Sunday, March 20

वीरेन्द्र जैन के उपन्यासों में मानवीय संबंध - शेख ॰ शाहीना बेगम (हिंदी साहित्य वैश्विक परिदृश्य)

हिंदी साहित्य वैश्विक परिदृश्य




वीरेन्द्र जैन के उपन्यासों में  मानवीय संबंध

                                                                                                     शेख ॰ शाहीना बेगम 


    हिन्दी साहित्य संसार में पिछले चार दशकों से जिन  रचनाकारों ने उल्लेखनीय कार्य किया है उनमें ' विरेन्द्र जैन ' का योगदान महत्वपूर्ण है । साहित्य के माध्यम से समस्त जन-मानस को परख ने की दृष्टि वीरेंद्र जैन  में है । उन्होंने अपनी कलम से साहित्य को नई भाषा  प्रदान की  है ।हिंदी उपन्यास साहित्य में नई पीढ़ी के उपन्यासकारों में उनका योगदान उल्लेखनीय है । अपनी लेखनी की विशिष्टता के कारण उन्होंने यह स्थान अपने बलबूते पर पाया । बहुमुखी , बहुआयामी प्रतिभा के धनी वीरेंद्र जैन प्रयोगधर्मी रचनाकार हैं । उनका रचना संसार बहुआयामी है । उनकी रचनाओं में अधितर जीवनानुभव दृष्टिगोचर होते हैं । उनके विचार संघर्षशील मानव के विचार हैं । वे अपने भोगे हुए बुरे दिनों को भी नहीं भूले हैं । अपने जीवन में उन्होंने जो देखा , उसे ही अपनी कलम चलाते हुए बयान किया समकालीन जीवन में जो कुछ बदलाव आ रहे हैं , उसे भी उन्होंने ठीक तरह से अंकित किया है ।

                 व्यक्ति समाज का एक पहलू या इकाई है । व्यक्ति की परिपूर्णता उसके सामाजिक संबंधों पर निर्भर करती है इसलिए समाज में व्यक्ति का किसी न किसी से संबंध अनिवार्य है । यह संबंध स्थूल एवं सूक्ष्म रूप में हो सकता है । व्यक्ति किसी का पति हो सकता है , बेटा , भाई अन्य सामाजिक संबंधों का कोई पहलू हो सकता है । इसी प्रकार स्त्री भी किसी की माँ , किसी की पत्नी , बेटी , बहू या प्रेमिका हो सकती है अर्थात समाज में संबंधों का अपना एक अलग अस्तित्व तथा पहचान है ।

    व्यक्ति , मानव सामाजिक प्राणी है । समाज में अपने ही जैसे अन्य मनुष्यों का साथ संबंध बनाने पर ही मानव जीवन व्यतीत कर सकता है । समाज का निर्माण , विकास , अस्तित्व मानवीय संबंधों पर आधारित रहती है । समाज मानवों का समूह है । जिस में वे एक दूसरे के साथ समन्वय , सहयोग , संपर्क भाव के साथ आवश्यकता होती हैं ।

    बढ़ती जनसमस्याएँ , आर्थिक समस्याएँ , स्वार्थ , ईर्ष्या , आदि ने मानव से भारत के ' शुभ्रतम अंशों को नष्ट कर दिया । मानव एक दूसरे के शत्रु बन गये हैं । वह क्रूर हिंसक और अमानुषिय बनता जा रहा है । वर्ग वैषम्य के जाल में फंसकर , साथी मनुष्य से  घृणा कर रहा है । आर्थाभाव से बदलती जीवन शैली से , उस के पास अपने अलग मनुष्य से संबंध बनाने का समय तक नहीं रह रहा । फलतः मानवीय संबंधों का विघटन हो रहा है । विडंबना इसी बात की है कि मनुष्य अपने परिवार के सदस्यों से दूरियाँ बढ़ा रहा है । माता- पिता , पति- पत्नी , भाई -बहन अन्य सगे संबंधियों का अलगाव हो रहा है । संयुक्त परिवार बिखरकर एकल परिवार बन रहे हैं । परिवार ही थे विघटन , समाज को विकृत दिशा की ओर लेकर जा रहे हैं । स्पष्ट है कि मानवीय संबंधों के विघटन से मानव स्वयं के विकास -दशा , दिशा को जान नहीं पा रहा है । "

    पति-पत्नी का संबंध -वीरेंद्र जैन ने अपने उपन्यास - साहित्य में पति - पत्नी सम्बन्धों को वर्तमान संदर्भ में प्रस्तुत किया है । पति पत्नी आपस में मिल - जुलकर रहें , इससे परिवार में शांति बनी रहती है । पति पत्नी के इर्द गिर्द ही सारे सम्बन्धों का ताना बाना अवलम्बित रहता है । पति पत्नी को हमेशा एक दूसरे की भावनाओं की कद्र करना लाजिमी है । ' प्रतिदान ' उपन्यास में लेखक ने ऐसे पति पत्नी का चित्रण किया है , जो एक - दूसरे की इच्छाओं एवं भावनाओं को समझते हुए सुखी दाम्पत्य जीवन का निर्वाह करते हैं ।

