Thursday, February 10

साहित्य और आलोचना - कमलेकर नागेश्वर राव (साहित्य मंथन)

साहित्य मंथन


साहित्य और आलोचना

-  कमलेकर नागेश्वर राव

साहित्य : व्यापक एवं संकुचित अर्थ

    साहित्यशब्द की उत्पत्ति सहित शब्द से मानी गई है | ‘सहितशब्द का अर्थ है- साथ / समेत/ संग / युक्त आदि | सहित का भाववाचक रूप ही साहित्य है| अतः व्युत्पत्ति की दृष्टि सेसाहित्यशब्द का अर्थ हुआ - सहित होने का भाव- सहितस्य भावं: साहित्यं अर्थात साहचर्य | आजसाहित्यशब्द का प्रयोग गद्य और पद्य सब प्रकार के घंटों के लिए किया जाता है अतः साहित्य शब्द का अर्थ है गद्य और पद्य सब प्रकार के उन ग्रंथों का समूह जिनमें सार्वजनिक हित संबंधी स्थाई विचार उपलब्ध रहते हैं |

    आजकलसाहित्यशब्द का प्रयोग प्राय: दो अर्थ में होता है | एक तो इसका व्यापक अर्थ है तथा दूसरा संकुचित अर्थ | साहित्य का व्यापक अर्थ है संपूर्ण वांग्मय| अर्थात विश्व में जो भी लिखित या मुद्रित सामग्री है, चाहे वह किसी भी विषय से संबंधित हो, साहित्य कहलाती है| साहित्य के इस व्यापक अर्थ की दृष्टि से धर्म,दर्शन, कला, विज्ञान, ज्योतिष, व्यापार नीति आदि संबंधित सभी ग्रंथ साहित्य कहलाते हैं|

    साहित्यके संकुचित अर्थ से तात्पर्य है-भावना प्रधान साहित्य अथवा ललित साहित्य, जिसे अपने रूढ अर्थ मेंकाव्यकी संज्ञा दी जाती है| ‘साहित्यके संकुचित अर्थ की दृष्टि से महाकाव्य, खंडकाव्य, गीत, कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध, रेखाचित्र, संस्मरण आदि साहित्य कहलाते हैं|

    हिंदी आलोचक गुलाबराय नेसाहित्यके इस व्यापक एवं संकुचित अर्थ को इस प्रकार व्यक्त किया है- “व्यापक अर्थ में साहित्य ऐसी शाब्दिक रचना मात्र का वाचक है, जिसमें कुछ हित का प्रयोजन हो और अपने रोढ अर्थ में काव्या भावना प्रधान साहित्य का पर्याय है|

हिंदी के विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाएं :

गुलाबराय- ‘साहित्यस्य भावः साहित्यं |’   अर्थात सहित होने का भाव ही साहित्य है |

प्रेमचंद- ‘साहित्य की बहुत सी परिभाषाएं की गई हैं पर मेरे विचार से उसकी सर्वोत्तम परिभाषाजीवन की आलोचनाहै | चाहे वह निबंध के रूप में, चाहे कहानियों के, काव्य के, उसे हमारे जीवन की आलोचना और व्याख्या करनी चाहिए |’

 गंगा प्रसाद पांडेय - ‘साहित्य विचारशील आत्मओं की अमर अभिव्यक्ति है| उसमें जीवन संबंधी उन विशेष विचारों का संकलन होता है जो हमारे यथार्थ जीवन को प्रगति देते हैं |

 नंददुलारे वाजपेयी - ‘विकासशील मानव जीवन के महत्वपूर्ण या मार्मिक अंशों की अभिव्यक्ति, यही साहित्य की परिभाषा मोटी परिभाषा हो सकती है|’

 विश्वनाथ प्रसाद मिश्र - ‘साहित्य या काव्य लोकजीवन की अभिव्यक्ति है |’

 हजारी प्रसाद द्विवेदी - ‘साहित्य मनुष्य के अंतर का उच्छलित   आनंद है, जो उसके अंतर में हटाए नहीं अट सका था | साहित्य का मूल यही आनंद का अतिरेक है| उच्छलित आनंद के अतिरेक से उदभूत सुष्टि ही सच्चा साहित्य है |’

डॉ.नागेंद्र - ‘आत्माभिव्यक्ति ही वह मूल तत्व है, जिसके कारण कोई व्यक्ति साहित्यकार और उसकी कृति साहित्य बन पाती है|

डॉ.रामविलास शर्मा - ‘साहित्य जनता की वाणी है| उसकी जातिय  चरित्र का दर्पण है।प्रगतिपथ में बढ़ने के लिए उसका मनोबल है| उनकी सौंदर्य की चाह पूरी करने वाला साधन है|’

