हिंदी साहित्य वैश्विक परिदृश्य
प्रेमचंद्र भी अपने युग के प्रतिनिधि साहित्यकार तथा सफल लेखक थे अतः समाज की
गतिविधियों तथा राष्ट्रीय चेतना से वे भी अछूते नहीं रह सकते थे। वे सामाजिक चेतना
से संपन्न उच्च कोटि के साहित्यकार थे अतः उनके साहित्य में राष्ट्रीय चेतना का
समुचित प्रस्फुरण हुआ है। उनका साहित्य तत्कालीन परिस्थितियों तथा उनके परिवेश का
आदर्श दर्पण है। प्रेमचंद्र का अंतस्थल देशप्रेम की अक्षुण्ण भावनाओं से आप्लावित
था। वे पराधीनता की बेड़ियों में जकड़े हुए देश को स्वतंत्र कराने के आकुल आकांक्षी
थे। महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा से युक्त राष्ट्रीय जन - आंदोलनों का सूत्रपात उनके समय की अद्भुत व
अपूर्व घटना थी। एक सच्चे देशभक्त तथा सच्चे राष्ट्रीय के रूप में उन्होंने इन आंदोलनों
का हार्दिक स्वागत किया। वे राष्ट्रीय आंदोलन राष्ट्र की पराधीनता की बेड़ियां
काटकर उसे स्वतंत्रता के उच्च आसन पर आसीन कराने के लिए किए जा रहे थे पर समस्त
देशवासी उसके समर्थक नहीं थे कितने ही अपने निहित स्वार्थों की आपूर्ति संख्यात्मक
जानकर उसके विरोधी हो गए थे कुछ ह्रदय से उसका समर्थन करते थे और कुछ तभी तक उसके
समर्थन को प्रश्रय देने के पक्ष में थे जब तक कि उनकी स्वार्थ सिद्धि बाधित नहीं
होती। राष्ट्रीयता के मार्ग की बाधाओं का अध्ययन कर उनको उद्घाटित करने का कार्य
प्रेमचंद ने किया। मुंशी प्रेमचंद्र ने राष्ट्रीयता आंदोलनों के वास्तविक स्वरूप
का साक्षात्कार किया था अतः उससे संबद्ध वर्गीय स्वार्थों का सम्यक अध्ययन कर के
अपने साहित्य में वर्ग के अनुसार राष्ट्रीय आंदोलनों के प्रति जनता के दृष्टिकोण
का वर्णन किया है। उन्होंने प्रारम्भिक साहित्य रचना उर्दू भाषा का कलेवर लेकर की
थी। ‘सोजे वतन’ कहानी संग्रह की कहानियाँ उनकी इस अद्भुत राष्ट्रीय चेतना का ज्वलंत उदाहरण
हैं। ‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन’, शेख मखमूर’ तथा ‘सांसारिक प्रेम और देशप्रेम’ जैसी
कहानियाँ उनके देश प्रेम की भावना से पूर्णतया ओतप्रोत हैं।
प्रेमचंद्र अपने युग की राष्ट्रीय गतिविधियों के प्रत्यक्ष दृष्टा तथा सम्यक
समर्थक थे तथापि उन्होंने स्वयं राजनीति के क्षेत्र में पदार्पण नहीं किया यदि
उन्होंने राजनीति में सक्रिय भाग लिया होता तो राष्ट्रीय गतिविधियों के समर्थकों
तथा विरोधी नीतियों के प्रणेता वर्ग विशेष की विपरीत प्रतिक्रिया तथा सामाजिक
संस्थाओं को इतनी सफलता से अभिव्यक्त भी न कर सके होते। उन के युग में जमींदारी
प्रथा विनाश के कगार पर पहुंच चुकी थी। जमींदार सरकार की कृपा पर निर्भर रहने के
कारण सरकार के समर्थक तथा आंदोलनों के विरोधी हो गए थे। वह सर्वत्र अपने स्वार्थ
सिद्धि के ही प्रयास में लगे रहते थे। जनता के सुख-दुख की उन्हें चिंता न थी। ‘प्रेमाश्रम’ उपन्यास
के नायक राय कमलानंद इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। सरकार का विरोध करने पर उन्हें
अपनी रियासत छिन का भय रहता है इसीलिए वे स्वराज्यवादियों का बहिष्कार करते हैं। ‘रंगभूमि’ उपन्यास
के भरत सिंह जनता की सेवा करने के इच्छुक हैं किंतु तभी तक जब तक कि उनकी रियासत
उसी से प्रभावित न हो। इसी प्रकार ‘गोदान’ उपन्यास के जमींदार राय साहब अमरपाल सिंह
स्वयं राष्ट्रीयता आंदोलनों के कारण जेल यात्रा कराने के बाद भी सरकार द्वारा
