Tuesday, February 1

आधुनिक परिप्रेक्ष्य में बाल साहित्य - श्रीमती कविता (साहित्य मंथन)

साहित्य मंथन


आधुनिक परिप्रेक्ष्य में बाल साहित्य

-  श्रीमती कविता


    आज के बदलते पारिवारिक परिवेश और जीवन-मूल्यों के कारण  दादा-दादी और नाना-नानी द्वारा कहनियाँ तथा जीवनानुभव सुनने की परंपरा विलुप्त होती जा रही है| लोगों के पास इतना अवकाश नहीं रहा कि वे अपने बच्चों के बारे में कुछ सोचें और करें|

     दुष्यंत कुमार की पंक्तियों में कहा जा सकता है –

                 “मेले में भटके होते तो, कोई घर पहुँचा जाता

          हम घर में भटके है, कैसे ठौर-ठिकाने आएँगे|”

    वास्तविक रूप से देखा जाए तो यह सच है कि आज की यांत्रिक जिंदगी ने अभिभावकों को इतना संवेदनशून्य बना दिया है कि उन्हें अपने ही बच्चे के अंतर्मन को झाँकने की फुरसत नहीं है तो इसके अलावा अन्य पारिवारिक रिश्तों के निर्वाह की बात बेइमानी होगी| माता-पिता को बच्चों को देने के लिए खिलौने, पैसे, कीमती कपड़े तो है परंतु समय का अभाव है| उच्च संपन्न वर्ग के परिवार का बच्चा एकाकीपन की पीड़ा झेल रहा है| मध्यम वर्ग के परिवार का बच्चा माता-पिता की महत्त्वाकांक्षा की भेट चढ़ रहा है| निम्न वर्ग का बच्चा अभावों का गरल पीने के लिए अभिशप्त है| इस तरह देखा जाए तो बच्चों का समूचा बचपन संकटग्रस्त है| यह भारत ही नहीं अपितु संपूर्ण वैश्विक परिवार की चिंता का विषय है|

    तुम उन्हें अपना प्यार दे सकते हो, लेकिन विचार नहीं. क्योंकि उनके पास अपने विचार होते हैं. तुम उनका शरीर बंद कर सकते हो, लेकिन उनकी आत्मा नहीं, क्योंकि उनकी आत्मा आने वाले कल में निवास करती है. उसे तुम नहीं देख सकते हो, सपनों में भी नहीं देख सकते हो, तुम उनकी तरह बनने का प्रयत्न कर सकते हो. लेकिन उन्हें अपने जैसा बनाने की इच्छा मत रखना. क्योंकि जीवन पीछे की ओर नहीं जाता और न ही बीते हुए कल के साथ रुकता  हैl

    बालमनोविज्ञान को उजागर करती, बच्चों में विश्वास दर्शाने वाली यह उक्ति खलील जिब्रान की है. कई शताब्दियों पहले कही कही गई यह बात आज भी उतनी ही सच एवं महत्त्वपूर्ण है जितनी कि उस जमाने में थी. मामूली–सी लगने वाली यह बात बालकों के मनोविज्ञान को पूरी तरह स्पष्ट करती है.

    बाल साहित्य के प्रसिद्ध कवि सोहनलाल द्विवेदी ने बाल साहित्य का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहा है "सफल बाल साहित्य वही है जिसे बच्चे सरलता से अपना सकें और भाव ऐसे होंजो बच्चों के मन को भाएँ। यों तो अनेक साहित्यकार बालकों के लिए लिखते रहते हैंकिन्तु सचमुच जो बालकों के मन की बातबालकों की भाषा में लिख देंवही सफल बाल साहित्य लेखक हैं।

