Thursday, February 10

वैश्विक ज़मीन हिंदी - डॉ रमेश जवलकर (साहित्य मंथन)

साहित्य मंथन


वैश्विक ज़मीन हिंदी

-  डॉ रमेश जवलकर

    सन १९४९ में जब संविधान सभा में हिंदी को राजभाषा बनानेवाली धारा पर बहस चल रही थी तो बहस दो के बीच थी। अंग्रेजी वहां कहीं भी नहीं थी ,बहस थी की हिंदुस्तानी इस देश की  मुख्य राजभाषा बने अथवा हिंदी। हिंदी के पक्षदर और हिंदुस्तानी के पक्षदर लगभग बराबर थे और संविधान की कांग्रेस  पार्टी में सिर्फ एकमत से यहाँ निर्णय हुआ कि हिंदी राजभाषा बने। अंग्रज़ी के करेस्पोंडेंट ने बहुत दिनों बाद लिखा  था  कि सबसे बड़ी भूल भारतीय जनतंत्र ने की हैं कि जिस दिन वे स्वतंत्र हुए उसी  दिन से उन्होंने अपनी भाषा को अधिकारी भाषा का दर्जा नहीं दिया। उसी दिन से डीएनए चाहिए था जैसे भी हिंदी चलती -टूटी फूटी चलती -तो अपनी आप ढल जाती। कोई भी भाषा प्रयोग से ढलती  है,आदेश से नहीं। जनता में जनतंत्र से काम नहीं चलता है। हिंदी प्रभुता की भाषा नहीं है। हिंदी साझेदारी की  भाषा है। इसने  सबके साथ मिलकर सबका प्रेम पा करके ,सबका ह्रदय जीत करके कुछ जोड़ने का काम किया है। हिंदी अंग्रेजी का स्थान लेने नहीं जा रही है ,हिंदी अंग्रेजी बनने  नहीं जा रही है ,हिंदी शासन  करने नहीं जा रही है ,हिंदी जनतंत्र की भाषा है ,हिंदी जनता की आकांक्षा की भाषा है। हिंदी भारत के सुदूरवर्ती क्षेत्र में रहने वाले आदमी को दूसरे क्षेत्र में रहनेवाले आदमी  से जोड़ने वाली भाषा होगी । एक इसी भावना का विकास करनेवाली भाषा होगी कि हमारी भाषाएँ भिन्न है ,हमारी वेशभूषायें भिन्न हो सकती हैं ,हमारी कुछ रीती रिवाज भिन्न हो सकते हैं ,लेकिन हमारी जातीय संस्कार एक है। कुछ है ,जिसके कारण हमें इतनी विभिन्नता का अनुभव करते हुए भी एक होने का अनुभव होता है। वह क्या है ,यहाँ जानना ,यहाँ समझाना हिंदी  का काम एक हजार वर्षों से रहा है । हिंदी के माध्यम से मध्य युगीन संत कवियों ने मराठी को ,बांग्ला को ,गुजराती को,सूरदास से जोड़ने की कोशिश की थी। हमारी हैदराबाद में  संत साई बाबा के यहाँ  जो भजन गाये जाते हैं ,सब हिंदी में गाये जाते है। इससे किसी भाषा के गौरव की हानि नहीं है ,इस से उनका गौरव बढ़ता है की उनमें से ही एक भाषा सबके द्वारा व्यवहार में लाई जाती है। पहल जब व्यवसाई अपनी हुंडी इस क्षेत्र से उस क्षेत्र में भेजना था तो हिंदी में भेजता था । कारण यह था कि कोई भाषा काम चलाने के लिए होनी चाहिए ,जिसका सब व्यवहार कर सके और इसके साथ ही साथ दूसरी भाषा का भी व्यवहार कर सकें। यहाँ आज के भाषाविज्ञानं ने  प्रमाणित किया है कि एक से अधिक भाषा जानना उपयोगी होता है। आदमी अगर अपनी भाषा के अतिरिक्त दूसरी-तीसरी भाषा जानता है  तो उससे उसकी अपनी भाषा का संस्कार और सुदृढ़ होता है ,मजबूत होता है। हिंदी भाषी क्षेत्र में ही हिंदी की करीब २२ बोलियां है और दक्किनी  हिंदी खड़ीबोली को लेकर २३  बोलियां ,सबका अपना महत्व है ,सबकी अपनी मिठास है ,घर में उन्ही का व्यवहार होता है -अवधि- मैथिलि तमाम बोलियां है। 