सुमित्रानंदन पंत - ‘साहित्य अपनी व्यापक अर्थ में मानव जीवन की गंभीर व्याख्या   है |’

    ऊपर लिखित सभी तत्वों को समाहित कर हम साहित्य की परिभाषा इस प्रकार दे सकते हैं- साहित्य विचार, कल्पना तथा उत्कृष्ट शैली से युक्त वह भावात्मक अभिव्यक्ति है, जो जीवन की व्याख्या एवं आलोचना करते हुए मानव हित साधन करती है|

 

साहित्य के तत्व

    साहित्य के स्वरूप को ठीक प्रकार से समझने के लिए उसकी तत्वों को जानना अत्यंत आवश्यक है|पाश्चात्य विद्वानों ने साहित्य की प्रमुख चार तत्वों को स्वीकार किया है|-वे  हैं -

कल्पना तत्व

बुद्धि तत्व

भाव तत्व

शैली तत्व


कल्पना तत्व

    साहित्य का कल्पना तत्व अत्यंत महत्वपूर्ण है| साहित्यकार साहित्य के निर्माण में कल्पना का अत्यधिक  उपयोग करता है | ‘कल्पनाशब्द का अर्थ है- निर्माण या सृष्टि करना | अंग्रेजी में इसके लिएइमेजिनेशन’ (Imagination) शब्द है जिसका अर्थ होता है- मन में धारण करना | साहित्यकार कल्पना द्वारा ही अमूर्त तथा अप्रत्यक्ष वस्कोतुओं को  मूर्त रूप में चित्रित करता है| साहित्यकार या कवि कल्पना तत्व के माध्यम से ही शुष्क रसहीन वस्तुओं को सरस आनंदमयी बना देता है| कल्पना के द्वारा ही साहित्यकार साहित्य को सजीव तथा सुंदर बनाता है|

 

बुद्धि तत्व

    बुद्धि तत्व का तात्पर्य है- विचार की प्रधानता | साहित्यकार साहित्य की रचना बिना किसी उद्देश्य के नहीं करता अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह रचना के माध्यम से अपने विचारों की अभिव्यक्ति करता है। परंतु साहित्य में विचार शुष्क रूप में रहकर सरस तथा भावात्मक रूप में रहते हैं जिसके कारण पाठक को साहित्य आनंद प्रदान करने वाला लगता है।

भाव तत्व

    भाव तत्व के बिना साहित्य नीरस हो जाता है तथा ऐसे साहित्य का पाठक पर प्रभाव के बराबर पड़ता है। पाश्चात्य कवि तथा आलोचक विलियम वर्ड्सवर्थ ने प्रबल भावों को ही काव्य का काव्य का आधार स्वीकार किया है।

        उनकी काव्य की परिभाषा है-" काव्य प्रबल भावों  का सहज उच्छलन है। वस्तुतः प्रबल भावों के कारण ही साहित्य का फाटक पर गहरा प्रभाव पड़ता है।"

शैली तत्व

    साहित्य के पहले तीन तत्व अर्थात कल्पना बुद्धि तथा भाव तत्वों को हम साहित्य के भाव पक्ष से संबंधित तत्व मान सकते हैं। इन तीनों तत्वों का संबंध साहित्यकार की मानसिकता से है।साहित्य का शैली तत्व साहित्य के कल्प पक्ष से संबंधित है। शैली तत्व महत्वपूर्ण तत्व क्योंकि इसके बिना साहित्य मूर्त रूप धारण नहीं करता।रचना जो साहित्यकार के मानस में अमूर्त रूप में स्थित रहती है, शैली तत्व के माध्यम से ही वह अपना मूर्त रूप ग्रहण करती है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि अभिव्यंजना की विशिष्टता ही शैली है। अपनी विशिष्ट शैली के कारण ही साहित्यकार अपनी पहचान बनाता है।


साहित्य और समाज

              साहित्य और समाज का घनिष्ठ संबंध है।साहित्य और समाज एक दूसरे से अविभाज्य रुप में संबंध है।साहित्य का निर्माता अर्थात साहित्यकार समाज का ही एक अंग या सदस्य होता है।वह साहित्य निर्माण के लिए संपूर्ण सामग्री समाज से ही ग्रहण करता है। भाव, विचार, भाषा, कल्पना, बिंब, प्रतीक आदि वह समाज से ही प्राप्त करता है। साहित्य का प्रभाव समाज पर पड़ता है।साहित्यकार साहित्य की रचना समाज के हित के लिए ही करता है।इस प्रकार साहित्य साहित्यकार और समाज के बीच एक सेतु का कार्य करता है। समाज और संस्कृति का निर्माण कला और साहित्य के द्वारा ही होता है। प्रायः यह देखा गया है कि 'साहित्य और कला संस्कृति सामाजिक मूल्यों' का रूप धारण करके मानव के जीवन को प्रभावित करती रहती है तथा साहित्य और कला में निहित मूल्य सामाजिक परिवर्तनों के कारण बन जाते हैं।