    नरेन ने प्रभा से विवाह बिना दहेज से किया था । नरेन के इस फैसले का परिवार के लोग एवं मित्र विरोध करते हैं । नरेन के पिता विवाह का खर्च देने से मना कर देते हैं । प्रभा को अपनी सास अम्मा के माध्यम से जब इस बात का पता चलता है तो उसके मन में नरेन के लिए सम्मान और भी बढ़ जाता है ,   " इसके बाद तो जैसे नरेन के प्रति नए सिरे से उसमें सम्मान की भावना जाग उठी इसी से उसने कुछ ऐसे कठोर निर्णय भी लिए जिन्हें निभाकर मानो वह नरेन को उसके किए का प्रतिदान दे सकेगी , " 1 एक- दूसरे के प्रति त्याग की भावना रिश्तों में और ज्यादा मजबूती और गहराई प्रदान करती है । प्रभा उपनी साज - सज्जा एवं माँ बनने की अपनी इच्छा का त्याग कर पति का साथ देती है । प्रभा अपने देवर मनीष और ननद प्रगल्भा की खातिर माँ बनने की अपनी इच्छा पति नरेन के सहयोग एवं सामंजस्य से त्याग देती है । वह तब तक गर्भ निरोधक सामग्री का इस्तेमाल करना चाहती है , जब तक उनकी आर्थिक स्थिति ठीक न हो जाए । प्रभा नरेन से कहती है , " हाँ , इनकी जरूरत होगी हमें , तब तक , जब तक मनीष अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो जाता और प्रगल्भा की डोली हम अपने घर से विदा नहीं कर देते । " भाभी अपने देवर और ननद को बच्चों की तरह मानती है । पति के परिवार के सदस्य को अपनाकर और अतिरिक्त स्नेह के कारण प्रभा पति नरेन के मन में एक विशेष स्थान रखती है ।

    माता-पिता एवं संतान संबंध-वीरेंद्र जैन के ' डूब ' उपन्यास के अँधेरे कक्का को उनके बेटे गाँव में अकेला छोड़कर शहर बस जाते हैं । पिताजी द्वारा किए गए पवक्- घोषण को , उन्हें बड़ा बनाते समय ली गई मेहनत को भूल जाते हैं । इस पर लेखक की प्रतिक्रिया देखिए - " उस अधसच्चे का बाकी आधा सच ही उजागर नहीं खहुआ , अँधेरे कक्का के सामने तो जग के रिश्ते भी उजागर हो गए , आँखें जाते ही अँधरे कक्का ने कि कैसे उनकी घरवाली , यहाँ तक कि अपने शरीर के अंग बच्चे भी उन्हें अकेला छोड़कर जा बैठे ननिहाल में । यहाँ अँधेरे कक्का रह गए  अकेले । "  अँधेरे कक्का को उनकी पत्नी भी अकेला छोड़कर चली जाती है । अँधरे कक्का जो भी कुछ मिले उससे अपना जीवनयापन करते हैं ।

    नारी के नाना रूपों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण एवं गौरवशाली रूप माता का है । वेदों में भी माँ को पृथ्वी स्वरूप कहा गया है , पृथ्वी के समान ही वह सन्तान को धारण करती है और आजीवन धैर्य एवं सहिष्णुता के साथ संतान के सुख की कामना करती है ।

    वीरेन्द्र जैन ने ' डूब ' उपन्यास में गोराबाई और रामदुलारे के माध्यम से माँ और पुत्र के मधुर सम्बन्धों को वर्णित किया है । गोराबाई अपने पुत्र रामदुलारे को पढ़ाने के लिए कड़ी मेहनत करती है । विषम आर्थिक परिस्थितियों में भी वह अपने पुत्र रामदुलारे को पढ़ा - लिखाकर विद्वान बनाना चाहती   है । गोराबाई रामदुलारे की सगी माँ नहीं है , गोराबाई ने रामदुलारे को गोद लिया है , परन्तु रामदुलारे उसे सगी माँ समझता है और उसके त्याग , प्रेम एवं बलिदान के सम्बन्ध में कहता है , " नहीं ' , धाय माँ नहीं , मेरी सगी  माँ है वह सोचता था रामदुलारे । सगी न होती तो मेरे सुख - दुख का इतनाख्याल क्यों रखती । मेरी फिकर में इतनी फिक्रमंद क्यों रहती । मेरे गीले किए बिस्तर पर खुद क्यों सोती । मुझे पढ़ा- लिखाकर इतना गुनी विद्वान बनाने के बारे में क्यों सोचती । मेरी परवरिश के लिए अपने हाङ क्यों गलाती । " इस प्रकार कह सकते हैं कि पुत्र के उज्ज्वल  भविष्य की कामना माँ सदैव करती है । विषय परिस्थितियों में भी वह अपने पुत्र पर आँच भी नहीं आने देती ।