सम्मानित होने पर अपने राष्ट्रप्रेम के लिए पश्चाताप करते प्रदर्शित किए गए हैं।
तत्कालीन शासक वर्ग भारत की उन्नति नहीं करना चाहता था। वह उसे पूर्णरूपेण परमुखापेक्षी
तथा पराश्रित बनाए रखना चाहता था अतः शासक वर्ग द्वारा देश की औद्योगिक तथा कृषि
संबंधी उन्नति के संदर्भ में कोई प्रयत्न नहीं किया गया। राष्ट्र के सजग नेताओं ने
स्वदेशी वस्तुओं का प्रचार तथा विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करके देश को उद्योग के
क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने का प्रयत्न किया तथा धनाढ्य वर्ग का सहयोग प्राप्त
किया। इस वर्ग का मुंशी जी ने स्वाभाविक चित्रण किया है। ‘रंगभूमि’ में
उन्होंने जनसेवक नामक पात्र के माध्यम से आर्थिक पराधीनता का विरोध कराया है। ‘गोदान’ का
मिस्टर खन्ना पूंजीपति वर्ग का होते हुए भी राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेकर दो बार
कारागार सेवन कर चुका है। यह धनाढ्य वर्ग राष्ट्रीयता आंदोलन का समर्थन अपने
आर्थिक लाभ के दृष्टिकोण से करता दृष्टिगोचर होता है। राष्ट्रीय विचारों की दृष्टि
से प्रेमचंद का मध्यम वर्ग राष्ट्रीय चेतना से अनुप्राणित होते हुए भी अपनी
स्वार्थपरता के आधार पर तथा अपनी आजीविका निर्भरता के कारण दो भागों में विभक्त हो
जाता है। एक वर्ग सरकारी नौकरियों से संबद्ध होने के कारण ब्रिटिश सरकार का दास है।
शासक वर्ग का विरोध करने पर उसकी जीविका छूट जाने का भय उत्पन्न होने की संभावना
है अतः वह हृदय से जन आंदोलन का सहयोगी होते हुए भी अपनी नौकरी को बनी रहने देने
की इच्छा के कारण विवश होकर अपनी देशभक्ति की भावनाओं का दमन कर देता है। आत्मिक
समर्थन देने पर भी सरकार के विरुद्ध एक शब्द भी कहने का साहस नहीं रखता और इसी
हेतु राष्ट्रीय गतिविधियों से असंपृक्त रहता है। इन्हीं में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो
अपने स्वार्थान्धता के कारण मन से भी राष्ट्रीय चेतना के विरोधी तथा ब्रिटिश शासन
के समर्थक हैं। यथा ‘पत्नी से पति’ शीर्षक कहानी का पात्र मिस्टर सेठ अपनी मानसिकता के कारण विदेशी के प्रेमी तथा
स्वदेशी के विरोधी है। वह स्वयं भी राष्ट्रीय गतिविधियों से दूर रहता है तथा पत्नी
को भी उससे दूर रखता है जिससे उसका अधिकारी वर्ग उसके प्रति सशंक न हो जाए। ‘भाड़े
का टट्टू’ कहानी का पात्र रमेश सरकारी नीति का विरोधी होने के कारण एक डाके के केस में
फंसा दिया जाता है। तब उसका मित्र यशवंत उसकी निर्दोषिता के संबंध में एक शब्द भी
नहीं कह पाता क्योंकि वह एक सरकारी नौकर है। प्रेमचंद के अनुसार सरकारी नौकरी करने
का अर्थ ही शारीरिक तथा मानसिक पराधीनता है।
दूसरे प्रकार के मध्यम वर्ग के लोग भी हैं जो सरकारी नौकरी के बंधन से मुक्त हैं
उन्हें अपनी नौकरी जाने का भय नहीं है और जीविका की पराधीनता न होने के कारण वे तन, मन
तथा धन से राष्ट्रीय नीतियों का समर्थन करते हैं और उसके नेतृत्व में भी आगे रहते
हैं। आंदोलन की गतिविधियों तथा उसकी अंतिम परिणति के संदर्भ में प्रेमचंद ने
समझौतावादी दृष्टिकोण अपनाया है। प्रेमचंद युगीन राष्ट्रीयता आंदोलन मुख्यतः
मध्यमवर्गीय आंदोलन है तथा इसमें दो गुट मध्यवर्गीय समाज के भी दिखाई देते हैं। प्रेमचंद
की कृतियों में ग्राम-समाज भी राष्ट्रीय चेतना से अनुप्राणित दिखाई देता है यद्यपि