               साहित्य निश्चित रूप से मनुष्य के मन पर प्रभाव डालता है,औद्योगिक और तकनीकी विकास के प्रभाव में भी वह अपने मूल्य और महत्व को स्थापित किया गया है।साहित्य के द्वारा मनुष्य की रुचियों का परिष्कार संभव है। उसके द्वारा हम सामाजिक जीवन में छिपी विसंगतियों और विषमताओं के प्रति समाज को सजग कर सकते हैं। इतना ही नहीं, साहित्य जीवन की जटिलता का बोध दे कर, मनुष्य को सामाजिक चेतना से युक्त भी कर सकता है और उसे एक सामाजिक के रूप में जागरूक भी बनाता है।

            साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं, सामाजिक यथार्थ का एक दस्तावेज माना जाता है।साहित्य में सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों का ही रूपांतरण होता है। रचनाकार भी और उसकी संवेदना भी उसे सामाजिक परिस्थितियों से संबंध करती है।

            साहित्य को जीवन से जोड़नेवाले साहित्यकार के लिए यह अनिवार्य है कि उसकी दृष्टि यथार्थवादी हो।अर्थात जब तक साहित्यकार सामाजिक यथार्थ को गहराई और ईमानदारी से नहीं देखता, तब तक साहित्य का प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है।

 

आलोचना

             संस्कृत शब्द आलोचना 'लोच' धातु से बना है, जिसका अर्थ है देखना, इसमें 'सम' उपसर्ग लगाने से इसका अर्थ हुआ 'सम्यक प्रकार से देखना या परीक्षण करना।'

             समालोचन का अंग्रेजी पर्याय 'क्रिटिसिज्म(criticism)' जो मूल ग्रीक शब्द से बना है'क्रिटोज(critos)'से बना है, जिसके कई अर्थ हैं,जैसे निर्णय करना, छिद्रान्वेषण करना,सौंदर्य का मूल्यांकन करना आदि।अतः समालोचन के माध्यम से कला और विशेषकर साहित्य कला की व्याख्या विश्लेषण का मूल्यांकन किया जाता है

'आलोचना' का सामान्य अर्थ किसी वस्तु या व्यक्ति के दोषों की चर्चा करना है किंतु साहित्य क्षेत्र में इसे थोड़े भिन्न एवं व्यापक अर्थ में ग्रहण किया गया है। साहित्य में किसी भी साहित्यिक रचना के विवेचन-विश्लेषण, गुण-दोष दिग्दर्शन या मूल्यांकन को अथवा साहित्य के संबंध में किसी सामान्य विचार, सिद्धांत या नियम के प्रतिपादन को तथा उसकी ऐतिहासिक, सामाजिक या मनोवैज्ञानिक व्याख्या को आलोचना,समालोचना या समीक्षा के अंतर्गत स्थान दिया जाता है।

              आलोचना ललित साहित्य का अंग है। वह बुद्धि का विलास नहीं है। कविता, उपन्यास एवं नाटक की ही तरह आलोचना भी सर्जनात्मक संदर्शन(creative vision)से अनुविद्ध  एवं परिव्याप्त रहती है।साहित्य को दिशा तो स्त्रष्टा कलाकार ही देता है। किंतु संघात और प्रतिघात से आलोचक उनकी प्रतिभा पर बाण रखने का कार्य करता है।

    आलोचना के स्वरूप एवं महत्व को जानने के लिए विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई आलोचना की विभिन्न परिभाषिओं से परिचित होना आवश्यक है।

    हमें 'शास्त्रीय आलोचना' का प्रादुर्भाव भरतमुनि के ग्रंथ 'नाट्यशास्त्र' से मानना चाहिए। भरतमुनि के इस ग्रंथ को अनेक विद्वानों ने 'काव्य स्वरूप शास्त्र' और 'पंचम वेद' की संज्ञा भी दी है। इसके बाद शास्त्रीय आलोचना का विकास हमें छः प्रमुख संप्रदायों के रूप में दिखाई देता है जिसे हम रस-सिद्धांत,अलंकार-सिद्धांतरीति -सिद्धांत, वक्रोक्ति-सिद्धांत, ध्वनि-सिद्धांत और औचित्य सिद्धांत के नाम से जानते हैं।

 

    आलोचना,समालोचना और समीक्षा ये तीनों पर्यायवाची शब्द है,आलोचना वस्तुतः व्यक्ति, समाज,राज्य,देश,धर्म,शासन आदि किसी की भी हो सकती है, पर साहित्य में इसका अर्थ है 'साहित्यालोचन' या 'Literary Criticism'