    उन सभी भाषाओँ का अलग-अलग महत्व है। सभी भाषाओँ के बोल;ने वाले लोगों ने हिंदी को अपनाया है ,इस भाव से कि एक विस्तृत आयाम में,एक विस्तृत समाज में संपर्क स्थापित  करने के लिए ,उनके साथ साझेदारी करने के लिए ,हिंदी जरूरी है और हिंदी का सभी ने विकास किया है और कर भी रहे है। मैं स्वयं  तेलुगु प्रान्ती हूँ। तेलुगु की संख्या इस देश में ८.  करोड़ हैं विश्व में ९. करोड़ हैं। पर हमने हिंदी लिखना ,हिंदी बोलना ,हिंदी में काम करना इसलिए जरूरी समझा की हम छोटे से क्षेत्र तक सीमित नहीं रहना चाहते। तीर्थयात्री उत्तर से दक्षिण आता है तो यहाँ का जो तीर्थ पुरोहित है ,हिंदी बोलता है । इसलिए हिंदी बोलता है ,व्यवसाय की दृष्टी से नहीं ,बल्कि जब तेलुगु भाषी दक्षिण से उत्तर जाता है तो वह भी हिंदी बोलता है। वह जानता है हिंदी एक ऐसी साधारण भाषा है ,जो किसी प्रभुसत्ता की भाषा नहीं है ,किसी के ऊपर चढ़कर रहनेवाली   भाषा नहीं है ,बल्कि ऐसी भाषा है की जिस से दो विभिन्न भाषाएं अपने बीच मिलने का सूत्र स्थापित कर लेती है। इस प्रकार की जो भावना रही है हिंदी के पीछे ,उस भावना को ध्यान में रखते हुए उस समय प्रधान मंत्री श्री नेहरूजी ने प्रस्ताव किया था की हिंदुस्तानी भाषा चले  । हिंदी या जो भी हिंदुस्तानी होती -उसके विकास में एक प्रतिबंद लग गया -१४ वर्ष बाद पुनः विचार किया जायेगा । और उसके बाद एक और प्रतिबन्ध लग गया । मेरे मित्र नितिन टंडन कहते हैं की सीता मैया को जैसे दो बार वनवास मिला ,उसी तरह हिंदी को भी दो बार वनवास मिला। एकबार  १४ वर्ष का मिला ,लेकिन उस समय राम  साथ थे ,दूसरी बार जो वनवास मिला ,वह अनिश्चित काल के लिए मिला ,जिसकी कोई अवधि नहीं है,जब तक एक भी राज्य  विरोध करे हिंदी नहीं होगी। एक राज्य आग्रह करे अंग्रेजी के लिए हिंदी नहीं होगी और अंग्रेजी मुख्य रूप से संपर्क भाषा बनी रहेगी यहाँ स्थिति उत्तरोत्तर अधिक चिंतनीय    होती चली जा रही है और लोग उदासीन होने  लगे हैं। हिंदुस्तानी अपनी अस्मिता से उदासीन होने लगे हैं। अपने स्वाभाव से उदासीन होने लगे हैं  और यहाँ उदासीनता लोगों के मन में खालीपन-एक रिश्ता उत्पन्न कर रही है।

    जनता की विश्वसनीयता जनतंत्र का मापदंड होती है। जनता की किस पर विश्वास होता है ,किस भाषा पर विश्वास होता है ,किस्मे लगता है की हमारे साथ चल नहीं हो रहा है ,धोका नहीं हो रहा है। जब उसकी भाषा में काम होता है तो उसे लगता है कि उसके साथ चल नहीं हो रहा है ,वह समझ सकता है ,एक सीधा सम्बन्ध होता है उसका जो कि जनतंत्र में आवश्यक है। हिंदी जनतंत्र के लिए आवश्यक है। हिंदी हिंदी भाषी के लिए आवश्यक नहीं है। भारतीय भाषाएँ भारतीय जनतंत्र के लिए आवश्यक है। वे केवल किसी अधिकार को हकदार नहीं है। वे इस भारत देश कि जीवनधारा हैं ,इसलिए जब आप राजभाषा के रूप में या एक दुसरे दर्जे को संपर्क भाषा के रूप में हिंदी का स्मरण  करते हैं तो यहाँ सोचना चाहिए यहाँ मातृभाषा मात्र नहीं है। इसके साथ कितनी भावनायें जुडी  हैं ,इसके साथ स्वाधीनता का संग्राम जुड़ा हुआ है ,इसके साथ चरखे का अभियान जुड़ा है। इसके साथ महात्मा गाँधी ,महर्षि दयानन्द ,केशवचन्द्र सेन, यार्लगड्डा लक्ष्मी प्रसाद  जैसे लोग जुड़े हुए हैं ,जो हिंदी भाषी नहीं थे कन्नड़ के प्रसिद्द कवि नामब्रियाजल और भारत के राष्ट्रकवि सुब्रह्मण्यम भारती जुड़े हुए हैं। तो यह किसके पदचिह्नों का जुड़ाव है ,किस मानसिकता  से जुड़ाव हुआ है ,यह समझना चाहिए। गांधीजी अंग्रेजी अच्छी लिखते थे ,बोलते थे ,उसकी अपेक्षा हिंदी कम अच्छी बोलते थे। पर उनका आग्रह  हिंदी में लिखना -बोलने का सिर्फ देश तक पहुँचने के लिए ,देश के आम आदमी तक पहुँचने  का था और यह आग्रह हर भारतीय का होना चाहिए। हमारी सार्थकता इसमें है की हम पूरे देश को एक परिवार के रूप में समझे। उस परिवार में कुछ चीजों पर मतभेद हो सकते हैं,उस परिवार में अलग -अलग मनोभाव हो सकते हैं,होने चाहिए। एकरूपता एकता नहीं ,एकरूपता तो एक तरह से ऊब पैदा करती है। इस तरह की वेशभूषा हो ,इस तरह का खानपान हो ,इस तरह से चलना हो ,यह सब तो सेना को शोभा देता है ,पुलिस  को शोभा देता है ,साधारण जनता को थोड़े ही शोभा देगा ?साधारण जनता तो अनेक रूप होती है। अनेकरूपता में सौंदर्य है ,एक सौष्ठव है ,एक अपना अनोखा बांका पन है। उसकी पहचान जब होती है तो एकता की पहचान अधिक अच्छी तरह से होती है। कमल जब पूरा खिलता है तो एक-एक दाल अलग दिखता है ,लेकिन पूरे दल को मिला करके कमल होता है। अकेले एक दल कमल नहीं है उसपर से जब सब भारतीय भाषाएँ पूर्ण रूप से विक्सित होंगी तो भारत का जो भाषा कमल है ,वह  खिला हुआ दिखेगा -पूरी तरह ,अधिक सुन्दर। इन्हे जोड़नेवाला एक परागकोष है ,मकरंद है ,जो सभी कोशों को जोड़ता है। उसका सम्बन्ध सभी दलों से है ,वह एक है। तो जैसे हमारी भीतर का रस है ,इस एक को पहचान ने के लिए अन्य एक की पहुंचना जरूरी होता है। इसके अनेक तक पहुंचना संभव है ,फिर इस देश में पहुँचने की यही पहचान नहीं है।

