साहित्य संगम
हिंदी भाषा की उत्पत्ति: संस्कृत भाषा का प्रतिरूप ही हिंदी भाषा है। कई चरणों में विकास होते हुए हिंदी भाषा का रूप धारण हुई।संस्कृत भाषा को प्राचीन भाषा, आर्य भाषा,देव भाषा एवं हिंदी की जननी कहते हैं। भारत में भारोपीय भाषाएं 73% है।भारोपीय भाषा में सर्वोपरि हिंदी भाषा को स्थान मिला है।भारोपीय भाषाओं का विकास क्रम तीन भागों में हुआ है। पहला प्राचीन भारतीय आर्य भाषा,दूसरा मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषा, तीसरा आधुनिक भारतीय आर्य भाषा।
1- प्राचीन भारतीय आर्य भाषा
प्राचीन भारतीय आर्य भाषा का विकास ईस्वी पूर्व 1500 से लेकर ईसवी पूर्व 500 तक मानी जाती है। वेदों की रचना ब्राह्मण ग्रंथों,उपनिषदों के अलावा वाल्मीकि व्यास, अशोक बौद्ध भाव, कालिदास आदि ग्रंथों की रचना संस्कृत भाषाओं में रचना लिखी गई।पश्चिमी के व्याकरण ग्रंथ पाणिनीय महर्षि ने के अष्टाध्याई के वैदिक एवं लौकिक दोनों प्रकार की संस्कृत भाषा में उल्लेख पाया जाता है। पहला वैदिक संस्कृत ग्रंथ, दूसरा लौकिक संस्कृत ग्रंथ,पहला वैदिक संस्कृत ग्रंथ। ईसवी पूर्व 1500 से लेकर इसवी पूर्व 500 तक मानी जाती है। वैदिक संस्कृत ग्रंथ वेदों की रचना ऋग्वेद की रचना हुई।ऋग्वेद की रचना की भाषा संस्कृत थी।दूसरा संस्कृत ग्रंथ लौकिक संस्कृत ग्रंथ। ईस्वी पूर्व 1000 से लेकर ईसवी पूर्व 500 तक माना जाता है।लौकिक संस्कृत ग्रंथ भारतीय दर्शन ग्रंथ को माना जाता है। उसी समय संस्कृत भाषा के अलावा भारोपीय भाषाओं में तीन क्षेत्रीय बोली भाषाओं का भी उत्पन्न हुआ है।पहला पश्चिमी बोली,दूसरा मध्य देशी बोली, तीसरा पूर्वी बोली का विकास हुआ है।
2- मध्यकालीन भारतीय भाषा
मध्यकालीन भारतीय भाषा का विकास इसवी पूर्व 500 से लेकर पहली ईसवी तक मानी जाती है।मध्यकालीन की प्रमुख भाषा का विकास हुआ। मध्यकालीन में पाली प्राकृत अपभ्रंश भाषाओं का विकास हुआ इस काल में बोलियों का भी विकास हुआ।रचनाएं अधिक लिखी गई और उन रचनाओं से समाज को मार्गदर्शक मिली।
पाली भाषा: पाली भाषा का विकास इसवी पूर्व 500 से लेकर पहली ईसवी तक मानी जाती है। संस्कृत भाषा मध्यकालीन समय में हुई उत्तर भारत नेपाली भाषा का विकास हुआ। पाली भाषा को भारोपीय भाषाओं में सबसे पुरानी भाषा का दर्जा दिया गया। भारत का पहला भाषा का स्थान पाली भाषा को ही जाता है। मध्य प्रांत में उत्पन्न होने के कारण इसे मागधी भाषा भी नामकरण से पुकारा जाता है।बौद्ध ग्रंथ का विकास पाली भाषा में ही हुआ। बौद्ध धर्म ग्रंथों को मध्यकालीन में पाली भाषा के साथ चार क्षेत्रीय बोलियों का भी विकास हुआ। पहला पश्चिमी बोली, दूसरा मध्य देशीय बोली, तीसरा पूर्वी देशीय बोली, चौथा दक्षिण देशी बोली।
प्राकृत भाषा:प्राकृत भाषा पाली भाषा में कुछ परिवर्तन होकर प्राकृत भाषा उत्पन्न हुई।इसका विकास पहले ईस्वी से लेकर पांचवी ईस्वी तक माना जाता है। प्राकृत भाषा में मुख्य रूप से महावीर के उपदेशों का प्रचार एवं प्रसार हुआ। बोलचाल की भाषा में परिवर्तन आने लगी। कुछ विद्वानों ने क्षेत्रीय बोलियों में परिवर्तन लाए। मुख्य रूप से प्रकृति बोलियों के पांच भेद माने जाते हैं।पहला शूरसेन,प्राचड, महाराष्ट्री, मागधी, अर्धमागधी।शौरसेनी बोली सोरी एवं मथुरा प्रांत में विकसित हुई। प्राचड सिंध प्रांत में विकसित हुई। महाराष्ट्री बोली विदर्भ प्रांत में विकसित हुई। मागधी बोली मगध प्रांत में विकसित हुई।अर्धमागधी बोली कोस्टल प्रदेश प्रांत में विकसित हुई।इस तरह प्राकृत भाषा तेजी से विकास हुआ।
अपभ्रंश भाषा :प्राकृत भाषा में जो परिवर्तन हुई।वह अपभ्रंश भाषा का रूप धारण कर विकसित हुई।काल500 ईसवी से लेकर 1000 ईसवी तक माना जाता है। मध्यकालीन के अंतिम अवस्था में अपभ्रंश भाषा का विकास हुआ। प्राकृत एवं आधुनिक काल के बीच की कड़ी अपभ्रंश भाषा की थी। अपभ्रंश भाषा का परिचय भोले नाथ तिवारी ने कि इन्होंने अपनी भाषा को सात भेद माने।शौरसेनी जो पश्चिमी भारत, पश्चिमी हिंदी,
राजस्थानी,गुजराती से संबंध है। दूसरा पैशाची जो लहंगा, पंजाबी से संबंधित है।तीसरा जो सिंधी भाषा से संबंधित है। चौथा पहाड़ी भाषा से संबंधित है। पांचवा महाराष्ट्री मराठी भाषा से संबंधित है। छठवां मागधी जो बिहारी बंगाली उड़िया एवं आसामी भाषा से संबंधित है और सातवा जो पूर्वी हिंदी भाषा से संबंधित है।अपभ्रंश भाषा के साथ-साथ इस समय में कई बोलियों का विकास हुआ।
3-आधुनिक भारतीय आर्य भाषा:
आधुनिक भारतीय आर्य भाषा का काल 1000 ईसवी से लेकर अब तक मानी जाती है। हिंदी और आर्य भाषाएं शामिल है। 11 ईस्वी में अपभ्रंश भाषा समाप्त हो गई।इसी बीच आवहट भाषा भी आई थी।अपभ्रंश और आधुनिक काल के बीच की जो कड़ी की भाषा थी। वही अवहट भाषा थी।अवहट भाषा का अधिक प्रयोग विद्यापति की रचनाओं में मिलती है। कालांतर में आगे चलकर पश्चिमी हिंदी,राजस्थानी, बिहारी,पूर्वी हिंदी और पहाड़ी भाषा एवं पांच उप भाषाओं तथा इनसे विकसित हुई। क्षेत्रीय बोली जैसे ब्रजभाषा, खड़ी बोली, भोजपुरी, अवधी, गढ़वाली आदि के आदि को समग्र रूप से समग्र रूप को ही हिंदी कहा जाता है।कालांतर में खड़ी बोली ही अधिक विकसित होकर अपने मानक और प्रतिष्ठित होकर अपनी हिंदी भाषा के रूप में हमारे सामने प्रस्तुति हुई और हमारे भारतवर्ष हिंदी भाषा को स्वीकार किया।
चार्वाक दर्शन: चार्वाक दर्शन के सिद्धांतों के लिए बौद्ध पिटको में "लोकायत" शब्द का प्रयोग किया जाता है ।जिसका मतलब दर्शन कि वह प्रणाली है। लेकिन इसका मूल ग्रंथ चल चार्वाक दर्शन ग्रंथ है।इसे लोकायत भी कहा जाता है।इसकी भाषा अपभ्रंश भाषा हैं।
बौद्ध: बौद्ध धर्म के प्रमुख ग्रंथ त्रिपिटक है ।त्रिपिटक के तीन भाग है ।जो पहला विनय पिटक दूसरा स्वीट तीसरा अभी दम एटक त्रिपिटक की भाषा पाली भाषा है। स्वयं गौतमबुद्ध पाली भाषा में अपनी संदेश दी।
सिद्ध: सिद्ध साहित्य ब्रजयानी सिद्धू के द्वारा लिखा गया है। सिद्धू के 32 ग्रंथ बताया जाते हैं ।सिद्धो में सरहपा सबरपा, लूईपा
प्रमुख हैं। सिद्धू के प्रथम कवि सरहपा को माना जाता है। और इनकी भाषा अपभ्रंश है।
नाथ: सिद्ध धर्म की वज्रयन शाखा के अनुयाई हैं ।नाथ संप्रदाय नाथ संप्रदाय के प्रमुख ग्रंथ "कॉल ज्ञान निर्णय" है। उसी प्रकार गोरखनाथ के "नाथ योगी" ग्रंथ वज्रयानी में लिखी गई।
जैन: जैन धर्म का प्रमुख ग्रंथ समयसार है ।यह आचार्य कुंदकुंद देव द्वारा पहली ईस्वी में लिखी गई। इस इस में कुल 415 गाथाएं हैं। यह प्राकृत भाषा में लिखी गई है। भगवान महावीर से पूर्व के जैन धार्मिक साहित्य को महावीर शिष्य गौतम ने संकलित किया था ।जिसे पूर्व माना जाता है। इसी तरह 14 पूर्व ओं का उल्लेख भी मिलता है ।जैन धर्म ग्रंथों के सबसे पुराने आगम ग्रंथ 46 माने जाते हैं ।सारे पूर्व ग्रंथों को प्राकृत भाषा में लिखी गई है।
आदिकाल की ग्रंथों की भाषा:
आदिकालीन से रासो साहित्य ग्रंथ प्रारंभ हुई।प्राकृत की अंतिम अपभ्रंश अवस्था से ही हिंदी साहित्य का आविर्भाव माना जाता है।आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार उस समय जैसी गाथा कहने से प्राकृत का बोध होता था। वैसे ही दोहे एवं दोहा कहने से ब्रह्म या प्रचलित काव्य भाषा का बोध होता है।आदिकाल में प्रामाणिकता ग्रंथ का वर्णन कर सकते हैं।आदिकाल की जो भी सामग्री प्राप्त है।उसमें कुछ तो असंदिग्ध हैं और कुछ संदिग्ध है। जो सामग्री और संदिग्ध हैं।उसकी भाषा अपभ्रंश या प्राकृत भाषा है। रामचंद्र शुक्ल कहते हैं। अब रमसिया प्राकृत भाषा उस समय जनसामान्य की भाषा नहीं वह यह उस दौर में दौर के कवियों की भाषा थी। छठवीं शताब्दी के आरंभ होकर अपभ्रंश की यह परंपरा विक्रम 15 वीं शताब्दी तक चलती रही। विद्यापति ने दो प्रकार की भाषाओं का प्रयोग किया। एक तो अपभ्रंश और दूसरा देसी बोलचाल की भाषा विद्यापति के कथन के अनुसार
देशील बना सब जग मीठा।
अतीत ऐसी जागो अवहट मिटा।।
शुक्ल के अनुसार विद्यापति ने अपभ्रंश से भिन्न प्रचलित बोलचाल की भाषा को देसी भाषा कहा ।आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भरतमुनि के बारे में इस प्रकार बता रहे हैं कि भरत मुनि ने अपना देकर लोक भाषा को देश भाषा के नाम दिया हम किसी कवि का या किसी रचना को हम दो भागों में बांट सकते हैं। प्रथम भाव पक्ष द्वितीय कला पक्ष के रूप में हम देखते हैं। जो भाव पक्ष है।वह सौंदर्य श्रृंगार और अंतर मन के विचारों से संबंधित है। जो प्रस्तुति होती है।पर उसका प्रभाव दिखता नहीं कला पक्ष उसके विपरीत हैं। इसमें भाषा की शैली और ज्ञान की वृद्धि को हम स्पष्ट रूप से समझ सकते हैं और देख सकते है। देश भाषा में नाथों की गोरख पंत की पुस्तकें गद्य एवं पद्य दोनों में लिखी गई है। यह विक्रम संवत 14 ईसवी के आसपास की संप्रदायिक रचनाएं इसी प्रकार की भी हम रचना को हम उसकी भाषा को देश भाषा मिश्रित अपभ्रंश या पुरानी हिंदी काव्य भाषा के रूप में हम देख सकते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा की देशों की भाषा को पाली माना। क्योंकि उनकी भाषा थी। वह तक साली थी और बाकी की रचना व हिंदी है। पर गीत की भाषा पुरानी बिहारी या पूर्वी हिंदी थी। शुक्ल के अनुसार सिंधी की भाषा तो खड़ी बोली, मिश्रित, राजस्थानी सामान्य भाषा साधुकड़ी है। रमणीय ने पदों की भाषा में काव्य की ब्रजभाषा और कहीं-कहीं पर पूर्वी बोली भी मिलती है।