    बाबू श्यामसुंदर दास के अनुसार- "किसी ग्रंथ को पढ़कर उसके गुण दोषों का विवेचन करना और उस पर अपना मत स्थिर करना आलोचना कहलाता है।यदि हम साहित्य को जीवन की व्याख्या मानें तो आलोचना को उस 'व्याख्या' की व्याख्या मानना पड़ेगा।"

     बाबू गुलाबराय के अनुसार- "आलोचना का मूल उद्देश्य कवि की कृति का भी सभी दृष्टिकोण से आस्वाद कर,पाठकों को उसी प्रकार के आस्वादन में सहायता देना तथा उनकी रुचि को परिमार्जित करना एवं साहित्य की गतिविधि निर्धारण  करने में योग देना है।

     डॉ.सुरेशचंद्र गुप्त जी की परिभाषा के अनुसार आलोचना के कार्य हैं-

1.वर्गीकरण

2.कृति का विश्लेषण

3. विशेषताओं का निरूपण 

4.उपलब्धियों की न्यूनताओं का मूल्यांकन

5.तुलना

6.प्रभाव

7.निर्णय

8.महत्त्व निर्धारण

रिचर्ड्स के अनुसार- "आलोचना साहित्य कृति के विचार पूर्ण विवेचनोपरांत,उसका मूल्यांकन करती है।

 

साहित्यिक आलोचना

     साहित्य के क्षेत्र में आलोचना का अर्थ पहले पहले छिद्रान्वेषण माना गया और जब-जब यह शब्द प्रयुक्त हुआ प्रायःअर्थ यही रहा कि लेखक की भूल-चूक और उसकी कुर्ती का न्यूनताओं की ओर संकेत किया जाए।

    19वीं शती में ही आलोचना के अर्थ तथा उसके प्रयोग में परिवर्तन हुआ। अब आलोचना का अर्थ छिद्रान्वेषण रहा और आलोचक का यह धर्म रहा कि वह साहित्यकार के प्रति विरोधी भावना रखें और उसकी त्रुटियों का संकलन करें।

     डाइडेन के अनुसार- "आलोचना निर्णय की ऐसा मानदंड है जो उन साहित्यिक विशिष्टताओं का लेखा रखती है जो साधारणतया किसी विचारशील पाठक वर्ग को आनंददाई होंगे।आलोचना हमारे तर्क का भी मानदंड होगी।"

     कॉलरीज के अनुसार- "समालोचना का वास्तविक उद्देश्य साहित्य निर्माण के नियमों का निर्धारण मात्र है; उसका ध्येय निर्णयात्मक नियमों की सूची बनाना नहीं। इन दोनों उद्देश्यों को संभवतः पृथक रखना चाहिए।"

     अर्नाल्ड के अनुसार-" किसी भी वस्तु का यथावत परिशीलन आलोचना का प्रमुख ध्येय रहेगा। उसे सर्वश्रेष्ठ तथा सर्वोन्नता विचारों की खोज करनी पड़ती और उनके प्रचार में दत्तचित होना पड़ेगा।"

    दिनकर के अनुसार- "आलोचना काव्य में प्रयुक्त कौशल का रहस्य उद्घाटित करती है, उस मार्ग का भेद व्यक्त करती है, जिस पर चलकर कवि ने अपने भावों को अभिव्यक्त किया है, अपनी कविता में प्रभाव या चमत्कार उत्पन्न किया है। इसलिए रचनात्मक आलोचना के पढ़ने से पाठक की आनंद ग्रहिणी योग्यता का प्रचार होता है।


आलोचना के तत्व

           आलोचना के लिए एक निश्चित प्रक्रिया या पद्धति होती है जिस पर आलोचना का स्वरूप निर्भर करता है ।सामान्यतया आलोचना मानव मन पर पड़े किसी कृति या रचना की प्रतिक्रिया का व्यवहारिक रूप है और यहांँ यह स्मरणीय है कि किसी भी कृति या रचना के अध्ययन मनन से मन पर उस कृति या रचना के संबंध में कुछ प्रतिक्रियाएंँ होती हैं कुछ निर्णय भी बनते हैं तथा उन्हीं प्रतिक्रियाओं और निर्णयों को आलोचना अभिव्यक्त करती है। उक्त प्रतिक्रिया अभिव्यक्त पाकर आलोचना का स्वरूप धारण करने के लिए निम्नलिखित तीन सोपान हैं-

1. विषय बोध और प्रभाव का व्याख्या

2.व्याख्या एवं विश्लेषण 

3.मूल्यांकन एवं निर्णय

 

