कथा सरोवर
"दिन बीत जाते हैं,कहानी बनकर
यादें रह जाती है, निशानी बन कर"
.....सच में किसी ने क्या खूब कहा।"
सुबह होती है, शाम होती है।
उम्र तमाम ऐसे ही गुजर जाती है।"
ऐसी अनमोल शायरी के पंक्तियां मेरे मस्तिष्क में यादों की बारात जैसे ताजगी भर रही थी। इन्ही विचारों को लेकर समीर बरामदे में इधर-उधर टहल रहा था। उतने में समीर समीर कह कर बुलाते हुए रसोड़े में से बाहर निकल आयी उसकी मां। जी मां अभी आया कहते हुए मां के पास पहुंच गया। मां ने उसे अपने गोद में बिठा लिया और कहा कि बेटा शाबान का महीना पूरा होने को है।कल या परसों रमजान का चांद होगा। तुम्हे भी रमजान के रोजे रखनी होगी। जी हां अम्मीजान अब तो वार्षिक परीक्षाएं पूरे हो गये और गर्मी की छुट्टियां मिल चुकी है।
दूसरे दिन ही शहर में रमजान के महीने की चांद दिखने की खबर देते हुए मस्जिदों में सैरन बज रहे थे। खबर सुनकर शहर में लोग एक दूसरे से गले मिलते हुए रमजान के चांद की मुबारकबाद देते हुए अपने अपने घरों को पहुंचे। समीर भी घर पर सबसे मिलकर बहुत खुश हुआ। विशेष कर मां से मिलने पर उसके खुशी का कोई ठिकाना न रहा। समीर आधे घंटे तक मां के गोदी में ही लेटा रहा। अब उठ जा बेटा तरावीह की नमाज़ में जाना है कह कर समीर को गोद से हटाया। अब समीर की मां कल की सहेरी की तयारी में लग गयी। समीर भी नमाज़ के लिए घर से निकल गया।
परिवार के सभी सदस्य खुशियों से रात का खाना खा कर अपने अपने फोनों में अलार्म लगा कर सुबह जल्दी से उठने के निय्यत से सो गये। करीब पांच-छः घंटों के बाद सबके फोनों में अलार्म बजना शुरू हुआ दस-बारह मिनट के अंतर से। समीर की मां तो सबसे पहले जाग कर सहेरी की तयारी कर रही थी। दस-बारह मिनट में सब जाग गये।अभी समीर की नींद खुली नहीं। उसी समय जमीला को अपने लाडले बेटे समीर की याद आयी। तुरंत जमीला ने समीर के कमरे का दरवाजा खटखटाया और अंदर पहुंच कर उसको जगाया। थोड़ी देर में सब डैनिंग हाल पहुंचे और सहेरी खाना आरंभ किया। उतने में समीर भी तैयार हो कर वहां पहुंच कर सहेरी खा लिया। अब सब एक जगह बैठकर पवित्र रमजान माह की नेकियों को किस प्रकार की इबादतों से कमाये एक से बढ़कर एक योजना बना रहे थे।उतने में फज्र की अज़ान की आवाज़ आ रही थी कि सबके सब नमाज़ के लिए तैयार हो गये। समीर भी नमाज़ के लिए मस्जिद को गया।
नमाज़ के बाद समीर थोड़ी देर मस्जिद में ही ठहर कर पवित्र क़ुरआन का पारायण किया।
अब वहां से निकल कर समीर घर जा रहा था तो रास्ते में उसका दोस्त विवेक मिला। उसने समीर को पवित्र रमजान के महीने की शुरुआत की मुबारकबाद दे दी।
इस तरह समीर के चार -पांच रोज़े पूरे हुए। गर्मियों में आया था इस बार रमजान का महीना। रमजान के महीने के पहले सप्ताह के बाद दिन ब दिन धूप तेज हो रही थी। रोज़े का समय बारह - तेरह घंटों का था। बच्चों से लेकर बूढ़ों तक गर्मियों की परवाह न करते हुए बड़ी खुशी से रोज़े रख रहे थे। समीर पहली बार रोज़े रख रहा था। जमीला की नजर अपने लाडले बेटे पर ही थी कि इन तेज़ गर्मियों में रोज़े कैसे रख रहा है।
