कथा सरोवर
(लघु कथा)
- रफीखा बेगम 'शायरिन'
जोसेफ नामक युवक था। वह एक होटेल में मैनेजर की नौकरी कर रहा था। वह एक अनाथाश्रम में पला बड़ा था। उसे पढ़ाई के प्रति लगन और श्रद्धा होने के कारण उसने स्नातक की पढ़ाई पूरी कर ली थी। वह दिखने में भी बहुत सुंदर और आकर्षक था। इतना ही नहीं वह ईमानदारी का दूसरा नाम था।
होटेल में आनेवाले ग्राहक भी जोसेफ को बहुत पसंद करते थे और वह भी उन सबसे स्नेहपूर्वक व्यवहार करता था।इस प्रकार वह सबका मित्र व शुभचिंतक बन गया था।
उस होटेल में एक बुजुर्ग ग्राहक हर दिन आया करते थे जो लगभग सत्तर वर्ष के थे। हर दिन जोसेफ से कुछ देर बात करते और चाय पीकर जाते थे।
एक दिन होटेल के मालिक विदेश से आनेवाले थे। उनके आने का संदेश पाकर जोसेफ ने होटेल को फूलों से सजवाया। तरह-तरह के भोजन बनवाए।
जोसेफ फूल माला लेकर मालिक का स्वागत करने बाहर खड़ा उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। इतने में हर रोज़ आनेवाले बुजुर्ग ग्राहक आकर बैठे। उनकी हालात कुछ ठीक नहीं थी और उनकी साँस फूल रही थी। उनकी परिस्थिति को देखकर, जोसेफ ने उनको पानी लाकर पिलाया। फिरभी उनकी स्थिति ठीक नहीं हुई और वे कुर्सी से नीचे गिर गये।
जोसेफ तुरंत उनको अपने हाथों में उठाकर, अपनी गाड़ी पर बिठाकर पासवाले अस्पताल ले गया। कुछ समय के बाद होटेल पहुँचा तो मालिक आ चुके थे। गुस्से में जोसेफ पर चिल्लाने लगे- " तुम्हें ज़री सी भी अक्ल है? कि तुम मेरा स्वागत न करके किसी गैर को अस्पताल ले गये।" मालिक बहुत ज़ोर से चिल्ला रहे थे। लेकिन जोसेफ मुस्कुराते ही सब सुन रहा था। उसे बुरा भी नहीं लगा। वह सोच रहा था कि मालिक भी अपनी जगह सही है। इतने में मालिक का फोन बजा। फोन उठाकर वे सुनते रहे।उनकी आंखों से आँसू बह रहे थे। जोसेफ घबराकर पूछने लगा कि "क्या हुआ मालिक?"
मालिक ने जोसेफ से कहा, "तुम जिसे अस्पताल ले गये थे, वे मेरे पिताजी हैं। वे हर दिन ग्राहक की तरह आकर होटेल का ध्यान रखते थे। उन्होंने बताया कि तुम्हारे कारण से ही होटेल अच्छा चल रहा है। क्रोध में आकर न जाने तुम्हे क्या- क्या कह दिया। मुझे क्षमा करो।"
जोसेफ की ईमानदारी ने मालिक को भी शांत और सज्जन बना दिया। उन्होंने जोसेफ को पचास हज़ार रुपये उपहार के रूप में दिये।
जोसेफ बिना संकोच किये उन पैसों को ले लिये। मालिक से इजाज़त लेकर कुछ खाना भी पैक कराया और अपने साथ ले जा रहा था।
होटेल के मालिक जानना चाहा कि जोसेफ इतना सारा खाना कहाँ ले जा रहा है।
उसका पीछा करते हुए अपनी गाड़ी में जा रहे थे।
जोसेफ अपने अनाथाश्रम पहुंचा। वहाँ के बच्चों को भरपेट खाना खिलाया। सब बच्चे बहुत खुश हो रहे थे कि उनको स्वादिष्ट खाना खाने को मिला। दूर से यह दृश्य देखकर होटेल के मालिक की आँखों में आँसू आ गये।
जोसेफ ने इनाम के रुपयों को ले जाकर अपने अनाथाश्रम के फादर को दिये।
होटेल का मालिक जोसेफ के पास आकर उसकी खूब प्रशंसा की।
वास्तव में जोसेफ की ईमानदारी ही अनाथाश्रम को दिया हुआ सच्चा उपहार है।
शिक्षा:- ईमानदारी और सज्जनता ही हमारे सच्चे आभूषण हैं।
रफीखा बेगम 'शायरिन'
70937 16276
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