वह इस क्षेत्र में अधिक सचेष्ट नहीं होता। कृषक वर्ग राष्ट्रीय आंदोलनों का स्वागत
करता है तथा जमींदारों के शोषण से मुक्ति पाने हेतु इस दिशा में सचेष्ट होता है।
सरकारी तथा जमींदारी शोषण से मुक्ति पाने को ही वे स्वराज्य समझते हैं। ‘कर्मभूमि’ उपन्यास
में अमर जमींदारों के उत्पीड़न के विरुद्ध किसानों को संगठित करता है। वह किसानों
की समस्या लेकर जमींदार और सरकारी कर्मचारियों से संघर्षरत होता है। ‘समर
यात्रा’ कहानी में भी प्रेमचंद ने राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं के आगमन पर किसानों की हृदय
गत आशाओं तथा आकांक्षाओं को सुंदर अभिव्यक्ति प्रदान की है।
प्रेमचंद के साहित्य में मजदूर पूंजीपति संघर्ष का चित्रण हुआ है किंतु श्रमिक
वर्ग की राष्ट्रीय चेतना का उन्होंने अपने साहित्य में संकेत मात्र किया है। ‘गोदान’ में
श्रमिकों की राष्ट्रीय चेतना का संकेत मिलता है। गोबर शहर में होने वाली सभाओं से
प्रभावित होता है और यह अनुभव कहता है कि अपने भाग्य का निर्माण स्वयं ही करना
होगा।‘गबन’ उपन्यास के अंतिम अंशों में प्रेमचंद ने पुलिस द्वारा कुछ जागृत चेतना वाले नव
युवकों पर चलाए गए जिस मुकदमे का चित्रण किया है उस पर मेरठ षडयंत्र की स्पष्ट छाप
प्रतीत होती है। इस प्रकार उन्होंने श्रमिक नेताओं के प्रति सरकार द्वारा अपनाए गए
कड़े रुख तथा छल पूर्ण नीति को भी इंगिति प्रदान की है। राष्ट्रीयता आंदोलनों के चरमोत्कर्ष
के काल में समाज के सभी वर्ग आंदोलनों से अभिभूत तथा उनमें संलग्न दृष्टिगोचर होते
हैं। ऐसे अवसर पर स्वर्गीय स्वार्थों की स्पष्ट विवेचना कर प्रेमचंद ने अपनी गहन
अन्वेषिका शक्ति का परिचय दिया है। ‘विविध प्रसंग’ में
उन्होंने स्पष्ट लिखा है - “सभी खद्दर पहनने वाले और जेल जाने वाले
देव उनमें भी अक्सर बड़े-बड़े हथकंडे बाज लोग शामिल हैं जो जेल किसी न किसी
स्वार्थ से ही गए थे।” राष्ट्रीय चेतना से संबद्ध आंदोलनों के अतिरिक्त देश की
तत्कालीन क्रांतिकारी गतिविधियों का भी प्रेमचंद ने अपने साहित्य में चित्रण किया
है। उस समय क्रांतिकारी नव युवकों ने कांग्रेस की नीति में विश्वास न होने के कारण
सशस्त्र कांति को प्रमुखता प्रदान की तथा ईट का जवाब पत्थर से देने की नीति का
पालन करते हुए अत्याचारी अंग्रेज तथा उनके भारतीय अधिकारियों की हत्याएं कीं। वे
गुप्त रूप से संगठित होकर कार्य करते थे। क्रांतिकारियों की ऐसी गुप्त सभाओं तथा
उनकी नीतियों का वर्णन करते हुए प्रेमचंद ने अपनी कहानी ‘कातिल’ में
बताया है कि ये उत्साही युवक शांतिपूर्ण आंदोलनों में विश्वास नहीं करते थे।
‘प्रतिशोध’ कहानी में बैरिस्टर व्यास सरकारी राजनीतिक
मुकदमे की पैरवी करने लाहौर जाते हैं जहां कुछ देशभक्त युवकों पर झूठा मुकदमा
चलाया जा रहा होता है। व्यास अपनी वैचारिक चातुरी तथा वाग्वैदग्धता से अभियोग
सिद्ध करने तथा उन युवकों को दंड दिलवाने में सफल हो जाते हैं। उनकी इस
स्वार्थपरता तथा राष्ट्र विरोधी नीति से क्षुब्ध होकर ईश्वरदास नामक युवक उनकी
हत्या करके अपनी क्रांतिकारी नीति को प्रकट कर देता है। ‘भाड़े
का टट्टू’ कहानी में भी रमेश झूठे अभियोग द्वारा दंडित होने पर क्रांतिकारी बन जाता है
और सामाजिक क्रांति में सक्रिय भाग लेने लगता है। उनके समय में यद्यपि देशी