जो जो काव्य भाषा देश भाषा की ओर प्रवृत्त होने लगती है।तो संस्कृत के तत्सम शब्दों को रखने में संकोच भी घटता गया है। सारंगधर और कीर्तिलता में इसका प्रमाण देखने को मिलता है। भाषा की हम परीक्षा करते हैं। तो वह साहित्यिक नहीं राजस्थानी है। यह इसका प्रमाण बीसलदेव रासो ग्रंथ में हम देख सकते हैं।अपभ्रंश के योग से शुद्ध राजस्थानी भाषा का जो रूप था।वह डिंगल कहलाया। डिंगल को ही पिंगल कहते हैं।डिग और गल दोनों मिलकर डिंगल शब्द बना। पढते समय हमें डमरु की आवाज सुनाई देती है।भाषा की कसौटी पर यदि ग्रंथ को कहते हैं। इसमें व्याकरण आदि की कोई व्यवस्था नहीं थी।इसका प्रमाण पृथ्वीराज रासो ग्रंथ है।कबीर की अपेक्षा खुसरो का ध्यान बोलचाल की भाषा पर अधिक था।जॉर्ज ग्रियर्सन ने बिहारी और मैथिली को माधवी से निकली होने के कारण हिंदी से अलग मानते हैं।शुक्ल के अनुसार चंद्रकांता की भाषा का समझा जाना अधिकतर उसकी शब्दावली पर अवलंबित होता है। यदि ऐसा ना होता तो हिंदी और उर्दू का ही एक ही साहित्य माना जाता है। भारत मेंआर्य मध्य एशिया से सिंधु नदी को पार करते हुए भारत में प्रवेश किए। वे सिंधु नदी को हिंदू नदी कहकर पुकारते थे।उन्हें "स" और "धा" शब्द का उच्चारण का ज्ञात उनको नहीं था। उच्चारण दोष के कारण वे सिंधु को हिंदू कहते थे। हिंदू देश में रहने के कारण इसकी भाषा को उन्होंने ई प्रत्यय लगाकर हिंदी का नामकरण दे दी।तब से आर्य हिंदी भाषा बन गई।मूल रूप से आर्यों की भाषा संस्कृति हम यहां एक विषय को और गहरी रूप से सोचेंगे तो हमें यह ध्यान में आता है कि भारत की जो प्राचीन भाषा वह पाली भाषा थी। पाली भाषा में भाषा का प्रयोग अधिक किया जाता था।जैसे राजा अशोक को असोक नाम से बुलाया जाता था। जिसका सीधा संबंध बौद्ध धर्म से था। असोक का अर्थ है शोक नहीं। मुख्य रूप से पाली भाषा में"स" का प्रयोग अधिक होता था।क्योंकि उनको "श" और "ष" दोनों वर्णों का उन्हें ज्ञात न था। आर्य जब भारत में प्रवेश करे तो तब यहां पर पाली भाषा का प्रयोग अधिक था।धार्मिक शब्द से संबंध जुड़ा हुआ था। उन्होंने पाली भाषा को स्वीकार नहीं किया और सावन के बदले उन्होंने हां वर्ण का प्रयोग किया। जिसे सिंधु से हिंदू बना दी।हिंदू भारत की धर्म बन गई।हिंदू देश में रहने वालों की भाषा हिंदी बन गई।इस प्रकार सिंधु से भारत में आर्यों की भाषा बन गयी। संस्कृत और मुसलमानों की भाषा अरबी भाषा दोनों मिलकर हिंदुस्तानी भाषा बन गई। हिंदुस्तानी भाषा में उर्दू और हिंदी शब्द मिलकर दोनों शब्दों का प्रयोग किया गया था।मूल हिंदी में संस्कृत हिंदी भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्द आकर जुड़ गई थी। अंतिम में यह हुआ कि हिंदी भाषा में हर भाषा सम्मिलित हो गई और वह हिंदी भाषा बन गयी। आदिकाल मे सबसे ज्यादा ब्रज भाषा का प्रयोग अधिक हुआ। अमीर खुसरो ने सर्वप्रथम खड़ी बोली भाषा का प्रयोग किया।आदि काल के साहित्य को सर्वोत्तम भाषा बन गयीं। ब्रज और अवधी भाषा चरित्र कार्य, अथवा आख्यान साहित्य के लिए अधिकतर चौपाई ,दोहे की पद्धति अपनाई गई पुष्पदंत आदि पुराण उत्तर पुराण और यशोधर चरित्र में अपनाई गई।चौपाई और दोहे की परंपरा आदि काल में ही प्रारंभ होती है। बौद्ध धर्म विकृत होकर वज्रयान संप्रदाय के रूप में देश के पूर्वी भागों में बहुत दिनों से चली आ रही थी।
हिंदी साहित्य का इतिहास आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार चार भागों में बांटा गया।
1-वीरगाथा काल विक्रम संवत 1050 से लेकर1375 तक
2-भक्तिकाल विक्रम संवत 1375 से 1700 तक
3-रीतिकाल विक्रम संवत 1700 से 1900 तक
4-आधुनिककाल विक्रम संवत 1900 से अब तक मानी जाती है।
वीरगाथा काल के ग्रंथों को रासो कहा जाता है।
पृथ्वीराज रासो:
पृथ्वीराज
रासो ग्रंथ की भाषा डिंगल, पिंगल, ब्रज भाषा,देसी भाषा, अपभ्रंश भाषा ,राजस्थानी भाषा, पृथ्वीराज रासो ग्रंथ ढाई हजार पृष्ठों में लिखी गई। पृथ्वीराज रासो ग्रंथ का पूर्वार्ध भाग चंदबरदाई ने लिखा ।उसी तरह पृथ्वीराज रासो ग्रंथ का उत्तरार्ध भाग
चंदबरदाई के पुत्र जलहन ने लिखा। राजस्थानी भाषा को ही डिंगल पिंगल कहते हैं।
बीसलदेव रासो:
बीसलदेव रासो ग्रंथ की रचना नरपति नाल्हा ने की ।नरपति नाल्हा ने 2000 चरणों में गीतों के रूप में लिखा। बीसलदेव ग्रंथ की भाषा राजस्थानी थी।
परमाल रासो:
परमाल रासो ग्रंथ को जगनिक ने लिखा। यह अपभ्रंश भाषा में लिखी गई।
खुमान रासो:
खुमान रासो ग्रंथ दलपति विजय ने वीरता पूर्ण 24 युद्धों की वर्णन मे लिखा।
विद्यापति:
विद्यापति
ने राधा कृष्ण के प्रेम पूर्ण वर्णन कि यह अपभ्रंश भाषा में लिखी। विद्यापति ने कीर्तीलता, विभागसार, भू परिक्रमा, लिखनावाली ,कीर्ति पताका को भी अपभ्रंश भाषा में लिखा। विद्यापति ने पदावली में राधा कृष्ण की प्रेम वर्णन वियोग श्रृंगार का वर्णन अपभ्रंश भाषा में की।
जब सारा देश विछिन्न हुई। तब भक्ति सबके हृदय में उत्पन्न हुई।
भक्तिकाल:
भक्तिकाल विक्रम संवत 1375 से 1700 तक माना जाता है। भक्तिकाल के दूसरे नाम मध्यकाल, पूर्वी मध्य काल, स्वर्ण युग, स्वर्ग युग
के नामों से पुकारा जाता है।
राजनीतिक स्थिति: देश में मुसलमानों का राज्य प्रतिष्ठित हो जाने के कारण हिंदू जनता के हृदय में गौरव गर्ग और उत्साह के लिए अवकाश ना था।देव मंदिर गिराए जाते थे। देव मूर्तियां तोड़ी जाती थी।पूज्य पुरुषों को अपमान करते थे।आगे चलकर जब मुसलमान मुस्लिम साम्राज्य दूर-दूर तक स्थापित हो गयी थीं। हिंदुओं में उदासीनता छा गयी थीं।
धार्मिक स्थिति: कुछ लोग दबी हुई भक्ति को जगाने लगे विक्रम संवत 1073 में रामानुजाचार्य शास्त्री पद्धति में सगुण भक्ति का निरूपण भी किया गया। माधवाचार्य संवत विक्रम संवत 1254 से लेकर 1333 तक दायित्व आदि वैष्णव धर्म संप्रदाय चलाएं। देश के पूर्व भाग में जय देव जी कृष्ण प्रेम संगीत की रामानुजाचार्य के शिष्य स्वामी रामानंद जी हैं। रामानंद जी ने विष्णु के अवतारों की वर्णन की दूसरी ओर वल्लभाचार्य ने कृष्ण को प्रेम मूर्ति बंधन की भक्तों ने ब्रह्मा को सत और आनंद स्वरूप माना। संतो ने ईश्वर को ज्ञान स्वरूप और प्रेम स्वरूप मानव संतो ने निर्गुण रुख अपनाया भक्तों ने सगुण रूप अपनाएं। संत लोग इस्लाम धर्म से प्रभावित हुए थे। भक्त लोग विष्णु राम कृष्ण के अवतारों से प्रभावित थे। हिंदुओं ने सभी देवताओं को एक मानते थे । हिंदी साहित्य का मध्यकालीन साहित्य को ही भक्ति काल से जाना जाता है। इसका समय विक्रम संवत 1375 से 1700 तक मानी जाती है।भक्तिकाल दो प्रकार के होते हैं। पहला निर्गुण दूसरा सगुण निर्गुण भक्ति धारा के दो भेद हैं।पहला ज्ञानमार्गी शाखा, दूसरा प्रेम मार्गी शाखा।निर्गुण भक्ति के लोग ईश्वर को निराकर मानते हैं और सगुण भक्ति के लोग ईश्वर को साकार रूप मानते हैं। सगुण भक्ति के दो रूप हैं।पहला राम भक्ति,दूसरा कृष्ण भक्ति निर्गुण पंथ हिंदुओं और मुसलमानों को एक पर बल देता है। निर्गुण पंथ बहू ईश्वर वादी है।
ज्ञानमार्गी शाखा:
कबीरदास: ज्ञानमार्गी शाखा की सर्वश्रेष्ठ कवि कबीर दास को माना जाता है।कबीर दास अनपढ़ थे।कबीर दास की रचना बीजक ने लिखी। कबीर की वाणी में साखी, सबद, रमैनी,ज्ञान जौतीष, विप्रमतीकी, कहरा,वसंत, चाचर, बेली , बिरहुली और हिंडोला है। कबीर की साखी की भाषा साधुकड़ी, राजस्थानी ,पंजाबी मिली खड़ी बोली थी। कबीर की सबद एवं रमणी गाने के पद थी और इसकी भाषा ब्रजभाषा थी।
धर्मदास :कबीर के शिष्य थे। धर्म के ग्रंथ "सुख निदान" थी।सुख निदान की भाषा पूर्वी भाषा में लिखी गई।
रैदास: स्वामी रामानंद की 12 शिष्यों में रविदास प्रथम व्यक्ति थे।रविदास की ग्रंथ आदि गुरु ग्रंथ साहब है। रैदास की भाषा इन्होंने सरल व्यवहारिक ब्रजभाषा को अपनाएं ।जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू, फारसी शब्द मिश्रण है।
गुरु नानक :शेख संप्रदायों के आदि प्रवर्तक गुरु नानक माने जाते हैं। श्री चंद्र हिंदू धर्म संप्रदाय के प्रवर्तक थे गुरु नानक ने भजन पंजाबी भाषा में लिखी। गुरु नानक की काव्य की भाषा फारसी, मुल्तानी, पंजाबी ,हिंदी खड़ी बोली और अरबी भाषा के शब्द समान पाए जाते हैं।
दादूदयाल: दादू दयाल सांभर ब्रह्म संप्रदाय के प्रवर्तक थे। दादू दयाल की रचना दादू पथ है। इसकी भाषा गुजराती ,पंजाबी ,पश्चिमी हिंदी, राजस्थानी ,जयपुर की भाषा है ।
सुंदर दास: सुंदर दास दादू दयाल की शिष्य थे ।इन्होंने भक्ति और नीति पद कहे इन की ग्रंथ सुंदर विलास है। सुंदर विलास में साहित्य और सरस के बारे में लिखें। सुंदर विलास की भाषा ब्रजभाषा है ।इन्हें अलंकार के कवि भी कहते हैं।
मलूक दास :मलूक दास औरंगजेब के समय के कवि थे ।मलूक दास की रचना रत्न खान ,ज्ञान बोध है। मलूक दास की भाषा फारसी अरबी खड़ी बोली है।
अक्षर अनन्य: अनन्य पृथ्वी चंद्र के दीवाने थे ।अक्षर अनन्य एक संत कवि एवं दार्शनिक थे ।इनकी रचनाएं राज योग,विज्ञान योग ,ध्यान योग, सिद्धांत योग ,विवेक दीपिका, ब्रह्म ज्ञान ,अनन्य प्रकाश ,जगजीवन दास, दुलनदास,तोवरदास,
तुलसी साहब, गोविंद साहब आदि योग ,वेदांत। इनमें अद्वैत वेदांत के गूढ़ रहस्यों को सरल भाषा में प्रस्तुत किया।
प्रेममार्गी शाखा:
प्रेम मार्गी शाखा को सूफीवादी भी कहते हैं।सूफी का अर्थ सफेद रंग का वस्त्र। उससे प्रेम तत्व का वर्णन किया है। जो ईश्वर को मिलाने वाला है।सूफी शब्द यूनानी सोफोश शब्द से निकली हुई है। सोफोश का अर्थ है।बुद्धिमान या ज्ञान सूफी लोग गुरु को प्रधानता देते थे। सूफी ओम ईश्वर और जीव का संबंध प्रेम मानते थे। सूफी संप्रदाय कवि संगीत के प्रेमी थे और हिंदू संप्रदाय के अधिक निकट थे ।भारत में सूफी संप्रदाय का आरंभ हिंदू से हुआ। सूफी बाजी को प्रेम मार्गी शाखा कहते हैं ।सूफी मत की विशेषता है कि आत्मा की व्याप्ति सूफी मत के कवि प्रेम के वीर के धनी थे। प्रेम मार्गी शाखा के कवियों ने भगवान को पुरुष और साधक को स्त्री माना।सूफी कवि अधिकांश मुसलमान कवि थे ।सूफी वादी कवियों का प्रमुख कवि मलिक मोहम्मद जायसी हैं और प्रेम मार्गी शाखा के प्रथम कवि क़ुतुबन हैं।
कुतुबुन:
प्रेम मार्गी शाखा की प्रथम ग्रंथ दुर्गावती है कुतुब उनकी रचना दुर्गावती कहानी दोहे चौपाई छंद में लिखी गई है कुतुब मुर्गावती की रचना की भाषा अवधि दोहे चौपाई छंद में लिखी गई है कुतुबुल दुर्गावती की रचना में चंद्र नगर के राजा गणपति देव और कंचनपुर की राजकुमारी दुर्गावती की प्रेम पूर्ण कहानी है।
मंझन:
मंझन कोमल कल्पना की करी थी। मंजन की रचना मधुमालती है। मधुमालती कहानी चौपाइयों दोहे में लिखी गई। मधुमालती कहानी कानेसर नगर राजा सूरजभान के बेटा मनोहर महाराज नगर के रानी रूपमंजरी की पुत्री मधु माली की प्रेम कहानी है।
मलिक मोहम्मद जायसी:
मलिक मोहम्मद जायसी की प्रमुख रचना पद्मावत आखिरी कलाम अग्रावत है । मलिक मोहम्मद जायसी की प्रमुख प्रबंध काव्य ग्रंथ पद्मावत है। पद्मावत ग्रंथ ने सिंबल दीप के राजा गंधर्व सेन की कन्या पद्मावती का विरह प्रेम कहानी है। जायसी की भाषा अवधी और पूर्व हिंदी है। जायसी की प्रमुख दर्शन ग्रंथ अखरावट है। मलिक मोहम्मद जायसी की आखिरी कलाम फारसी अक्षरों में लिखी गयी।
उस्मान:
उस्मान का उपनाम मान है।उस्मान की रचना चित्रावली है। चित्रावाली कहानी दोहे, चौपाई में लिखी गई। चित्रावली में नेपाल के राजकुमार सुजान कुमार कमला विद की प्रेम पूर्ण कहानी है। चित्रावली की भाषा अवधी है।
शेख नबी:
हिंदी में सूफी काव्य परंपरा के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं।शेख नबी की रचना ज्ञानदीप है। साहित्य प्रेमगाथा ज्ञानदीप है। इसकी भाषा अवधि एवं फारसी।
कसीमशाईं:
कसीमशाईं की कहानी हंस जवाहिर है। कसमशाईं की भाषा फारसी अक्षरों में लिखी गई है। हंस जवाहिर कहानी में राजा हंस और रानी जवाहिर की प्रेम कथा वर्णन की कहानी है।
नूर मोहम्मद:
नूर मोहम्मद की रचना रोज तूल गायक इंद्रावती ,प्रेमाख्यान, अनुराग बांसुरी, सूफी संप्रदाय के अंतिम ग्रंथ इंद्रावती मानी जाती है। इसकी भाषा फारसी
हिंदी है।
सगुण भक्ति:
सगुण भक्ति धारा विक्रम संवत 18 वीं शताब्दी के अंत में वैष्णव श्री संप्रदाय के प्रधानाचार्य श्री राघवानंद जी की काशी में रहते हुए मेरे उपरांत संप्रदाय के सिद्धांतों की रक्षा किस प्रकार होगी। राघवानंद जी स्वामी रामानंद को शिक्षा प्रदान कर निश्चिंत हुए। राघवानंद का दूसरा नाम ही रामानुजाचार्य है।स्वामी रामानंद ने राम का आश्रय लिया।स्वामी रामानंद को इष्ट देव राम हुए और उनका मूल मंत्र राम नाम हुआ।स्वामी रामानंद ने राम भक्तों के द्वारा सब जातियों के लिए आमंत्रित की। स्वामी रामानंद ने वर्ण सराय के विरुद्ध रामानंद के बारह शिष्य कबीरदास, रैदास, शहनाई, पीपा, अनंतानंद, सुखानंद, सुरसुरानंद,नरहैनिंदा,भाव नंदा, घना, पद्मावती और सुरसरी। सुर सरी रामानंद की रचनाएं वैष्णव संप्रदाय भास्कर श्री राम आरती राम श्री राम अर्चन पद्धति ।रामानुजाचार्य विशिष्ट अद्भुत संप्रदाय की स्थापना की। रामानुजाचार्य की रचना ब्रह्मसूत्र , श्री भाष्य। शंकराचार्य ने ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या मायावती प्रतिपादन की। माधवाचार्य ने व्दैतवाद संप्रदाय की स्थापना की। श्री वल्लभाचार्य ने शुद्ध व्दैतवाद संप्रदाय की स्थापना की। श्री निंबार्काचार्य ने द्वैताद्वैत संप्रदाय की स्थापना की
श्री हित हरिवंश ने राधा वल्लभ संप्रदाय की स्थापना की। श्री राम अर्चन पद्धति के प्रथम प्रधान प्रवर्तक स्वामी रामानंद जी थे। रामानंद ने लोगों को राम मंत्र का उपदेश दिया। रामानंद शिष्य परंपरा में गोस्वामी तुलसीदास सातवीं पीढ़ी में पाए जाते हैं। स्वामी रामानंद के शिष्य परंपरा के द्वारा भक्त लोगों पुटकला पदों में राम की महिमा गाते थे। सगुण भक्ति धारा को दो भागों में बांटा गया। पहला राम भक्ति शाखा, दूसरा कृष्ण भक्ति शाखा।
रामभक्ति शाखा:
राम भक्ति शाखा के प्रमुख कवि गोस्वामी तुलसीदास जी हैं।तुलसीदास ने लोक कल्याण हेतु अपनी काव्य की रचना की। तुलसीदास एक दर्जन काव्य ग्रंथ लिखे। रामचरितमानस, विनय पत्रिका, कवितावली, गीतावली,कृष्ण गीतावली, पार्वती मंगल, जानकी मंगल, बरवै रामायण, वैराग्य संदीपनी, रामलाल नहुछु।तुलसीदास रामचरितमानस में भगवान राम को पूर्ण रूप से वर्णन की। तुलसीदास राम चरित मानस की भाषा अवधी भाषा में लिखी।इसे दोहे चौपाई में सात खंडों में लिखी। यह एक महाकाव्य है। तुलसीदास ने विनय पत्रिका की भाषा ब्रजभाषा एवं संस्कृत भाषा में लिखी। यह भक्ति रस के 300 छंद का है। तुलसीदास ने कवितावली में हास्य रस का ग्रंथ लिखा। इसकी भाषा ब्रजभाषा थी।इसमें 325 छंद में लिखें ।तुलसीदास ने दोहावली को संकलन ग्रंथ माना। दोहावली मुक्तक रचना है। और यह शुद्ध ब्रज भाषा में लिखी गई। दोहावली में मार्मिक ढंग से 700 शब्द में वर्णन की गई ।तुलसीदास ने सूरदास के कहने पर गीतावली की रचना की। गीतावली ब्रज भाषा में लिखी और यह गीतो की रचना है। तुलसीदास ने कृष्ण गीतावली रहीम के आदेश के अनुसार लिखी।इसमें भगवान कृष्ण की कथा का वर्णन 612 छंदों में की गई। तुलसीदास ने पार्वती मंगल 164 छंदों में लिखी। इसमें शिव और पार्वती के बारे में वर्णन की और यह ब्रज भाषा में लिखी। तुलसीदास ने जानकी मंगल में राम और सीता का विवाह के बारे में 216 छंदों मे ब्रज भाषा में उन्होंने वर्णन की।तुलसीदास ने रामायण में 69 छंदों मे वर्णन की। रहीम के आदेश अनुसार तुलसीदास ने बरवै रामायण लिखा। इसकी भाषा ब्रजभाषा थी।तुलसीदास ने वैराग्य संदीपनी में संतों की महानता के बारे में 62 शब्दों में वर्णन की।इसकी भाषा ब्रजभाषा थी। तुलसीदास ने रामलाल नहुछु को बीस छंदो में उन्होंने लिखा। तुलसीदास ने अपने आपको चातक पक्षी और भगवान श्रीराम को नींल मेघ के रूप में वर्णन की और यह ब्रजभाषा में लिखी। तुलसीदास ने रामाज्ञ ब्रज भाषा में लिखी। भगवान राम के आदर्शो पर चलने का प्रस्ताव किया गया।
स्वामी अग्रदास: अग्रदास की रचनाएं ध्यान मंजरी,राम ध्यान मंजरी, कुंडलियां, हितोपदेश, आख्यान बावनी
नाभादास:
नाभादास साधु से ली थी। इनकी रचनाएं भक्त माला, अष्टयाम। नाभादास भक्तमाला रचना में दो सौ कवियों का वर्णन किया। नाभादास की अष्टयाम की भाषा ब्रजभाषा थी।
प्रणचंद चौहान:
प्रणचंद चौहान की रचना रामायण महा नाटक है।
हृदय राम: हृदय राम की रचना हनुमान नाटक वाली चरित्र इन रचनाओं की भाषा संस्कृत थी।
रायमल पांडे: रायमल पांडे की रचनाएं हनुमच्चरित्र
कृष्ण भक्ति शाखा:
कृष्ण भक्ति शाखा श्री वल्लभाचार्य 15 वी शताब्दी 16वीं शताब्दी में वैष्णव धर्म का जो आंदोलन को वल्लभाचार्य प्रधान तो वक्त थी उन्होंने आगे बढ़ाएं। सभी धर्मों को अपनाया प्रेम भावना मैं मदन रही ।वल्लभाचार्य जी अपनी मां का नाम पुष्टीमार्ग रखें वल्लभाचार्य जीव को तीन प्रकार माना। पहला पुष्टि जीव जो भगवान के अनुग्रह का ही भरोसा रखते हैं, दूसरा मर्यादा जी जो वेद की विधियों का अनुसरण करते हैं, और स्वर्ग को प्राप्त कर सकते हैं। 38 राजीव प्रवाह जीव जो संसार की प्रवाह में जो पड़े सांसारिक सुखों को प्राप्त ही नहीं लगा रहते हैं। वल्लभाचार्य की रचनाएं पूर्वी मीमांसा भारत में उत्तरी मीमांसा ब्रह्म सूत्र सुबोधिनी टीका तत्व दीप निबंध शोले छोटे-छोटे प्रकरण ग्रंथ
उन्होंने लिखा।
सूरदास:
सूरदास सगुन उपासक कविता सूरदास कृष्ण भक्ति शाखा के प्रमुख कवि हैं। सूरदास वल्लभाचार्य के आज्ञा से श्रीमद् भागवत को के रूपों में यानी गीतों के रूपों में उन्होंने रचना की सूरदास की। प्रमुख रचनाएं सूरसागर, सुरसुरा वाली, साहित्य लहरी, ब्यावलो सूरदास ने उत्प्रेक्षा उपमा रूपक अलंकार ओं का अधिक प्रयोग किया ।सूरदास ने श्रृंगार वात्सल्य शांत रसों का प्रयोग किया। सूरदास भाषा साहित्य में सूरदास के पद अनमोल रत्न है। सूरसागर में सवा लाख पत्र लिखें सूरदास के ग्रंथ में भ्रमरगीत की विशेषता बताई गई। सूरदास की भाषा शुद्ध ब्रजभाषा की हिंदी साहित्य के आकाश की सूर्य सूरदास हैं।
नंददास:
नंददास विट्ठलनाथ की थी नंददास तुलसीदास के भाई थे। सूरदास की समकालीन कवि नंददास थी नंद दास की रचनाएं भागवत दशम स्कंध, रुक्मणी, मंगल सिद्धांत पंचाध्याई, रूपमंजरी रसमंजरी मान मंजरी विरह मंजरी नाम चिंता मणि मान अनेकार्थी नाम माला ज्ञानमंजरी श्याम सगाई भ्रमरगीत सुदामा चरित्र 200 से अधिक नंददास के फुट कुल पदों लिखी । इनकी भी भाषा ब्रजभाषा थी।
कृष्ण दास:
कृष्णदास वल्लभाचार्य जी के शिष्य थे। कृष्ण दास की रचनाएं जुगल महान चरित्र भ्रमरगीत प्रेम तत्व निरूपण इनकी भाषा ब्रजभाषा की।
परमानंद दास:
परमानंद दास वल्लभाचार्य परमानंद की रचनाएं परमानंद सागर ,दयानंद पद, धर्मानंद ,पद दानलीला उद्धव लीला ध्रुव चरित्र।
कुंभन दास:
कुंभन दास भी वल्लभाचार्य जी के शिष्य थे ।विरक्त धन मान मर्यादा से उनका संबंध नाथ की रचनाएं नाल लेला प्रेम लीला उनकी रचना की भाषा ब्रजभाषा की।
चतुर्भुज दास: चतुर्भुज दास महात्मा विट्ठलनाथ की स्थिति थी।चतुर्भुज दास की रचनाएं द्वादश यस भक्ति प्रताप कितनों को मंगल।
हिप स्वामी: खेत स्वामी भी विट्ठलनाथ जी के शिष्य थे इनकी काव्य में मधुरता और सरसता दिखाई पड़ती है।
गोविंद स्वामी:
सूरदास के साथ गोवर्धन पर्वत पर गोविंद स्वामी भी रहते थे। गोविंद स्वामी ने कदंबू उपवन की निर्माण की।
हित हरिवंश:
राधावल्लभ
संप्रदाय के प्रवर्तक हित हरिवंश थे। संस्कृत के अच्छे विद्वान और भाषा काव्य के मर्मज्ञ थे इनकी पद हित चौरासी थी। इन्होंने 84 पद लिखे उनकी भाषा ब्रजभाषा थी।
गदाधर भट्ट गौरी संप्रदाय के मूल संस्कृत ग्रंथों की रचना की इनकी भाषा संस्कृत थी।
मीराबाई:
मीराबाई की उपासना माधुरी भाव की थी।श्री कृष्ण को पति मानकर कृष्ण की गीता ओं में लीन हो गई ।मीराबाई की रचना मीराबाई पदावली ,गीत गोविंद, टीका नरसी जी का मायरा राधा गोविंद राग सोरठ के पद मीराबाई की भाषा पश्चिमी राजस्थानी, ब्रजभाषा थी।
स्वामी हरिदास:
निंबार्क मतांतर्गत टट्टी संप्रदाय की स्थापना की। स्वामी हरिदास की रचनाएं हरिदास के ग्रंथ स्वामी हरिदास के पद हरिदास की बानी इन्होंने भाव उत्कृष्ट कभी के रूप में झलक दिखाई देते हैं ।उनकी भाषा ब्रजभाषा थी।
सूरदास मदनमोहन:
यह भी गौडी संप्रदाय के थे । इनकी कविता सरस होती थी।
श्री भट्ट:
निंबार्क संप्रदाय के प्रसिद्ध विद्वान थे इनकी भाषा सीधी-सादी चलती भाषा थी। इनकी ग्रंथ युगल शतक आदि बानी श्री भट्ट बड़े गीतकार थे ।इन्होंने राधा कृष्ण की प्रेम वर्णन की और इनकी भाषा ब्रजभाषा थी।
व्यास जी:
व्यास का पूरा नाम हरिराम व्यास था। व्यास जी पहले गाउड संप्रदाय को अपनाया अंत में राधा वल्लभ संप्रदाय को अपनाया व्यास संस्कृत शास्त्री पंडित से व्यास की रचना रास पंचाध्याई थी ।उनकी भाषा संस्कृत थी व्यास जी हित हरिवंश जी से दीक्षा शिक्षा ली।
रसखान:
राजस्थान बड़े प्रेमी जी भी थे। श्रृंगार संबंधी कविता दवाइयों को कहने लगे। रसखान की रचना प्रेम वाटिका दोहे में लिखी गई और सुमन रसखान सवैया में लिखी गई ।इनकी भाषा शुद्ध ब्रजभाषा थी श्री कृष्ण के मुसलमानों भक्तों में रस्तान अग्रगण्य माने जाते हैं ।
ध्रुव दास:
हित हरिवंश के शिष्य थे दुर्गा दुर्गा 40 रचनाएं लिखी। उनकी रचनाएं बृंदावन, शृंगार रस ,रत्नावली ,नेहा मंजरी, रहस्य मंजरी ,सुख मंजरी ,नाभादास के भक्त माला को अनुकरण करके इन्होंने भक्त नामावली भी लिखी भक्ति काल के फुटकल रचनाएं इनकी रचना की भाषा भी ब्रजभाषा थी।
छीछल:
टीचर की रचना पंच सहेली इन्होंने दोहे में लिखिए और बावनी भी इन्होंने दोहे में लिखी। उनकी भाषा है राजस्थानी पंच सहेली ग्रंथ में पांच सहेलियों का विरह वर्णन का वर्णन है।
लालच दास:
लालच दास की रचनाएं हरि चरित्र भागवत दशम स्कंध इनकी भाषा अवधि थी ।इन्होंने दोहे चौपाई में इन्होंने अपनी गंध लिखी।
बलभद्र मिश्र:
किशोर दास के भाई थे।
इनकी रचनाएं बल मदी कृत व्याकरण हनुमान नाटक गोवर्धन सतसई टीका दूषण विचार काव्य दोषों का निरूपण।
जमाल:
जमाल मुसलमान कवि थे नीति और श्रृंगार की रचनाएं लिखी।
कादिर:
इन्होंने फुटकल पद लिखे।
कृपाराम:
कृपा राम की प्रकृति लक्षणों का प्राचीन ग्रंथ हित तरंगिणी है।
हित तरंगिणी शरद भाव पूर्ण रूप में लिखे।
महापात्र नरहरी बंदी जन:
महापात्र नरहरी बंदी जन की रचनाएं रुकमणी मंगल छपाई नीति बबीता संग्रह इनको छपाई कभी कहते थे।
नरोत्तम दास:
नरोत्तम दास की रचना सुदामा चरित्र है।
आलम:
आलम की रचना माधवानल
कंदाल
कहानी है ।इनका खंडकाव्य ध्रुव चरित्र है। उनकी भाषा ब्रज भाषा है।
महाराजा टोडरमल:
महाराजा टोडरमल नीति संबंधी कविता लिखते थे।
महाराज बीरबल:
महाराज बीरबल ब्रज भाषा के कवि थे। अलंकारों का अधिक प्रयोग किया। इन्होंने अपना कविताओं में अपना नाम ब्रह्मा रखा।
गंग:
गंद श्रृंगार वीर हास्य रसों का अधिक प्रयोग किया। नवाब के क्रोधित होने से एक गंग को हाथियों से कुचला गया।
मनोहर कवि:
मनोहर अकबर के दरबार के कवि थे। फारसी और संस्कृत के अच्छे विद्वान थे। उनकी रचनाएं सत प्रश्नोत्तरी इन्होंने नीति और श्रृंगार रस के चुटकुले पद लिखे।
केशवदास:
केशव 10 को साहित्य शास्त्रज्ञ की उपाधि से सम्मानित की। संस्कृत के अच्छे पंडित थे। इनकी रचनाएं श्रृंगार सागर श्रृंगार संबंधी ग्रंथ में उन्होंने लिखा। इनकी रचनाएं कवि प्रिया, रसिकप्रिया ,कान्हा भरण, श्रुति भूषण, भूषण जहांगीर, जस चंद्रिका आदि। केशवदास की प्रमुख ग्रंथ कवि प्रिया है। रसिकप्रिया, भूषण अलंकारी संबंधित ग्रंथ है। केशव के प्रबंध काव्य वीर सिंह, देव चरित्र एवं रामचंद्रिका है। केशव की प्रसिद्ध काव्य रामचंद्र का है ।केशव की नाटक विज्ञान गीता प्रबोध चंद्रोदय यह वीर रस में लिखी गई। केशवदास की जीवन रसिक जी बी कहते हैं।
रहीम:
रहीम का पूरा नाम खानखाना अब्दुल रहीम था। रहीम हिंदी काव्य में पूर्ण मर्मज्ञ कवि थे ।यह संस्कृत अरबी फारसी के विद्वान थे। तुलसीदास के साथ इनका बड़ा संस्था रहीम की रचनाएं ,बरवै नायिका
इसकी भाषा ब्रज और अवधी थी ।उनकी अन्य रचनाएं रहीम दोहावली, रहीम सतसई, श्रंगार सोरठा, पंचाध्याई ,रहीम रत्नावली ,वाक्य बावरी रहीम की रचना सुर्खी से फारसी में अनुवाद कीजिए रहीम की मिश्रित रचना रहीम कवि संस्कृत में लिखी गई। रहीम की ज्योतिष ग्रंथ खेत का उत्तर कम संस्कृत और फारसी भाषा में लिखी गई। वहीं सर्वश्रेष्ठ भानु कवि थे।
मुबारक:
मुबारक संस्कृत फारसी अरबी के अच्छे पंडित थे। हिंदी के सर्वे कवि थे।वे श्रृंगार के ही कविता लिखते थे।
बनारसी दास:
बनारसी दास जैन धर्म लंबित है ।इनकी रचना अर्थ कथानक ग्रंथ में अपना जीवन वृत्त लिखी ।उनकी रचनाएं बनारसी विलास, नाटक समय, सर नाम माला ,अर्थ कथानक बनारसी, पद्धति मोक्ष परी, दुर्गा वंदना ,कल्याण मंदिर भाषा विधि निर्णय पंचासखा माखन विद्या।
सेनापति:
सेनापति बड़े ही सरूर सहृदय कवि थे। सेनापति ऋतु वर्णन के सर्वश्रेष्ठ कवि थे। सेनापति भावुक निपुण कवि थे। सेनापति भावुक निपुण कवि थे। सेनापति की रचना काव्य कल्पद्रुम है। इसकी भाषा माधुरी ब्रज भाषा एवं संस्कृत भाषा है।
पुहकर कवि:
कवि कारागार में ही रस रतन ग्रंथ उनके अन्य रचनाएं रंभा वती शूरसेन की प्रेम कथा संयोग और वियोग की विविध दशाओं को साहित्य की रीति की वर्णन की।
सुंदर:
सुंदर की रचना सुंदर श्रृंगार है। शाहजहां बादशाह ने इनको धोखा दिया दी। पहला कविराय दूसरा महाकवि राय
लालचंद लालचंद की रचना पद्मिनी चरित्र प्रबंध काव्य है। इनकी भाषा राजस्थानी। ईश्वर दास की कृति सत्यवती कथा है ।पृथ्वीराज की कृत बेली कृष्ण रुक्मणी रे ।यह राजस्थानी भाषा में लिखी गई। नरहरी की कृति रुकमणी मंगल है। आनंद दास की रचना कबीर परिचय ही है ।उपर्युक्त सभी रचनाएं ब्रज भाषा में लिखी गई और उसी समय ब्रजभाषा का परिवर्तन होने लगा।
रीतिकाल:
रीतिकाल का समय विक्रम संवत 17 00से लेकर1900 तक माना जाता है। रीतिकाल का दूसरा नाम मध्यकाल है। रीतिकाल को श्रृंगार काल अलंकृत काल कलाकार उत्तर मध्यकाल ऐसे अनेक नामों से उसे बुलाया जाता है। हिंदी साहित्य चरित्र के अनुसार तीसरा काल रीतिकाल को माना जाता है। विश्वनाथ प्रसाद मिश्र रीतिकाल को श्रृंगार काल भी कहा है। मित्र बंधुओं ने अलंकृत काल कहा है। रीतिकल को श्रृंगार काल क्यों कहा गया है। इसलिए कहा गया है कि श्रृंगार रचना के कारण कारण ही कहा गया है ।रीतिकाल के अधिकांश कवि श्रृंगार कवि थे। रीतिकाल कवियों के प्री छंद कविता और समय गणित में श्रृंगार और वीर दोनों रसों का उपयोग किया गया था। रीतिकाल में श्रृंगार रस की प्रधानता थी। रीतिकाल की नामकरण आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी नहीं की रीति बद्ध ग्रंथों का सृजन केशवदास ने की। मोहनलाल मिश्र की रचना श्रंगार
संबंधी रचना है। करने इसकी रचना कर्ण भरण श्रुति भूषण भूषण अलंकारी संबंधी ग्रंथ है।
रीतिकाल के कवि अलंकार रस का लक्षण अवश्य करते थे।रीतिकाल के कवि में आचार्य शब्द नाथ थे। बस कवि थे ।रीतिकाल में श्रृंगार रस में मुक्त रचनाएं की जाती थी। काव्य के कितने भेद हैं। यह नियम यही बना कवी के दो भेद एक है। श्रमिक काव्य दूसरा है ।दृश्य का तो हमें यह पता चलता है कि श्रव्य काव्य दृश्य काव्य रीतिकालीन में ही उद्भव हुई।
चिंतामणि त्रिपाठी:
चिंतामणि त्रिपाठी की ग्रंथ कभी कुल कल्पतरू है। इन की अन्य रचनाएं चंद विचार का भी विवेक काव्यप्रकाश रामायण है ।प्रीति ग्रंथ कार के प्रथम कवि चिंतामणि त्रिपाठी को माना जाता है।
बेनी:
इनकी रचनाएं नाक शिखा बैटरी तू है।
महाराज जसवंत सिंह:
इनकी रचना भाषा भूषण चंद्रलोक के आधार पर लिखिए ।महाराज जसवंत सिंह तत्वज्ञान संबंधी रचनाएं लिखिए। इन की अन्य रचनाएं अपरोक्ष सिद्धांत अनुभव प्रकाश आनंद विलास सिद्धांत बोध सिद्धांत चार प्रबोध चंद्रोदय(पद्य मे लिखी)