विषय बोध और प्रभाव ग्रहण

         किसी भी कृति के विषयबोध पर ही प्रभाव ग्रहण की प्रक्रिया आधारित होती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जब तक आलोचक के सामने विषय बोध का स्पष्टीकरण होगा, वह आलोचना करने में असमर्थ ही रहेगा। अतएव विषय बोध में केवल कृति का सम्यक ज्ञान सम्मिलित रहता है अपितु उस कृति का पूर्ण निरीक्षण एवं उस  में पूरी पॉइंट एवं छानबीन भी आती हैं ।इस प्रकार विषय का पूर्ण ज्ञान होने पर ही उसके प्रभाव की पूर्णानुभूति भी संभव है और आलोचक को संबद्ध कृति से संबंधित समकालीन परिस्थितियों तथा समसामयिक साहित्यकारों एवं उनके कृतित्व आदि का भी पूर्ण ज्ञान होना चाहिए जिससे कि वह कृति पर पड़े प्रभाव का भी पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सके।

व्याख्या एवं विश्लेषण

               वस्तुतः जब आलोचक किसी कृति के विषय को पूर्ण रूप से समझ लेता है और उसका उसके मन पर पूर्ण प्रभाव पड़ जाता है वह उसकी व्याख्या करने में प्रयुक्त होता है।सामान्यता व्याख्या का अर्थ किसी भी कृति का सर्वांग विश्लेषण एवं विवेचन करना होता है।

मूल्यांकन एवं निर्णय

               आलोचक किसी कृति के जिस प्रभाव को ग्रहण करता है, उसकी अपनी लोग दृष्टि से व्याख्या करता है और अंत में उस पर निर्णय भी देता है। इस संबंध में रिचर्ड्स ने स्पष्ट रूप से कहा है कि -"आलोचक होने का अर्थ यह है कि वह किसी वस्तु या कृति का गुण-दोष विवेचन करके मूल्यों का निर्धारण करें।" इसमें कोई संदेह नहीं कि रचना के संबंध में एक निश्चित धारणा व्यक्त किए बिना आलोचक का कर्तव्य पूर्ण नहीं होता और निर्णय से केवल आलोचना का स्वरूप स्थिर होता है बल्कि रचना के महत्व का प्रतिपादन होता है।

 

आलोचना की पद्धतियांँ

         आज हिंदी में आलोचना के  कई प्रकार प्रचलित हैं ।आलोचना की पद्धतियांँ पाश्चात्य  की हैं तथापि हम कह सकते हैं कि भारतवर्ष में संस्कृत आलोचना की भी अनेक पद्धतियाँ हैं- वे इस प्रकार हैं

आचार्य पद्धति

टीका पद्धति

शास्त्रीय पद्धति

सूक्ति पद्धति

खंडन पद्धति

लोचन पद्धति।


आचार्य पद्धति

    इस पद्धति के अंतर्गत काव्य कृतियों का परीक्षण रीति ग्रंथों के मान्य सिद्धांतों के आधार पर किया जाता है ।शास्त्रों के ज्ञाता पंडित आचार्य कहलाते थे। इसी से यह पद्धति 'आचार्य पद्धति' कहलाती है।

 टीका पद्धति

                 इस पद्धति से मूलग्रंथ की टीका लिखी जाती है, जिसमें कठिन प्रसंगों को समझाया जाता है, कवि का आशय स्पष्ट किया जाता है, काव्य की विशेषताओं यथा रस,ध्वनि,अलंकार रस रीति  आदि पर प्रकाश डाला जाता है।

 शास्त्रीय पद्धति

                इस पद्धति के अनुसार तर्कों प्रमाणों के आधार पर ग्रंथ में प्रतिपादित मत का खंडन- मंडन किया जाता है,यह पद्धति साहित्य की अपेक्षा दर्शनशास्त्र के ग्रंथों पर अधिक लागू होती है।

 सूक्ति पद्धति

                इस पद्धति के अनुसार किसी कवि या कृति का महत्व या सौंदर्य निरूपण सूक्तियों के रूप में कर दिया जाता है।

खंडन पद्धति

                इस पद्धति के अंतर्गत किसी कृति के दोषों का निरूपण किया जाता है तथा अन्य में प्रतिपादित विचारधारा का खंडन किया जाता है। शास्त्रार्थ में इस पद्धति का सहारा लिया जाता है।

लोचन पद्धति

               इस पद्धति के अंतर्गत ग्रंथ का पूर्ण अध्ययन कर, उसमें अंतर्निहित भाव सौंदर्य,उत्ती  वैचित्र,कलात्मकता, विचार गांभीर्य आदि पर सम्यक प्रकाश डाला जाता है। आज की आलोचना पद्धति का आधार इसी पद्धति को माना जाता है।

 