इस तरह समीर की मां सोच रही थी। मगर समीर तो अपनी खुशी को दोस्तों से बांटते हुए माहे रमजान के रोजे रखते हुए आगे बढ़ गया।हर दिन इफ्तारी में फल,मेवे ले जा कर मस्जिद में मित्रों के साथ बैठकर रोजा खोल लेता और बड़ी एकाग्रता से नमाज़ अदा करता। ऐसे ही दिन बीतते गये। आखिर रमजान का महीना पूरा होने को आया।सब लोग ईद की तैयारियों में जुटे हुए थे। ईद की तैयारियों के साथ -साथ समीर की सोच भविष्य की पढ़ाई पर थी। समीर का लक्ष्य था कि भविष्य में डाक्टर बन कर जनता की सेवा करुं। आखिर ईद का चांद नजर आ गया।सब लोग एक-दूसरे को ईदुल फितर की मुबारकबाद देते रहे। ईद का दिन बड़ा सुहावना था।सभी लोग नमाज़ अदा करने ईदगाह चल पड़े। एक से बढ़कर एक कीमती कपड़े पहन कर खुशबू लगाये जा रहे थे।जिधर भी देखो गलियों में खुशबू की महक। ईद के नमाज़ के बाद विशेष कर बच्चे एक दूसरे को मुबारकबाद देते हुए टोलियां बनाकर घूम रहे थे।उनके साथ समीर भी था। समीर ईद के अवसर पर अपने दोस्तो को आमंत्रित किया। उनमें समीर का जानि दोस्त विवेक भी था। सभी मित्र शीरखुर्मा और बिरियानी खा कर अपने अपने घरों को पहुंचे।
ईद होने के एक सप्ताह के बाद दसवीं कक्षा के वार्षिक परीक्षाओं के परिणाम निकले। समीर, विवेक और उनके अन्य साथी सब प्रथम श्रेणी में कामयाब हुए। सभी लोग बड़े खुश थे। गर्मियों की छुट्टियां समाप्त होने को थी। सभी अपनी-अपनी आगे की पढ़ाई की योजना बना रहे। समीर और विवेक आगे की पढ़ाई के लिए एक ही कालेज में दाखिला ले लिये। समीर और विवेक एक से बढ़कर एक अच्छा पढ़ाई करके समीर मेडिसिन में और विवेक इंजीनियरिंग में स्नातक शिक्षा के लिए दाखिला ले लिये।
अब दोनों मित्र समीर और विवेक अलग-अलग कालेज में पढ़ते रहे। दोनों की पढ़ाई पूरी हुई समीर डाक्टर बना और विवेक इंजीनियर। अब दोनों मित्रों की अक्सर मुलाकात होना मुश्किल हुआ। इसी तरह बहुत लम्बा अरसा हुआ। एक दिन विवेक को अपने पुराने दोस्तों की बहुत याद आई। समीर को विषय बता कर सभी साथियों का एक सम्मेलन करने की योजना बनाई। सम्मेलन सभा स्थानीय हाईस्कूल में रखी गयी। सभी मित्रों और अध्यापिका- अध्यापकों को आमंत्रित किया गया।सभा का संचालन समीर और विवेक कर रहे थे। बड़े खुश थे सभी लोग। सभी साथी अपने अपने बचपन के यादों को भाषण में तरोताजा कर खुशियां बांट रहे थे। कुछ लोग अपने अपने नौकरियों के अनुभव बताये। आखिर में सभी अध्यापिका-अध्यापकों का बड़े प्यार से सम्मान समारोह कार्यक्रम सुसंपन्न हुआ।तदुपरांत सभी मिल कर भोजन कियेऔर अपने अपने रास्ते तय किये।
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