    हम अनेकता को गौरव देते हैं ,इसका कारण है कि हमरे भीतर एक मूलभूत एकता है। भीतर में एकात्मकता है  ,एक दुसरे के लिए चिंता का भाव है। अगर यह इस दिन  स्मरण किया जाए तो में समझता हूँ हम हिंदी दिवस  अच्छी तरह मना रहे होंगे। इसलिए मेरा निवेदन है कि जो कार्य आप कर रहे हैं ,वह चाहे हल्का सा ही कदम हो और बड़ा कदम न हो तो भी यहाँ आगे ले जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं ,उसकी भी प्रशंसा होनी ही चाहिए क्यों कि यहाँ सकारात्मक काम है ,नकारात्मक नहीं। हर सकारात्मक काम की प्रशंसा होनी चाहिए। उसकी उपलब्धि कम हो,ज्यादा हो ,कोई चिंता नहीं ,लेकिन यदि सकारात्मक कार्य हो तो निश्चय ही उसका फल आगे चल करके अच्छा होगा। बस इस से संतोष होना चाहिए ,इस से अधिक प्रयत्न करना नहीं चाहिए ,और जो तमाम कल्पित  भयों की बात की जाती है --इससे यह न हो जाए,कहीं यह न प्रभावित हो ,सब व्यर्थ है। आदमी रहेगा तो कहीं का रहेगा ,अपनी ज़मीन पर रहेगा तो विश्व का होगा। जिसकी ज़मीन नहीं होगी ,वह विश्व का क्या होगा?जो घर से उझड़ जायेगा ,उसका विश्व क्या है ?जिसकी ज़मीन है ,उसका विश्व भी है। जिसका घर है ,उसका विश्व भी है। जिसका परिवार है ,उसीका  समाज भी है। जिसका परिवार नहीं ,उसका समाज क्या होगा। जिसके अपने रिश्ते हैं वे माया से जुड़े हुए,ममता से जुड़े हुए ,उसीको सबकी ममता होती है,जिसके पास ममता ही नहीं,उसे दुसरे की ममता क्या होगी । इसलिए यहाँ आवश्यक है कि इस भाषा के प्रयोग को आप एक कर्त्तव्यमात्र के रूप में न लें,इस भाषा को आप अपने भीतर आवश्यकता के रूप में लें,यह  आपके जीवन की भीतरी आवश्यकता है।

    इस प्रकार भारत की सेवा में ही आप एक ऐसे देश की सेवा में हैं ,जो स्वाभाविकता में विश्वास करता है। जब आप एक आरोपित भाषा में सोचिएगा तो आरोपित बात करेंगे और अपनी बात नहीं कहेंगे। इसलिए आप अपनी भाषा का प्रयोग कीजिए। आपकी जुबान में जो बात आती है ,अगर कुछ शब्द नहीं आते हैं ,किसी शब्द का प्रयोग कीजिए ,भाव से प्रकट हो जायेगा -आप क्या कहना चाहते है।  उस से जो हिंदी का विकास होगा ,वही सही होगा ,हो रहा भी है मीडिया के विभिन्न क्षेत्रों में  पनपती जा रही है। अंत में मेरा यह  मानना  है की हिंदी शब्दों से नहीं बनेगी ,हिंदी प्रयोग से बनेगी और जीवन में आप जितना ही विस्तृत प्रयोग करेंगे ,ह्रदय से प्रयोग करेंगे ,हिंदी का केवल देश ही नहीं विश्व का विकास भी उतना ही होगा



डॉ रमेश जवलकर
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