Tuesday, March 29

बिरई बाबा की बगिया - सुरेन्द्र कुमार (कथा सरोवर)

कथा सरोवर


बिरई बाबा की बगिया

सुरेन्द्र कुमार


    ैं इलाहाबाद से अपने घर जाते हुए अचानक ठिठका। गाँव के पश्चिमी किनारे पर एक बाग था।  जिसको हम लोग बिरई बाबा का बगिया कहते थे। बगिया में करीब बीस से कुछ अधिक पेड़ रहे होंगें। विशालकाय आम,महुआ,पीपल और एक गगनचुंबी शीशम का पेड़ था। सड़क के किनारे होने के कारण, बगिया गांव की खूबसूरती में चार चाँद लगा देती थी । जब मैं गाँव के समीप पहुंचा तो देखा कि,वे सभी बृक्ष बेरहमी से काटे जा चुके थे। अब मुझे रास्ता वीरान सा लग रहा था।मेरे सामने बिरई बाबा की छाया सी आ गई,और मुझे लगा कि जैसे वे हंस रहे थे। बचपन में उनकेद्वारा कहे हुए शब्द मष्तिष्क में ताजा हो गये।

    बचपन में गांव के बच्चों के खेलने का कभी यहीबगिया ठिकाना होता था। सभी बच्चे कबड्डी, बैट-बाल,गुल्ली-डंडा,और सियाडंडी इत्यादि प्रकार के खेल खेलते थे।  बच्चे तो शैतान के पुतले होते हैं,वे खेल के साथ-साथ आम के फल पर भी निशानेबाजी का करतब दिखाते।सियाडंडी खेल में तो बच्चे बन्दर ही बन जाते,कभी इस डाल तो कभी उस डाल।बिरई बाबा डंडा लेकर गरियाते हुए खेदते तो बच्चे लंक लगते। जोबच्चा दौड़ प्रतियोगिता में उत्तीर्ण नहीं हो पाता उसको बिरई बाबा की गालियाँ खानी पड़ती। हालांकि वे अपने शस्त्र डंडे का प्रयोग अल्पमात्रा में ही करते थे।

    बाबा जी उस समय पचास के आसपास के थे।गेहुंआ रंग,मजबूत कद काठी लगभाग साढ़े पाँंच फुट लम्बाशरीर था।उनका रहन-सहन निहायत गंवारू व सादा था।किसान का जीवन भला उससे बेहतर कहाँ हो ही सकता है। उनका सुबह भी खेत मेंऔर शाम भी खेत में ही होता था ।उनके दो बेटे थे,बड़ापढ़ा- लिखा था तो तहसील और दफ्तर के चक्कर लगाता था। छोटा कम पढ़ा था तोउसे बाबा ने अपना सहयोगी बना लिया।छोटा लड़का अब खेती के कार्य में प्रवीण हो गया था। बाबा अब अधिक उम्र के हो गये थे सो वह अधिकतर काम अपने कन्धों पर ले लिया। इसका यह कदापि मतलब नहीं कि बाबा अकर्मण्य हो गये थे। वह भी छोटे लड़के के साथ साया की भाँति रहते थे।

    बाबाजी शिवजी के अनन्य भक्त थे । उन्होने शिवजी का मन्दिर बनवाया और स्वयं उसकी देखरेख करते थे। शिवरात्रि के दिन पूरेगाँव की महिलाएं और पुरुष उसी मन्दिर में रूद्राभिषेक करते थे। बिरई बाबा लगभग सभी को पूजा सामग्री उपलव्ध  कराते थे।

    बाबा की सबसे खास बात थी उनकी आवाज यदि वे दिल्ली से आवाज लगाते तो इस्लामाबाद सुनाई पड़ता।उनका पैतृक घर गाँव में था। सुविधा के खातिर उन्होने गाँव के बाहर अपना बसेरा बना लियेथे,,वहीं मन्दिर के पास ही। उन्होंने एक जोड़ी बैल रखा था। बैल भी उन्ही के समान हष्ट-पुष्ट थे। बाबा स्वयं उनकी देखभाल करते थे ।उन्होने लगभग गांव के बीस घरों में दूध देनेका ठेका ले रखा था। सुबह ही घर के बच्चे दूध का बितरण कर देते और घर की अर्थव्यवस्था काफी महद तक मजबूत कर देते।

    वे बड़े गर्व से कहते कि हमारे पुरखों ने पाँच इनारे खुदवाये थे । चार तो पट गये थेलेकिन एक अभी भी चल रहा है।बाबा आधुनिक सुख-सुबिधाओं के कट्टर विरोधी थे। कपड़े के नाम पर वे धोती और कमीज ही पहनते थे। कपड़ों को साफ करने के लिए डिट्रजेंट का प्रयोग फिजूलखर्ची मानते थे। वे अन्य लोंगों को भीबहिष्कार करने के लिए प्रेरित करते थे।कपड़ों को साफ करने के लिए वे रेह का प्रयोग करते। दिनभर हाड़तोड़ मेहनत करते। शाम को जानवरों के चारे की व्यवस्था करते।