रियासतें अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखती थी किंतु उनकी यह स्वतंत्रता मात्र दिखावा
थी। प्रत्येक रियासत में ब्रिटिश सरकार द्वारा एक पोलिटिकल एजेंट नियुक्त किया
जाता था जो रियासत का वास्तविक शासक होता था। रियासतों के स्वामी अपना धन तथा समय
सरकार को प्रसन्न रखने के लिए खर्च करते थे। प्रजा की सुख सुविधा की उन्हें रंच
मात्र भी परवाह नहीं थी। ‘रंगभूमि’ तथा ‘कायाकल्प’ उपन्यासों में इन रियासतों की स्थिति का विस्तार से वर्णन किया गया है। ‘राज
हठ’ कहानी में अचलगढ़ की रियासत का शासक देवमल प्रजा के लिए चिकित्सालय, पाठशाला
तथा अन्य सुख सुविधाओं के साधनों की आपूर्ति की अपेक्षा दुर्गा पूजा महोत्सव की
धूम धाम को अधिक आवश्यक समझता है क्योंकि उसमें पोलिटिकल एजेंट को भी नियंत्रित
किया गया है। ‘रियासत का दीवान’ कहानी में सतिया का राजा भी पोलिटिकल एजेंट के दौरे पर उसका धूमधाम से स्वागत
करता है। इसे वह अपना परम कर्तव्य समझता है। देशी सरकार अपने अधीन रियासतों को
देशव्यापी राष्ट्रीय चेतना से मुक्त रखना चाहती है तथा राष्ट्रीय चेतना की
गतिविधियों का संदेह होते ही रियासतदारों से पूछताछ प्रारंभ कर देती है। अपने
ऐश्वर्य तथा रियासत की रक्षा के लिए रियासताधीश अपनी प्रजा में उत्पन्न होने वाले
क्रांतिकारियों को असामाजिक तत्वों का बाना पहना कर दंडित करना परम धर्म समझते हैं।
भारत की अक्षुण्ण एकता को भंग किए बिना विदेशी शासक उसे अपने अधीन नहीं कर
सकते थे। ब्रिटिश सरकार को अपना शासन बनाए रखने के लिए भारत में वैमनस्य वर्ग
संघर्ष, सांप्रदायिक संघर्ष के रूप में बनाए रखना आवश्यक था अतः उन्होंने देश के दो
प्रमुख संप्रदायों हिंदू और मुसलमानों के बीच वैमनस्य उत्पन्न कर दिया। उन्होंने
समय-समय पर मुस्लिम वर्ग को विशेषाधिकार देकर द्वेष - भावना की अग्नि को भड़काया
और इन दोनों संप्रदायों के पारस्परिक वैमनस्य की आड़ लेकर अधिक से अधिक समय तक देश
को अपने अधीन बनाए रखने का कुचक्र रचते रहे। स्वाधीनता के प्रबल समर्थक होने के
कारण प्रेमचंद ने इस समस्या के यथार्थ रूप को उजागर करते हुए उनके द्वारा
पारस्परिक सहयोग की अनिवार्यता पर बल दिया है। ‘सेवा सदन’ में प्रेमचंद ने स्पष्ट दोनों संप्रदायों
के धनिक वर्ग द्वारा अपने आर्थिक हितों एवं राजनीतिक पदों के लिए प्रत्येक समस्या
को सांप्रदायिक रूप देने का वर्णन किया है। प्रदायिक द्वेष भावना इतनी तीव्र हो
चुकी है कि दोनों ही संप्रदाय के लोग अवसर तथा अधिकार मिलने पर दूसरे संप्रदाय को
हानि पहुंचाने में तत्पर दिखाई देते हैं।
हिंदू मुसलमानों का यही वैमनस्य आगे चल कर भयंकर दंगे के रूप में परिवर्तित हो
जाता है। असहयोग आंदोलन के स्थगित होते ही हिंदू-मुस्लिम दंगों की अति हो जाती है।
उनकी एकता का महल धूल धूसरित हो जाता है। ‘कायाकल्प’ में प्रेमचंद ने आगरा के हिंदू मुसलमानों
की सांप्रदायिक भावनाओं का चित्रण कर के तत्कालीन सांप्रदायिकता पर यथार्थ प्रकाश
डाला है। हिंदू मुसलमानों की सांप्रदायिक मनश्चेतना का वर्णन करते हुए वे लिखते
हैं- “निज
के रगड़े झगड़े सांप्रदायिक संग्राम के क्षेत्र में खींच लाए जाते थे। दोनों ही दल
मजहब के नशे में चूर थे।” सांप्रदायिक दंगे का वर्णन करते हुए ‘कायाकल्प’ में
उन्होंने लिखा है- “दीन के नाम पर ऐसे ऐसे कर्म होने लगे जिन पर पशुओं को भी लज्जा आती। पिशाचों
