Wednesday, March 9

दो मित्र - अवुसुला श्रीनिवासा चारी ‘शिक्षा रत्न‘ (कथा सरोवर)

कथा सरोवर


दो मित्र

            अवुसुला श्रीनिवासा चारी ‘शिक्षा रत्न


    एक गाँव में दो मित्र रहते थे। वे आपस में एक दूसरे को बहुत चाहते थे। उनमें से चंद्र एक अमीर बाप का बेटा था। उसके पिताजी बहुत बड़ा व्यापारी था। वह बहुत बड़े कारखाने का मालिक था। उसके पास हजारों लोग काम करते थे। वह अपने कर्मचारियों को अपने मित्र समान देखता था अगर कभी कोई कर्मचारी कष्टों में होता तो उसे अपना कष्ट मानकर सहायता करता था

    उसका बेटा चंद्र भी अपनी पढ़ाई पूरी की और अपने पिताजी के कारखाने को संभालने का भार अपने कंधों पर ले लिया। वह अपने पिताजी के दिखाए रास्ते पर ही चलता रहा और सबसे आदर पाते हुए अच्छा नाम कमाया।

    चंद्र का बचपन का दोस्त सूरज था। सूरज एक गरीब घराने से था। सूरज के पिता चंद्र के कारखाने में ही एक छोटा कर्मचारी था। वह बहुत ही ईमानदार था। कई सालों से वह उस कारखाने में काम कर रहा था। सूरज अपनी पढ़ाई पूरी कर लिया और अपने पिताजी की सहायता के लिए नौकरी करना चाहा। सूरज  के कहने पर उसी कारखाने में चंद्र की सहायता करने और हिसाब किताब देखने के लिए अकौनटेंट के रूप में नियुक्त हो गया।

    कई दिन बीत गए। सूरज अपनी नौकरी को बहुत ही ईमानदारी से करता था। वह अपने काम को परम कर्तव्य मानता था। वह ईमानदार , परिश्रमी और उत्तम नौकर के रूप में नाम कमाया था। चंद्र को सूरज पर पूरा विश्वास था। सूरज हर वक्त काम में रत रहता था। कभी वह बेईमानी करता था और किसी को करने देता था।

    कारखाने के कुछ कर्मचारी सूरज पर जलते थे। वे अपने फायदे के लिए इसे बेईमानी साबित करना चाहते थे। जब भी मौका मिलता  तो ये कर्मचारी सूरज के खिलाफ चंद्र को काना फूसी सुनाते थे। चंद्र के कई बार मना करने पर भी कर्मचारी सूरज के विरुद्ध में बातें सुनाते रहते थे।

    एक बार चंद्र ने सोचा चलो ठीक है ये लोग इतनी बार कह रहे हैं तो बात सच भी हो सकती है। धीरे-धीरे चंद्र सूरज पर शक करने लगा। उस पर निगरानी रखने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति की नियुक्ति की।

    जब यह बात सूरज को पता चला तो वह बहुत दुखी हुआ। कई दिनों तक अपमान सहता रहा। फिर एक दिन वह निश्चय कर लिया कि मेरा यहाँ रहना ठीक नहीं होगा। अतः उसने नौकरी छोड़ दी और किसी दूसरे कारखाने में काम करने निकल गया।

    सूरज के विरुद्ध बात करने वाले कर्मचारी अब अपने मालिक को लूटने लगे। धीरे-धीरे कारखाना नष्टों में डूब गया।

    एक दिन चंद्र असलीयत जानकर बहुत पछताया। वह बेईमानी लोगों को अपने कारखाने से निकाल दिया। अपने मित्र के पास जाकर माफी माँगा। दोनों मित्र आपस में मिले। दोनों आपस में मिलकर फिर से काम करने लगे। दोनों मिलकर व्यापार में खूब तरक्की कर लिये। दूसरों के लिए वे आदर्शवान बने।


            नीति   :   1 . काना फूसी बातें नहीं सुनना चाहिए।

                         2 . ईमानदार लोगों पर कभी शक नहीं करना चाहिए।



अवुसुला श्रीनिवासा चारीशिक्षा रत्न

तुनिकी गाँव , मेदक जिला , तेलंगाना।

दूरभाष : 8801600139, 8328191672

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कथा सरोवर
Editor
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