आलोचना के प्रकार

             हिंदी साहित्य में शुक्ल जी द्वारा लिखित तुलसी, सूर, जायसी की समीक्षाएं, हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित 'कबीर' की विस्तृत समीक्षा, नंद दुलारे वाजपेयी द्वारा लिखित 'सूरदास' जयशंकर प्रसाद, डॉ नागेंद्र द्वारा लिखित 'साकेत:एक अध्ययन' तथा 'सुमित्रानंदन पंत', डॉ इंद्रनाथ मदान की 'प्रेमचंद',डॉ. माता प्रसाद गुप्त की 'तुलसीदास', गंगा प्रसाद पांडेय द्वारा लिखित 'छायावाद', डॉ. रामविलास शर्मा द्वारा लिखित भारतेंदु, निराला, आचार्य रामचंद्र शुक्ल आदि ग्रंथ हिंदी साहित्य की स्थाई नीति बन गए हैं।

          मुख्यतःआलोचना के तीन प्रकार माने जा सकते हैं-

 1.सैद्धांतिक

2.व्यावहारिक

3.अनुसंधान परक

 

1.सैद्धांतिक समीक्षा:

                बहुत सी कृतियों का अध्ययन कर जब आलोचक कुछ सामान्य मानदंडों, नियमों या सिद्धांतों का निर्धारण कर लेता है, उसे "सैद्धांतिक आलोचना" कहते हैं। आलोचक का कार्य केवल इतना ही नहीं है कि वह किसी के उचित और अनुचित का निर्देशन करें,उसका कर्तव्य है कि उन सिद्धांतों और नियमों को खोज निकाले जिनके आधार पर उस काव्य कृति  का निर्माण किया गया हो। साहित्य के परीक्षण हेतु मानदंडों का निर्धारण ही "सैद्धांतिक आलोचना" है।

                 हिंदी में आचार्य केशवदास की 'कवि प्रिया' और 'रसिक प्रिया', कन्हैयालाल पोद्दार की 'रस मंजरी', शुक्ल जी की 'रस मीमांसा', डॉ. श्यामसुंदर दास की 'साहित्यालोचन', बाबू गुलाबराय की 'सिद्धांत और अध्ययन', डॉ नगेंद्र की 'रस-सिद्धांत" तथा डॉ. रामदहिन मिश्र की "काव्यालोक" के सिद्धांत निरूपण करने वाली कुर्तियां कह सकते हैं।

                भामह, दंडी, उद्भव, वामन, रूद्रट, भोज, मम्मट, रुय्यक,वाग्मट, जयदेव, विश्वनाथ तथा पंडितराज जगन्नाथ तक साहित्य चिंतन की एक सुधीर्घ परंपरा दृष्टिगोचर होती है। आनंद वर्धन द्वारा रचित"ध्वन्यालोक" संस्कृत साहित्य चिंतन का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है।

 

2.व्यावहारिक आलोचना

             सैद्धांतिक आलोचना के विपरीत व्यावहारिक आलोचना के अंतर्गत आलोचक साहित्य शास्त्रियों द्वारा नियमों, सिद्धांतों, मानदंडों आदि के आधार पर किसी कृति के अंतर्बाह्य की  परीक्षा कर, उसकी व्याख्या, विश्लेषण आदि करता है। व्यवहारिक समीक्षा के पुनः तीन भाग हैं-

1. प्रभावत्मक या आत्म प्रधान (Subjective Criticism)

2. व्याख्यात्मक आलोचना (Inductive Criticism)

3. निर्णयात्मक आलोचना (Judicial Criticism)

 

1.प्रभावात्मक या आत्म प्रधान

 (Subjective Criticism):

                इस समीक्षा के अंतर्गत समीक्षक किसी कृति को सांगोपांग पढ़कर वैयक्तिक रुचि-अरुचि के अनुरूप उसकी आलोचना प्रस्तुत करता है। इस प्रकार की समीक्षा में किसी सिद्धांत या विचारधारा की अपेक्षा आलोचक की रूचि का ही प्रभाव अधिक हुआ है। हिंदी में पद्म सिंह शर्मा, शांतिप्रिय द्विवेदी आदि समीक्षा स्कूटी में आते हैं।

 

व्याख्यात्मक आलोचना Inductive criticism

               इसके अंतर्गत साहित्यिक कृतियों की व्याख्या, वर्गीकरण, विश्लेषण, विवेचन, मूल्य-निर्धारण आदि किया जाता है। समालोचक कृति का अध्ययन एक अन्वेषक के रूप में करता है। न्यायाधीश के रूप में नहीं। वह रचयिता की मनोवृति, अभिरुचि, विचारधारा, दृष्टिकोण आदि को उदारता पूर्वक समझने का प्रयत्न करता है। व्याख्या द्वारा आलोचक सामान्य पाठक के लिए कृति के आस्वादन के नए मार्ग खोलता है। उसे सूक्ष्म सौंदर्य का बोध करता है।  हिंदी में आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य नंददुलारे वाजपेई, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा आदि ने इसे प्रशस्त किया।