    " गैल और गन " उपन्यास के लम्बरदार और उनके बेटे आज्ञा प्रसाद के माध्यम से लेखक ने पिता- पुत्र के सम्बन्धों का यथार्थ चित्रण किया है । पिता को अपने पुत्र के गलत कार्यों की जानकारी हो तो उसे रात दिन यही चिन्ता रहती है कि कहीं उनका पुत्र फंस न जाए । लेखक ने लम्बरदार को पुत्र की चिन्त में लीन दिखाया है । लम्बरदार को इस बात का पता है कि उनका पुत्र जो विजिलेंस विभाग में कार्यरत है रिश्वत लेता है । इसी कारण लम्बरदार को सदैव उसकी चिन्ता लगी रहती है , " लम्बरदार सपने में भी अपने इकलौते बेटे की हेटी अपनी आँखों के आगे होना गवारा नहीं कर सकते थे । लिहाजा कुछ दिन उसके घर में टिककर , उसकी खुशफहमियों को हवा देकर गाँव लौट आया करते थे । लम्बरदार जितने भी दिन  शहर में रहते थे ,ईश्वर से यह प्रार्थना करना नहीं भूलते थे कि इस बीच आज्ञा पर कोई विपत्ति न आन पड़े जो न तो उनसे देखे बने औन न सहते । " वर्तमान समय में रिश्ते इतने बदल गए हैं कि पुत्र को सही राह में लाने की बात नहीं रही है । पुत्र किसी भी तरीके से धन कमाएँ , परन्तु वह पकड़ा नहीं जाना चाहिए ।

    भाई-बहन का संबंध-वीरेंद्र जैन के पंचनामा ' उपन्यास में ग्रामीण परिवेश में स्थित भाई - बहन के सम्बन्ध का चित्रण मिलता है । उपन्यास पात्र प्रदीप की बहन मृणालिनी को एक दिन आश्रम के प्रधान मंत्री के घर से बुलावा आता है । वह अधीक्षिका के आदेश पर प्रधानमंत्री के घर जाती है । उस समय वहाँ पर उनके बेटे के सिवा कोई नहीं रहता है । उसके अकेले में मृणालिनी से मिलने के लिए मृणालिनी को बुलावा भेजा था । मुणालिनी उसके इरादों को भाँप लेती है । मुणालिनी उसे चकमा देकर वहाँ से भाग कर भाई प्रदीप के पास पहुँचती है । वह पूरी हकीकत उसे बताती है । प्रदीप अपनी बहन को छात्रावास के लड़कों के भरोसे छोड़कर  प्रधानमंत्री के घर जाता है । प्रधानमंत्री का बेटा प्रदीप को देखकर छिपने की कोशिश करता है । तब प्रदीप उसे तीसरी मंजिल पर दबोच लेता है और वहाँ से नीचे छलँग मारता है । प्रदीप की मौत और बेटा राम की हत्या होती है । प्रदीप अपनी बहन पर हुए अत्यचार का बदला लेने के लिए प्रधानमंत्री के बेटे साथ खुद की भी जान देता है । एक तरफ बहन के लिए अपनी जान न्यौछावर करने वाले भाई भी हैं । इसका यथार्थ चित्रण किया गया है ।

    सास-बहू का संबंध- वरिंद्र जैन ने ' सुरेखा- पर्व ' उपन्यास में विद्या की सास के माध्यम से उन सभी सासों की ओर इशारा किया है जो अपने नाकाश पुत्रों की नाकामी का कारण बहू को मानती है । विद्या को सास विद्या के सम्बन्ध में तरह - तरह की बातें करती रहती है । विनय का मित्र यती इस सम्बन्ध में कहता है , " विनय की अम्मा ने मुझे बड़ी मासूमियत के साथ यह बताया कि उनकी पुत्रवधु अभागन निकली । उसने सारा घर चौपट कर दिया । उनके लड़के को बेकार कर दिया और अब बीमारी का बहाना करके उसके सिर पर सवार है । उन्होंने यह भी कहा कि विनय के पिताजी बहू - बेटे के लिए गाँव से रसद पहुँचाते हैं । विनय कोई काम नहीं कर रहा है और बहू की बीमारी की वजह से वह शहर भी नहीं छोड़ पा रहा है । उन्होंने यह भी बताया कि सुनीता की शादी की बात चल निकलने पर विद्या ने अपने गहने छुपाकर रख दिए थे ताकि हम लोग इस्तेमाल न कर सकें । पूछने पर उसने बताया तक नहीं । विद्या नहीं चाहती थी कि हमारा लड़का हमारे पास रहे इसलिए उसे यहाँ से भगा ले गई और पास वाले गाँव में रंगरलियां मनाती रही । " सास अपनी बहुओं की हमेशा बुराइयाँ निकालती रहती हैं । यदि वह अपने नाकारा पुत्रों को कुछ कहेगी तो उससे उनके परिवार की ही बदनामी होगी । बहू तो पराये घर से आई है यही सोचकर उसे ताने दिए जाते हैं ।