    आज समय बड़ी तेजी से बदल रहा है,जिसका सर्वाधिक प्रभाव बच्चों पर है| कुछ लोगों का मानना तो यहॉ तक है, कि वर्तमान जगत् का बालक संस्कार-विहीन हो गया है| पर इस बात में कितनी सच्चाई है, यह जानने से पहले इस बात पर मंथन कर लेना समुचित होगा, कि उन्हें संस्कार-विहीन कर कौन रहा है? क्या हम उन्हें धर्म-कर्म, साहित्य-समाज, संस्कार और भाव-व्यंजना की शिक्षा देते हैं? क्या कभी भगवान राम, कृष्ण या किसी अन्य महापुरूष की जीवन या प्रेरक प्रसंग बच्चों को सुनाते या उन पर अमल करने के लिए बल देते हैं? क्या हमने कभी जानने की इच्छा की कि वह किस मानसिकता को धारण करता है और उसकी दिशा क्या है,क्या नहीं?केवल बड़े स्कूल या कॉलेज-कोचिंग में दाखिला दिलवाने से बच्चे राम, कृष्ण, गांधी, गौतम और विवेकानंद नहीं बन सकते, जब तक कि हम खुद में संस्कार डालकर बच्चों के हृदय की थाली में नहीं परोसेंगे| आज का बालक तकनीकी मस्तिष्क का हो गया है, जो शरीर और हृदय से रोबोट या मशीन बन चुका है| अगर यह ऐसे ही चलता रहा, तो निश्चित ही वह दिन दूर नहीं कि रोबोट आपको और आपके समाज और संस्कृति को नष्ट कर देगा| और उसके जिम्मेदार हम होंगे न कि बच्चे|

    असंयमित पश्चिमी जीवन शैली, हिंसक फिल्में, अश्लील, विज्ञापन क्राइम शो, एडवेंचर धारावाहिक, वीडियों, कंप्यूटर गेम, वर्तमान शिक्षा प्रणाली, मोबाइल, बाईक, इंटरनेट चैटिंग, असीमित जेब खर्च और विभिन्न टी.वी. चैनलों ने बच्चों में हिंसक प्रवृत्ति अप संस्कृति और उदंडता को जन्म दिया है| आज बच्चे असमंजस्य की स्थिति में दिशा विहिन चौराहे पर खड़े है| इस स्थिति से बच्चे को उबारने और सही रास्ते पर लाने का दायित्व बाल साहित्य लेखकों का ही बनता है|

    बाल–मनोविज्ञान के अनुरूप सहज संप्रेषणीय एवं मौलिक साहित्य की संकल्पना, आधुनिक युग की ही देन है l

    जहां तक हिंदी बालसाहित्य को स्वतंत्र पहचान मिलने का सवाल है उसकी शुरुआत आजादी के बाद और मुख्यतः छटे दशक से मानी जा सकती है. इस बीच हिंदी बालसाहित्य ने लंबी यात्रा तय की है. प्रकाशन संबंधी सुविधाओं, शिक्षा के प्रसार, वैज्ञानिक चेतना आदि के चलते आज बड़ी मात्रा में बालसाहित्य लिखा जा रहा है. इस बीच अनेक उत्कृष्ठ रचनाएं बालसाहित्य के नाम पर आई हैं. जिनपर हम गर्व कर सकते हैंl

    आधुनिक बालसाहित्य में दो प्रकार की प्र्रवृतियां साफ नजर आती हैं. आज भी एक बड़ा वर्ग है जो परंपरा और संस्कृति के प्रति मोह से इतना अधिक ग्रस्त है कि उनमें किसी भी बदलाव की संभावना को नकारते हुए वह बार–बार अतीत की ओर लौटने पर जोर देता रहा है. इस वर्ग के हिमायती साहित्यकार मानते हैं कि प्राचीन भारतीय वांड्मय में वह सबकुछ मौजूद है जो आज के बालक के मनोरंजन, शिक्षण तथा व्यक्तित्व–विकास संबंधी सभी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है और प्रायः राजा–रानी, जादू–टोने, उपदेशात्मक बोधकथाओं, लोककथाओं की भोंडी प्रस्तुति और परीकथाओं के लेखन या पुनर्प्रस्तुति मात्र से ही वे अपने साहित्यिक कर्म की इतिश्री मान लेते हैं. इनसे भिन्न दूसरे वर्ग के साहित्यकार परंपरा से हटकर आधुनिक सोच और ज्ञान–विज्ञान के उपकरणों से बालसाहित्य का मसौदा चुनते हैं और उपदेशात्मक लेखन के बजाए संवादात्मकता पर विश्वास रखते हैं.