बिहारी लाल बिहारी की रचनाएं बिहारी सतसई है ।इसमें 700 दोहे में लिखी गई। श्रंगार रस ग्रंथों में ख्याति प्राप्त करने वाले ग्रंथ बिहारी सतसई है। बिहारी की टीका भी है ।जो कृष्ण कवि की टीका हरि प्रकाश की टीका ,लल्लू जी लाल की लाल चंद्रिका टीका ,सरदार करी की टीका, सुरती मिश्र की टीका, बिहारी कुल मिलाकर 50 टिकाऊ को लिखने लगे। उसमें पांच मुख्य है। बिहारी के दोहे रत्न के समान है ।हिंदी साहित्य के बिहारी लाल की भाषा बुंदेलखंडी मिश्रित ब्रजभाषा है। बिहारी लाल की रचित ग्रंथ बिहारी सतसई काव्यप्रकाश है ।बिहारी काव्य धारा में भाव पक्ष तथा कला पक्ष दोनों की प्रधानता थी। गागर में सागर भरना बिहारी लाल की कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय यह भी बिहारी लाल की है। हिंदी साहित्य में बिहारी लाल का स्थान महत्वपूर्ण है।
मंडन:
मंडल ने फुटकल कविता सवाई मैं रचना लिखी ।मंडन की ग्रंथ रत्नावली, रसविलास ,जनक पच्चीसी, जानकी जो कि ब्याह नैन 50 है ।मंडन की मुख्य ग्रंथ रस रत्नावली और रसविलास है।
मतिराम:
मतिराम की ग्रंथ रचना ललित ललाम, साहित्य सागर, लक्षण श्रृंगार,मतिराम सतसई ।मतिराम की भाषा चलती भाषा है। मतिराम की विरोध चित ग्रंथ रसराज है।
भूषण: भूषण वीर रस के प्रसिद्ध रीतिकाल कवि हैं चित्रकूट के सोनकी राजा रुद्र ने भूषण को कवि भूषण की उपाधि दी। भूषण रीतिकाल की हिंदू जाति के प्रतिनिधि कवि थे। गुलशन की प्रमुख रचनाएं शिवराज भूषण है। भूषण की व्यक्तिगत ग्रंथ शिवराज भूषण एवं शिव बावनी है। भूषण की अन्य रचनाएं शिवराज भूषण, शिव बावनी ,छत्रसाल दशक, भूषण उल्लास, दूसन उल्लास, भूषण हजारा ।रीतिकाल के अलंकृत कवि भूषण को कहा जाता है।
कुलपति मिश्र:
कुल परकुलपति मिश्र की प्रमुख ग्रंथ द्रोण पर्व युक्ति तरंगिणी। कुलपति की छाया अनुवाद रस रहस्य काव्यप्रकाश संग्राम चार रहस्य है ।कुलपति की भाषा कुलपति मिश्र संस्कृत के बड़े विद्वान भी थे।
सुखदेव मिश्र:
सुखदेव मिस्त्री के ग्रंथ वृत्त विचार चंद, विचार फाजिल ,अली प्रकाश , रसत रणक ,श्रृंगार लता ,आध्यात्मिक प्रकाश, दशरथ राय मिस्र की आध्यात्मिक प्रकाश में ब्रह्म ज्ञान संबंधी के विषय में लिखी गई। कालिदास, द्विवेदी कालिदास ,द्विवेदी की ग्रंथ, जंजीरा बाद ,राधा माधव बुध मिलन, विनोद कालिदास हजारा
नेवाज नवाज की प्रमुख ग्रंथ शकुंतला नाटक है। यह आख्यान दोहे ,चौपाई, सवैये में लिखी गई ।संयोग श्रृंगार के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं।
देव:
रीतिकाल के प्रतिनिधि कवियों में सबसे अधिक ग्रंथ लिखने वाले कवि थे। इनका ग्रंथ भाव विलास आष्टा याम्बा ,वनी विलास, देव चरित्र, प्रेम चंद्रिका ,जाति विलास ,रस विलास, काव्य रसायन ,सुख सागर तरंग विलास, ब्रह्मदर्शन पच्चीसी ,तत्व दर्शन पच्चीसी, आत्म दर्शन पच्चीसी, जग दर्शन पच्चीसी, रस आनंदलहरी ,प्रेम दीपिका,प्रेम दर्शन
श्रीधर श्रीधर की ग्रंथ जंग नामा है और इनकी अन्य रचनाएं चित्रकारी नायिका भेद है।
सुरती मिश्र:
सुरती मिश्र की ग्रंथ सुरती मिश्र कनौजिया नगर, आगरे बास ,अलंकार माला ,अमर चंद्रिका ,सुरती मिश्र की अन्य रचनाएं।। बिहारी सतसई कवि प्रिया ,रसिकप्रिया गधी के रुप में लिखी गई। इनकी भाषा ब्रजभाषा थी ।इनकी अनुवाद ग्रंथ
ब्रज भाषा में लिखी गई। इनकी रीतिकाल की अन्य रचनाएं, अलंकार माला, रस रत्नमाला सदस्य रस्त ग्राहक, चंद्रिका नक्षिका ,काव्य सिद्धांत रस रत्नाकर
कविंद्र की प्रसिद्ध ग्रंथ रस चंद्रोदय है। इनके अन्य ग्रंथ विनोद चंद्रिका योग लीला रस चंद्रोदय श्रृंगार ग्रंथ है। इसकी भाषा मधुर और प्रसाद पूर्ण है।
श्रीपति:
श्रीपति के रीति ग्रंथ काव्य सरोज है। श्रीपति की अन्य ग्रंथ कवि कल्पद्रुम रत्चागर अनुप्रास विनोद विक्रम गिलास सरोज कलिका अलंकार गंगा श्रीपति को विशद रीति ग्रंथ कार कहते हैं। श्रीपति की प्रौड ग्रंथ
काव्य सरोज है।
वीर:
वीर ने वीर रस में कविता लिखी। इन्होंने देश में नायिका भेद कृष्ण चंद्र का लिखी।
कृष्ण कवि: कृष्ण कवि ने बिहारी सतसई की टीका की रचना की। इनकी भाषा सरल और चलती भाषा है।
रसिक सुमति:
इनकी ग्रंथ उमर उद्दीन हां बुला यह श्रंगार रस ग्रंथ है।
अलीमुहिबखां: इनकी ग्रंथ खटमल बाईसी हास्य ग्रंथ है ।इनको प्रीतम भी कहते हैं ।प्रीतम जी की उत्तम श्रेणी के पथ प्रदर्शक कवि माने जाते हैं।
भूपति: भू पर सच्चाई कंठ भूषण रस रत्नाकर इनकी प्रमुख रचना है।
भिखारी दास :
भिखारी दास की प्रमुख ग्रंथ रस सारांश, छंदार्णव पिंगल ,काव्य निर्णय, श्रृंगार निर्णय, नाम प्रकाश, विष्णुपुराण भाषा (दोहा चौपाई मे लिखी गयी) छंद प्रकाश ,शतरंज शतिक, अमरप्रकाश संस्कृत भाषा में लिखी गई। छंद, रस, अलंकार ,रीति ,गुण, दोष, विस्तृत प्रतिपादन भिखारी दास ने किया।
तोष निधि:
इनकी प्रमुख ग्रंथ सुधा निधि है ।अन्य ग्रंथ विनय शतक, नखशिखा है।
दलपति राय: दलपतराय उदयपुर महाराणा जगतसिंह के नाम पर अलंकार रत्नाकर ग्रंथ लिखा ।इनकी अन्य अलंकार ग्रंथ भाषा भूषण, कुवलयानंद चंद्रलोक है।
सोमनाथ:
सोमनाथ रस पीयूष निधि नामक रीति विस्तृत ग्रंथ लिखी। अन्य ग्रंथ पिंगल, काव्य लक्षण, प्रयोजन, भेद शब्द शक्ति, ध्वनी, भाव, रस, नीति, गुण, दोष विषयों का निरूपण की ।सोमनाथ ने माधव विनोद प्रेम प्रबंध नाटक भी लिखा।
रेसलिंन: रसूलिन की ग्रंथ अंग दर्पण में उपमा, उत्प्रेक्षा अलंकार प्रबोध की गयी। इनकी अन्य ग्रंथ रस प्रबोध दोहे में लिखी गई।
रघुनाथ: रघुनाथ ने काव्य कलाधर, रसिक मोहन, जगत, मोहन, इश्क महोत्सव की रचना लिखी। इन्होंने रसिक मोहन अलंकार ग्रंथ लिखी। काव्य कलाधर रस ग्रंथ है। इनकी इश्क महोत्सव खड़ी बोली भाषा में लिखी गयी।
दूल्ह: दूल्ह ने कवि कुल कंठाभरण अलंकार ग्रंथ लिखा। कवित्त और सवैये
छंद की प्रयोग की।
शंभू नाथ मिश्र: शंभू नाथ मिश्र कि ग्रंथ रस कलोल राज तरंगिणी अलंकार दीपिका दोहे में लिखी गई।
रूप साही :रूप साही की ग्रंथ रूप विलास है।
बैरी साल :बैरी साल कि ग्रंथ भाषा अलंकार ग्रंथ दोहे में लिखी गई।
कुमार मनी भट्ट :इनकी ग्रंथ रस्सी कर सर प्रीति ग्रंथ है।
शिव सहायता: इनकी रचना का ग्रंथ शिव चौपाई जो चौपाई दोहे में लिखी गई।
ऋषि नाथ इन्होंने अलंकार मनी मंजरी
इन्होंने दोहे में लिखी।
रतन कवि: इन्होंने फतेहपुर सन अलंकार ग्रंथ लिखा और दूसरी ग्रंथ अलंकार दर्पण भी लिखा।
दत्त: इन्होंने ललित्य अलंकार ग्रंथ लिखा।
नाथ हरिनाथ नाथ ने अलंकार दर्पण सबसे छोटा ग्रंथ लिखा। रीतिकाल में सबसे छोटा ग्रंथ अलंकार दर्पण माना जाता है। अलंकार दर्पण को नाथ ने कवित्त और दोहे में लिखा।
मनीराम मिश्र इन्होंने छंद छृप्पणी
मैं छंद शास्त्र का
बड़ा ग्रंथ है ।इन्होंने आनंद मंगल को भागवत दशम स्कंद का पद में अनुवाद की।
देवकीनंदन
इन्होंने श्रृंगार चरित्र, अवधूत भूषण,रसफराज, नखशिखा नवरस पूर्ण अलंकार प्रयोग की। इनकी भाषा मजी हुई फ्रॉड भाषा थी।
थान राय: इन्होंने दलेल प्रकाश रीति ग्रंथ लिखे।
ललक दास इन्होंने टिकट प्रकाश रसा वाला ग्रंथ की रचना की।
महाराजा रामसिंह: इन्होंने अलंकार दर्पण रसा वाला रस विनोद अलंकार ग्रंथों को लिखा।
चंदन :चंदन श्रृंगार
सागर ,काव्य भरण ,क्लेश तरंगिणी रीति ग्रंथों की रचना की। चंदन की अन्य ग्रंथ केसरी प्रकाश, चंदन सतसई पासिंक बोध, नखशिखा, नाममाला, पत्रिका बोध, तत्व संग्रह, रीत वसंत, कृष्ण काव्य, लिखी।वे फारसी के अच्छे शायर थे। रीतिकाल के प्रथम कहानीकार भी चंदन को माना जाता है।
भान कवि: इन्होंने नरेंद्र भूषण अलंकार ग्रंथ की रचना की।
बेनी बंदीजन: इन्होंने हिकैत राय प्रकाश अलंकार ग्रंथ और रसविलास रस निरूपण ग्रंथ और भधैवसंग्रह ,भडौव ग्रंथों की रचना की।
विनी प्रवीण:
बेनी प्रवीण के ग्रंथ में मुख्य ग्रंथ नवरस भूषण ,नवरस तरंग ,श्रृंगार भूषण ,नाना राव प्रकाश यह सब अलंकार ग्थ हैं। इनकी भाषा साफ-सुथरी चलती भाषा है।
यशोदा नंद:
यशोदा नंद की प्रमुख ग्रंथ बरवै नायिका भेद। इनकी भाषा संस्कृत और अवधी थी।
जसवंत सिंह :
जसवंतसिंह ज्योति की प्रमुख ग्रंथ एक साई होत्र, सुंदर शिरोमणि इनकी भाषा संस्कृत थी।
करण कवि :करण कवि के प्रमुख ग्रंथ साहित्य रस कलोल यह सब रीति ग्रंथ थे।
पद्माकर भट्ट :
पद्माकर भट्ट के प्रमुख ग्रंथ कविराज शिरोमणि ,जगत विनोद ,पद्मावत यह तीनों दोहे अलंकार ग्रंथ है। प्रभु 50 यह ग्रंथ वैराग्य और भक्ति रस की है ।गंगा लहरी ,विरुदावली ,हिम्मत बहादुर ,राम रसायन यह सब ग्रंथ वाल्मीकि रामायण के आधार पर दोहे और चौपाई में लिखी गई ।यह सारे ग्रंथ भाषा हितोपदेश की थी। पद्माकर भट्ट की भाषा पच डायन भाषा थी ।पद्माकर भट्ट के वीरो चित्र ग्रंथ हितोपदेश सी है। रस नीति से निर्वाचित ग्रंथ रतन हजार है। रीतिकाल के प्रतिनिधि कवियों ने लक्षण ग्रंथ अधिक लिखी।
घनानंद:
घनानंद की बृज भाषा के प्रमुख रीति ग्रंथ कार थे ।वृंदावन में जाकर निंबार्क संप्रदाय को अपनाया ।इनकी प्रमुख ग्रंथ सुजान सागर ,रस अकेली ,वाली कोक सागर, विरह लीला, कृपानंद, गोकुल गीत ।घनानंद को रीतिमुक्त कवि कहते हैं।
महाराज विश्वनाथ सिंह:
महाराज विश्वनाथ सिंह ने ब्रज भाषा में सर्वप्रथम नाटक लिखा। इनकी नाटक का नाम आनंद रघुनंदन है।इनकी कविता वर्णनात्मक और उपदेश आत्मक हैं।
रस निधि :
रस निधि ने रतन हजारा नामक ग्रंथ लिखा। यह श्रृंगार रस के कवि थे। इन्होंने दोहे और फारसी में कविता लिखी।
बोधा :
बोधा की भाषा संस्कृत एवं फारसी थी। इनकी ग्रंथ विरह करिस्क ,इश्क नामा थी।
रामचंद्र पंडित :रामचंद्र पंडित की प्रमुख ग्रंथ चरण चंद्रिका थी ।इसकी भाषा महिग्न थी।
गिरिधरदास :