के भी रोये खड़े हो जाते।” ‘हिंसा परमो धर्म’ कहानी
में इसी सांप्रदायिक वैमनस्य का वर्णन करते हुए तत्कालीन पंडे पुजारियों और
मौलवियों के कुकृत्य को अनावृत किया गया है। सीधा साधा ग्रामीण जानिद शहर में
पहुंच कर वहां की धार्मिक भावना से अत्यधिक प्रभावित होता है किंतु धर्म के नाम पर
जब उसे एक पुजारी ‘शुद्ध’ करवाता है तथा एक मौलवी हिंदू स्त्रियों को बहका कर उनका मुसलमान से निकाह
करवा देता है तब उसे दोनों ही धर्म की वास्तविकता का पता चलता है और वह उनसे घृणा
करने लगता है। ‘मंदिर’ और ‘मस्जिद’ कहानी में भी हिंदू मुसलमानों की धार्मिक असहिष्णुता का वर्णन किया गया है तथा
उनके वैमनस्य के फल स्वरुप होने वाले दंगों का चित्र खींचा गया है।
प्रेमचंद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सच्चे सेनानी थे। उन्होंने भारतीय
राष्ट्रीयता मूलक गतिविधियों के बाधक तत्वों का विरोध किया तथा अपने कथा - साहित्य
में हिंदू मुस्लिम सांप्रदायिक संघर्ष तथा उनकी प्रेरणा देने वाले निहित स्वार्थ
से युक्त मुल्ला मौलवी तथा पंडे पुजारियों व नेताओं की गोपनीय मंत्रणाओं पर भी
व्यापक प्रकाश डाला है। साथ ही मुंशीजी ने हिंदू मुस्लिम एकता पर बल देते हुए
स्पष्ट रूप से घोषणा की है कि – “सांप्रदायिकता सरकार का सबसे बड़ा अस्त्र है और
वह आखिर दम तक इसे हाथ से न छोड़ेगी।” उन्होंने आगे भी लिखा - “हिंदू
मुस्लिम एकता का मसला निहायत नाजुक है और अगर पूरी एहतियात और धीरज और जब्त और
रवादारी से काम न लिया गया तो यह स्वराज्य के आंदोलन के रास्ते में सबसे बड़ी
रुकावट साबित होगा।” प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं उपन्यासों तथा कहानियों में
राष्ट्रीयता आंदोलन तथा उसके परिणाम स्वरूप समाज की प्रतिक्रियाओं तथा उसकी
प्रस्फुरित राजनीतिक चेतना का चित्रण करने के साथ-साथ तत्कालीन शासन व्यवस्था तथा
सरकारी नीति पर भी प्रकाश डाला है। ‘रंगभूमि’ उपन्यास में ब्रिटिश सरकार की
साम्राज्यवादी नीति का वर्णन किया गया है। इस उपन्यास का अंग्रेज जिलाधीश मिस्टर
क्लार्क ब्रिटिश सरकार की साम्राज्यवादी नीति पर प्रकाश डालता हुआ कहता है- “अंग्रेज
जाति भारत को अनंत काल तक अपने साम्राज्य का अंग बनाए रखना चाहती है। हम... सब के
सब... साम्राज्यवादी हैं।” इस प्रकार इंग्लैंड के लेबर दल द्वारा प्रस्तुत की जाने
वाली विभिन्न सुधार योजनाओं के भ्रम-जाल में फंसे रहने वाले देश के नेताओं को भी
प्रेमचंद ने सही दिशा प्रदान की है। उन्होंने अपने साहित्य में सरकार की दमन नीति
तथा उसके नृशंसता का भी चित्र प्रस्तुत किया है।
‘अधिकार चिंता’ शीर्षक
कहानी में प्रेमचंद ने सरकार की विभिन्न संप्रदायों तथा वर्गों में आपस में फूट
डालने की कूटनीति पर भी प्रकाश डाला है। इस कहानी में अन्योक्ति के द्वारा यह
व्यक्त कर दिया गया है कि सरकार अपना शासन भारतवर्ष में बनाए रखने के लिए विभिन्न
वर्गों तथा संप्रदायों में फूट डाल कर उन्हें आपस में लड़ा देती है। पराधीन भारत
में पुलिस भी सरकार के हितों की रक्षा करने के लिए है न कि जनता के जान माल की
सुरक्षा के लिए। सरकार एवं जनता के विरोध के समय पुलिस सरकार का साथ देती है।
विदेशी वस्तुओं, शराब, मद्य विक्रय संस्थानों के सम्मुख धरना देने वाले सत्याग्रही, अहिंसात्मक
आंदोलन के पक्षधरों धर्म के प्रति भी उसका क्रूर व्यवहार ही वास्तव में हिंसात्मक