          व्याख्यात्मक आलोचना पद्धति के अंतर्गत निम्न आलोचना पद्धतियों का समावेश किया जा सकता है

1.शास्त्रीय

 2.मनोवैज्ञानिक

3. ऐतिहासिक

4.तुलनात्मक

5 प्रगतिवादी

 

1.शास्त्रीय समीक्षा पद्धति(Academic Criticism):

             इस पद्धति में सामान्यत: शास्त्र सम्मत नियमों को ही समीक्षा का निष्कर्ष माना जाता है अतः आज यह पद्धति आउटडेटेड(Out dated) हो चुकी है। यानी पुरानी हो चुकी है।

 

 2.मनोवैज्ञानिक:

         इस आलोचना का सूत्रपात  विश्व प्रसिद्ध मनोचिकित्सक सिग्मंड फ्रायड के मनोविश्लेषण सिद्धांत(Psycho-analytic) के आधार पर हुआ। फ्राइड ने अपने मनोवैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर यह प्रतिपादित किया कि-"समग्र कलाओं का सर्जन वस्तुतः कलाकार की अतृप्त वासनाओं की तृप्ति का साधन है।"

        फ्रायड की मान्यता है कि मानव मन के गहन स्तरों में लगातार अनुभूतियों, संवेदनाओं, विचारों आदि का संग्रह रहता है। कालांतर में इन्हीं की अभिव्यक्ति स्वप्न तथा कला सर्जना के रूप में होती है।

       हिंदी में आचार्य शुक्ल ने इस पद्धति का विकास किया। उन्होंने तुलसी, जायसी सूर की व्याख्या करते समय तत्कालीन परिस्थितियों का भी आकलन किया। हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन में उनकी यही दृष्टि स्वतंत्र व्यक्त हुई है। कालांतर में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी,परशुराम चतुर्वेदी, डॉ रामलाल शर्मा आदि ने इस दृष्टि को विकसित किया।

 

3.ऐतिहासिक समीक्षा( Historical Criticism):

 

   इतिहास आलोचना -ये दोनों पृथक विषय होकर भी एक दूसरे पर आश्रित हैं।इतिहासिक प्रणाली द्वारा आलोचक लेखक के समय को राजनैतिक,सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों की छान-बीन कर, उनके बीच कलाकार के विकास क्रम को निर्धारित करता है।

 

तुलनात्मक आलोचना

(Comparative criticism):

 

 तुलनात्मक आलोचना पद्धति के अंतर्गत एक ही लेखक की विभिन्न कृतियों या दो लेखकों की कृतियों या दो विभिन्न युगों के लेखकों की या दो विभिन्न भाषाओं के लेखकों की कृतियों की तुलना की जा सकती है।         

       आज के युग में तुलनात्मक आलोचना का बड़ा महत्व है। भारत की अनेक भाषाओं की कुर्तियों,लेखकों, प्रवृत्तियों आदि का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया जा रहा है। शचीरानी गुर्टु ने अपनी पुस्तक 'साहित्य दर्शन' में हिंदी-अंग्रेजी के कई कवि लेखकों की तुलनात्मक समीक्षा प्रस्तुत की।

प्रगतिवादीआलोचना(Progressive Criticism):

          इस प्रकार की समालोचना का आधार मार्क्सवाद तथा सामाजिक यथार्थवाद(Socialitic Criticism) है। दर्शन में जो मार्क्सवाद हैं, राजनीति में जो समाजवाद हैं, साहित्य में वही प्रगतिवाद हैं। प्रगतिवाद का मूल आधार है-मार्क्स का द्वंदात्मक भौतिकवाद, वर्ग-संघर्ष का सिद्धांत, इतिहास, सौंदर्य धर्म की नवीन व्याख्या।कल्पना के बदले वैज्ञानिक दृष्टि, वैयक्तिक साहित्य के बदले सामाजिक यथार्थवादी साहित्य को बल, सूक्ष्मता के बदले स्थूलता, वर्ग संघर्ष की अभिव्यक्ति, ईश्वर, धार्मिक,आडंबर, कर्मवाद आदि का विरोध कर 'श्रमजीवी' मानव की प्रतिष्ठा-इस समालोचना का लक्ष्य है। सन् 1936 में लखनऊ प्रगतिवादी लेखक संघ की स्थापना हुई।

             श्री प्रकाश चंद्र गुप्त,डॉ. रामविलास शर्मा, शिवदान सिंह चौहान,डॉ. भगवतशरण उपाध्याय, अमृतराय नामवर सिंह आदि हिंदी के मूर्धन्य प्रगतिवादी आलोचक हैं