भारतेंदु हरिश्चंद्र के पिता गिरधर दास थे। गिरिधरदास ब्रज भाषा के कवि थे। गिरधर दास ने संस्कृत हिंदी के अच्छे ज्ञानी थे। गिरधर दास ने निजी पुस्तकालय की निर्माण की ।पुस्तकालय का भवन सरस्वती भवन का नामकरण किया था। गिरधर दास ने 40 काव्य ग्रंथ लिखे। इनकी महाकाव्य ग्रंथ जरासंध वध यह ब्रज भाषा में लिखी गई और भारती भूषण अलंकार ग्रंथ संस्कृत में लिखी गई ।भाषा व्याकरण पिंगल ग्रंथ इन्होंने हिंदी में लिखी।
आधुनिक काल के पूर्व गद्य की अवस्था
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आधुनिक काल के पहले साहित्य की भाषा ब्रजभाषा प्रधान थी। रीति काल तक गद्य की रचना ब्रजभाषा थी। विट्ठलनाथ भक्ति काल में कृष्ण भक्ति शाखा के भीतर श्रृंगार रस मंडन ब्रज भाषा में लिखी ।नाभादास अष्टयाम भगवान राम की दिनचर्या की वर्णन की जो ब्रज भाषा में लिखी ।वाई वाय कुंड
मनीष शुक्ला अगहन महात्मा ,वैशाख महात्मा ,ना सके केतो आख्यान यह सब ब्रज भाषा में लिखी गई। सुरती मिश्र बेताल पच्चीसी संस्कृत भाषा में लिखी । पादरी विलियम कैरी ने बाइबिल की अनुवाद को खड़ी बोली भाषा में की।
खड़ी बोली का गति विकास:
खुसरो जी ने चौधवीं शताब्दी में ब्रजभाषा के साथ-साथ खड़ी बोली में कुछ पद् और पहेलियां भी बनाई। अकबर बादशाह के समय गंग कवि ने चंद छंद महिमा नामक जल् पुस्तक दिल्ली में लिखी। रामप्रसाद निरंजनी ने भाषा योग विशिष्ठ खड़ी बोली भाषा में लिखी।रामप्रसाद निरंजनी प्रथम रावण गद्य लेखक दौलत राम ने जनपद नामक ग्रंथ 700 प्रश्नों में लिखें। रीतिकाल के समाप्त होते होते अंग्रेजों का राज्य देश में प्रतिष्ठित हो चुकी।
आधुनिक काल: आधुनिक काल के समय विक्रम संवत उन्नीस सौ से अब तक माना जाता है। आधुनिक काल को कई नामों से बुलाया जाता है। आधुनिक काल, गद्य काल, नवीन काल,नवजागरण काल,स्वतंत्रता काल, युवावस्था, नवीन यूग और भी कई नामों से बुलाया जाता है ।गद्य का विकास इसी काल में हुआ। गद्य का विकास नाटक, उपन्यास ,कहानी, एकांकी, निबंध ,रिपोर्ताज , रेखाचित्र, जीवनी ,आत्मकथा मे विकास हुआ।
मुंशी सदा सुखलाल: मुंशी सदा सुख लाल इनकी प्रमुख रचनाएं मुक्तक मे लिखी गयी। विलास ज्ञान, उपदेश वाली मुंशी सदा सुख लाल की प्रमुख उपदेश आत्मा ग्रंथ विष्णु पुराण इनकी गद्य रचना योग्य विशिष्ट है। इनकी प्रमुख रचना सुखसागर है। मुंशी सदा सुखलाल की भाषा संस्कृत मिश्रित हिंदी की उर्दू वाली भाषा कहते हैं।
इंशा अल्लाह का वह उर्दू के बड़े शायर थे ।इन्होंने कहानी रानी के तक की कहानी लिखी।जो हिंदी साहित्य केष प्रथम कहानी मानी जाती है। रानी केतकी की कहानी के इंशा अल्लाह लिखी है।
लल्लू लाल जी: लल्लू लाल जी की गति रचना प्रेम सागर है ।इसकी भाषा खड़ी बोली है। इन्होंने हिंदी गद्य में सिंहासन बत्तीसी ,बेताल पच्चीसी, शकुंतला नाटक ,माधव नल यह सब उर्दू और हिंदी में लिखिए लल्लू लाल जी की प्रमुख ग्रंथ लाल चंद्रिका है ।इन्होंने खड़ी वाली भाषा में लिखी।
सदल मिश्र: सदल मिश्र की रचना
नासिकेतोपाख्यान यह खड़ी बोली भाषा में लिखी गई ।सदल मिश्र की नाटक चंद्रावली ब्रज में लिखी।
आधुनिक काल के भाग
पहला भारतेंदु युग ( विक्रम संवत उन्नीस सौ से 1950 तक माना जाता है)
दूसरा द्विवेदी युग विक्रम संवत 1950 से 1975 तक माना जाता है ।तीसरा छायावादी युग चौथा रहस्यवादी युग,पांचवा प्रगतिवादी युग, छठवां प्रयोगवादी युग ,सातवा
हालावादी युग।
आधुनिक काल को प्रथम उत्थान काल, द्वितीय उत्थान काल ,तृतीय उत्थान काल में विभाजित किया गया है।
प्रथम उत्थान काल विक्रम संवत 1925 से लेकर 1950 तक माना जाता है ।द्वितीय उत्थान काल
विक्रम संवत 1950 से लेकर 1975 तक माना जाता है और तृतीय उत्थान काल विक्रम संवत 1975 से लेकर अब तक माना जाता है ।
प्रथम उत्थान काल
( विक्रम संवत 1925 से लेकर 1950 तक)
हिंदी गद्य के प्रवर्तक भारतेंदु हरिश्चंद्र जी को माना जाता है। भारतेंदु की पद्य की भाषा ब्रजभाषा थी।विश्वनाथ सिंह आनंद रघुनंदन नाटक की भाषा ब्रजभाषा थी। भारतेंदु हरिश्चंद्र विद्या सुंदर नाटक ,प्रकाश नाटक बंगला से हिंदी में अनुवाद की।
भारतेंदु हरिश्चंद्र
आधुनिक युग का प्रथम युग भारतीय युग है ।इस युग में गद्य की रचना खड़ी बोली भाषा में की गई और पद्य की रचना ब्रज भाषा में की गई ।भारतेंदु की प्रथम मौलिक नाटक वैदिक हिंसा हिंसा न भवति बांग्ला से हिंदी में प्रथम अनुवाद विद्या सुंदर नाटक इनकी मौलिक नाटक चंद्रावली विषय विषमौषधम् ,भारत दुर्दशा ,नील देवी अंधेर ,नगरी प्रेम जोगिनी, सती प्रताप, दुखनी बाला भारतेंदु की अनुवाद नाटक विद्या सुंदर नाटक, पाखंड विडंबन ,धनंजय विजय ,कर्पूर मंजरी, मुद्राराक्षस, सत्य हरिश्चंद्र ,भारत जननी, दुर्लभ बंधु, शकुंतला। भारतेंदु ने एक कहानी भी लिखी रामलीला हमीर हठ राज सिंह सुलोचना शीलावती सावित्री चरित्र ।इन्होंने एक ऐतिहासिक रचना भी लिखी। कश्मीर को बादशाह दर्पण निबंध का विका।स भारतेंदु युग में हुआ। आधुनिक हिंदी का दूसरा नाम ही खड़ी बोली है। उपन्यासों का प्रारंभ भर्ती नियम से ही प्रारंभ हुआ। भारतेंदु की कविताओं का संग्रह कवि वचन सुधा है ।भारतेंदु की रचनाओं का संग्रह भारतेंदु ग्रंथावली है।
प्रताप नारायण मिश्र:
प्रताप नारायण मिश्र ने कई नाटक लिखे। उनमें से संगीत शकुंतला कभी प्रभाव को संकट जुआरी इन्होंने समझदार की मौत नामक कहानी भी
लिखी।
बालकृष्ण भट्ट:
बालकृष्ण भट्ट की रचनाएं हिंदी प्रदीप
संस्कृत साहित्य पर लिखी गई।
उपाध्याय पंडित बद्रीनाथ चौधरी:
उपाध्याय पंडित बद्रीनाथ चौधरी पहेली के सबसे विलक्षण शैली करी। चौधरी थे इनकी नाटक भारत सौभाग्य इन्होंने प्रयाग रामा गमन ब्रज भाषा में लिखा।
लाल श्रीनिवास दास:
इन्होंने प्रहलाद चरित्र तपता सवर्ण, रणधीर ,प्रेम मोहिनी, संयोगिता, स्वयंवर नाटक लिखा ।लाल श्रीनिवास दास की रणधीर प्रेम मोहिनी रोमियो एंड जूलियट के समान है।
ठाकुर जगमोहन सिंह:
इन्होंने हिंदी के प्रेम पथिक कवि और माधुर्य पूर्ण गद्य लेखक माने जाते हैं। इनकी रचना श्यामा स्वप्न है।
पंडित राधाचरण:
गोस्वामी समाज सुधारक होने के कारण ब्रह्म समाज की ओर आकर्षित हुए ।इन्होंने कई मौलिक नाटक लिखे। सुदामा नाटक ,सती चंद्रावती, अमर सिंह राठौर, सती चंद्रावली में औरंगजेब के दुराचार का वर्णन की। अमर सिंह राठौर में ऐतिहासिक नाटक लिखी।
पंडित अंबिका दत्त व्यास:
पंडित अंबिका दत्त व्यास हिंदी के अच्छे कवि थे। व्यास जी सनातन धर्म को स्वीकार किया। इन्होंने धर्म संबंधी ग्रंथ अवतार मिमामसा लिखी ।इन्होंने काव्य ग्रंथ बिहारी लिखी। इनकी महाकाव्य ग्रंथनिर्माणसा है ।इनकी भाषा ब्रज भाषा है।
पंडित प्रताप नारायण मिश्र:
इनकी संग्रह कंजली कादंबिनी है।
दिव्तीय उत्थान काल:
विक्रम संवत् 1950 से लेकर 1975 तक व्याकरण की शुद्धता और भाषा की सफाई के प्रवर्तक थे महावीर प्रसाद द्विवेदी इन्होंने तीन अनुवादित नाटक लिखें।
पंडित ज्वाला प्रसाद मिश्र ने सीता वनवास संस्कृत भाषा में लिखी।
पंडित अयोध्या सिंह उपाध्याय ठेठ हिंदी का ठाठ, अधिकिला फुल,
को संस्कृत भाषा में लिखी।
महावीर प्रसाद द्विवेदी:
महावीर प्रसाद द्विवेदी भाषा ब्रजभाषा थी। और कविता की भाषा खड़ी बोली भाषा थी। इनके चुटकुले बातों की संग्रह थी। द्विवेदी ने व्याकरण की शुद्धता पर अधिक बल दिया।
पंडित अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध जी :
इन्होंने सर्वप्रथम खड़ी बोली भाषा प्रिय प्रवास की रचना की। सर्वप्रथम खड़ी बोली महाकाव्य प्रियप्रवास है ।जो करुण रस में लिखी गयी।
श्रीधर पाठक:
पाठक ने ऋतुसंहार संत पथिक ब्रज भाषा में लिखे। बाबू जगन्नाथ रत्नाकर ने ब्रज भाषा में अपनी रचना लिखे और अपनी रचना की पद्धति हिंडोल माना। उन्होंने प्रबंध काव्य भी हरिश्चंद्र गंगावतरण ,उद्धव शतक ,रत्नाकर राय, देवी प्रसाद पूर्ण इन्होंने ब्रजभाषा काव्य परंपरा के बहुत प्राउड कवि थे ।इन्होंने बसंत वियोग लिखा।
बाबू मैथिलीशरण गुप्त:
बाबू मैथिलीशरण गुप्त की भाषा साहब सुंदरी संस्कृत भाषा की खड़ी बोली के सबसे प्रसिद्ध प्रतिनिधि कवि गुप्तजी हैं ।गुप्त जी की प्रथम रचना भारत भारती ,भारत की दुर्दशा के बारे में उन्होंने लिखा ।गुप्त की प्रथम प्रबंध कार्य रंग में भंग है ।गुप्त की गीत का व्यवस्था लिक है ।गुप्त की महाकाव्य साकेत है ।गुप्त की पत्ती चंद्रहास, तिलोत्तमा है ।गुप्त की खंडकाव्य पंचवटी है।
पंडित गिरिधर शर्मा :नवरत्न संस्कृत श्लोक में एकांत वादी की रचना लिखी। रवींद्रनाथ ठाकुर की गीतांजलि हिंदी पद्य में गिरधर शर्मा ने ही अनुवाद की स्वर्गीय लाल भगवानदीन इनकी भाषा खड़ी बोली है। पंडित सत्यनारायण ब्जऔर मधुर वाणी में इन्होंने रचना लिखी।
हजारी प्रसाद द्विवेदी :हिंदी साहित्य की भूमिका कबीर नाथ संप्रदाय की रचना की आचार्य चतुरसेन शास्त्री जिन्होंने गद्दी में अंतर स्थल अंतिम संदेश लिखा।
तृतीय उत्थान छायावादी युग 1975 से लेकर 1990 तक मानी जाती है।छायावादी युग कविता में प्रेम और सौंदर्य का वर्णन हुआ।प्रकृति को प्रेयसी सभी प्रिय को ईश्वर के रूप में देखते हैं। छायावादी कविता में रहस्य की भावना दिखाई देती है ।छायावादी में मुख्य रूप से प्रकृति की वर्णन की जाती है। छायावादी युग के प्रमुख कवि जयशंकर प्रसाद ,सुमित्रानंदन पंत ,सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ,महादेवी वर्मा है।
जयशंकर प्रसाद: हिंदी कविता की छायावादी तथा रहस्यवादी धारा के प्रथम कवि जयशंकर प्रसाद जी हैं ।हिंदी साहित्य के प्रथम नाटककार
