कथा सरोवर
सपना एक आम सा दिखने वाला शब्द, अपने आप में
जिंदगी के विभिन्न रंग, पहलूओं, आशा-निराशा, सफलता- असफलता और आकांक्षाओं को समेटे
हुए है। हर एक व्यक्ति का एक सपना होता है- कुछ कर गुजरने का, कुछ ऐसा जो यादगार हो।
सपना आम व्यक्ति का होता है, किन्तु सपना आम नहीं होता। सपने साकार भी होते हैं, और
सच हुए सपने व्यक्ति को आम से खास बना देतें हैं।
रोहन एक साधारण सा दिखने वाला किन्तु
बहुमूल्य प्रतिभा का धनी बच्चा था। मात्र सात साल की उम्र में ही उसने बहुत से लेखकों
की किताबें पढ़ डाली। विद्यालय में चाहे कोई भी प्रतियोगिता हो उसमें वह बढ़- चढ़कर
हिस्सा लेता और सभी की प्रशंसा बटोरता। लेकिन उसको सबसे ज्यादा प्रिय था कैनवास पर
चित्र उकेरना और उन्हे अपनी कल्पना के रंगों से संवारना। जो भी उसके बनाये चित्रों
को देखता मंत्रमुग्ध हो जाता और उसे आगे बढ़ने, कुछ कर गुजरने का हौंसला देता। उसके
पास एक सतरंगी चिड़िया थी। जिससे वह दिनरात बातें किया करता और शायद वही उसकी प्रेरणा
का स्रोत भी थी, जो उसे जीवन को विभिन्न रंगों से सजाने- संवारने का संदेश देती थी।
वह अपनी जिंदगी से बेहद खुश था। विद्यालय में सभी बच्चे उसको अपना मित्र बनाना चाहते
थे और अपने अध्यापकों की आँखों का तो मानो वह तारा था। पर नियति को शायद कुछ और ही
मंजूर था। एक दिन की बात है कि वह अपने माता-पिता के साथ पास के ही गांव में एक आयोजन
में सम्मिलित होने चला गया। किन्तु वह अपनी प्रिय मित्र चिड़िया को न ले जा सका क्योंकि
उसके माता-पिता ने चिड़िया को न ले जाने के लिये उसे सख़्त हिदायत दी थी, उन्हे लगता
था कि यदि वह चिड़िया उसके साथ होगी तो वह सब-कुछ भूलकर उसी से खेलता रहेगा। वहां आयोजन
में रह-रहकर उसे अपनी प्यारी चिड़िया की याद सता रही थी, उसका मन किसी भी तरह की गतिविधि
में नहीं लग रहा था। दिन ढ़लने लगा था और ढ़लते हुए सूरज के साथ ही उसका मन भी किसी
अनिष्ट की आशंका से घिर चला था। आखिर ऐसा हो भी क्यूं ना उसके मन के तार चिड़िया के
साथ इतनी गहराई से जो जुड़े थे, यदि चिड़िया को थोड़ा सा भी कष्ट होता तो रोहन उसे
महसूस करने लगता। न जाने किस पूर्व जन्म का यह सम्बंध था।
खैर, जैसे-तैसे तक़रीबन आठ बजे वह
अपने घर पहुंचा और दौड़कर अपनी चिड़ियारानी के पास जा पहुंचा। लेकिन चिड़िया दर्द से
तिलमिला रही थी, उसके पंख इधर- उधर बिखरे हुए थे, वह खून से लथपथ थी, और उसके प्राण
मानो रोहन के इंतजार में अटके हुए थे। यह सब देख कर रोहन हक्का-बक्का रह गया, उसकी
आँखों से आँसूओं का झरना बह रहा था। उसका तन-मन दर्द से कराह उठा। कुछ समय बाद उसे
ढूंढते हुए उसके माता-पिता भी वहां आ गये और यह सब देखकर अवाक् रह गये। रोहन ने चिड़िया
को अपनी हथेली में उठाया और अश्रुपूरित नैत्रों से मानो उसे आश्वासन दिया- मैं हूँ