    बाल साहित्‍य का उद्देश्‍य बाल पाठकों का मनोरंजन करना ही नहीं अपितु उन्‍हें आज के जीवन की सच्‍चाइयों से परिचित कराना है। आज के बालक कल के भारत के नागरिक है। वे जैसा पढ़ेगें उसी के अनुरुप उनका चरित्र निर्माण होगा। कहानियों के माध्‍यम से हम बच्‍चों को शिक्षा प्रदान करके उनका चरित्र निर्माण कर सकते हैं तभी तो ये बच्‍चे जीवन के संघर्षों से जूझ सकेंगे। इन बच्‍चों को बड़े होकर अंतरिक्ष की यात्राएं करनी हैं, चाँद पर जाना है और शायद दूसरे ग्रहों पर भी। बाल साहित्‍य के लेखक को बाल-मनोविज्ञान की पूरी जानकारी होनी चाहिए। तभी वह बाल मानस पटल पर उतर कर बच्‍चों के लिए कहानी, कविता या बाल उपन्‍यास लिख सकता है। बच्‍चों का मन मक्‍खन की तरह निर्मल होता है, कहानियों और कविताओं के माध्‍यम से हम उनके मन को वह शक्‍ति प्रदान कर सकते हैं जो उनके मन के भीतर जाकर संस्‍कार, समर्पण, सदभावना और भारतीय संस्‍कृति के तत्‍व बिठा सकते हैं।

    बाल साहित्य की भाषा गूढ़ नहीं, बल्कि सीधी सरल जो सहज समझ में आ सके ऐसी होनी चाहिए। शब्दावली भी ऐसी हो जो बच्चों को स्वयं अर्थ प्रदान करती चले। यथार्थ अर्थ द्वारा ही बच्चे समर्थ बन सकते हैं। हमारी लेखनी तब तक सार्थक नहीं कहलाएगी जब तक प्रत्येक बच्चा पढ़कर आनंद विभोर न हो जाए।

बाल साहित्य की अहमियत इस बात से समझी जा सकती है कि पंचतंत्र का अनुवाद दुनिया भर की लगभग सभी भाषाओं में हुआ है।  यह मानी हुई बात है कि जैसे शारीरिक पोषण के लिए अच्छे भोजनशारीरिक सुरक्षा के लिए कपड़े की आवश्यकता होती है वैसे ही मानसिक के लिए अच्छे साहित्य की भी आवश्यकता होती है। बाल साहित्यबच्चों के मन में अच्छे बनने के प्रति एक ललक जगाता है। बच्चों के मन में प्रकृति के प्रति जानवरों के प्रति बच्चों के मन में प्रेम जगाता हैउनके प्रति लगाव पैदा होते ही बच्चे ज्यादा संवेदनशील हो जाते हैं। फिर वे मानव के साथ मानवेत्तर जगत से भी जुड़ जाते हैं। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि साहित्य का एक काम उन लोगों के लिए बोलना है जो स्वयं नहीं बोल सकते। अतः बाल साहित्य इस क्षेत्र में समाज और परिवेश को सजग करने का महत्वपूर्ण कार्य करता आ रहा है। बाल साहित्य जहाँ एक तरफ कम उम्र के पाठकों को मनोरंजन प्रदान करता हैवहीं वह उनकी चेतना और सजगता को भी उत्प्रेरित करता है। यह बालकों को एक संवेदनशील मनुष्य के रूप में विकसित होने की स्थितियाँ देता है। वहीं यह नैतिकता को भी बचाने की जिम्मेदारी निभाता है। नैतिकता हमारे अस्तित्व के लिए सामाजिक अनुशासन के लिए प्राथमिक शर्त होती है। नैतिकता का उन्मेश बाल साहित्य में एक आवश्यक तत्व है।

    बाल साहित्य के अंतर्गत वह शिक्षाप्रद साहित्य आता है जिसका लेखन बच्चों के मानसिक स्तर को ध्यान में रखकर किया गया हो। बाल साहित्य में रोचक शिक्षप्रद बाल कहानियां ,बालगीत  व कविताएं प्रमुख है। बाल साहित्य ही वह सहायक सामग्री है जिसकी सहायता से बच्चे की मौखिक भाषा शैली संवर सकती है। अदायगी का विस्तार हो सकता है। और खुद उत्तर देने की क्षमता विकसित की जा सकती है।  बाल साहित्य के माध्यम से बच्चे कल्पना लोक में जाते हैं। अच्छा बाल साहित्य बच्चों को साहित्य से संवाद करने के अवसर प्रदान करता है और पढ़ी जा रही कहानी, कविता आदि पर अपनी राय बनाने के अवसर देता है। उनके भाषिक और संज्ञानात्मक कौशल का विकास होता है साथ ही बाल साहित्य बच्चों की भावनात्मक बुद्धिमत्ता के विकास के भी अवसर प्रदान करता है।

