते हैं। राम की शक्ति पूजा में निराला जी में राम को संशय ग्रस्त दिखाया है, परंतु उनका संशय भिन्न प्रकार है। वहां राम अपने पराजय को लेकर चिंतित है किंतु संशय की एक रात के राम का संशय अलग है, वह युद्ध करें या ना करें के द्वंद से ग्रस्त है।
नरेश मेहता ने संशय की एक रात की भूमिका में कहा है कि" जिस प्रकार कुछ प्रश्न सनातन होते हैं उसी प्रकार कुछ प्रगनापुर श्री सनातन प्रतीक होते हैं" राम ऐसे ही प्रज्ञा प्रतीक हैं जिसके माध्यम से प्रत्येक युग की अपनी समस्याओं को सुलझाता रहा है।"
इस खंड काव्य में चार सर्ग है। प्रधाम सर्ग में राम अनिश्चित स्थिति में सोचते है की युद्ध हो या नहीं। राम सीता को वापस लाना अपना व्यक्तिगत विषय समझता है। इस कारण युद्ध करने से प्रजा का नष्ट शांति का नष्ट होना नहीं चाहता। प्रथम सर्ग में बालू तट पर कभी उदास रहते हैं कभी बैठ जाते हैं। वे सोचते हैं क्यों गए स्वर्ण मृग के पीछे ? क्यों हुई ऐसी परिस्थिति! क्या सोच रहे होंगे जनक जी, बंधु मित्र, पुरवासी सब?
जानते भी क्यों गए हम
स्वर्ण मृग हित!
क्यों गए पथ भूल ?
उस वंचक के पदों में
सर्प बंद सौमित्र रेखा
क्यों नहीं लिपटी ?
यह परिताप
यह अनुताप
अनुखान सालता है।
क्या सोचते होंगे जनक ज्यो?
बंधु बांधव और
पुरवासी क्या कह रहे होंगे?
राम के मन में अनेक प्रश्न है कि क्या सभी संधियों और युद्ध से मानव अपनी नियति को साकार कर सकता है? उनकी मन युद्ध और युद्ध के लिए उत्तरदाई परिस्थितियों तथा युद्ध के परिणाम के विषय में द्वंद्व से गिरे हुए हैं। राम युद्ध नहीं चाहते लेकिन संधि के सारे प्रयत्न विफल हो चुके हैं क्योंकि रावण के यहां सभी शांतिदूत लौट आए हैं। वह परीतप्त हैं जिसके कारण सीता का वियोग उन्हें सहना पड़ा।
ओह सूर्यास्त हमें आलोक दो !!
प्रति बार
रावण द्वार से
शांति के सब दूत
लौट हार
सौ बार ।
इस तरह की हृदय से बालू के तट पर टहलते समय लक्ष्मण प्रवेश करते हैं। राम को इस प्रकार के अनिश्चित संशय तथा अनास्ता के पक्ष में होते देखकर अनुज होकर भी लक्ष्मण कहते हैं_
"मानव कितना भी लागू क्यों ना हो वह सार्थक है अपना अस्तित्व सुरक्षित रखने में उसकी सार्थकता है"वाह दृढ़ निश्चय से कहते हैं अगर रामाज्ञा दें तो अकेले ही लंका पर आक्रमण कर अपने पुरुषार्थ से सीता जी को वापस ला सकते हैं। वे राम के माथे पर चिंता की रेखा नहीं देख सकते हैं।
आप रुके रामेश्वर
जाएगा लक्ष्मण ले अभियान
यदि नितांत एकाकी भी जान पड़े
जाऊंगा
बंधु जाऊंगा
सीता को लाऊंगा
अपने पुरुषार्थ से।
राम मन में युद्ध के बाद होने वाले परिणामों को सोच कर युद्ध ना करने का संकल्प कर लेते हैं। वह अपने व्यक्तिगत कारणों से युद्ध का कारण नहीं बन सकते। इस तरह की स्थिति के साथ संशय की एक रात का प्रथम सर्ग समाप्त होता है। द्वितीय सर्ग में राम फिर युद्ध विषयक सोच में लीन है ।राम को मीनार के पीछे एक छाया घूमती दिखाई देती है और उसके साथ में एक पक्षी फड़ फड़ आता हुआ दिखाई देता है। दोनों छाया है राम को एकांत में ले जाकर अपना परिचय देती है कि वह दशरथ और जटायु की आत्माएं हैं। दशरथ जी छाया राम के उदय में उत्पन्न संशय का निराकरण करती हुई कहती है
कीर्ति, यश, नारी, धरा,
जय,लक्ष्मी
ये नहीं है कृपा
या अनुदान ।
मेरे पुत्र
भिक्षा से नहीं
वर्चस्व से
अर्जित हुए हैं आज तक।
राम को इस संकट स्थिति में यह छायाये युद्ध करने की प्रेरणा देती हैं। राम युद्ध नहीं चाहते वह अनेक संवादों के बाद युद्ध करने के लिए तत्पर हो जाते हैं क्योंकि उनका संशय व्यक्तित्व जब यह सुनाता है
तुम्हें लड़ना युद्ध
अपने से नहीं
अनास्ता से नहीं
समशायी व्यक्तित्व से भी नहीं
केवल
असत्य से।
तृतीय सर्ग में जब लक्ष्मण हनुमान विभीषण तथा जामवंत युद्ध करने के लिए अपने अपने विचार व्यक्त करते हैं तब युद्ध की निश्चिंतता का संकेत मिल जाता है। राम युद्ध को अनिवार्य रूप से स्वीकार कर लेते हैं किंतु उन्हें चिंता इस बात की भी है कि युद्ध के बाद भी क्या शांति स्थापित हो सकेगी? संपूर्ण काव्य का यही कथानक है।
चतुर्थ सर्ग में प्रभात होते ही राम युद्ध संबंधी सामूहिक निर्णय को स्वीकार कर लेते हैं और उनका समस्यात्मक स्थिति यह कह उठता है कि बड़े ही विवश भाव से हमने युद्ध के निर्णय को स्वीकार किया है
ओ मेरे विवेक
मुझसे प्रश्न मत करो
अब मैं केवल प्रतीक्षा हूं
प्रतिष्रुति युद्ध हूं
निर्णय हूं सबका
सबके लिए।
वस्तुतः राम काव्य में यह सूक्ष्म संदर्भ घटना हीन ही था किंतु कवि ने इसको जिस मनोवैज्ञानिकता और आधुनिक बोधवत्ता के साथ प्रस्तुत किया है उससे स्पर्शत होकर यह प्रसंग महत्वपूर्ण बन गया है। यह स्वयं कवि ने भी स्वीकार किया है "अपने विशेष प्रयोजन के लिए ही राम कथा का मैंने वह स्थल चुना जो घटना हीन था किंतु मेरी रचना संभावना के लिए उर्वर था । राम जिस द्विविधत्व को प्रस्तुत करते हैं उसके लिए वही उपयुक्त स्थल था।"
डा एम राज्यलक्ष्मी
हिंदी अध्यापिका
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