ना, मैं तुम्हे कुछ नहीं होने दूंगा, तुम मेरे जीवन की कल्पना हो, मेरा आधार हो। उसके
पिताजी दौड़कर पास के ही मकान में रह रहे डॉक्टर शेरगिल को बुला लाये जो पंक्षियों
के डॉक्टर थे। उन्होने चिड़िया की चोट को पूरी तरह परखने और जांचने के बाद बताया कि
किसी बिल्ली या अन्य जानवर ने इसकी यह दशा की है, और बहुत देर हो जाने से जहर पूरे
शरीर में फैल चुका है, इसे बचाना लगभग नामुमकिन है, आगे ईश्वर की मर्जी।
लगभग आधे घंटे के बाद चिड़िया के
प्राण- पखेरू उड़ गये। इस घटना ने रोहन को पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया, वह दिन-व-दिन
मानो निष्प्राण हो चला था। उसने विद्यालय की किसी भी गतिविधि में भाग लेना बंद कर दिया,
घर पर भी वह ज्यादातर समय मौन ही रहता, पैंटिंग करना तो मानो वह भूल ही गया था। उसके
माता-पिता व अध्यापकों ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन उसका चिड़िया के प्रति
प्रेम उसे कुछ भी समझने से रोकता। शायद, वह अपने माता-पिता को उस चिड़िया की मौत के
लिये जिम्मेदार मानने लगा था, क्योंकि उन्होने ही उसे चिड़िया को न ले जाने के लिए
मजबूर किया था, लेकिन हौनी को कौन टाल सकता था। कहीं न कहीं उसके माता-पिता भी इस अपराध
बोध की भावना से ग्रसित थे।
उन्होने अपने बेटे का ध्यान दूसरी तरफ लगाने का बहुत प्रयास किया किन्तु असफल रहे। इस तरह तीन-चार साल बीत गये किन्तु रोहन उस चिड़िया को न भुला सका और उधर उसका परीक्षा परिणाम ग्राफ़ निरंतर नीचे और नीचे आता जा रहा था। 5 सितंबर यानी टीचर्स डे को सभी अध्यापकों ने यह तय किया कि सभी बच्चों को चिड़ियाघर ले जाया जाये, किन्तु रोहन ने चलने से इंकार कर दिया। अध्यापकों के बहुत समझाने पर वह अनमने ढंग से चलने को तैयार हो गया। इस चिड़ियाघर की यात्रा ने उसे जीने का एक नया उद्देश्य दे दिया- वह तरह-तरह की रंग-बिरंगी चिड़िया, तोता, मोर और अन्य पक्षियों की निश्छल क्रीडाओं से मंत्रमुग्ध हो उठा, उसके अधरों पर खुशी की लहर चमक उठी और आँखों से आँसू बहने लगे- ये आँसू उसकी प्यारी चिड़िया के लिये सच्ची श्रद्धांजलि तथा अधूरे सपने को फिर से सच करने की फिर से जाग्रत हो उठी लालसा के प्रतीक थे। उसके अध्यापक यह सब देखकर बहुत खुश थे और धीरे-धीरे रोहन पहले की तरह सामान्य जीवन जीने लगा और सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता गया। साथ ही उसने एक ऐसी संस्था के लिये कार्य करना शुरू कर दिया जो पशु- पक्षियों की देखभाल का जिम्मा उठाती है। इस तरह वह सतरंगी चिड़िया उसके जीवन का सपना, एक अधूरा किन्तु सुनहरा सपना बन गयी, परंतु उसके जीवन को एक नयी दिशा, एक आयाम दे गयी।
डॉ सोना अग्रवाल
Assistant
Professor in English
Govt
College, Newai (Tonk)
97828 38128
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