हिंदी साहित्य वैश्विक परिदृश्य
डॉ.एन.
डी. नरसिम्हाराव जीका जन्म
आंध्रप्रदेश के विशाखपट्टणम में ३१ अक्टूबर १९३५ में हुआ। उनकी मातृ भाषा तेलुगु
है। उनके पिता सत्यनारायणमूर्ति जी नेभारतीय सेना में काम किया। दूसरा विश्व युद्ध
में युद्ध क्षेत्र में उन्होंने सक्रिय भाग लिया।
माता रुक्मिणी बाई साधारण गृहिणी है। उनके बडे भाईने वायु सेना में काम
किया। ऐसी पृष्ठभूमि से प्रभावित नरसिम्हाराव जी राज भाषा हिन्दी - सेवा के प्रति
आकर्षित हो गये। उन्होंनेबी.
एस. सी.
गणित करने के बाद बी.
ए. हिन्दी,
एम.
ए. हिन्दी तथा हिन्दी से
सम्बंधित१५ परीक्षाओं में उत्तीर्ण होकर हिन्दी के प्रति अपनी निष्ठा को साबित
किया। उन्होंने अपने ५३ साल की अवस्था में
(१९८८) आचार्य पी.आदेश्वरराव
जी, आंध्र विश्वविद्यालय के
निर्देशन में "भारतेन्दु हरिश्चंद्र और कंदुकूरीवीरेशलिंगम के नाटकों में
हास्य और व्यंग्य " विषय पर एम.फिल
करके हिन्दी के प्रति अपनी विशेष रुचिको दर्शाया।
७७ वर्ष की आयु में डॉ.
ऋषभ देव शर्मा, आचार्य एवं विभाग
अध्यक्ष, उच्च शिक्षा व
शोध संस्थान, दूर शिक्षा
निदेशालय, दक्षिण भारत
हिन्दी प्रचार सभा, हैदराबाद
शाखा के निर्देशन में ''हिन्दी
- तेलुगु दलित आत्मकथाओं का तुलनात्मक अध्ययन''
पर
शोधकार्य किया। इतना ही नहीं सन १९६० में ही उन्होंने हिन्दी - टंकण में
उत्तीर्णता प्राप्त की।
राष्ट्रभाषा
हिन्दी -
सेवक:
नरसिम्हाराव जी विजयनगरम
में हिन्दी विद्यालय (१९५३)
के प्रथम विद्यार्थीरहे। हिन्दी प्रचारक आदुर्तिसूर्यनारायण मूर्ति जीऔर अपने गुरु
चिर्रावूरीसुब्रहमण्यमजीसे प्रेरणा प्राप्त करके हिन्दी प्रचार कार्यक्रम में भाग
लिया। हिन्दी अध्यापक के रूप में अपना जीवन आरंभ किया। १९६९ से
१९९० तक उन्होंने केन्द्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान में हिन्दी
प्राध्यापकका, १९९० से १९९२ तकसहायक
निर्देशक का काम किया। साथ ही उन्होंने शारदा
हिन्दी विद्यालय की स्थापना की। इस विद्यालय में शाम ५ बजे से ७ बजे तक दक्षिण
भारत हिन्दी प्रचार सभा द्वारा आयोजित परीक्षाएँ - प्राथमिका से साहित्य रत्न तक
की पढ़ाई की जाती है। इस विद्यालय में
हिन्दी की पढ़ाई के साथ दोहा पठन, पद्य
पठन, कहानी या निबंध लेखन आदि
प्रतियोगिताओं का निर्वाह करके विद्यार्थियों में हिंदी के प्रति रुचि बढ़ाने की
सफल प्रयास किया। सन १९६० से आज तक करीब ६००००विद्यार्थिनी
- विद्यार्थीलाभान्वित हुए हैं। नरसिम्हाराव जी ने अब तक शारदा विद्यापीठ के
द्वारा निःशुल्क पढ़ा रहे हैं। उनके विद्यार्थी
हिन्दी अध्यापक, प्राध्यापक,
शिक्षक,
अनुवादक,
टंकक,
हिन्दी
अधिकारी जैसी सरकारी नौकरियों में विराजमान हैं। उन्होंने सरकारी कार्यालयों में
काम करने केलिए आवश्यक हिन्दी टंकण का शिक्षण सन १९७५ में आरंभ किया। ३०विद्यार्थियाँ इस में सफल हो
गये। कंप्यूटर के आगमन से टंकणसीखनेवालों
