हिंदी साहित्य वैश्विक परिदृश्य
जनजीवन के सक्ष्म एवं जटिल यथार्थ और जनवादी साहित्यकार और समकालीन
हिंदी साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर श्रीगोविन्द मिश्र वर्तमान उपन्यास कारों में अलग
पहचान बनाएँ हगोविन्द मिश्र का जन्म १ अगस्त सन
१९३९ आतरा उत्तरप्रदेश में हुआ | गोविन्दमिश्र
हिंदी संसथान भारतीय भाषा परिषद्,साहि थ्यअकादमी दिल्लीत थाव्यास
सम्मान द्वारा साहित्य सेवाओं के लिए सम्मानित हुए हैं | गोविन्द
मिश्र के दस उपन्यास और तेरह कहानी संग्रह
प्रकाशित हुए हैं | यात्रावृत्तांतकार के रूपमें इनकी पाँचरचनाएँ
प्रकाशित हुई हैं |' साहित्य का सन्दर्भ ',' कथा - भूमि ','संवादअनायास ', और ' समय और
सर्जना
' रचनाओं के माध्यम से गोविन्द मिश्र साहित्य निबंधकार के रूप
में ख्याति प्राप्त की है |
बाल साहित्यकार के रूप में भी गोविन्दमिश्र
प्रसिद्धि हुए हैं |' वह अपना चेहरा',' उतरथिहुएधुप','लाल पीली जमीन','हुज़ूरदरबार','तुमारी
रोशनी में',
'घिर समीर' 'पाँच
आंगनोंवाला घर',फूल इमारतें और बंदर','कोहरे में कैदरंग' और 'धुल पौधों पर' गोविन्द मिश्र के उपन्यास हैं | गोविन्द मिश्र के उपन्यासों में
सरकारी दफ्तरों का वातावरण, वहाँ
काम करनेवाले श्रामिक के बारे मैं और सह श्रामिक बीच के मतलबी संबंदों के बारे में
सजीव चित्रण कीए हैं | श्रमिक का अर्थ हैं "आजीविका चलनेवाला व्यक्ति", और विमर्श का अर्थ है "सोच विचार कर तथ्य या वास्तविकता का पता लगाना| श्रमिक शब्द का अर्थ गांधीजी ने बड़ी ट्टढ़ता के साथ कहाँ - " एक श्रमिक मात्र उथपधान का एक साधन ही नहीं है , वह अपना
परिवार उधोगत था देश के प्रति उतरदायित्व का एक भाव रखने वाला अनिवार्यतःएक व्यक्ति
है
| अतः वह एक कर्तव्य प्रबुद्ध प्रति एक अच्छा पडोसी तथा एक बुद्धिमान
नागरिक के रूप में आर्थिक उथ्पन की अभिलाषा करता हैं।" "वह अपना चेहरा" उपन्यास में गोविन्द मिश्र जी
ने सरकारी दफ्तरों में काम करनेवाले किस प्रकार की मानसिक संगर्ष का और कार्यालयों
में घटित प्रति दिन आये परिस्थितियों का और शासन व्यवस्था में भ्रष्टता और अनाचार का
सजीव चित्रण श्रमिक जीवन व्यवस्था के भ्रष्ट चेहरे का यथार्थ चित्रण एक दुसरे के नीचे
दिखाने की कोशिश समाज का एक सजीव चित्र आदि का चित्रण कीए हैं |
'वह अपना चेहरा' का नायक हैं 'मैं(शुक्ला)
जो एक सरकारी दफ्तर में काम करता हैं वह अपने अधिकारियों की
रक्षा करते–करते स्वयं विवस्ता का शिकार बनजाता हैं।केशवदास उसका सीनियर अधिकारी हैं।केशवदास
उनके सहकर्मचारी रचना के साथ उसके अवांछनीय संबंन्ध हैं। रचना शुक्ल के पुरानी मित्र
है दोनों ट्रेनिंग कॉलेज में एक साथ नाटक खेल था और रचना के प्रति प्रेम भावनाएं उत्पन्न
हुई थी।लेकिन जब दिल्ली के दफ्तर में रचना की बदलती बिगाड़ी रूप देखकर शुक्ला विस्मय
हो जाता है।रचना अपने कैरियर को बचाने के लिए और पदोन्नति प्राप्तकरने के लिए गंदे
और घिनौनी अधिकारी केशव दास के साथ उसके अवांछनीय संबंध रखती है इसी कारण केशवदास (मैं) की उपेक्षा करके रचना को अनावश्यक और अनुचित रूप से पदोन्नति
देता रहता है । और (मैं) को नीचे दिखाने की
कोशिश करता रहता है।केशवदास और शुक्ला के बीच टकराहट और नफरत पैधा होती रहती है।शुक्ला
निसहाय हो जाता था और सोचताता की-"मैं सोचताता हूँ सिर्फ
काम के सहारे जिंदगी काटना मुश्किल है। कोई-न–कोई फल लेना चाहिए।"(मैं) ने कहा- मैं घिनौनी अधिकारी
केसवदास के हरकतों से तंग आजाता है और अपने आपको जाने–अनजाने
में विवशता का शिकार बनकर स्वयं को अपमानितमहसूस करता है और अपमान का बदला लेने के
लिए सोचता है और केसवदास की बेटी के लिए सोचता है और केसवदास की बेटी रेशमा से दोस्ती
करता है और उस के साथ फलर्ट भी करता है।युवा शुक्ला ईमानदार,चरित्रवान अब अपना व्यक्तित्व खोकर अपना चेहरा बदलकर उसी दफ्तर के अन्य ब्रष्ट
चेहरों से मिल गया और दूसरा आदमी बनकर 'वह अपमान चेहरा' खोकर सब से बड़ी चारित्रिक,मानसिक हार प्राप्त किया है।"मुँह की लिपस्टिक साफ़ करने के लिए मैं जब वाश–बेसिन
के शीशे पर झुका तो मुझे अपनी उंगलियां भी कुछ कांपती–सी लगीं–एक दम केशवदास की उँगलियों की तरह। मैं शीशे के सामने से हट गया ... तो यह वह साँचा था जिस में मैं ढल रहा था, क्या
अब भी मैं अपने को बचा सकता हूँ ? 'वह अपना
चेहरा'
उपन्यास इस से समाप्त हो जाता है ।इस उपन्यास
में गोविन्द मिस्र दफ्तर मैं कई तरह के लोग और उनकी व्यक्तित्व भयावह चेहरे का चित्र
और नामक किस प्रकार अपने अच्छे गुणों को धीरे–धीरे
बुराई के तरफ किस प्रकार आकर्ष हो गया और बुरी व्यवस्था में फाँस जाना और अपने मूल्यता को बैठा वह सब कलात्मकता के ढंग से उपन्यास
को विशिष्ट बनाते है।
१. वह अपना चेहरा -१९८५- राजकमल प्रकाशन
-------------------------------------------------------------------------------------
No comments:
Post a Comment