जयशंकर प्रसाद जी हैं ।जयशंकर प्रसाद की कामायनी विश्व के श्रेष्ठ महाकाव्य में एक है ।जो मानव जीवन की समस्याओं के बारे में वर्णन की गई है ।इन्होंने प्रबंध आत्मक ऐतिहासिक कार्य लहर विरह प्रेम संबंधी रचना लिखी। इनकी भाषा शुद्ध संस्कृत खड़ी बोली भाषा में इन्होंने रचना लिखी।
सुमित्रानंदन पंत: छायावादी के प्रतिनिधि कवि हैं ।सुमित्रानंदन पंत हिंदी साहित्य प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत जी को कहा जाता है। पंत जी कोमल कल्पनाओं की कवि हैं। पंत जी हिंदी सुंदर चित्रण के बेजोड़ कवि भी हैं। पंत जी की प्रारंभिक कविता वीणा पर गीतांजलि का प्रभाव पढा। ग्रंथि असफल प्रेम कथा है। इन्हें चिदंबरा काव्य पर ज्ञानपीठ पुरस्कार 1968 में मिला ।पंत जी की भाषा संस्कृत युक्त खड़ी बोली भाषा है।पंत की महाकाव्य लोकायतन है ।पंत की उपन्यास हार
है।
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला :
इन्होंने इन्होंने काव्य को संगीत के निकट लाने की पत्नी थी।निराला के छंदों के उपनाम स्वर छंद, कछुआ छंद है। इनकी अंतर मुख्य प्रबंध रचना तुलसीदास। इनकी आधुनिक यूरोपीय साहित्य भविष्य का शुभ स्वप्न निराला ने हिंदी में सर्वप्रथम जूही की कली कविता में मुक्त छंद का प्रयोग की। निराला रहस्यवाद, प्रगतिवाद ,छायावाद, प्रयोगवाद युद्ध से जुड़े हैं ।प्रयोगवाद के प्रारंभ कर्ता निराला जी को माना जाता है। इसलिए प्रयोग वादा के जन्मदाता निराला है।
महादेवी वर्मा :
इन्होंने संगीत दर्शन चित्र कला के प्रति वर्मा की रुचि थी। छायावादी के प्रमुख कवि थे। आधुनिक हिंदी साहित्य की मीरा महादेवी वर्मा को कहा जाता है। गीतों की सफल कवियत्री महादेवी वर्मा थी। महादेवी वर्मा की काव्य नीरजा, रश्मि संध्या की दीपशिखा इनकी कहानी बबलू कुमार इनकी निबंध श्रंखला खड़िया इनके संस्मरण अतीत के चलचित्र रेखा चित्र सोना इनकी आलोचना हिंदी का विवेचनात्मक थी। इनकी गद्दी घर और बाहर इनकी भाषा संस्कृत निश्ड खड़ी बोली की सहेली विवेचनात्मक।
भगवती चरण वर्मा :भगवती चरण वर्मा प्रसिद्ध सामाजिक उपन्यासकार हैं। इनकी काव्य मधुर प्रेम संगीत और मानव एक दिन मधुकर है। इनकी कहानी मौज बंदी, छम छम आया एम भूले बिसरे चित्र इनके ऊपर उपन्यास चित्रलेखा सीधी सच्चे रास्ते एवं पतन है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल: नए युग के प्रवर्तक हैं ।आचार्य रामचंद्र शुक्ल वे मनोविज्ञान कसौटी के व्यक्ति थे ।शुक्ल की प्रबंध काव्य बुद्ध चरित्र है ।इनकी भाषा ब्रजभाषा के निकट है ।इन्होंने बुद्ध चरित्र के आधार पर अंग्रेजी में लाइट ऑफ एशिया लिखी।
रहस्यवाद रहस्य का अर्थ है गुप्त या अव्यक्त।
रहस्य वाद का विषय आत्मा परमात्मा जगत है ।हिंदी के रहस्यवाद के आदि कवि कबीर दास मलिक मोहम्मद जायसी मीराबाई तुलसीदास हैं। वास्तविक रहस्यवाद के दर्शन कवियत्री महादेवी वर्मा है। रहस्यवादी के प्रधान प्रवर्तक जयशंकर प्रसाद रहस्यवाद में विषय गीतों के माध्यम से रचना की।छायावादी कवियों ने कथा को रहस्य के रूप में बताया ।सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने तत्वज्ञान के विषयों को अपने विचार
में बताया। सुमित्रानंदन पंत ने प्राकृतिक सौंदर्य से रहस्य विषयों को उल्लेख किया। महादेवी वर्मा ने प्रेम और वेदना के विषयों को उल्लेख किया। जयशंकर प्रसाद ने उस परमात्मा को अपने से बाहर खोजा।
प्रगतिवाद
प्रगतिवाद
का अर्थ है बढ़ना एवं उन्नति करना। प्रगतिवाद में सामाजिक समस्याएं का अधिक प्रस्ताव है। प्रगतिवाद का सृजन उपन्यास, कहानी, नाटक ,निबंध ,आलोचना, कविता के रूप में विकसित हुई। प्रगतिवाद का विस्तार हमसे पत्रिका के द्वारा अधिक प्रगति हुई।
डॉ रामधारी सिंह दिनकर:
प्रगतिवाद के प्रतिनिधि
कवि दिनकर जी हैं इनको सन 1972 में उर्वशी काव्य पर ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला ।दिनकर हिंदी कविता के रत्नहार है। राष्ट्रीय जागरण एवं सांस्कृतिक विकास के ओजस्वी गायक है। संस्कृति के विकास मैं हुई। दिनकर की महाकाव्य उर्वशी एवं कुरुक्षेत्र है। दिनकर की काव्य रश्मिरथी ,रेणुका ,हुंकार ,इतिहास की आंखों। दिनकर की निबंध मिट्टी की ओर ,अर्धनारीश्वर है।दिनकर की जीवनी लोक देव नेहरू है ।दिनकर की बाल साहित्य मिर्च का मजा ,धूप छांव हैं। दिनकर की संस्कृति विषय भारतीय संस्कृति के चार अध्याय है। दिनकर की आलोचना मिट्टी की ओर ,पंत ,प्रसाद, गुप्त ,शुद्ध कविता की खोज दिनकर की खंडकाव्य रश्मिरथी है ।दिनकर की कविता हिमालय के प्रति, मिथिला है। दिनकर की भाषा
नागार्जुन ( वैद्यनाथ मिश्र)
आचार्य नागार्जुन जी राहुल सांकृत्यायन और निराला से प्रभावित हुए। इनकी भाषा खड़ी बोली भाषा है। इनकी कार्य युग धारा, सतरंगी पंखों वाली ,प्यासी पथराही आंखें। नागार्जुन की उपन्यास अग्रतारा ,वल्चरनामा आदि है।
शिवमंगल सिंह सुमन:
इनकी प्रमुख काव्य हिलेला जीवनी की गान है ।सुमन की काव्य ने युग कोयला अत्यंत महत्वपूर्ण इनको सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार ,साहित्य अकादमी पुरस्कार, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पुरस्कार दिया गया।
गजानन माधव:
इनकी पद्य चांद का मुंह टेढ़ा ,भूरी भूरी स्वाद भूत ,इनकी गद्य की रचना एक साहित्य डायरी ,कामायनी ,एक पुनर्विचार। इनकी कहानी काठ का सपना ,उनके उपन्यास विपत्र इनके निबंध नई कविता का आत्म संघर्ष इनकी साप्ताहिक पत्रिका थी नया खून।
मैथिलीशरण गुप्त :सरस्वती का संपादन त्रिवेदी जी के हाथ में आने के उपाय 3 वर्ष पीछे बाबू मैथिलीशरण गुप्त की खड़ी बोली की कविताएं उक्त पत्रिका में निकलने लगी और उनके संपादन का तक बराबर निकलती रही। यहां तक कि प्रबंधन की परंपरा को उन्होंने बनाए रखें और खंडकाव्य लेखन में अपनी महत्वपूर्ण पहचान बना।
जयशंकर प्रसाद हिंदी कवि नाटककार कथाकार उपन्यासकार तथा निबंधकार के रूप में यह विख्यात हुए हिंदी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं ।उन्होंने हिंदी काव्य में छायावाद की स्थापना की। जिसके द्वारा खड़ी बोली के काव्य में कंपनी माधुरी की प्रसिद्ध धारा प्रवाहित हुई और वह का विकसित भाषा बन गई है।
बाबू गुलाब राय गुलाब राय की रचना दो प्रकार की है। दार्शनिक और साहित्य गुलाब राय जी के दार्शनिक रचनाएं उनके गंभीर अध्ययन और चिंतन का
परिणाम है।
श्यामसुंदर
दास यह एक उच्च कोटि के संगठन करता और व्यवस्थापक थे। इनकी हिंदी सेवाओं से प्रसन्न होकर अंग्रेज सरकार ने रायबहादुर हिंदी साहित्य के सम्मेलन में साहित्य वाचस्पति और काशी हिंदू विश्वविद्यालय में डिलीट की सम्मान उपाधि प्रदान की।
माखनलाल चतुर्वेदी भारत के ख्याति प्राप्त कवि लेखक एवं पत्रकार थे। जिनकी रचनाएं अत्यंत लोकप्रिय हुई। सरल भाषा और ओज पूर्ण भावनाओं से वे सीधे पाठक के दिल को छू लेते थे। इसी कारण वे अत्यंत लोकप्रिय हुए।
धर्मवीर भारती आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रमुख लेखक कवि नाटककार और सामाजिक विचारक थे। एक समय के प्रख्यात साप्ताहिक पत्रिका धर्म युग के प्रधान संपादक भी थे।
सूर्यकांत
त्रिपाठी निराला हिंदी कविता की छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं। अपने समकालीन अन्य कवियों में से अलग उन्होंने का हिसाब नहीं कल्पना का सहारा बहुत कम लिया है और यथार्थ को प्रमुखता से चित्रित किया है। यह हिंदी के मुक्त छंद के प्रवर्तक भी माने जाते हैं।
वृंदावन लाल वर्मा हिंदी साहित्य के वाल्टर स्कॉट कहे जाने वाले इस महान व्यक्ति का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित उपन्यास नाटक लेख आदि गद्य की रचनाएं लिखीं।
राहुल सांकृत्यायन इन्हें महा पंडित की उपाधि दी गई है ।यह प्रतिष्ठित बहुभाषावाद थे और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में उन्होंने यात्रा वृतांत यात्रा साहित्य तथा विश्व दर्शन के क्षेत्र में साहित्यिक योगदान दिए।
आचार्य नागार्जुन हिंदी और मैथिली के अप्रतिम लेखक और कवि थे ।उनका असली नाम वैद्यनाथ मिश्रा था।
मोहन राकेश नई कहानी के आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर के रूप में प्रख्यात मोहन राकेश एक अच्छे नाटककार भी रहे इनका योगदान साहित्य में अविस्मरणीय है।
फणीश्वर नाथ रेनू हिंदी के प्रमुख साहित्यकार के रूप में विवेक थे। इन्होंने प्रेमचंद्र के बाद के काल में हिंदी में श्रेष्ठतम रचनाएं की इनके पहले उपन्यास मैला आंचल को बहुत ख्याति मिली थी। जिसके लिए उन्होंने पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया।
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी कुशल संपादक साहित्य वाचस्पति और मास्टर जी के नाम से विख्यात है। हिंदी के सर्वश्रेष्ठ निबंध कारों में से एक है ।वह राजा नंद गांव की हिंदी त्रिवेणी के तीन धाराओं में से एक है।
सुभद्र कुमारी चौहान हिंदी के सुप्रसिद्ध कवियत्री और लेखिका के रूप में पहचानी जाती है। बाल्यकाल से ही लेखन का नशा चढ़ गया था ।इनको कई देश भक्तों के ओतप्रोत गीतों की रचना का श्रेय उन्हें जाता है। इनकी प्रमुख रचना मुकुल एवं त्रिधारा है।
निर्मला वर्मा: यह हिंदी के आधुनिक कलाकारों में से एक मूर्धन्य कथाकार और पत्रकार थे शिमला में जन्म निर्मला वर्मा जी की मूर्ति देवी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
सच्चिदानंद