की संख्या कम हो गयी। नरसिम्हाराव जी ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के तत्वावधान
में आचार्य पी.आदेश्वरराव जी
द्वारा संपादित ''दक्षिण
भारत के हिन्दी साहित्य का इतिहास'' नामक
बृहत ग्रंथ के मसौदे का २५०० पृष्ठों का टंकण
करके अपनी कार्यक्षमता का परिचय दिया।
राजभाषा
हिन्दी - सेवक:
डॉ.एन.डी.नरसिम्हाराव
जी ने सन १९७० से आज तक राजभाषा हिन्दी संबंधी कार्यों में अपना सहयोग दे रहे
हैं। दिल्ली में पत्राचार पाठ्यक्रम द्वारा
पंजीकृत छात्रों को १९९१-९२ में योजना आयोग भवन में व्यक्तिगत संपर्क का कार्य
किया। १९९२ में अखिल भारतीय हिन्दी प्राध्यापकों के नवीनकरण कार्यक्रम में भाग
लेकर प्रवीण पाठ्यक्रम का दिशा निर्देशन किया।
केन्द्रीय गृह सचिव के तत्वावधान में श्री यार्लगड्डा लक्ष्मी प्रसाद जी
द्वारा आयोजित अंतर राष्ट्रीय विचार संगोष्ठी में भाग लिया। उसके अलावा १२ राष्ट्रीय विचार संगोष्ठियों में
भाग लेकर प्रपत्र वाचन करके तीन बार सम्मानित हुए। उन्होंने राज्य सरकार की शिक्षक
अर्हता परीक्षा, हिन्दी पंडित
प्रवेश परीक्षा, हिन्दी पंडित
नियुक्ति परीक्षा, स्नातकोत्तर
प्रवेश परीक्षा के लिए आवश्यक प्रशिक्षण कार्य करने के द्वारा हिन्दी के प्रति
सम्मान की भावना को दर्शाया।
हिन्दी
साहित्य -
सेवक:
डॉ.एन.डी.नरसिम्हाराव
जी हिन्दी जगत में रहकर हिन्दी साहित्य की सेवा करना अपना भाग्य समझते हैं। उन्होंने हिन्दी की विभिन्न साहित्यिक संस्थाएँ
- हिन्दी साहित्य किरण, सृजन,सक्रिय
कार्य किया।स्रवंती, स्मारिका,
‘’सुगंध’’ (विशाखा
इस्पातकी पत्रिका)
आदि में अनेक लेख लिखे हैं। अखिल भारतीय राज्यभाषा संस्थान,
देहरादून
की वार्षिक पत्रिका में लगातार दो वर्ष उनके लेख प्रकाशित करके अपनी हिन्दी
साहित्य सेवा का परिचय दिया। हिन्दी
साहित्य से संबंधित विभिन्न विषयों पर सरल हिन्दी में व्याख्यान देने में उनकी
प्रतिभा प्रशंसनीय है। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा ने उन्हें आंध्रशाखाकीव्यवस्थापिका
के सदस्य के रूप में नियुक्त किया। आंध्र विश्वविद्यालय में श्री चेंबोलुशेषगिरि
राव जी द्वारा आयोजित हिन्दी में प्रथम अष्ठावधान में पृच्छक के रूप में भाग लेकर हिन्दी के प्रति अपनी
प्रतिभा को दर्शाया। उन्होंने हिन्दी सेवा से सम्बंधित सभी क्षेत्रों में अपनी
प्रतिभा को दिखाया। हिन्दी में आशुलिपि का
भी प्रशिक्षण दिया।
नरसिम्हाराव जी की
हिन्दी - सेवा की प्रशंसा करते हुए अनेक संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित किया। ५० साल से अधिक साल निःशुल्क हिन्दी प्रचार
केलिए हिन्दी विभाग आंध्र विश्वविद्यालय ने उन्हें सन १९९७ में विशिष्ट हिन्दी
सेवा के रूप में सम्मानित किया। आराधना
कल्याण संस्था ने उन्हें ''उत्तम
हिन्दी सेवक'' - उगादि
पुरस्कार से सम्मानित किया। २००६ में मदरथेरीसा कल्याण संस्था ने''सेवामित्र''
की
उपाधि से सम्मानित किया।एच.