 

निर्णयात्मक आलोचना( Judicial criticism):

यह पद्धति पुरानी या आउटडेटेड मानी जाती है।इसके अंतर्गत आलोचक अपनी व्यक्तिगत रूचि या व्याख्यात्मक आलोचना के आधार पर कवियों की कोटियाँ निर्धारित कर,उन्हें उच्च या निम्न पदों पर आसीन करता है।

 

 अनुसंधान परक आलोचना:

 

           एक समर्थ आलोचक अनुसंधान द्वारा नए तथ्यों का खोज कर कृति कृतिकार का पुनर्मूल्यांकन करता है।आजकल विश्वविद्यालय में अनुसंधान अनुसंधानात्मक आलोचना को काफी श्रेय मिल रहा है।हिंदी के प्राचीन मध्ययुगीन साहित्य पर सतत अनुसंधान,पाठ संशोधक संपादन आदि के द्वारा कई नवीन तथ्य सामने आये हैं।अनुसंधाता इस संदर्भ में इतिहास,नृतत्व- शास्त्र,समाज-शास्त्र, भाषा- विज्ञान, लोकगाथा, धर्म, दर्शन आदि का सहारा लेता है।

 

आलोचक के गुण

 

एक समर्थ आलोचक एक सफल सर्जक भी होता है।वह न केवल किसी कवि की अथवा कृति की सांगोपांग आलोचना करता है, प्रयुक्त आलोचना के रूप में एक नवीन कृति को जन्म भी देता है।इस कृति में साहित्य के सारे गुण होते हैं। इसलिए आलोचक में निम्न गुणों की अपेक्षा की जाती है।

 1.भावयित्री और कारयित्री प्रतिभा (Critical and Creative talent )

होनी चाहिए।

 

2.विद्वत्ता विविध विषयों का ज्ञान

3. सहृदय गुण ग्राहिता

4 निष्पक्षता-दलगत भावना का त्याग अहम्मन्यता का निषेध

 5.अंतर्दृष्टि

 6.तार्किकता और संगति

 7.जीवन के साथ गहन संपुक्ति

 8 साहित्य शास्त्र का ज्ञान

 9 भाषा पर अच्छा अधिकार।

 

               अंततः हम यह कहते हैं कि आलोचक में उपर्युक्त गुणों के होने के साथ-साथ विवेक होना चाहिए।विवेक के द्वारा ही वह सद्-असद् की पहचान कर सकता है। अर्नाल्ड ने कहा है कि आलोचना ईमानदार, सीधी-सादी, लचीली सत्यनिष्ठ ज्ञान के क्षेत्र का विस्तार करने वाली होनी चाहिए।

 

निष्कर्ष

 

            संस्कृत शब्द आलोचना से बना है जिसका अर्थ है देखना। इसमें सम उपसर्ग लगाने से इसका अर्थ सम्यक प्रकार से देखना या परीक्षण करना। समालोचक का अंग्रेजी परिश्रम से जो मूल ग्रीक शब्द प्रयोग से बनाएं जिसके कई अर्थ हैं जैसे निर्णय करना ,छिद्रान्वेषण करना सौंदर्य का मूल्यांकन करना। आलोचना के माध्यम से कला और विशेषकर साहित्य कला की व्याख्या, विश्लेषण मूल्यांकन किया जाता है। किसी कृति अथवा साहित्य का अध्ययन विश्लेषण, विवेचन, तत्कालीन स्थितियों का आकलन के व्यक्तित्व का उद्घाटन सृजन प्रक्रिया, गुण-दोष, विवेचन, मूल्यांकन आदि साहित्यालोचन के अंतर्गत जाते हैं।

आलोचना का संबंध हमारे रुची तथा हमारे हृदय से है। जीवन में पग-पग पर हमें आलोचना के दर्शन होते हैं और प्रतिक्षण हम अपनी आलोचनात्मक शक्ति का परिचय अनेक रूपों में दिया करते हैं।निस्संग भाव से की गई आलोचना और मूल रचना के एक साथ अनुशीलन से पाठक की बोध-वृत्ति  या जन रुचि का निश्चय ही परिष्कार होगा, क्योंकि उसके माध्यम के सत्साहित्य का प्रचार और असत्य साहित्य का बहिष्कार किया जाता है ।अतः हम यह कह सकते हैं कि साहित्य के उचित मूल्यांकन के लिए आलोचना का आश्रय आवश्यक है।

 


कमलेकर नागेश्वर राव

                       एस.(हिंदी)

अच्चंपेट, नागरकर्नूल जिला

तेलंगाना राज्य।

9848493223.

 

सहायक पुस्तकें--

साहित्यालोचन -श्यामसुंदर दास

डॉ.बी.आर...यु.,बी.3(एच)4


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