हीरानंद वात्स्यायन अग्य प्रतिभावान कभी शैली का कथा साहित्य को एक महत्वपूर्ण मोड़ देने वाले कथाकार ललित निबंधकार संपादक और सफर अध्यापक के रूप में यह माने जाते हैं।
अज्ञेय की काव्य संग्रह आंगन के पार द्वार, सागर मुदा, चिंता मरुस्थल, बावरा ,अहेरी आदि।
इन की अन्य रचनाएं त्रिशूल, ऑल वालों सबरंग ,एक बूंद सहसा उछली आदि ।इनकी भाषाएं फारसी बंगला एवं बोलचाल की भाषा ।
वस्तुतः अज्ञेय की रचनाएं उनके संवेदनशील कभी व्यक्तित्व और विचार एक मानस की है।हिंदी के प्रेमचंद के बाद यथार्थवादी धारा के प्रमुख कहानीकार हैं। यशपाल उन्हें गोकरी कहते थे।
अशोक चक्रधर :यह हिंदी के मंची कवियों में से एक है ।उनकी लेखनी हंसी विधा के लिए मानी जाती है ।कवि सम्मेलनों के वाचिक परंपरा को घर-घर में पहुंचाने का श्रेय उन्हीं को जाता है।
इस्मत चुगताई :उर्दू साहित्य के सर्वाधिक विवादास्पद और सर्व मुख लेखिका जिन्होंने महिलाओं के सवालों के लिए नए सिर से उठाया उनके साहित्य में स्पष्ट होता है।
इनकी मुख्य रचनाएं लिफाफा ,टेढ़ी लकीर ,एक बात गलियां ,जंगली कबूतर, एक कतरा ,यह खून दिल की दुनिया, वह रूपनगर छुईमुई
उनकी भाषा हिंदी एवं उर्दू है।
उदय प्रकाश: चर्चित कवि कथाकार पत्रकार और फिल्मकार हैं ।इनकी कुछ कृतियों में अंग्रेजी जर्मन जापानी एवं अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद भी उपलब्ध है ।लगभग समस्त भारतीय भाषा में रचनाएं में अनुदित है।
इनकी मुख्य कहानी मोहनदास है। इनकी प्रमुख कविताएं कारीगर कबूतर कबूतर उनकी भाषा सरल हिंदी है।
कुंवर नारायण: नई कविता आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर कुंवर नारायण अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के प्रमुख कवियों में 1 दिन का समय 1959 है। कुंवर नारायण को अपनी रचना सिलता में इतिहास और मिथक के जरिए वर्तमान को देखने के लिए जाना जाता है। इनकी प्रकाशित कृतियां कविता संग्रह है चक्रव्यूह तीसरा सप्तक फ्री प्रेस हम तुम अपने सामने हास्य के बहाने इनकी खंडकाव्य आत्मा की जय आवाज अस्त्रों के बहाने ।उनके कहानी संग्रह आकारों के आसपास इनकी भाषा मानकीकृत रूप को मानक हिंदी कहा जाता है ।विश्व की एक प्रमुख भाषा है ।हिंदुस्तानी भाषा के एक महान एकीकृत रूप है। जिसमें संस्कृत के तत्सम तथा तद्भव का प्रयोग अधिक है। अरबी, फारसी शब्दों का कम है।
जैनेंद्र कुमार :प्रेमचंदोत्तर उपन्यास कारों में जैनेंद्र कुमार का विशिष्ट स्थान है। हिंदी उपन्यास के इतिहास में मनोविश्लेषणात्मक परंपरा के प्रवर्तक के रूप में माने जातेहैं। जैनेंद्र कुमार की भाषा साहित्य खड़ी बोली है ।इनकी भाषा मनोवैज्ञानिक के अनुकूल सरल सहज तथा प्रवाह में ही है ।उन्होंने अपनी भाषा में तत्सम तद्भव शब्दों के साथ-साथ यथा प्रयोजन उर्दू फारसी व अंग्रेजी शब्दों का भी प्रयोग किया है। इनकी प्रमुख रचना पंजाबी है ।इनकी प्रमुख उपन्यास परख है।
यशपाल: यह आधुनिक हिंदी साहित्य की कथा कारों में प्रमुख हैं।यह साथ एक क्रांतिकारी एवं बड़े घर दोनों रूपों में जाने पहचाने जाते हैं। अपने विद्यार्थी जीवन में से ही स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ने के कारण इनकी लेखनी में हमें क्रांति के झलक दिखाई देती है। इनकी कहानी संग्रह पिंजरे की उड़ान, वह दुनिया ,तर्क का तूफान, ज्ञानदान फूलों का कुर्ता पत्र अनुकूल भाषा एवं कहानी की उद्देश्य मित्रता सर्व व्याप्त है। उनकी भाषा जन मानव की सामान्य भाषा है। कहीं-कहीं संवेदनात्मक रूप में भाषा दिखाई देती है।
नरेंद्र कोहली कालजई कथाकार एवं मनीषी डॉ नरेंद्र कोहली की गणना आधुनिक हिंदी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ रचनाकारों में होती है। कोहली जी ने इस साहित्य के सभी प्रमुख विधाओं यानी यथा उपन्यास व्यंग्य नाटक कहानी एवं डॉन विधाओं यथा संस्मरण निबंध पत्र आदि और आलोचनात्मक साहित्य में अपनी लेखनी चलाई उन्होंने सत्ता धिक श्रेष्ठ ग्रंथों का सृजन किया हिंदी साहित्य में महाकाव्य नामक उपन्यास की विधा को प्रारंभ करने का श्रेय नरेंद्र कोहली को ही जाता है। इन्होंने 19 उपन्यासों को समेटा उनकी महाकाव्य आत्मक उपन्यास श्रृंखलाएं महासमर है 850 में लिखा गया ।तोड़ो काश तोड़ो इसमें पांच है। उपन्यासों का जोड़ा गया। अभ्युदय दीक्षा आदि 5 उपन्यास है की गुणवत्ता एवं मात्रा दोनों की दृष्टि से अपने पूर्व भर्तियों से कहीं अधिक है ।इन्होंने हिंदी भाषा में ही साहित्य की रचना की।
जगदीश चंद्र माथुर :आकाशवाणी में काम करते हुए हिंदी के लोकप्रियता के विकास में इनका महत्वपूर्ण योगदान दिया।
भीष्म साहनी :हिंदी साहित्य में प्रेमचंद की परंपरा की अग्रणी लेखक के रूप में यह माने जाते हैं ।मानवीय मूल्यों के लिए हिमायती रहे और उन्हें विचारधारा को अपने ऊपर कभी हावी नहीं होने दिया।
हिंदी एवं उर्दू एवं संस्कृति इनकी भाषा थी इन्होंने कहानी उपन्यास नाटक एवं उन वादों की रचना की जैसे मेरे प्रिय कहानियां झरोके तमस बसंती माया दास की माठी, हानूश कबीरा खड़ा बाजार में ,भाग्य रेखा ,पहला पाठ, भटकती रात ,आधी इनकी भाषा रूसी और पंजाबी इनको बहुत ज्यादा ज्ञात था।
शमशेर बहादुर सिंह :हिंदी कविता में अनूठे ,मां साल इंद्री बिंदुओं के रचयिता शमशेर आजीवन प्रगतिवादी विचारधारा से जुड़े रहे हैं। आधुनिक हिंदी कविता में प्रगतिशील कवि हैं। यह हिंदी तथा उर्दू के विद्वान हैं। नई कविता धारा किस से चली है ।इनके मुख्य काव्य संग्रह है ।कुछ कविताएं हैं,कुछ कविताएं और कविताएं ।इन्होंने अपने उर्दू और हिंदी दोनों भाषा में इन्होंने अपनी रचना की थी।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना :कवि एवं साहित्यकार थे ।पर जब उन्होंने दिनमान का कार्यभार संभाला। तब समकालीन पत्रकारिता के समक्ष उपस्थित चुनौतियां को समझा और सामाजिक चेतना जगाने में अपना अनुकरणीय योगदान दिया। इनकी मुख्य रचनाएं काव्य संग्रह में कोठियों पर टंगे लोग इनकी लघु उपन्यास पागल कुत्तों का मसीहा ।इनकी नाटक बकरी है ।इनकी बाल साहित्य बबूता का जूता। इनकी भाषा शैली में चित्रात्मक तथा स्पष्टता के दर्शन होते हैं।
कुर्रतुल एन हैदर: ऐसी आपके नाम से जाने जाने वाली एनी नाम से आप एक प्रसिद्ध उपन्यासकार एवं लेखिका है। आधुनिक काल के और हस्तियों से भी अगर आपकी पहचान करने लगूं तो इस प्रकार की कई पतियों तैयार हो जाएंगे। पर पुस्तकों को कहीं भी किसी प्रकार का विराम नहीं रहेगा ।इससे एक बात तो हमें समझ में आ जाती है कि आधुनिक काल के साहित्य रचनाकार का विकास खुलकर हुआ है ।शायद की कोई सीमा नही।साहित्य समाज का दर्पण है। समाज से उठी विषयों को ही साहित्यकार अपने जीवन को जोड़ते हुए साहित्यकार फिर से दोबारा समाज को उसी विषय को दे देता है ।अपने विचारों को व्यक्त करता है ।आधुनिक भाषा में सभी साहित्यकारों ने लगाया है। आपके अवलोकनार्थ खुल कर लिखो गागर में सागर वाले कहावत तो आपने सुना ही होगा। अब आपके जीवन में और
में परिवर्तन लाएं। इनकी भाषा उर्दू विधाएं हैं।उर्दू के साथ-साथ हिंदी भाषा में भी इन्होंने अपनी रचना लिखिए इन
की पहली कहानी बी चुहिया है।
राही मासूम रजा: इन्होंने उर्दू में एक महाकाव्य 1857 हिंदी में क्रांति कथा नाम से प्रकाशित हुआ। आधा गांव, नीम का पेड़ ,कटरा बी आर्जू, ओस की बूंदे जैसे 75 प्रसिद्ध उपन्यास लिखिए। इनकी भाषा उर्दू एवं हिंदी है।
श्रीलाल शुक्ल: इन्होंने पहला उपन्यास सुनी घाटी का सूरज 1997 में प्रकाशित की ।इनकी लोकप्रिय उपन्यास राग दरबारी 1968 में छापी गई ।राग दरबारी का 15 भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी नीति अनुवाद प्रकाशित हुआ। इनकी भाषा अंग्रेजी ,उर्दू ,संस्कृत और हिंदी भाषा है।
जगदंबा प्रसाद दीक्षित: हिंद की पटकथा: जगदंबा प्रसाद दीक्षित की रचना कलयुग ,सर जहां, नायायाज, जख्मी जमीन ,फिर तेरी कहानी, याद आई ,जानम इनकी भाषा हिंदी है।
कमलेश्वर: आंधी, मौसम, सारा, आकाश ,रजनीगंधा, राम बलराम जैसे पट कथाएं उनकी कलम से लिखी गई थी। एक सड़क, 57 गलियां ,डाक बंगला ,लड़ते हुए मुसाफिर कहानी लिखी थी। कमलेश्वर की भाषा शैली आम आदमी की साफ-सुथरी एवं सरल हिंदुस्तानी भाषा है।
चिन्ना मुद्गल: इन की प्रमुख रचनाएं आवां,गिलीगडु,एक है। यथार्थ पर भाषा प्रयोग की पड़ताल करते हुए जहां परिवार और समाज में अलग-अलग स्तरों पर बदलती भाषा के रंग देखे जाते हैं।
उदय प्रकाश: उदय प्रकाश की प्रमुख रचनाएं मोहनदास कहानी, सुनो कारीगर, अबूतर कबूतर यह दोनों कविताएं ।इनकी भाषा हिंदी भाषा है।
असगर वजाहत: सात आसमान उपन्यासों में लिखा इसमें सात परियों का वर्णन किया ग।या है। सामाजिक स्थिति का वर्णन किया गया है। इनकी पहली नाटक फिरंगी लौट आए।
प्रियदर्शी
दर्शन की भाषा सरल हिंदी है। इनकी प्रमुख कहानी संग्रह उसके हिस्से का जादू है। इनकी लेख संग्रह इतिहास गड़ता समय है।
चंदन पांडे :उनकी भाषा हिंदी है ।यह जो काया की माया लिखी उनकी कविता का नया संग्रह है।
भगवत दास मोखल: भारत के प्रमुख शिक्षा शास्त्री स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दार्शनिक एवं कई संस्थापकों के संस्थापक थे इन्होंने हिंदी और संस्कृत में 30 से भी अधिक पुस्तकों का लेखन की भाषा सरल हिंदी और उर्दू थी।
प्रसादराव जामि
साहित्यकार एवं संपादक
6301 260 589
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