क्रांति को जन्म देता है। ‘जुलूस’ तथा ‘माता का हृदय’ कहानियों में पुलिस की बर्बरता का वर्णन है। ‘गबन’ तथा ‘कर्मभूमि’ उपन्यासों में पुलिस विभाग में व्याप्त
भ्रष्टाचार का कच्चा चिट्ठा प्रस्तुत किया गया है। ‘प्रेमाश्रम’ उपन्यास में भी प्रेमचंद जी ने पुलिस की
कार्यप्रणाली की तीव्र आलोचना की है। पुलिस की नीति तत्कालीन सरकार की ही नीति है।
घूस तथा रिश्वत का इस विभाग में बाहुल्य था। पुलिस के कर्मचारी जमींदार तथा
कारिंदों के साथ मिल कर ग्रामीण जनता का शोषण कर रहे थे करते थे। अपराधियों के दंड
विधान के लिए प्रयुक्त की जाने वाली न्याय व्यवस्था भी अनेक दोषों से युक्त थी।
प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों तथा कहानियों में यत्र तत्र न्याय व्यवस्था के दोषों
की ओर भी संकेत किया है। ‘रंगभूमि’ में उन्होंने अदालतों का धनाढ्यों तथा सरकार के पिट्ठुओं के हाथों अत्याचार
करने वाले यंत्र के रूप में उल्लेख किया है। ‘नमक का दरोगा’ शीर्षक
कहानी में तत्कालीन न्याय प्रणाली पर व्यंग करते हुए प्रेमचंद ने बताया है कि किस
प्रकार रुपयों के बल पर न्याय खरीदा जा सकता है। न्याय व्यवस्था के दोषों पर
प्रकाश डालते हुए उन्होंने उसके सुधार का उपाय भी बताया है। प्रेमचंद के मतानुसार
प्रचलित न्याय व्यवस्था में तब तक कोई सुधार नहीं हो सकता जब तक अदालत स्वयं
वकीलों की नियुक्ति न करने लगे। उन्होंने ‘प्रेमाश्रम’ में लिखा है- “जब
तक मुद्दई और मुद्दालेह अपने अपने वकील अदालत में लाएंगे तब तक इस दिशा में कोई सुधार
नहीं हो सकता क्योंकि वकील तो अपने मुवक्किल का मुख पात्र होता है। उसे सत्यासत्य
से कोई प्रयोजन नहीं। सच्चे न्याय की आशा तो तभी हो सकती है जब वकीलों को अदालत
स्वयं नियुक्त करे और अदालत भी राजनीतिक भावों और अन्य दुःसंस्कारों से मुक्त हो।”
अन्याय तथा शोषण की नींव पर बनाए गए शासन व्यवस्था के भवन में भ्रष्टाचार की
बहुलता होना सहज स्वाभाविक है।
प्रेमचंद द्वारा ‘सज्जनता का दंड’ तथा ‘नमक का दरोगा’ कहानियों में शासन व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचारों का उद्घाटन किया गया है।
इसमें यह बताया गया है कि धर्मनिष्ठ तथा ईमानदार व्यक्ति के लिए सरकारी नौकरी
आत्मिक विकास के मार्ग में बाधक तथा बोझ स्वरूप होती है। ‘दंड’ कहानी
में तत्कालीन शासन व्यवस्था में प्रचलित भ्रष्टाचार तथा घूसखोरी का यथार्थ चित्रण
प्रस्तुत किया है। न्याय व्यवस्था का कार्य अन्याय से मुक्ति दिलाना है किंतु इस
विभाग के उच्चाधिकारियों द्वारा लोभ के वशीभूत होकर न्याय की पूर्णतया उपेक्षा की
जाती है। इस कहानी में मिस्टर सिन्हा नामक जज एक मुकदमे में पक्ष तथा विपक्ष दोनों
से रिश्वत लेते हैं। प्रेमचंद के मतानुसार विभिन्न शासन विभागों की उत्कोच प्रियता
के कारण ही अन्याय को प्रश्रय मिलता है। ‘विषम समस्या’ नामक
कहानी में शासन व्यवस्था की भ्रष्टाचारिता के परिणाम स्वरूप होने वाले नैतिक पतन
पर प्रकाश डाला गया है। कहानी का नायक गरीबदास एक गरीब सीधा साधा चपरासी है। वह
रिश्वत लेने देने के विरुद्ध है किंतु अपने कार्यालय के बाबुओं को प्रसन्न करने के
लिए उसे उत्कोच देना पड़ता है और अंत में वह स्वयं भी उत्कोच लेने लगता है। प्रेमचंद
के युग में स्थानीय शासन स्वशासन के अधिकार भारतीयों को प्राप्त हो चुके थे तथा
