Tuesday, March 29

अस्पृश्यता - सावित्री जामि "चेतना" (कथा सरोवर)

 कथा सरोवर

अस्पृश्यता

- सावित्री जामि "चेतना"

    पुराने समय की बात है।एक दिन भीम अपने भाई के साथ पिता से मिलने रेल से जाते हैं और कोरेगांव रेलवे स्टेशन मे उतरते हैं और पिता के आने का इंतजार करते हैं। पर समय बीतता जाता है।उन्हें लेने के लिए पिता भी नहीं आते हैं और नौकर भी नहीं आता है।दोनों बच्चे उदास से अपने पिता की राह देखते रहते हैं।

    कुछ समय बाद स्टेशन मास्टर दोनों को उदास देखातो!वह उनके पास आते हैं और पूछते हैं कि आप किस के इंतजार में यहां खड़े हैं। भीम ने जवाब दिया कि हमारे पिताजी हमे लेने आने वाले हैंऔर हमें उन के दर्शन के लिए रेलवे स्टेशन मे इंतजार कर रहे हैं। स्टेशन मास्टर इन से पूछते हैं कि आपके पिताजी का नाम क्या है? आप किस गांव के हैं ?आप किस जाति के हैं? इस तरह अनेक प्रश्न मास्टर ने दोनों बच्चों से सवाल पूछते करते हैं।

     भीम स्टेशन मास्टर से कहते हैं कि अपने पिताजी का नाम शकपाल है ,और उनके गांव का अंबेवाडा नाम है, और उनकी जाति महर बताते हैं।स्टेशन मास्टर के कानों में महर की शब्द सुनते ही कुछ पल दंग रह जाते हैं !और दो कदम पीछे हट जाते हैं। क्योंकि स्टेशन मास्टर ने इनके वस्त्र धारण उसे देखकर सोचा कि वह शायद ब्राह्मण होंगे।पर यह लोग शूद्र निकले ,और चुपचाप स्टेशन मास्टर अपने केबिन की ओर चले जाते हैं।

     दोनों बच्चे वहीं स्टेशन पर खड़े रहते हैं और अपने पिताजी का इंतजार करते हैं। समय बिता गया। पर उनके पिता नहीं आए ।अंधेरा हो गई और रात हो गई। दोनों बच्चे घबरा रहे थे।

     स्टेशन मास्टर कुछ करुण दिलवाले थे। उन्होंने अपने केबिन से  झांककर देखा, दोनों बच्चे अंधेरा के कारण घबरा रहे थे। स्टेशन मास्टर उनके पास पहुंचे और दोनों बच्चों से कहा आप अब काफी अंधेरा हो गई है। घबराओ नहीं आपके पिताजी अभी तक नहीं आए। चलो मैं तुम्हारे घर जाने का इंतजाम करता हूं।

     स्टेशन मास्टर स्टेशन से बाहर खड़ी हुई बैलगाड़ीवालोँ के पास जाकर कहते है कि इन बच्चों को उनके गांव तक छोड़ दो ।स्टेशन मास्टर की बातें सुनकर बैलगाड़ी वाले कहते हैं कि वह बच्चे अछूत हैं।हम उनको अपनी बैलगाड़ी में नहीं ले जा सकते। अगर हम उनको हमारी बैलगाड़ियों में ले जाएंगे तो हमारा बैलगाड़ी मैला हो जाएगी।

    साफ-साफ इंकार कर देते हैं।

     स्टेशन मास्टर दोनों बच्चों की उदासीनता को देखकर कहते हैं कि तुम उदास ना हो! मैं तुम्हें तुम्हारे गांव तक मै छोड़ देता हूं और कहते हैं जाओ अपना सामान लेकर साइकिल के पास जाओ और स्टेशन मास्टर दोनों बच्चों को साइकिल पर चढ़ा कर उनके गांव तक छोड़ देते हैं।

 

नीति

हमारी संस्कृति यह बताती है कि हमारे देवताओं ही स्वयं मनुष्यों को समान मानते थे और उनसे विवाह भी करते थे।तो हमें यह भेदभाव क्यों? उन देवताओं को पूजा करनेवालोँको यह अस्पृश्यता की भावना क्यों?

ईश्वर की उपासना से ईश्वर प्राप्त नहीं होता! हर आदमी के आदर से ही ईश्वर की प्राप्ति होती है।क्योंकि हर मनुष्य में ईश्वर छिपा हुआ रहता है। अस्पृश्यता की प्रथा अंत से ही सम समाज की स्थापना हो सकती है।

जो बचपन में छोटा लड़का भीम था वह और कोई नहीं वह डॉक्टर भीमराव अंबेडकर था। 



सावित्री जामि "चेतना"

साहित्यिकार

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Editor
Prasadarao Jami

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