पी.सी.एल.,
एम.एम.टी.
सी., ड्रेडजिंगकार्पोरेशन,
जूट
कार्पोरेशन आदि प्रमुख संस्थाओं ने हिन्दी समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में
उन्हें सम्मानित किया। भारत के प्रमुख केंद्रीय सरकारी विभाग - रेलवे,
टेलीकॉम,
आयकर,
केंद्रीय
उत्पाद शुल्क विभागों ने हिन्दी उत्सवों में कई बार उन्हें सम्मानित किया। दक्षिण
भारत हिन्दी प्रचार सभा के रजतोत्सव, स्वर्णोत्सव,
वज्रोत्स्व में उन्हें विशिष्ट हिन्दी सेवक के रूप में
सम्मानित कियागया। सन २०१९ में दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के शतमानोत्सव में
नरसिम्हाराव जी को अपनी शोध कार्य के लिए स्वर्ण पदक दिया गया। इस महोत्सव में
भारत के राष्ट्रपति श्री रामनाथकोविंद मुख्य अतिथि के रुप में पथारे हैं। २०१४ में
जीवन साफल्य पुरस्कार; २०१५
में आंध्रप्रदेश के उत्तम नागरिक पुरस्कार,
२०१६
में आंध्र प्रतिभा रत्न और २०१८ में डॉ.
एस.राधाकृष्णन राष्ट्रीय
पुरस्कार से सम्मानित हैं। इनके अलावा विशाखपट्टणम और विजयनगरम के अनेक विद्यालय,
महाविद्यालय
और सरकारी संस्थानों ने उनकी सेवा की प्रशंसा करते हुए उन्हें सम्मानित किया।
गांधी शांति समिति द्वारा आयोजित उत्सव में मुख्य अतिथि के रुप में भी वे सम्मानित
हैं।तेलुगु भाषी नरसिम्हाराव जी इतने सम्मान व पुरस्कारों से पुरस्कृत होना सभी
तेलुगु भाषी हिन्दी प्रेमियों के लिए बहुत गर्व की बात है।
''अपनी
मंजिल तक वेही लोग पहुँचा करते हैं,
जो कड़ी धूप में छाँव नहीं मंजिल ढूँढ़ते हैं।''
यह
बात नरसिम्हाराव जी के विषय में सही निकला।८५ वर्ष की आयु में नरसिम्हाराव जी निःशुल्कहिन्दी
प्रचार में व्यस्तहैं। सरकारी सेवा से
निवृत्ति के बाद १९९१ से विशाखापट्टणम में रहते हुए भी विजयनगरम में स्थित हिन्दी
विद्यालय की जिम्मेदारी भी निभा रहे हैं। दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के वैभव
को बढ़ाने में वे हमेशा आगे रहते हैं। २०११ में उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो गय।
इतने दुख को सहते हुए उन्होंने अपने शोध प्रबंध को सही समय (२०१२)
पर
प्रस्तुत किया। हिन्दी की सेवा उनके लिए
मरहम - पट्टी है। हिन्दी सेवा उनकी जीवन की औषधि है। नजदीक से उनका अध्ययन करने
वाले सभी कह सकते हैं कि वे विशिष्ट हिन्दी - सेवी ही नहीं आदर्श गुरु और आदर्श
पिता भी हैं। उनकी बेटी भी पिता के मार्गदर्शन में निःशुल्क हिन्दी की सेवा कर रही
है।
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