स्थानीय शासन संस्थाओं पर अपने देशवासियों का ही आधिपत्य था किंतु उनके अधिकार
अत्यंत सीमित तथा नाममात्र के ही थे। स्थानीय स्वशासन की इसी भ्रामक स्थिति का
चित्रण प्रेमचंद ने अपने ‘सेवा सदन’, ‘रंगभूमि’ और ‘कर्मभूमि’ उपन्यासों के नागरिक जीवन के संदर्भ में किया है। इससे स्पष्ट होता है कि उस समय
स्थानीय स्वशासन संस्थाओं पर उच्च वर्ग का ही आधिपत्य था। यद्यपि म्युनिसिपल बोर्ड
के सदस्यों का चुनाव मतदान द्वारा किया जाता था परंतु उच्च वर्ग के अधिकार में
शासन रहने के कारण उच्चवर्गीय स्वार्थों को ही प्राधान्य प्राप्त था। वर्गगत
स्वार्थों की सिद्धि के लिए जनसाधारण की पूर्णरूपेण उपेक्षा की जाती थी।
जनतंत्र में जनमत का प्रतिनिधित्व करने वाली कौंसिलों के द्वारा ही शासन नीति
का निर्धारण किया जाता है। विदेशी सरकार ने भी देश में काउंसिल की व्यवस्था की थी
किंतु उनके अधिकारों को भी सीमित रखा। इन कौंसिलों में प्रवेश करने वाले भारतीय
अंतिम अधिकार गवर्नर तथा वायसराय के हाथ में होने के कारण सरकारी विभागों में रंच
मात्र भी परिवर्तन करवा पाने में असमर्थ रहते थे। ‘सेवा सदन’, रंगभूमि, ‘प्रेमाश्रम’ उपन्यासों में स्थिति का यथार्थपरक चित्रण
हुआ है। ‘सेवा सदन’ के श्यामचरण काउंसिल तथा स्थानीय बोर्ड के सदस्य होने पर भी कोई भी ऐसा कार्य
करना नहीं चाहते जिससे सरकार की नीति का विरोध हो। ‘आदर्श विरोध’ कहानी
के दयाकृष्ण मेहता तथा ‘प्रेमाश्रम’ उपन्यास के राय कमलानंद राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा अपने पद की रक्षा तथा
सरकार द्वारा मिलने वाले लाभ तथा उनकी कृपा दृष्टि बनाए रखने के लिए सरकारी नीति
का ही समर्थन करते हैं किंतु ‘रंगभूमि’ उपन्यास में प्रेमचंद ने गांगुली के रूप
में स्वराज्य पार्टी के निर्भीक नेताओं का वर्णन किया है। वह किसी भी प्रकार भय या
लाभ के कारण झुकना नहीं जानते तथा न्याय के पक्ष में जनाधिकारों की रक्षा के लिए
सरकार की नीति का निर्भीकता पूर्वक विरोध करते हैं। गांगुली क्लार्क का सूरदास की
जमीन के संदर्भ में विरोध करता है और जब उसे पशु बल द्वारा दबाने का प्रयत्न किया
जाता है तो अपने पद से त्यागपत्र दे देता है। गांगुली का उन लिबरल नेताओं से
सर्वथा भिन्न चरित्र है जो काउंसिल में रह कर अपने निहित स्वार्थों अथवा सरकारी का
कोप भाजन बनने के भय से उसकी प्रत्येक उचित या अनुचित नीति का समर्थन करते हैं। तत्कालीन
काउंसिल धनाढ्य उच्च वर्ग के ही अधीन थी। उस में वे ही निर्वाचित होकर पहुंच पाते
थे जो भरपूर धन वर्षा कर सकें। पूंजीवाद तथा साम्राज्यवाद के गठबंधन के कारण जनता
के सच्चे प्रतिनिधियों की काउंसिल तक पहुंच ही नहीं हो पाती थी। धनी वर्ग धन शक्ति
के आधार पर वहां पहुंच कर राष्ट्रीय हितों के स्थान पर वर्गीय स्वार्थ को पूरा
करने में ही लगे रहते थे। इस प्रकार की कौंसिलों से देश के कल्याण की आशा करना
दुःस्वप्न मात्र है। ‘रंगभूमि’ में प्रेमचंद ने डॉक्टर गांगुली के मुख से ही कहलवाया है - “काउंसिल
को सरकार बनाती है और वह सरकार की मुट्ठी में है। जब जाति द्वारा काउंसिल बनेगी तब
उसने देश का कल्याण होगा।” ‘आदर्श विरोध’ कहानी
में अपने इन्हीं विचारों को प्रकट करते हुए प्रेमचंद लिखते हैं - “आधे
ही नहीं अगर सारे मेंबर हिंदुस्तानी हो तो भी वे नई नीति का उद्घाटन नहीं कर सकते।