     एक दिन की बात है मई का महीना था ।गर्मी अपने शबाब पर थी। बिरई बाबा सुबह से दोपहर तक खेत की जुताई करके, बैलों को हल से खोलकर खूंटे से बाँध दिए।  चौपायौं के चारो का प्रबन्ध करके स्वयं भोजन करके चारपाई पर आराम कर रहे थे।वे भविष्य के बारे में सोचकर चिंतित हो रहे थे। पिछले बार बारिश कम होने के कारण धान की पसल पर बुरा प्रभाव पड़ा था।जो थोड़ा बहुत हुआ भी था ,वह बड़े कसालत से हुआ था। बाबा जी इसी के बारे में चिंतन-मनन कर रहे थे,तभी बाग में बच्चों का कोलाहल सुनाई पड़ा। बच्चों ने उनके आराम में खलल डाल दिये । गुस्से से उनका शरीर काँप रहा था।डंडा लेकर दौड़े तो बच्चे लंक लगे। आज उनके क्रोध की सीमा टूट गई। माँ -बहन की गाली देते हुए जब बाग में पहुँचे तो सभी बच्चे भाग गये थे। मैं अकेलेकिनारे खड़ा था। उनहोने मुझे कुछ नही कहा ,बस ऊँची-ऊँची आवाज में बोले जा रहे थे। मुझे लगा शायद वे मुझसे ही कह रहे हो।मैंभी ध्यानपूर्वक उनकी बातों को सुनने लगा' । वह कह रहे थे ‘ यही बाग का हमरे पुरखा  पुरनिया लगाय रहिन ,अपने खून पसीनन का इन्कै सींचिन। हमहू वनकै धरोहर समझ कै एकर रखवाली करत रहिन।लेकिन यै लड़कै सारे यहि पेड़न कै फल खायं हमैं खुशी होत। लेकिन यै सारै इनकै डार टोड़ डालिन ‘  इतना कहते-कहते जोर -जोर से बाबा रोने लगे। मैं गम्भीरता से उनकी बाते सुन रहा था । दरअसल उस दिन बच्चे कच्चे आमों से लदी हुई दो तीन बड़ी डालियाँ टोड़ डाली थी। क्रोध से बाबा जी का शरीर दहक रहा था। आज उनका आवाज शून्य सा हो रहा रहा था।

    उन्होने कहा जब तक बिरई हैं तब तक आम खाय लो ,मौज लौ बचवा जैहदिन हमकै दीनानथ बुलाय लेहैं तरिसबो सारेव'।

    तोहार बाप कभौ बाग न लगाइ पैंहै भलै महला -दुमहला बनवाय लेहैं। हमार काव साल दुइ साल कै मेहमान हई।आपन देखौ।

    इस घटना से करीब दो साल बाद बाबाजी स्वर्ग सिधार गये। उनके न रहने से बगिआ सूना- सूना सा लगता था। बच्चों की शरारतों का उनके लड़के सहन न कर सके ।  उनके मरने के करीब तीन या चार साल बाद सभी पेड़ काट दिये गये। उनके पुत्रों को बच्चोँ की शैतानियों से फुर्सत मिल गई थी।

    मेरे गाँव आनेलगभग दो महीने पहले  पेड़ो को निर्दयतापूर्वक काट डाला गया था। ऐसा इसलिए कह रहा हूँ कि जब मैं इलाहाबाद जा रहा था तब पेड़ो ने मुझेअलविदाकहा था। शायद यह अन्तिम बिदाई थी तभीतो मेरे आने पर वे स्वागत नहीं कियें। हाँ पेड़ के ठूठों की तरफ देखने पर ऐसे लगा जैसे बिरई बाबा चिढ़ा रहे हों और जश्न मना रहे हों । (बिरई बाबा कै बगिया)



सुरेन्द्र कुमार 

सहायक अध्यापक 

राजकीय हाईस्कूल , बम्हनाखेड़ा हरदोई।

दूरभाष संख्या - 8874804043


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6 comments:

  1. पहला प्रयास कृप्या प्रतिक्रिया दें ।🙏🙏!

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  2. बेहतरीन 👌👌👌🤗

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  3. बेहतरीन🤗🤗👌👌

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  4. मार्मिक कृति, बहुत शुभकामनाएं आपको आशा है कि भविष्य में भी आपकी ऐसे ही बेहतरीन लेखनी का अनुभव ले सकूं।

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  5. मार्मिक कृति, बहुत शुभकामनाएं आपको आशा है कि भविष्य में भी आपकी ऐसे ही बेहतरीन लेखनी का अनुभव ले सकूं।

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  6. धन्यवाद। आभार आपका।।

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