    गुरू -शिष्य का संबंध-गुरु और शिष्य के बीच केवल शाब्दिक ज्ञान का ही आदान प्रदान नहीं होता था । बल्कि गुरु अपने शिष्य के संरक्षक के रूप में भी कार्य करता था । उसका उद्देश्य रहता था कि गुरु उसका कभी अहित सोच भी नहीं सकते । यहीं विश्वास गुरू के प्रति उसकी अगाध श्रद्धा और समर्पण का कारण रहा है । एक श्रेष्ठ गुरु अपने शिष्यों को सन्मार्ग पर चलने का परामर्श देता है । वह अपने शिष्यों की हर गतिविधि पर नजर रखता है । जब उसे लगता है कि उसके शिष्य अच्छे बुरे , उचित - अनुचित का निर्णय नहीं कर पा रहे हैं तो वह उनकी असमंजस स्थिति का समाधान करता है । पंचनामा उपन्यास में अकलंक केवल मनोरंजन पूर्ण पुस्तकें पढ़ने में अपना समय गंवाता है तो अकलंक के अध्यापक गोयल जी उसे ऐसा करने से रोकते हैं । वह उसे एक पुस्तकालय में ले जाते हैं और समझाते हुए कहते हैं , " इस पुस्तकालय में तुमने स्वयं देखा है , हजारों पुस्तकें हैं । यहाँ आने वाली पुस्तकों का चयन विद्वान लोग करते हैं । इसलिए यहां की पुस्तकें तुम्हारा कोई हित न करें , क्योंकि उनसे अपना हित साधन करने के लिए पढ़ने वालों के पास बुद्धि और विवेक भी होना चाहिए , लेकिन इतना तय है कि ये पुस्तकें तुम्हारा अहित कतई नहीं करेंगी "  अध्यापक गोयल अकलंक को जीवनोपयोगी पुस्तकें पढ़ने की सलाह देते  हैं । स्पस्ती मनोरंजनपूर्ण पुस्तकें कभी किसी के लिए उपयोगी नहीं होतीं । अध्यापक गोयल जी अनाथाश्रम के प्रत्येक शिष्य की सहायता के लिए सदैव तत्पर रहते हैं ।

    इस प्रकार लेखक ने वर्तमान समाज को उसकी समस्त दुर्बलताओं , विद्रूपताओं के साथ उद्घाटित किया है । लेखक ने समाज में व्याप्त विभिन्न सम्बन्धों के साथ - साथ उनमें आए परिवर्तनों का भी उल्लेख किया है । सामाजिक समस्याओं के साथ- साथ नारी सम्बन्धी समस्याओं और नारी की स्थिति को विशेष रूप से अपने उपन्यास - साहित्य का विषय बनाया है । अनाथाश्रम की व्यवस्था में भ्रष्टाचार या मनमानी कारोबार से छात्र- जीवन तंग आ रहा है । इन सभी बातों को यथार्थ रूप में जैन जी ने अपने साहित्य में चित्रित किया है ।

 संदर्भ  ग्रंथ सूची

1. वीरेंद्र जैन -प्रतिदान, वाणी प्रकाशन ,नयी दिल्ली, 2010 

2. वीरेंद्र जैन - डूब, वाणी प्रकाशन ,नयी दिल्ली, 2014

3. वीरेंद्र जैन - पार, वाणी प्रकाशन ,नयी दिल्ली, 2012

4. वीरेंद्र जैन - गैल और गन, वाणी प्रकाशन ,नयी दिल्ली, 2004

5.वीरेंद्र जैन -सुरेखा-पर्व, वाणी प्रकाशन ,नयी दिल्ली, 2010

6.वीरेंद्र जैन - पंचनामा, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन ,नयी दिल्ली, 1996


शेख ॰ शाहीना बेगम
हिन्दी विभाग , आंध्र  विश्व विद्यालय,
विशाखपटनमआंध्र प्रदेश ।
shaheenabegum009@gamialcom

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