    बाल्यकाल सुखद अनुभूति और कल्पनाओं का सुनहरा संसार है फिर भी साहित्य की उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए यदि आप बच्चों को साहित्य देना ही चाहते हैं तो वह इस प्रकार का होना चाहिए जिससे हर दृष्टि से बच्चों का समुचित विकास हो सके। आधुनिक बाल जगत पूरी तरह विज्ञान की गिरफ्त में है। इलेक्ट्रानिक क्षेत्र की चुनौतियां और बच्चों की तीव्र होती बुद्धि तथा नई-नई जिज्ञासा के बीच सामंजस्य स्थापित करना संभव नहीं, बड़ा जटिल काम है। आज इक्कीसवीं सदी की दहलीज पर खड़ा बालक अपनी उम्र से आगे की कल्पना आसानी से कर लेता है भारत की अनूठी संस्कृति की गरिमा कायम रखते हुए बाल साहित्य ने अपने रंग-ढंग बदले हैं। समय के हिसाब से रूप परिवर्तन जरूरी है। बाल साहित्य में नैतिक शिक्षा, वैज्ञानिकदृष्टिकोण, देश-प्रेम, विचार-विमर्श, मर्यादा और आगे बढऩे की प्रबल इच्छा भी समाहित रहे तो निश्चित ही बच्चों को एक नई दिशा मिलेगी।

    बाल साहित्यसंस्कृतिसमाजराष्ट्रविश्व बंधुत्वशिक्षा और बच्चों के सर्वांगीण विकास की दृष्टि से बेहद महत्त्वपूर्ण है। आवश्यकता है तो केवल यह कि समाज निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बाल साहित्य का महत्त्व हम बड़े समझें और इसके समुचित विकासप्रसार पर ध्यान दें। बाल साहित्यबच्चों में आत्मविश्वास तथा आत्म-विकास एवं आत्म निष्ठा का संचार करता है। इसके माध्यम से बच्चे स्वयं को आधुनिक जीवन की चुनौतियों के अनुरूप ढालने में समर्थ होते हैं।

    बाल साहित्य का क्षेत्र व्यापक हो इसके लिए जरूरी समय-समय पर परिचर्चा, संगोष्ठी और सेमिनार भी हों| तभी जाकर बालक और बाल-साहित्य समृद्ध होगा|

    अब्राहम लिंकन का कथन है, “बालक एक ऐसा व्यक्ति है जो आपके कार्यों को आगे बढ़ाएगा| आज जहाँ आप बैठे है, वहीं कल वह बैठेगा| और जब आप चले जाएँगे तो आपके महत्त्वपूर्ण कार्यों को वह पूरा करेगा| आप अपनी इच्छा से कोई भी नीति अपना सकते हैं| किंतु उन्हें किस तरह पूरा करना है, यह बालक पर ही निर्भर करता है| आपकी सभी पुस्तकों का मूल्यांकन, उनकी प्रशंसा अथवा निंदा उसी के द्वारा होगी| वास्तव में मानवता का भविष्य बालक के ही हाथों में हो|”

श्रीमती कविता

सरकारी बालकोन्नत पाठशाला

गोशामहल,  हैदराबाद 

8106861187 


---------------------------------------------------------------------------------------

If you like this Writing and want to read more... Then Follow Us
or call
9849250784
for Printed Book
साहित्य मंथन
Editor
Prasadarao Jami

-----------------------------------------------------------------------------------------------------


scan to see on youtube



scan to join on WhatsApp




BOOK PUBLISHED BY :

GEETA PRAKASHAN

INDIA

Cell 98492 50784

geetaprakashan7@gmail.com

---------------------------------------------------------------------------------

do you want to publish your writing through our BLOGPAGE ?

Please call us 62818 22363

No comments:

Post a Comment

हमर छत्तीसगढ़ - मुकेश कुमार भारद्वाज (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "उथल पुथल - अक्षरों की")

(Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "उथल पुथल - अक्षरों की")      हमर छत्तीसगढ़  💐..................................💐 छत्त...