Thursday, March 10

विद्यावती की कहानी - एम राजराजेश्वरी (कथा सरोवर)

कथा सरोवर


विद्यावती की कहानी

एम राजराजेश्वरी


    एक सूंदर तथा सुशील परिवार था।  उनके ५ पुत्र  तथा 3 पुत्रियाँ थी।  पिताजी हेडमास्टर थे।  बड़ी मुश्किल से घर  परिवार चलता था ||  इतने में ४० साल की उम्र में कैंसर के कारण उनकी मृत्यु हो गयी।    घर चलना बहुत मुश्किल था।  फिर भी उस माँ ने  पति की इच्छा के अनरूप सबको पढ़ाने का निर्णय लिया।  बड़े बेटे को पिताजी की नौकरी मिली। सभी भाईयों ने मिलकर दो बहनो का विवाह किया।  आखरी बहिन (हेमवती))बड़ी तेज थी।  एक बार कही या सुनी बात कभी नही भूलती थी।  उसकी पढाई स्कूल तक सीमित हो गयी थी क्योंकि कॉलेज जाने के लिए नदी पार करनी पड़ती थी। आमदनी भी नहीं थी।   लेकिन भाईयों की सारी किताबें, पुस्तकालय से लाये सभी उपन्यास पढ़ लेती थी।  क्योंकि रेलवे में एक भाई काम करते थे उसकी उत्तर-दक्षिण यात्राएँ भी विवाह से पहले पूरी हो गयी।  निर्मल मन, निश्चल उसके संकल्प थे |

    वह सबमें लाड़ली और होशियार थी।   सब उसको चाहते थे।  विवाह की उम्र हो गयी थी तो अच्छे पढ़े लिखे व्यक्ति से उसका विवाह तय हुआ।  परन्तु सास बड़ी ही कंजूस मक्खीचूस औरत थी।  उनकी १० एकड़ भूमि होने के बावजूद दहेज़ तथा पैसों के लिए सताती थी।  पति शकी मिजाज का था।  उसे बहुत सताता था।   उसकी एक और खूबी थी की वह अच्छा गाती भी थी।  लेकिन पति के शकी व्यवहार के कारण उसे हर अपनी इच्छा से दूर रहना पड़ता था।  समय बीतता गया।  उनके ३ पुत्र तथा १ बेटी हुई थी  बेटी बेटे के बाद पैदा हुई।   उसका नाम विद्यावती रखा गया।  

    विद्यावती माँ की तरह नैतिक मूल्यों तथा कौशलों की खान थी।  माँ को उसने बहुत नजदीकी से देखा।  पिताजी के मारने-पीटने के सब घाव उसके मन में कचोट रहे थे।  उसने ठान लिया कि वह खूब पढ़ लिखकर माँ को और भाइयों को पिताजी से दूर लेजाकर उनकी अच्छी देखभाल करेगी।  पिताजी सरकारी नौकर थे पर नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे सरकारी नौकर बने।  उन्होंने किसीको पढ़ाया -लिखाया नही।  बच्चो पर जुल्म ढाते थे।  लेकिन हेमवती ने उन बच्चों को सरकारी पाठशाला में खूब पढ़ाया लिखाया।  हेमवती ने बेटी को अपना सा दुःख न झेले बहुत पढ़ना चाहती थी।  माँ और बेटी दोनों का भगवान् पर अचंचल विश्वास था।  वीद्यावाती ने भगवान् को ही अपना पिता माना। माँ बेटी को  अपने पैरों पर खड़ा देखना चाहती थी।  बेटी विद्यावती ने  हिंदी की सभी परीक्षाएँ पास की। ट्यूशन  पढ़ाते हुए उसने सारी डिग्रियाँ हासिल की।  कड़ी मेहनत की।   कॉलेज के बाद हिंदी में एम् ए किया।   अनुवाद में डिप्लोमा किया।  हिंदी पंडित प्रशिक्षण किया और सरकारी नौकरी हासिल की।   अब उसकी कामना पूरी हुई।  माँ की इच्छा पूरी की और सबकी अच्छी देखभाल करने लगी।  पिताजी के  दम्भ को सीमित किया।  नौकरी करते उसने  बी एड भी किया।  कविताएँ लिखती ,  हिंदी साहित्य विकास में भाग लेती हुई उसने छात्रों को बड़ी रुझान से पढ़ाते हुए उत्तम अध्यापिका का सम्मान पाया।  शैक्षिक विभाग में भी उसका बड़ा नाम हुआ। इतना ही नहीं , उसने सामाजिक कार्यों में भाग लेना तथा एक लेखिका के  रूप में अपने आप को प्रतिष्ठित किया।  माँ हेमवती के संकल्प को उसने सच कर दिखाया।  विपरीत परिस्थितियों में भी उसने अपना  लक्ष्य नहीं भूला। 

सीख/नीति : संकल्प और लक्ष्य  के  लिए कार्य करनेवाले कभी नहीं हारते।


एम राजराजेश्वरी

सरकारी पाठशाला सहायक,

बोइनपल्ली, हैदराबाद

9951974900

anvpadmavathi@gmail.com

-------------------------------------------------------------------------------------

If you like this Writing and want to read more... Then Follow Us
or call
9849250784
for Printed Book
कथा सरोवर
Editor
Prasadarao Jami

-----------------------------------------------------------------------------------------------------


scan to see on youtube



scan to join on WhatsApp




BOOK PUBLISHED BY :

GEETA PRAKASHAN

INDIA

Cell 98492 50784

geetaprakashan7@gmail.com

---------------------------------------------------------------------------------

do you want to publish your writing through our BLOGPAGE ?

Please call us 62818 22363

No comments:

Post a Comment

हमर छत्तीसगढ़ - मुकेश कुमार भारद्वाज (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "उथल पुथल - अक्षरों की")

(Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "उथल पुथल - अक्षरों की")      हमर छत्तीसगढ़  💐..................................💐 छत्त...