वे कैसे भूल जाएं कि काउंसिल में उनकी उपस्थिति केवल सरकार की कृपा और विश्वास पर
निर्भर है।” सरकार पर निर्भर होने के कारण ही भारतीय सरकार की नीतियों का विरोध
करने में सक्षम नहीं होते। वे सरकार के मुखापेक्षी बने रहने में ही अपने कर्तव्य
की इति मानते हैं।
प्रेमचंद जी ने ‘कानूनी कुमार’ शीर्षक कहानी में स्पष्ट रूप से अपने विचारों को अभिव्यक्ति देते हुए कहा है
कि देश के उद्धार के लिए कानून बनाने की नहीं वरन त्याग करने की आवश्यकता है। इंग्लैंड
में लेबर दल का बहुमत होने पर भारत के लिबरल नेताओं को यह आशा थी कि भारत को भी
औपनिवेशिक स्वराज्य की प्राप्ति हो जाएगी किंतु देश के लिबरल नेताओं की यह आशा
स्वप्न मात्र सिद्ध हुई। प्रेमचंद ने इसे बहुत पूर्व ही अनुभव कर लिया था।
अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीति को भलीभांति जानते हुए उन्होंने ‘रंगभूमि’ में
मिस्टर क्लार्क के ही शब्दों में अंग्रेजी नीति पर प्रकाश डाला है - “हम
सब के सब लेबर हैं। समाजवादी हैं। अंतर केवल उस नीति में है जो भिन्न-भिन्न दल इसे
जाति पर आधिपत्य जमाए रखने के लिए ग्रहण करते हैं। कोई कठोर शासन का उपासक है, कोई
सहानुभूति का। कोई चिकनी चुपड़ी बातों से काम निकालने का, बस।
वास्तव में नीति कोई है ही नहीं। केवल उद्देश्य है और वह यह कि क्यों कर हमारा
आधिपत्य उत्तरोत्तर सुदृढ़ हो।” उनके विचार प्रगतिवादी विचारधारा के पोषक थे।
प्रेमचंद के हृदय में अपनी मातृभूमि को विदेशी शासकों की अधीनता से मुक्त कराने की
बलवती इच्छा थी। स्थानीय स्वशासन की अंग्रेजों की नीति तथा अथवा औपनिवेशिक
स्वराज्यता की नीति में उनकी रंचमात्र भी आस्था नहीं थी। वह देश में पूर्ण
स्वराज्य की कामना करते थे। विदेशी सरकार की थोड़ी सी भी अधीनता उनके देशप्रेम की
भावना को ठेस पहुंचाने के लिए पर्याप्त थी। यद्यपि उनके तत्कालीन कांग्रेस नेता
औपनिवेशिक स्वराज्य से ही संतुष्ट होने को तत्पर थे परंतु प्रेमचंद्र की भारतीयता
ने इसे स्वीकार नहीं किया और उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से देश में पूर्ण
स्वराज्य की आवश्यकता को अनुभव कराने की सतत चेष्टा की। प्रेमचंद जनता के शोषण तथा
जन उत्पीड़न के सर्वथा विरुद्ध थे। उनका स्वराज्य जनता का राज्य था। ऐसा राज्य
जिसमें जनता का दुख सुख ही महत्वपूर्ण था। उस समाज में वर्गगत स्वार्थों अथवा जातिगत
पक्षपात की हठधर्मिता के लिए बिल्कुल स्थान नहीं था। वे देश को पराधीनता के बंधन
से मुक्त करा कर एक आदर्श राज्य स्थापित करना चाहते थे। देश को स्वतंत्र कराना ही
उनका उद्देश्य नहीं था। वह स्वतंत्रता के बाद के आदर्श राष्ट्र की कल्पना भी कर
चुके थे। समाज में प्रचलित आर्थिक तथा वर्गगत व जातिगत विषमता को नष्ट कर के
अनुसरणीय एकत्व की स्थापना करना उनका उद्देश्य था।
सहायक ग्रन्थ :
1.
डॉ. रामविलास शर्मा - प्रेमचंद और उनके युग
2.
डॉ. एन. पी. व्यास - प्रेमचंद का कथा साहित्य
3.
डॉ. दिलीप महरा - प्रेमचंद के कथा साहित्य में सामाजिक सरोकार
4.
जाफ़र रज़ा - कथाकार प्रेमचन्द
5.
प्रेमचंद - प्रेमचंद की संपूर्ण कहानियाँ कुछ विचार
डॉ. वि. सरोजिनी
अतिथि अध्यापक, हिंदी विभाग,
आंध्र विश्वविद्यालय, विशाखपट्टणम्
आंध्रप्रदेश-530003, मोबाइल - 9542323226
ई मेल : vedangisarojini@gmail.com
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